15.12.17

अदरक का पानी कई बीमारियों मे फायदेमंद //Ginger water is beneficial in many diseases



   भोजन को स्वादिष्ट व पाचन युक्त बनाने के लिए अदरक का उपयोग आमतौर पर हर घर में किया जाता है। वैसे तो यह सभी प्रदेशों में पैदा होती है, लेकिन अधिकांश उत्पादन केरल राज्य में किया जाता है। भूमि के अंदर उगने वाला कन्द आर्द्र अवस्था में अदरक, व सूखी अवस्था में सोंठ कहलाता है। गीली मिट्टी में दबाकर रखने से यह काफी समय तक ताजा बना रहता है। इसका कन्द हल्का पीलापन लिए, बहुखंडी और सुगंधित होता है।
अदरक में अनेक औषधीय गुण होने के कारण आयुर्वेद में इसे महा औषधि माना गया है। यह गर्म, तीक्ष्ण, भारी, पाक में मधुर, भूख बढ़ाने वाला, पाचक, चरपरा, रुचिकारक, त्रिदोष मुक्त यानी वात, पित्त और कफ नाशक होता है।
   वैज्ञानिकों के मतानुसार अदरक की रसायनिक संरचना में 80 प्रतिशत भाग जल होता है, जबकि सोंठ में इसकी मात्रा लगभग 10 प्रतिशत होती है। इसके अलावा स्टार्च 53 प्रतिशत, प्रोटीन 12.4 प्रतिशत, रेशा (फाइबर) 7.2 प्रतिशत, राख 6.6 प्रतिशत, तात्विक तेल (इसेन्शियल ऑइल) 1.8 प्रतिशत तथा औथियोरेजिन मुख्य रूप में पाए जाते हैं। सोंठ (सुखा अदरक) में प्रोटीन, नाइट्रोजन, अमीनो एसिड्स, स्टार्च, ग्लूकोज, सुक्रोस, फ्रूक्टोस, सुगंधित तेल, ओलियोरेसिन, जिंजीवरीन, रैफीनीस, कैल्शियम, विटामिन `बी` और `सी`, प्रोटिथीलिट एन्जाइम्स और लोहा भी मिलते हैं। प्रोटिथीलिट एन्जाइम के कारण ही सोंठ कफ हटाने व पाचन संस्थान में विशेष गुणकारी सिद्ध हुई है।
अदरक को अधिकतर लोग मसाले के रूप में यूज करते हैं. लेकिन अगर इसके पानी को रेग्युलर पिया जाए तो यह कई बड़ी बीमारियों को भी कंट्रोल करता है. इसमे मौजूद एंटी बैक्टीरियल, एंटी फंगल और एंटी इंफ्लेमेटरी प्रॉपर्टी बॉडी को हेल्दी रखने में मदद करती हैं.
अदरक का पानी बनाने की विधि :- 1 गिलास पानी में थोडा सा अदरक का टुकड़ा ले और उसको थोड़ी देर गर्म करे. जब पानी उबालकर थोडा कम हो जाए तो उसे ठंडा करके सिप सिप करके पीना है. एक दम से नहीं पीना. थोडा थोडा पीना है जैसे चाय पीते है, जैसे गर्म दूध पीते है, वैसे ही पीना है. आप एक काम और कर सकते है, रातको पानी में अदरक डालकर रख दे और सुबह उसको गर्म करके फिर ठंडा करके पिए. और जो टुकड़ा पानी में रह जाता है उसको चबाकर खा ले.
डायबिटीज कंट्रोल करे : रेगयूलर अदरक का पानी पीने से बॉडी का ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल होता है. इससे डायबिटीज की आशंका कम होती है.
सिरदर्द दूर करे : अदरक का पानी पीने से ब्रेन सेल्स रिलैक्स होती है. इससे सिरदर्द की प्रॉब्लम दूर होती है.
स्किन बनये हेल्दी :


रेगयूलर अदरक का पानी पीने से बॉडी के टोक्सिंस बाहर निकलते है. इससे ब्लड साफ होता है और पिम्पल्स, स्किन इन्फेक्शन का खतरा टालता है.

हार्ट बर्न करे दूर : खाना खाने के 20 मिनट के बाद एक कप अदरक का पानी पिएं. यह बॉडी में एसिड की मात्रा कंट्रोल करता है. इससे हार्ट बर्न की प्रॉब्लम दूर होगी.
कैंसर से बचाए : अदरक में एंटी कैंसर प्रॉपर्टी पाई जाती है. इसका पानी पीने से लंग्स, प्रोस्ट्रेट, ओवेरियन, कोलोन, ब्रेस्ट, स्किन और पेन्क्रिएटिक कैंसर से बचाव होता है.
वजन घटाए : अदरक का पानी पीने से बॉडी का मेटाबोलिजम सुधरता है. ऐसे में फैट तेजी से बर्न होता है और वजन घटाने में हेल्प मिलती है.
मसल्स पेन : अदरक का पानी पीने से बॉडी का ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है. इससे मसल्स रिलैक्स होती है और मसल्स पेन दूर होता है.
डाइजेशन सुधारे : अदरक का पानी बॉडी में डाइजेस्टिव जूस को बढ़ता है. इससे खाना जल्दी डाइजेस्ट करने में हेल्प मिलती हैं.
कुन्दन




9.12.17

दाँत के दर्द के तुरंत असर उपचार // Instant pain treatment of toothache



1॰हल्दी- हल्दी की गांठ भूनकर दाँत मे दबाने से दांत पीड़ा शांत होती है|
2.लहसुन- दांतों मे छेद होकर काले पड गए हों और दर्द कराते हों तो दो काली लहसुन की सेंककर दर्द वाले दाँत मे दबाकर रखें| तुरंत दर्द दूर होगा|
3.प्याज-दाँत मे दर्द या मसूढ़ों मे पीड़ा होने पर प्याज चबाकर लुगदी दर्द वाले दाँत के पास रखें|
4.लौकी 30 ग्राम ,लहसुन 20 ग्राम दोनों को पीसकर एक किलो पानी मे उबालें कि आधा रह जाये |छानकर इस मिश्रण से कुल्ले करने पर दाँत का दर्द ठीक हो जाता है|
5.प्याज का रस दांतों पर मलने से दांत- शूल शांत होता है|



6॰चबाने पर दाँत दर्द होता है तो पीसी हल्दी सरसों के तेल मे मिलाकर सोते समय अपने दांतों पर लेप कर लें और सुबह कुल्ला कर लें|
7.दाँत मे कीड़े लगे हों और दर्द होता हो तो थौड़ी सी हींग दर्द वाले दाँत मे दबा कर रखें|दर्द बंद हो जाएगा|
8. हींग मिले पानी मे रुई का फ़ोया भरकर दाँत मे लगाने पर दांत-शूल शांत होता है|
9. अजवाईंन के प्रयोग से हर तरह के दाँत दर्द ठीक हो जाते हैं|आग पर अजवाईंन डालकर दुखते दाँत पर धुनी दें|उबलते पानी मे आधा चम्मच नमक और एक चम्मच आजवाईंन डालकर ढक कर रखें|पानी जब गुनगुना रहे तब इस पानी को मुंह मे लेकर कुछ देर रोक कर रखें फिर कुल्ला थूक दें|दिन मे तीन बार प्रयोग करें|
10. तुलसी के रस मे काली मिर्च पीसकर गोली बनाएँ|इसे दुखते दान के नीचे दबाकर रखने से तुरंत राहत मिल जाती है|
11. पुदीना पीसलें इससे मंजन करने से दाँत की पीड़ा समाप्त हो जाती है|
12.दाँत मे दर्द की टीस उठने पर 3 ग्राम सौंठ पावडर पानी से फांक लें|दर्द दूर होगा|
13.दाँत मे कीड़ा लगा हो तो तुलसी के रस मे कपूर पीसकर उसमे रुई भिगोकर दाँत पर रखें |दर्द मे तुरंत आराम लगेगा|




7.12.17

गाय के घी से दीर्घ यौवन ,कई रोगों मे फायदेमंद

    गाय के घी में ऐसे औषधिय गुण होते हैं जो और किसी चीज़ में नहीं मिलते। यहाँ तक की इसमें ऐसे माइक्रोन्यूट्रींस होते हैं जिनमें कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता होती है। और तो और अगर आप धार्मिक नजरिये से देखते हैं तो घी से हवन करने पर लगभग 1 टन ताजे ऑक्सीजन का उत्पादन होता है। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने तथा धार्मिक समारोहों में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है।     आयुर्वेद में घी को स्वाद बढ़ाने वाला और ऊर्जा प्रदान करने वाला माना गया है। इसलिए भारतीय घी को सदियों से अपने भोजन का अभिन्न हिस्सा मानते रहे हैं। घी केवल रसायन ही नहीं यह आंखों की ज्योति को भी बढ़ाता है। ठंड में इसके सेवन को विशेष लाभदायी माना गया है। इसके अपने गुणों के कारण ही मक्खन की जगह हम इसका उपयोग कर सकते हैं।
    दरअसल घी में तीन ऐसी खूबियां हैं, जिनकी वजह से इसका इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। पहली बात यह कि घी में शॉर्ट चेन फैटी एसिड होते हैं, जिसकी वजह से यह पचने में आसान होता है। ये हमारे हॉर्मोन के लिए भी फायदेमंद होते हैं, जबकि मक्खन में लांग चेन फैटी एसिड ज्यादा होते हैं, जो नुकसानदेह होते हैं। घी में केवल कैलोरी ही नहीं होती। इसमें विटामिन ए, डी और कैल्शियम, फॉस्फोरस, मिनरल्स, पोटैशियम जैसे कई पोषक तत्व भी होते हैं। आईए जानते है घी का सेवन करने के कुछ प्रमुख लाभ-



1. घी और दूध -
सर्दियों में दिनभर में एक बार दूध में घी डालकर पीने से सेहत बन जाती है। दवाओं के कारण शरीर में गर्मी होने पर या मुंह में छाले होने पर भी यह रामबाण की तरह काम करता है। खांसी ज्यादा परेशान कर रही हो तो छाती पर गाय का घी मसलें जल्द ही राहत मिलेगी।
2. युवावस्था बनाए रखता है - आयुर्वेदिक मान्यता है एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री मिलाकर पीने से शारीरिक, मानसिक व दिमागी कमजोरी दूर होती है। साथ ही, जवानी हमेशा बनी रहती है। काली गाय के घी से बूढ़े व्यक्ति भी युवा समान हो जाता है। प्रेग्नेंट महिला घी-का सेवन करे तो गर्भस्थ शिशु बलवान, पुष्ट और बुद्धिमान बनता है।
3. जोड़ो के दर्द में काम करता है -
जोड़ों का दर्द हो, या हो त्वचा का रूखापन, या कराना हो पंचकर्म शोधन, आयुर्वेद में हर जगह घी का उपयोग निश्चित है। हम जानते हैं, कि हमारा शरीर अधिकतर पानी में घुलनशील हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालता है, लेकिन घी चर्बी में घुलनशील हानिकारक रसायनों को हमारे आहारनाल से बाहर निकालता है। घी को पचाना आसान होता है, साथ ही इसका शरीर में एल्कलाईन फार्म में होने वाला परिवर्तन बहुत ज्यादा एसिडिक खान-पान के कारण होने वाले पेट की सूजन (गेस्ट्राईटीस ) को भी कम करता है।



4. थकान दूर करता है -
संभोग के बाद कमजोरी या थकान महसूस हो तो एक गिलास गुनगुने दूध में गाय का घी मिलाकर पी लेने से थकान व कमजोरी बहुत जल्दी दूर हो जाती है।
5. आंखों के लिए फायदेमंद है - एक चम्मच गाय के घी में एक चौथाई चम्मच काली मिर्च मिलाकर सुबह खाली पेट व रात को सोते समय खाएं। इसके बाद एक गिलास गर्म दूध पिएं। आंखों की हर तरह की समस्या दूर हो जाएगी।

6. कैंसर रोधी - गाय के घी में कैंसररोधी गुण पाए जाते हैं। इसके रोजाना सेवन से कैंसर होने की संभावना बहुत कम हो जाती है। विशेषकर यह स्तन व आंत के कैंसर में सबसे अच्छे तरीके से काम करता है।
7. स्त्रियों की समस्या में लाभदायक -
स्त्रियों में प्रदर रोग की समस्या में गाय का घी रामबाण की तरह काम करता है। गाय का घी, काला चना व पिसी चीनी तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बनाकर खाली पेट सेवन करें।
8. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है - घी बनाते समय घी के तीन लेयर बन जाते हैं ,पहला लेयर पानी से युक्त होता है, जिसे बाहर निकाल लिया जाता है ,इसके बाद दूध के ठोस भाग को निकाला जाता है, जो अपने पीछे एक सुनहरी सेरेटेड चर्बी को छोड़ जाता है। जिसमें कंजुगेटेड लाईनोलीक एसिड पाया जाता है। यह कंजुगेटेड लाईनोलीक एसिड शरीर के संयोजी उतकों को लुब्रीकेट करने व वजन कम होने से रोकने में मददगार के रूप में जाना जाता है। यह भी एक सच है कि, घी एंटीआक्सीडेंट गुणों से भरपूर होता है।
9. जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।
10. गाय के घी से बल बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है. गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है। अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।


11. ऐसा माना जाता है की गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है। नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है। यहाँ तक की गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लोट आती है
12. फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है। सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।
13. गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है। गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
14. एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।
15. यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।
16.हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ठीक होता है। हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी। गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।




शरीर (हाथ-पैर) में कम्पनके लक्षण कारण और उपचार


शरीर के किसी अंग का या पूरे शरीर के नियंत्रण खो जाने से कम्पन होता रहता है। यह एक तरह का वात ही है। इसलिए इसे कम्पवात कहते हैं।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन एक दिमाग का रोग है जो लम्बे समय दिमाग में पल रहा होता है। इस रोग का प्रभाव धीरे-धीरे होता है। पता भी नहीं पडता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गडबड है।
जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो रोगी व्यक्ति के हाथ तथा पैर कंपकंपाने लगते हैं। कभी-कभी इस रोग के लक्षण कम होकर खत्म हो जाते हैं। इस रोग से पीड़ित बहुत से रोगियों में हाथ तथा पैरों के कंप-कंपाने के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन वह लिखने का कार्य करता है तब उसके हाथ लिखने का कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं।
यदि रोगी व्यक्ति लिखने का कार्य करता भी है तो उसके द्वारा लिखे अक्षर टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। रोगी व्यक्ति को हाथ से कोई पदार्थ पकड़ने तथा उठाने में दिक्कत महसूस होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी के जबड़े, जीभ तथा आंखे कभी-कभी कंपकंपाने लगती है।
बहुत सारे मरीज़ों में ‍कम्पन पहले कम रहता है, यदाकदा होता है, रुक रुक कर होता है। बाद में अधिक देर तक रहने लगता है व अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। प्रायः एक ही ओर (दायें या बायें) रहता है, परन्तु अनेक मरीज़ों में, बाद में दोनों ओर होने लगता है।
जब यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है तो रोगी की विभिन्न मांसपेशियों में कठोरता तथा कड़ापन आने लगता है। शरीर अकड़ जाता है, हाथ पैरों में जकडन होती है। मरीज़ को भारीपन का अहसास हो सकता है। परन्तु जकडन की पहचान चिकित्सक बेहतर कर पाते हैं जब से मरीज़ के हाथ पैरों को मोड कर व सीधा कर के देखते हैं बहुत प्रतिरोध मिलता है। मरीज़ जानबूझ कर नहीं कर रहा होता। जकडन वाला प्रतिरोध अपने आप बना रहता है।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन पार्किन्सन रोग के लक्षण Parkinson’s disease Symptoms :-
आंखें चौडी खुली रहती हैं। व्यक्ति मानों सतत घूर रहा हो या टकटकी लगाए हो ।
चेहरा भावशून्य प्रतीत होता है बातचीत करते समय चेहरे पर खिलने वाले तरह-तरह के भाव व मुद्राएं (जैसे कि मुस्कुराना, हंसना, क्रोध, दुःख, भय आदि ) प्रकट नहीं होते या कम नज़र आते हैं।
खाना खाने में तकलीफें होती है। भोजन निगलना धीमा हो जाता है। गले में अटकता है। कम्पन के कारण गिलास या कप छलकते हैं।
हाथों से कौर टपकता है। मुंह से पानी-लार अधिक निकलने लगता है। चबाना धीमा हो जाता है। ठसका लगता है, खांसी आती है।
आवाज़ धीमी हो जाती है तथा कंपकंपाती, लड़खड़ाती, हकलाती तथा अस्पष्ट हो जाती है, सोचने-समझने की ताकत कम हो जाती है और रोगी व्यक्ति चुपचाप बैठना पसन्द करताहै।
नींद में कमी, वजन में कमी, कब्जियत, जल्दी सांस भर आना, पेशाब करने में रुकावट, चक्कर आना, खडे होने पर अंधेरा आना, सेक्स में कमज़ोरी, पसीना अधिक आता है।
उपरोक्त वर्णित अनेक लक्षणों में से कुछ, प्रायः वृद्धावस्था में बिना पार्किन्सोनिज्म के भी देखे जा सकते हैं । कभी-कभी यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि बूढे व्यक्तियों में होने वाले कम्पन, धीमापन, चलने की दिक्कत, डगमगापन आदि


शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन  पार्किन्सन रोग के कारण :-

पार्किन्सन रोग  व्यक्ति को अधिक सोच-विचार का कार्य करने तथा नकारात्मक सोच ओर मानसिक तनाव के कारण होता है।
किसी प्रकार से दिमाग पर चोट लग जाने से भी पार्किन्सन रोग  हो सकता है। इससे मस्तिष्क के ब्रेन पोस्टर कंट्रोल करने वाले हिस्से में डैमेज हो जाता है।
कुछ प्रकार की औषधियाँ जो मानसिक रोगों में प्रयुक्‍त होती हैं, अधिक नींद लाने वाली दवाइयों का सेवन तथा एन्टी डिप्रेसिव दवाइयों का सेवन करने से भी पार्किन्सन रोग हो जाता है।
अधिक धूम्रपान करने, तम्बाकू का सेवन करने, फास्ट-फूड का सेवन करने, शराब, प्रदूषण तथा नशीली दवाईयों का सेवन करने के कारण भी पार्किन्सन रोग  हो जाता है।
शरीर में विटामिन `ई´ की कमी हो जाने के कारण भी पार्किन्सन रोग  हो जाता है।
तरह -तरह के इन्फेक्शन — मस्तिष्क में वायरस के इन्फेक्शन (एन्सेफेलाइटिस) ।
मस्तिष्क तक ख़ून पहुंचाने वाले नलियों का अवरुद्ध होना ।
मैंगनीज की विषाक्तता।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन ( पार्किन्सन रोगके प्राकृतिक चिकित्सा में इलाज :-
पार्किन्सन रोग को ठीक करने के लिए 4-5 दिनों तक पानी में नीबू का रस मिलाकर पीना चाहिए। इसके अलावा इस रोग में नारियल का पानी पीना भी बहुत लाभदायक होता है।
इस रोग में रोगी व्यक्ति को फलों तथा सब्जियों का रस पीना भी बहुत लाभदायक होता है। रोगी व्यक्ति को लगभग 10 दिनों तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।
सोयाबीन को दूध में मिलाकर, तिलों को दूध में मिलाकर या बकरी के दूध का अधिक सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
रोगी व्यक्ति को हरी पत्तेदार सब्जियों का सलाद में बहुत अधिक प्रयोग करना चाहिए।
रोगी व्यक्ति को जिन पदार्थो में विटामिन `ई´ की मात्रा अधिक हो भोजन के रूप में उन पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए।
रोगी व्यक्ति को कॉफी, चाय, नशीली चीज़ें, नमक, चीनी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
प्रतिदिन कुछ हल्के व्यायाम करने से यह रोग जल्दी ठीक हो जाता है।
पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease) से पीड़ित रोगी को अपने विचारों को हमेशा सकरात्मक रखने चाहिए तथा खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए।
प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से प्रतिदिन उपचार करे तो पार्किन्सन रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
जिन व्यक्तियों के शरीर में Vitamin D बड़ी मात्रा में मौजूद है, उनमें पार्किंसन बीमारी होने का ख़तरा कम होता है। सूरज की किरणें Vitamin D का बड़ा स्रोत हैं। बहुत ही कम ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जिनमें Vitamin D पाया जाता है। यदि शरीर में Vitamin D की मात्रा कम होती है तो उससे हड्डियों में कमोजरी, कैंसर, दिल की बीमारियों और डायबिटीज हो सकती है, लेकिन अब Vitamin D की कमी पार्किंसन की वजह भी बन सकती है।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन ( पार्किन्सन रोग के आयुर्वेदिक और औषधीय उपचार :-
1. तगर : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम तगर का चूर्ण यशद भस्म के साथ सुबह-शाम सेवन करने से कम्पन के रोगी को लाभ मिलता है।
2. जटामांसी :


हाथ-पैर कांपने पर या किसी दूसरे अंग के अपने आप हिलने पर जटामांसी का काढ़ा 2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित सेवन करना चाहिए।

3. घी : 10 ग्राम गाय का घी एवं 40 मिलीलीटर दूध को 4 भाग (10-10 मिलीलीटर की मात्रा) लेकर हल्की आंच पर पका लें। इस चारों भागों में 3 से 6 ग्राम की मात्रा में असगंध नागौरी का चूर्ण मिला लें। यह मिश्रण रोजाना सुबह-शाम सेवन करने से कम्पन के रोगी का रोग जल्द ठीक हो जाता है।
4. कुचला :
> आधा-आधा चम्मच अजवायन और सौंठ का चूर्ण तथा कुचला बीज मज्जा (बीच के हिस्से) का 100 ग्राम चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम खायें। इससे शरीर का कांपना ठीक होता है।
> लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग शुद्ध कुचला का चूर्ण सुबह-शाम सेवन करने से कम्पवात में लाभ मिलता है।
5. दूध : चार कली लहसुन को दूध में अच्छी तरह से उबाल लें, फिर इसमें 2 चम्मच एरण्ड का तेल मिलाकर प्रतिदिन सोने से पहले सेवन करने से अंगुलियों का कम्पन कम हो जाता है।
6. गाय का घी : गाय का घी और गाय का चार गुना दूध लेकर उबाले फिर उसमें मिश्री मिलाकर 3 से 6 ग्राम असगन्ध नागौरी के चूर्ण के साथ सुबह-शाम पीने से अंगुलियों का कांपना दूर हो जाता है।
7. जटामांसी : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग आधा ग्राम जटामांसी को फेंटकर प्रतिदिन दो से तीन बार सेवन करने से लाभ मिलता है।
8. निर्गुण्डी :
निर्गुण्डी की ताजी जड़ एवं हरे पत्तों का रस निकाल कर उसमें पाव भाग तिल का तेल मिलाकर गर्म करके सुबह-शाम 1-1 चम्मच पीने से तथा मालिश करते रहने से कंपवात, संधियों का दर्द एवं वायु का दर्द मिटता है। स्वर्णमालती की 1 गोली अथवा 1 ग्राम कौंच का पाउडर दूध के साथ लेने से लाभ होता है।
9. लहसुन : लहसुन के रस में वायविडंग को पकाकर खाने से एवं लहसुन से प्राप्त तेल की मालिश करने से अंगुलियों का कम्पन ठीक हो जाता है।
10. महानींबू : लगभग 10 से 20 मिलीलीटर महानींबू (चकोतरा) के पत्तों का रस सुबह-शाम सेवन करते रहने से अंगुलियों का कांपना ठीक हो जाता हैं।
11. सोंठ : महारास्नादि में सोंठ का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम पीने और प्रतिदिन रात को 2 चम्मच एरण्ड तेल को दूध में मिलाकर सोने से पहले सेवन करने से अंगुलियों का कांपना की शिकायत दूर हो जाती है।
12. कुचला : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग शुद्ध कुचले का चूर्ण सुबह-शाम सेवन करने से शरीर का कांपनादूर हो जाता है। रोगी को काफी राहत महसूस होती है।
13. असगंधनागौरी : लगभग 3 से 6 ग्राम असगंध नागौरी को गाय के घी और उसका चार गुना दूध में उबालकर मिश्री मिलाकर प्रतिदिन पीने से अंगुलियों का कांपना दूर हो जाता हैं। इससे रोगी को काफी लाभ मिलता है।
14. तिल : तिल के तेल में अफीम और आक के पत्ते मिलाकर गरम करके लेप करने से हाथ-पैरों की अंगुलियों की कम्पन दूर हो जाती है।
15 आशाकन्द : लगभग 2 ग्राम आशाकन्द का चूर्ण दूध के साथ लेने से हाथ-पैरों की अंगुलियों का कम्पन ठीक हो जाता है।


16. गोरखमुण्डी :
हाथ-पैरों की अंगुलियों का कांपना दूर करने के लिए गोरखमुण्डी और लौंग का चूर्ण खाने से रोगी को फायदा मिलता है।
17. भांगरा : लगभग 20 ग्राम भांगरे के बीजों के चूर्ण में 3 ग्राम घी मिलाकर मीठे दूध के साथ खाने से हाथ-पैरों का कांपना दूर हो जाता है।
18. बड़ी हरड़ : हाथ-पैरों की अंगुलियों का कम्पन दूर करने के लिए बड़ी हरड़ का चूर्ण खाने से रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
19. लहसुन :
> शरीर का कम्पन दूर करने के लिए बायविडंग एवं लहसुन के रस को पकाकर सेवन करने से रोगी को लाभ मिलता है।
> लहसुन के रस से शरीर पर मालिश करने से रोगी का कंपन दूर होता है।
> 4 जावा (कली) लहसुन छिलका हटाकर पीस लें। इसे गाय के दूध में मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से कम्पन के रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
 असगन्ध– इसका स्वाद कसैला/कडवा होता है । इसकी जड ही काम में ली जाती है और इसमें घोडे के शरीर के समान गन्ध पाई जाती है । शायद इसीलिये इसे (अश्र्व) असगन्ध कहा जाता है । यह आपको किसी भी जडी-बूटी विक्रेता के यहाँ मिल सकता है । उपरोक्त उपचार हेतु इसके चूर्ण की आवश्यकता होती है । अतः यदि बाजार से चूर्ण तैयार मिल जावे तो अति उत्तम, अन्यथा आप इसे जड रुप में खरीदकर घर पर इसका कूट-पीसकर 100 ग्राम के लगभग बारीक (महीन) चूर्ण बना लें ।
अश्वगंधा  के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण
आमलकी रसायन- आंवले के चूर्ण में आंवले का ही इतना ताजा रस मिलाया जाता है कि चूर्ण करीब-करीब रोटी के लिये उसने हुए आटे से भी कुछ अधिक नरम हो जाता है इसे आयुर्वेद की भाषा में भावना देना कहते हैं । फिर इस रस मिश्रीत चूर्ण को सुखाया जाता है । सूख चुकने पर पुनः इसी प्रकार से इसमें आंवले के ताजे रस की भावना दी जाती है और फिर इसे सुखाया जाता है । इस प्रकार इस चूर्ण में 11 बार आंवले के रस की भावना दी जाती है और हर बार इसे सुखाया जाता है । 11 भावना के पूर्ण हो चुकने पर इसी चूर्ण को आमलकी रसायन कहा जाता है । ये परिचय यहाँ सिर्फ आपकी जानकारी के लिये प्रस्तुत किया गया है बाकि तो आप इसे किसी भी प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक औषधि निर्माता कम्पनी का बना हुआ तैयार आमलकी रसायन बाजार से 100 ग्राम मात्रा की पेकिंग में खरीदकर काम में ले सकते हैं ।
अब असगन्ध व आमलकी रसायन के इन दोनों चूर्ण को आपस में मिलाकर किसी भी एअर टाईट शीशी या डिब्बे में भरकर रख लें और समान मात्रा में मिश्रीत इस चूर्ण को पहले सप्ताह सिर्फ चाय के आधा चम्मच के बराबर मात्रा में लें व इसमें शहद मिलाकर प्रातःकाल इसका सेवन कर लें। एक सप्ताह बाद आप इस आधा चम्मच मात्रा को एक चम्मच प्रतिदिन के रुप में लेना प्रारम्भ कर दें ।
यदि आप शहद न लेना चाहें तो मिश्री की चाशनी इतनी मात्रा में बनाकर रखलें जितनी 8-10 दिन में समाप्त की जा सके । इस चाशनी में 4-5 इलायची के दाने भी पीसकर डाल दें और इस चाशनी के साथ असगन्ध व आमलकी रसायन का यह चूर्ण उपरोक्तानुसार सेवन करें । लेकिन शुगर (मधुमेह) के रोगियों को इसे चाशनी की बजाय शहद मिलाकर ही लेना उपयुक्त होता है ।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन ( पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease)) main प्रभावी योगासन :- कोणासन (विपरीत दंडासन) पश्चिमोत्तानासन का उपासन है। अर्थात, पश्चिमोत्तानासन में हमने शरीर को आगे की ओर झुकाया था। इस बार शरीर को उसके विपरीत खिंचाव दिया गया है। इस आसन के अभ्यास से हमारे हाथ, कंधे, पैर तथा रीढ़ प्रभावित होती है। अत: इन भागों के समस्त दोष समाप्त हो जाते हैं। हाथों तथा टांगों के कम्पन रोग को समाप्त करने में यह आसन बहुत ही उपयोगी है। इस आसन को करने के लिए बैठकर दोनों पैरों को आगे की ओर फैलाएं। एड़ियां व पंजे परस्पर मिले हुए हों। हाथों को मजबूती के साथ नितम्बों के पास जमा दें। गहरी लंबी श्वांस भरते हुए पूरे शरीर को पैर की एड़ियों तथा हाथों के पंजों पर उठा दें। पैरों तथा हाथों को सीधे तानकर रखें। श्वांस की गति सामान्य कर लें। पैरों के पंजों को खींचकर पृथ्वी से मिलाने का प्रयत्न करें। आसन की पूर्ण स्थिति में कुछ समय रुककर ध्यान को मणिपूरक चक्र पर ले जाएं। तत्पश्चात धीरे-धीरे वापस आएं। वापस आकर कुछ क्षण विश्राम करें। इस आसन को लगभग 5-10 बार करें।


6.11.17

पीलिया का रामबाण उपचार

   
पीलिया लीवर से सम्बंधित रोग है, इस रोग में रोगी की आँखे पीली पड़ जाती हैं, पेशाब का रंग पीला हो जाता है, अधिक तीव्रता होने पर पेशाब का रंग और भी खराब हो जाता है, पीलिया दिखने में बहुत साधारण सी बीमारी लगती है, मगर इसका सही समय पर इलाज ना हो तो ये बहुत भयंकर परिणाम दे सकती है, रोगी की जान तक जा सकती है इसमें. आज हम आपको इस जानलेवा बीमारी का एक ऐसा रामबाण उपचार बता रहे हैं जो आपकी बरसों से चलती आ रही इस बीमारी को भी ज्यादा से ज्यादा 3-४ दिन में बिलकुल सही कर देगी. ये उपचार पीलिया चाहे वो हेपेटाइटिस ऐ बी या सी हो या फिर बिलरुबिन या ESR भी बढ़ा हुआ हो तो भी ये बहुत कारगर है|.
पीलिया हेपेटाइटिस कोई सा भी ( ऐ ,बी या सी) सबका रामबाण उपचार कच्चा हरा नारियल.
रोगी को दिन में कम से कम 2 हरे नारियल का पानी पिलायें, नारियल तुरंत खोल कर तुरंत ही पानी पिलाना है, इसको ज्यादा देर तक रखना नहीं है. एक दिन के बाद ही पेशाब का कलर बदलना शुरू हो जायेगा. ऐसा निरंतर ४-५ दिन करने के बाद आप बिलकुल स्वस्थ अनुभव करेंगे. ऐसे में रोगी को जो भी इंग्लिश दवा दी जा रही हो उसको एक बार बंद कर दी जाए.. और अगर रोगी कि हालत बहुत सीरियस हो तो उसको इसके साथ में ग्लूकोस दिया जा सकता है. और बाकी पूरा दिन सिर्फ नारियल पानी पर ही रखें. ये प्रयोग अनेक लोगों पर पूर्ण रूप से सफल रहा है. लीवर में होने वाले किसी भी रोग के लिए भी इस प्रयोग को निसंकोच अपनाया जा सकता है.

25.10.17

अदरक के पानी के अनुपम फायदे:




पाचन में मददगार:
जैसा हमने पहले बताया आपको की यह पेट के लिए मुफीद हैं. अदरक वाला पानी शरीर में डाइजेस्टिव जूस को बढ़ाता है. इसके सेवन से पाचन क्रिया में सुधार आता है और खाना आसानी से पच जाता है और पेट सम्बन्धी समस्याए नहीं होती हैं.
मधुमेह को कंट्रोल करे:
अदरक का पानी डायबिटीज के मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद होता है. इसके नियमित सेवन से रीर का ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल होता है. इतना ही नहीं इससे आम लोगों में डायबिटीज होने का खतरा भी कम होता है इसीलिए इसके सेवन से आप शुगर जैसी भयंकर बिमारी से बच सकते हैं.
कैंसर से रक्षा:


अदरक में कैंसर से लड़नेवाले तत्व पाए जाते हैं. इसका पानी फेफड़ें, प्रोस्टेट, ओवेरियन, कोलोन, ब्रेस्ट, स्किन और पेन्क्रिएटिक कैंसर से रक्षा करता है इसीलिए अगर आप इन भयंकर बीमारियों से बहकना चाहते हैं तो आपको अदरक का पानी पीना चाहिए इससे आपको बहुत सारे फायदे मिलेंगे.

त्वचा संबंधी समस्याए:
अदरक का पानी पीने से खून साफ होता है और स्किन ग्लो करती है. ये पिंपल्स और स्किन इंफेक्शन के खतरे को भी दूर करता है इसीलिए अगर आप इस तरह की किसी परेशानी से तृप्त है तो इसका सेवन ज़रूर करे, इससे आपकी त्वचा समबन्धि समस्याए खत्म हो जायेंगी.
दर्द से राहत:
अदरक का पानी नियमित रुप से पीने से ब्लड सर्कुलेशन ठीक रहता है और मसल्स में होने वाले दर्द से राहत मिलती है. साथ ही सिर दर्द में भी ये बहुत फायदेमंद होता है अगर आप सर दर्द की समस्या से परेशान रहते हैं तो आपको इस पानी का प्रयोग ज़रूर से करना चाहिए इससे आपको बहुत फायदा मिलेगा.हार्ट बर्न दूर करे :
अगर आप सीने में होने वाली जलन से परेशान हैं तो आपको खाना खाने के 20 मिनट बाद अदरक का पानी पीना चाहिये इससे आपको हार्ट बर्न की समस्या नहीं होगी यह बहुत फायदेमंद होता हैं.



मांसपेशयों के दर्द मे-

अगर आप मसल्स पेन से पीड़ित हैं तो आपको अदरक का पानी पीना चाहिए यह इसके लिए बहुत ज्यादा फायदेमंद होता हैं इससे ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता हैं और यह मसल्स को ररिलैक्स कर पेन को दूर करता हैं.
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है:
इम्यून सिस्टम का अच्छा होना बहुत ज्यादा ज़रूरी होता हैं इसको पीने से आपका इम्यून सिस्टम ठीक होता हैं और आप छोटी बड़ी बीमारियों से बच जाते है अदरक का पानी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है. हर रोज इसे पीने से सर्दी-खांसी और वायरल इंफेक्शन जैसी बीमारियों के खतरे कम हो जाता है. इसके अलावा यह कफ की समस्या को भी दूर करता है और आपको चुस्त वा दुरुस्त बनाता हैं.




18.10.17

चर्म रोग से बचने के घरेलू उपचार


अलसी के बीज


अलसी के बीजों में ओमेगा थ्री फैटी एसिड होता है जो हमारे इम्‍यून सिस्‍टम को मजबूत बनाने में मदद करता है। इसमें सूजन को कम करने वाले तत्‍व मौजूद होते हैं। यह स्किन डिस्‍ऑर्डर, जैसे एक्जिमा और सोरायसिस को भी ठीक करने में मदद गरता है। दिन में एक-दो चम्‍मच अलसी के बीजों के तेल का सेवन करना त्‍वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है। बेहतर रहेगा कि इसका सेवन किसी अन्‍य आहार के साथ ही किया जाए।
कैमोमाइल/ बबूने का फूल


कैमोमाइल का फूल त्‍वचा पर लगाने से जलन को शांत करता है और साथ ही अगर इसका सेवन किया जाए तो आंतरिक शांति प्रदान करता है। इसके साथ ही यह केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली पर भी सकारात्‍मक असर डालता है। यह एक्जिमा में भी काफी मददगार होता है। इसके फूलों से बनी हर्बल टी का दिन में तीन बार सेवन आपको काफी फायदा पहुंचाता है। इसके साथ ही एक्जिमा और सोरायसिस जैसी बीमारियों से उबरने में भी यह फूल काफी मदद करता है। एक साफ कपड़े को कैमोमाइल टी में डुबोकर उसे त्‍वचा के सं‍क्रमित हिस्‍से पर लगाने से काफी लाभ मिलता है। इस प्रक्रिया को पंद्रह-पंद्रह मिनट के लिए दिन में चार से छह बार करना चाहिए। कैमोमाइल कई अंडर-आई माश्‍चराइजर में भी प्रयोग होता है। इससे डार्क सर्कल दूर होते हैं
कमफ्रे


इस फूल के पत्‍ते और जड़ें सदियों से त्‍वचा संबंधी रोगों को ठीक करने में इस्‍तेमाल की जाती रही हैं। यह कट, जलना और अन्‍य कई जख्‍मों में काफी लाभकारी होता है। इसमें मौजूद तत्‍वा तवचा द्वारा काफी तेजी से अवशोषित कर लिए जाते हैं। जिससे स्‍वस्‍थ कोशिकाओं का निर्माण होता है। इसमें त्‍वचा को आराम पहुंचाने वाले तत्‍व भी पाए जाते हैं। अगर त्‍वचा पर कहीं जख्‍म हो जाए तो कमफ्रे की जड़ों का पाउडर बनाकर उसे गर्म पानी में मिलाकर एक गाढ़ा पेस्‍ट बना लें। इसे एक साफ कपड़े पर फैला दें। अब इस कपड़े को जख्‍मों पर लगाने से चमत्‍कारी लाभ मिलता है। अगर आप इसे रात में बांधकर सो जाएं, तो सुबह तक आपको काफी आराम मिल जाता है। इसे कभी भी खाया नहीं जाना चाहिए, अन्‍यथा यह लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है। गहरे जख्‍मों पर भी इसका इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए। इससे त्‍वचा की ऊपरी परत तो ठीक हो जाती है, लेकिन भीतरी कोशिकायें पूरी तरह ठीक नहीं हो पातीं।
गेंदा

गेंदा गहरे पीले और नारंगी रंग का फूल होता है। यह त्‍वचा की समस्‍याओं का प्रभावशाली घरेलू उपाय है। यह छोटे-मोटे कट, जलने, मच्‍छर के काटने, रूखी त्‍वचा और एक्‍ने आदि के लिए शानदार घरेलू उपाय है। गेंदे में एंटी-बैक्‍टीरियल और एंटी-वायरल गुण होते हैं। यह सूजन को कम करने में भी मदद करता है। इसके साथ ही गेंदा जख्‍मों को जल्‍दी भरने में मदद करता है। यह हर प्रकार की त्‍वचा के लिए लाभकारी होता है। गेंदे की पत्तियों को पानी में उबालकर उससे दिन में दो-तीन बार चेहरा धोने से एक्‍ने की समस्‍या दूर होती है।
अन्‍य उपाय
     हल्दी, लाल चंदन, नीम की छाल, चिरायता, बहेडा, आंवला, हरेडा और अडूसे के पत्ते को एक समान मात्रा में लीजिए। इन सभी सामानों को पानी में पूरी तरह से फूलने के लिए भिगो दीजिए। जब ये सारे सामान पूरी तरह से फूल जाएं तो पीसकर ढ़ीला पेस्ट बना लीजिए। अब इस पेस्ट से चार गुना अधिक मात्रा में तिल का तेल लीजिए।
    तिल के तेल से चार गुनी मात्रा में पानी लेकर सारे सामानों को एक बर्तन में मिला लीजिए। उसके बाद मिश्रण को मंद आंच पर तब तक गर्म करते रहिए जब तक सारा पानी भाप बनकर उड़ ना जाए। इस पेस्ट को पूरे शरीर में जहां-जहां खुजली हो रही हो वहां पर या फिर पूरे शरीर में लगाइए। इसके लगाते रहने से आपके त्वचा से चर्म रोग ठीक हो जाएगा।
    एग्जिमा, सोरियासिस, मस्सा, ल्यूकोर्डमा, स्केबीज या खुजली चर्म रोग के प्रकार हैं।किसी भी प्रकार का चर्म रोग जब तक ठीक नही हो जाता है, बहुत कष्टदायक होता है। जिसके कारण से आदमी मानसिक रूप से बीमार हो जाता है।




7.10.17

पान के पत्ते खाने के अनुपम फायदे// Unique benefits of eating Pan leaf



अगर आप इस पान के पत्ते को खाने के बारे में जान लोगो तो आप भी इसकी तारीफ किये बिना नहीं रह पाओगो |भारत की तो हर गली के नुक्कड़ पर पान की दुकान मिल ही जाती है |लेकिन कई लोग पान के पत्ते में जर्दा व तम्बाकू मिलाकर खाते है |जिसे पान को भी नशीला पदार्थ बना दिया जाता है |और जिससे कई प्रकार की खतरनाक बीमारिया पैदा हो जाती है |पैन के पत्ते का प्रयोग पूजा पाठ से लेकर कई प्रकार की मिठाईया बनांने में किया जाता है |
 अगर हम सिर्फ पान के पत्ते का ही प्रयोग करते है तो इससे हमें काफी लाभकारी फायदे मिलते है |पान के पत्ते की शेप दिल के आकार की होती है |जो कई बीमारियों को दूर करने के लिए कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है |इसमें प्रोटीन ,कैल्शियम व विटामिन स होता है |यह एक बेहतरीन एंटी बायोटिक होता है |इसमें एंटी बक्ट्रियल गुण पाए जाते है |पान का पत्ता एक बहुत ही बढ़िया माउथ फ्रेशनर है |तो आइये जानते है पान के पत्तो को खाने से हम कितनी बीमारियों से बच सकते है :
मुँह के छाले -

 इसके लिए आप पान के पत्तो को चबाये या फिर इस पर कत्था लगाकर चबाएँ या फिर इसे पानी में उबालकर इसे पानी से कुल्ले करे आपके मुँह के छाले ठीक हो जायेंगे |
खांसी को दूर करे - खांसी को दूर करने के लिए आप 10 -15 पत्ते ले और इसे तीन गिलास पानी डालकर जब तक उबाले जब तक एक गिलास ना रह जाये |और इस पानी को दिन में तीन से चार बार पिए आपकी खांसी छू मन्त्र हो जाएगी |
खुजली - 

इसके लिए आप 15 -20 पत्ते पानी में उबाले और फिर इस पानी को ताजे पानी में मिलाकर नहा लो आपकी खुजली ख़त्म हो जाएगी |



आँखों की जलन व लाल होने पर

आप पान के पांच से छ पत्तो को पानी में उबाले और इस पानी से अपनी आँखों पर छीटे मारे आँखों की जलन व लाली ठीक हो जाएगी |
मसूड़ों से खून आना - 

पान के पत्ते को पानी में उबालकर इस पानी से कुल्ले करने पर मुँह से बदबू व मसूड़ों से खून आना बंद हो जाता है |
शरीर से बदबू आने पर - 

आप पान के पत्तो को पानी में उबाले और इस पानी को दिन में दो से तीन बार सेवन करने से आपके शरीर से आने वाली बदबू भी दूर हो जाएगी आप चाहे तो पान के पत्तो के पानी से भी नहा सकते हो |
पाचन तंत्र -

पान के पत्तो को खाने से हमारा पाचन तंत्र सही रूप से कार्य करता है |क्योकि इससे हमारी लार ग्रंथि पर असर पड़ता है |और इसे स्लाइव लार बनने में मदद मिलती है |अगर आपने भरी भोजन किया हो तो भी पान के पत्ते को खाने से खाना हजम हो जाता है |साथ ही इससे गेस्ट्रिक अल्सर भी ठीक हो जाता है |


 मोटापा - 
पान के पत्तो को खाने से हमारा वजन कम हो जाता है |और हमारा मेटाबॉलिज्म बढ़ जाता है |जिससे शरीर में अतिरिक्त वसा नष्ट हो जाता है |जिससे हमारा वजन कम हो जाता है |
महिलाओं में श्वेत प्रदर - 

पान के पत्तो को पानी में उबाले और इस पानी से अपनी योनि को हर रोज धोये इस समस्या से आपको चुकारा मिल जायेगा |
मुहांसे होने पर - 

सात से आठ पान के पत्तो को पीस लो और इस पेस्ट में दो गिलास पानी डालकर जब तक उबाले जब तक ये गाढ़ा पेस्ट ना बन जाये |और ठंडा होने पर इसे आपने फेस पर अप्लाई करे |ऐसा करने से आपके पिम्पल्स गयाब हो जायेंगे |
नकसीर - 

पान के पत्ते को सुघने से ही नकसीर आनी बंद हो जाएगी |
जल जाने पर -

 जल जाने पर पान के पत्तो पीसकर जलने की जगह पर लगा लो फिर 15 -20 मिनट बाद इसे धोकर इस पर शहद लगा लो |आपकी जलन व घाव जल्दी ठीक हो जायेगा |




23.9.17

पेट के रोगों की होम्योपैथिक चिकित्सा //Homeopathic Medicine of belly Diseases





उदर-विकार समय पर खाना न खाना, अधिक तली चीज़ें खाना, अत्यधिक खाना खाना अथवा भूखा रहना, मिर्च-मसालों का अधिक प्रयोग आदि उदर- विकारों को उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त हैं। प्रमुख परेशानियां, कारण और होमियोपैथिक चिकित्सा से निवारण निम्न प्रकार संभव है –

अग्निमांद्य : 
अग्निमांद्य यानी जठराग्नि कमजोर हो जाने पर प्रमुख लक्षण होते हैं – भूखन लगना, भोजन से अरुचि होना, पेट भरा-भरा सा लगना। इसे अजीर्ण, बदहजमी और पेट भरा-भरा सा कहते हैं। अग्निमांद्य होने पर गैस की शिकायत रहना, कब्ज होना, पेट फूलना और भारी रहना, तबीयत में गिरावट, स्वभाव में चिड़चिड़ाहट और मन में खिन्नता रहना आदि अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इन व्याधियों की चिकित्सा के लिए लक्षणों के अनुसार दवा चुनकर सेवन करना फायलक्षण एवं उपचार
कार्बोवेज : 
पाचन शक्ति कमजोर हो जाए, खाना देर से हजम होता हो और पूरी तरह से पच न पाने के कारण सड़ने लगता हो, जिससे गैस बनती हो, पेट फूल जाता हो, अधोवायु निकलने पर राहत मालूम देती हो, खट्टी डकारें आती हों या खाली डकारें आएं, गैस ऊपर की तरफ चढ़ती हो, जिसका दबाव छाती पर पड़ता हो और भोजन के आधा-एक घटे बाद ही कष्ट होने लगे, तो समझें कि ये लक्षण ‘कार्बोवेज’ दवा के हैं। ऐसी स्थिति में 30 शक्ति एवं 200 शक्ति की दवा अत्यन्त फायदेमंद होती है।
एण्टिमक्रूड : 
अग्निमांद्य के साथ-साथ जीभ पर दूध जैसी सफेद मैली परत चढ़ी होना, गर्मी के दिनों में उदर-विकार होने पर दस्त लग जाना, बदहजमी, भूख न लगना, एसिड एवं अचारों को खाने की प्रबल इच्छा, खट्टी डकरें, बच्चा दूध की उल्टी कर देता है, खाने के बाद पेट फूल जाना, खुली हवा में आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर एण्टिमक्रूड दवा 6 एवं 30 शक्ति अत्यधिक कारगर है।देमंद है। प्रमुख दवाएं इस प्रकार हैं –
नक्सवोमिका : खाना खाने के घटे दो-घटे बाद तकलीफ होना, पेट में भारीपन, जैसे कोई पत्थर पेट में रखा हो, पेट फूलना, पेट में जलन मालूम देना, गैस के दबाव के साथ सिर में भारीपन बढ़ना, रोगी दुबले शरीर वाला, क्रोधी एवं चिड़चिड़ा स्वभाव, ठंड के प्रति अधिक सहिष्णुता, रोगी अचार, चटनी, तले पदार्थ खाना पसंद करता है और पचा भी लेता है। इसके बाद परेशानी होने लगती है। बहुत मद्यपान करने, बहुत भोग-विलास करने, बहुत ज्यादा खाने, आलसी जीवन बिताने और गरिष्ठ पदार्थों के सेवन से जिनकी पाचन शक्ति कमजोर हो गई हो एवं पाखाना जाने की इच्छा होती हो, किन्तु पाखाना बहुत कम होता हो और थोड़ी देर बाद पुनः पाखाने जाने की जरूरत होने लगती है, ऐसी स्थिति में ‘नवसवोमिका’ 30 एवं 200 शक्ति की दवा अत्यन्त फायदेमंद होती है। यह दवा प्राय:रात में सोने से पूर्व ही सेवन करनी चाहिए।
पल्सेटिला : 
प्यास बिलकुल न लगना जबकि जीभ सूखी हुई हो, भोजन के घटे-दो घंटे बाद तकलीफ होना, पेट में बोझ-सा लगना, जलन होना, सुबह उठने पर बिना कुछ खाए-पिए भी पेट भरा हुआ और भारी लगना, रोगी स्वास्थ्य में ठीक होता है, मोटा होता है, ऊष्ण प्रकृति (गर्म-तासीर) वाला होता है, शांत और मधुर स्वभाव का होता है, अधीरता के कारण बात करते-करते रो देना एवं शांत कराने पर चुप हो जाना, चटपटे, तले एवं घी से बने भारी पदार्थ हजम नहीं कर पाना, ठंडी हवा में आराम मिलना, खाने में स्वाद कम हो जाना, गर्म कमरे में एवं दर्द से विपरीत दिशा में लेटने पर परेशानी महसूस करना, ठंडी चीजों से आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर 30 एवं 200 शक्ति की दवा बेहद कारगर साबित रही है।
अम्लता (एसीडिटी) :
 पेट में अम्लता बढ़ जाए, तो पाचन-क्रिया बिगड़ जाती है, जिससे भोजन ठीक से पचने की अपेक्षा सड़ने लगता है और पेट व गले में जलन होती है, गले में खट्टा, तीखा, चटपटा पानी डकार के साथ आता है, छाती में जलन का अनुभव होता है,खट्टी व तीखी डकारें आती हैं। ये सब अम्लता के मुख्य लक्षण हैं। इसमें अपच के साथ-साथ कब्ज या दस्त होने की शिकायत बनी रहती है। कभी-कभी कड़वी और गर्म पानी के साथ उल्टी हो जाती है। लक्षणों के आधार पर प्रमुख औषधियां निम्न प्रकार है –
एसीडिटी के लक्षण एवं उपचार
अर्जेण्टम नाइट्रिकम : 
डकार आए और साथ में पेट दर्द भी हो, मीठा खाने में रुचि हो, पर मीठा खाने से कष्ट बढ़े, डकार आने से आराम मालूम देना, जी मतली करे, गैस बढ़े, पेट में जलन हो, मीठे के साथ-साथ नमकीन खाने की भी इच्छा रहती हो, गमीं से, मिठाई से, ठंडे खाने से परेशानी बढ़ना, खुली हवा में, डकार आने से आराम मिलना आदि लक्षण हो, तो 30 शक्ति की दवा उपयोगी है।
खाने के बाद जी मतली करे, गले में कड़वा खट्टा पानी डकार के साथ आए, रोगी शीत प्रकृति का हो, तो ‘नक्सवोमिका’ 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
यदि डकार में खाए हुए अन्न का स्वाद आए, रोगी ऊष्ण प्रकृति का हो, मुंह सूखा रहे और प्यास न लगे, तो ‘पल्सेटिला’ 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
नेट्रमफॉस :

 परेशानियां जो अत्यधिक अम्लता के कारण पैदा हो जाती हैं, पीली, चिकनी परत, जीभ के पिछले भाग पर, मुंह में घाव, जीभ की नोक पर घाव, गले की (टॉन्सिल) झिल्ली भी मोटी और चिकनी हो जाना, खाना निगलने में परेशानी महसूस करना, खट्टी डकारें, कड़वी उल्टी, हरा दस्त आदि लक्षण मिलने पर 12 × एवं 30 शक्ति की दवा अत्यन्त लाभदायक है।
चाइना : 

अम्लता के रोगी को ऐसा अनुभव हो कि पूरा पेट हवा से भरा हुआ है, डकार आने पर हलकापन और राहत अनुभव हो, डकरें खट्टी व बदबूदार हों या खाली डकारें ही आती हों, मुंह का स्वाद कड़वा रहे, मुंह में कड़वा पानी आता हो, ऐसा लगे कि खाना छाती पर ही अड़ा हुआ है, छाती में जलन होती हो, तो चाइना 30 शक्ति फायदेमंद होती है।
कब्ज (कांस्टिपेशन) :
 खाने में अनियमितता, जल्दी-जल्दी खाने, ठीक से चबा-चबाकर न खाने, भारी, तले हुए और मांसाहारी पदार्थों का सेवन करने, पाचन शक्ति कमजोर होने आदि कारणों से अधिकांश स्त्री-पुरुष कब्ज के शिकार बने रहते हैं। कब्ज होने से कई और रोग भी उत्पन्न हुआ करते हैं। जैसे-शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता, जिससे शरीर में सुस्ती व कमजोरी आती है। गैस एवं वातरोग उत्पन्न होते हैं। स्वस्थ रहने के लिए कब्ज का न होना पहली शर्त है।
ब्रायोनिया : 

खाने के बाद कड़वी और खट्टी डकारें आएं, पेट में भारीपन हो, डकार में खाए हुए पदार्थ की गंध या स्वाद हो, अधिक प्यास, मुंह व होंठ सूखना, सुबह मतली आना, गर्म चीज खाने से कष्ट बढ़े, खाना खाते ही तबीयत बिगड़े, हिलने-डुलने से कष्ट बढ़े, ठंड एव् ठंडी हवा से आराम हो, पेट को छूने से अथवा खांसी आने पर परेशानी बढ़ जाना, दर्द वाली सतह पर लेटने, कसकर दबाने से, आराम करने से परेशानियां कम हो जाती हों, तो ब्रायोनिया 30 शक्ति की दवा फायदेमंद है।
कब्ज का लक्षण एवं उपचार
हाइड्रेस्टिस : 
अगर रोगी सिर्फ कब्ज का ही रोगी हो, तो हाइड्रेस्टिस बहुत अक्सीर दवा है। पेट खाली-खाली-सा लगे, मीठा-मीठा हलका-सा दर्द हो और कब्ज के सिवाय अन्य कोई लक्षण न हो, तो हाइड्रेस्टिस दवा के मूल अर्क (मदर टिंचर) की 5-5 बूंद 2 चम्मच पानी में सुबह खाली पेट लगातार कई दिन लेने से कब्ज दूर हो जाती है।
नक्सवोमिका : 

उक्त दवा के मुख्य लक्षण ऊपर वर्णित किए जा चुके हैं। कब्ज की अवस्था में, जो लोग बैठक का काम ज्यादा करते हैं, बार-बार शौच के लिए जाते हैं, पर पेट ठीक से साफ नहीं होता, हर बार थोड़ा-थोड़ा पाखाना हो और शौच के बाद भी हाजत बनी रहे, तो नक्सवोमिका 200 शक्ति की तीन खुराकें 15 मिनट के अंतर पर रात में सोने से एक घंटा पहले ले लेनी चाहिए। दस्त के बाद पेट में मरोड़ होना भी इसका एक लक्षण है।
मैग्नेशिया म्यूर : 



यह दवा शिशुओं के लिए उपयोगी है। खास कर दांत-दाढ़ निकलते समय हो, दूध न पचता हो, उन्हें उक्त दवा 30 शक्ति की देना फायदेमंद है। इसके अलावा ‘साइलेशिया’ दवा भी अत्यंत फायदेमंद है।
अतिसार (डायेरिया) : 
उदर-विकार में जहां अपच के कारण कब्ज हो जाने से शौच नहीं आता, वहीं अपच के कारण अतिसार होने से बार-बार शौच आता है, जिसे दस्त लगना कहते हैं। कभी-कभी निर्जलन की स्थिति (डिहाइड्रेशन) बन जाती है, यानी शरीर में पानी की कमी हो जाती है, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मल निकलता है। फिर भी पेट साफ और हलका नहीं लगता।
डायरिया का लक्षण एवं उपचार
मैग्नेशिया कार्ब :
 शिशुओं के लिए उत्तम दवा है। दूध पीता बच्चा, हरे-पीले और झागदार दस्त बार-बार करे, मल से और शरीर से खट्टी दुर्गन्ध आए, दस्त में अपना दूध निकाले, तो उक्त दवा 30 शक्ति कारगर है।
एलूमिना : 

कुछ रोगियों को टट्टी की हाजत ही नहीं होती और वे 2-3 दिन तक हाजत का अनुभव नहीं करते। शौच के लिए बैठते हैं, तब बड़ी मुश्किल से सूखी काली तथा बकरी की मेंगनी जैसी गोलियों की शक्ल में टट्टी होती है, आलू खाने से कष्ट बढ़ जाता है, मलाशय की पेशियां इतनी शिथिल हो जाती है कि स्वयं मल बाहर नहीं फेंक पातीं। यहां तक कि पतले मल को निकालने के लिए भी जोर लगाना पड़ता है। पेशाब करने में जोर लगाना पड़े, पीठ में दर्द हो, तो इन लक्षणों के आधार पर ‘एलुमिना’ 30 एवं 200 शक्ति की कुछ खुराक ही कारगर असर दिखाती है।
कैमोमिला :
 बेचैनी, चिड़चिड़ापन, बच्चा एक वस्तु मांगता है, मिलने पर लेने से मना कर देता है, जिद्दी स्वभाव, गर्म-हरा पानी जैसा बदबूदार दस्त (जैसे किसी ने पालक में अंडा फेंट दिया हो), पेशाब के रास्ते में जलन, मां के गुस्सा करने के समय बच्चे को दूध पिलाने के बाद बच्चे को दस्त होना आदि लक्षणों के आधार पर 30 शक्ति की दवा फायदेमंद रहती है।
एलोस : 
रोगी को मांस के प्रति घृणा रहती है। जूस एवं तरल पदार्थों की इच्छा बनी रहती है, किंतु पीते ही पेट फूलने लगता है। पेट में भारीपन, फूला हुआ, शौच से पूर्व एवं बाद में भी पेट दर्द, रोगी कुछ भी खाता है, फौरन पाखाने जाना पड़ता है। पाखाने में श्लेष्मायुक्त स्राव अधिक निकलता है। साथ ही गैस भी अधिक निकलती है। ऐसी स्थिति में उक्त औषधि 30 शक्ति में नियमित सेवन करानी चाहिए।
पोडोफाइलम : 
उल्टी के साथ दस्त, अधिक प्यास, पेट फूला हुआ, पेट के बल ही रोगी लेट सकता है, यकृत की जगह पर दर्द, रगड़ने पर आराम, कालरा रोग होने पर, बच्चों में सुबह के वक्त, दांत निकलने के दौरान हरा दस्त, पानीदार, बदबूदार पाखाना आदि लक्षण मिलने पर 30 शक्ति में औषधि का प्रयोग हितकारी रहता है।
कैल्केरिया कार्ब :
 जरा-सा दबाव भी (बच्चे चाक खड़िया खाते हैं) पेट पर बर्दाश्त नहीं कर पाता, पीला बदबूदार पाखाना, अधपचा खाना निकलता है, किंतु अधिक भूख लगती है, पहले पाखाना कड़ा होता है, बाद में दस्त होते हैं, 200 शक्ति में लें।
• पहले सिरदर्द, फिर दस्त – ‘एलो’, ‘पोडोफाइलम’।


• खट्टी वस्तुओं से – ‘एलो’, ‘एण्टिमकूड’।
• किसी आकस्मिक बीमारी के कारण – ‘चाइना’, ‘कार्बोवेज’।
• शराब पीने के कारण – ‘आर्सेनिक’, ‘लेकेसिस’, ‘नक्सवोमिका’।
• बुखार के कारण – ‘कैमोमिला’ ।
• नहाने के बाद – ‘एण्टिमक्रूड’।
• बियरपीने के कारण – ‘कालीबाई’, ‘सल्फर’, ‘इपिकॉक’, ‘म्यूरियाटिक एसिड’ आदि।
• गोभी खाने से – ‘ब्रायोनिया’, ‘पेट्रोलियम’।
• नाक बहने एवं फेफड़ों की गड़बड़ी के साथ – ‘सैंग्युनेरिया’।
• मौसम-परिवर्तन के साथ – ‘एकोनाइट’, ‘ब्रायोनिया’, ‘नेट्रम सल्फ’, ‘केप्सिकम’, ‘डल्कामारा’, ‘मरक्यूरियस’।
• आइसक्रीम व अन्य ठंडी वस्तुओं के कारण – ‘पल्सेटिला’, ‘एकोनाइट’, ‘आर्सेनिक’, ‘ब्रायोनिया’।
• कॉफी के कारण – ‘साइक्लामेन’, ‘थूजा’ ।
• जुकाम दब जाने से – ‘सैंग्युनेरिया’ ।
• अंडे खाने के बाद – ‘चिनिनम आर्स’।
• उत्तेजना अथवा व्यग्रता के कारण – ‘एकोनाइट’, ‘अर्जेण्टम नाइट्रिकम’, ‘जेलसीमियम’, ‘इग्नेशिया’, ‘ओपियम’, ‘फॉस्फोरिक एसिड’।
• त्वचा रोग हो जाने पर – ‘ब्रायोनिया’, ‘सल्फर’।
• चिकनी एवं तैलीय वस्तुएं खाने के बाद – ‘पल्सेटिला’।
• फल खाने के बाद – ‘आसेंनिक’, ‘ब्रायोनिया’, ‘चाइना’, ‘पोडोफाइलम’, ‘पल्सेटिला’, ‘क्रोटनटिंग’।
• पेट की गड़बड़ियों के कारण – ‘एण्टिमकूड’, ‘नक्सवोमिका’, ‘पल्सेटिला’ ।
• गर्मी के कारण – ‘एण्टिमकूड’, ‘ब्रायोनिया’, ‘कैमोमिला’, ‘सिनकोना’, ‘क्यूफिया’, ‘इपिकॉक’, ‘पीडोफाइलम’।
• अम्लता (हाइपर एसिडिटी) के कारण – ‘कैमोमिला’, ‘रयूम’, ‘रोविनिया’ ।
• अांतों की कमजोरी के कारण – ‘अर्जेण्टमनाइट’, ‘सिनकोना’, ‘सिकेल’।
• पीलिया के कारण – ‘चिओनेंथस’
• मांस खाने के कारण – ‘आर्सेनिक’, ‘क्रोटनटिंग’।
• दूध पीने के कारण – ‘एथूजा’, ‘मैगकार्ब’, ‘नक्समॉश’, ‘मैगमूर’, ‘सीपिया’।
• चलने-फिरने से – ‘ब्रायोनिया’।
• ऊपर से नीचे उतरने (सीढ़ियां उतरने) के कारण – ‘बोरैक्स’, ‘सैनीक्यूला’ ।
• गुर्दो के संक्रमण के कारण – ‘टेरेबिंथ’ ।
• प्याज खाने से – ‘थूजा’ ।
• सूअर का मांस खाने से – ‘एकोनाइट’, ‘पल्सेटिला’ ।
• मिठाई खाने के कारण – ‘अर्जेण्टम नाइट्रिकम’, ‘गेम्बोजिया’।
• तम्बाकू खाने से – ‘टेबेकम’, ‘कैमोमिला’।
• क्षयरोग के साथ दस्त – ‘आर्निका’, ‘बेप्टिशिया’, ‘सिनकोना’, ‘क्यूप्रमआस’, ‘फॉस्फोरस’ आदि।
• सन्निपात ज्वर के साथ – ‘आर्सेनिक’, ‘बेप्टिशिया’, ‘हायोसाइमस’, ‘म्यूरियाटिक एसिड’।
• आंतों में घाव हो जाने के कारण – ‘मर्ककॉर’, ‘कालीबाई’।
• पेशाब के साथ दस्त – ‘एलोस’, ‘एलूमिना’, ‘एपिस’।
• खांसने पर पाखाना निकल जाना – ‘कॉस्टिकम’।
• टीके वगैरह लगने के बाद (बच्चों में) दस्त होना – ‘साइलेशिया’, ‘थूजा’ ।
• सब्जियां (तरबूज वगैरह) खाने के बाद – ‘आर्सेनिक’, ‘ब्रायोनिया’ ।
• प्रदूषित जल पीने के कारण – ‘जिंजिबर’, ‘एल्सटोनिया’, ‘कैम्फर’ ।
• बच्चों में दस्त होना – ‘एकोनाइट’, ‘एथूजा’, ‘अर्जेण्टमनाइट’, ‘आर्सेनिक’, ‘बेलाडोना’, ‘बोरैक्स’, ‘कैल्केरिया कार्ब’, ‘कैल्केरियाफॉस’, ‘कैमोमिला’, ‘कोलोसिंथ’, ‘क्रोटनटिंग’, ‘सल्फर’, ‘वेरेट्रम एल्बम’।
• बच्चों में दांत निकलने के दौरान दस्त – ‘एकोनाइट’, ‘एथूजा’, ‘बेलाडोना’, ‘कैल्केरिया आदि।
• बूढ़े व्यक्तियों को दस्त होने पर – ‘एण्टिमकूड’, ‘कार्बोवेज’, ‘सिनकोना’, ‘सल्फर’ ।
• स्त्रियों में मासिक ऋतु स्राव से पहले व बाद में दस्त – ‘अमोनब्रोम’, ‘बोविस्टा’।

• लेटे रहने पर स्त्रियों को दस्त की हाजत होना – ‘कैमोमिला’, ‘हायोसाइमस’, ‘सिकेलकॉर’।



16.9.17

काली खांसी जड़ से खत्म करने के उपाय





मौसम बदलने के साथ ही सर्दी-जुकाम जैसी कई तरह की समस्याएं हो जाती हैं। इसी में से एक है काली खांसी जो एक संक्रामक बीमारी है और हवा के जरिए एक-दूसरे तक फैल जाती है। कूकर खांसी एक संक्रामक रोग है जो एक बच्चे से दूसरे बच्चे के सम्पर्क में आने से हो जाती है। यानि की हवा से ये बीमारी एक इ इस बीमारी से न केवल बच्चे प्रभावित होते हैं अपितु बड़े व बूढ़े लोग भी काली खांसी से परेशान हो सकते हैं। कूकर खांसी को काली खांसी बोलते हैं। काली खांसी के मुख्य लक्षण होते हैं जैसे-

शरीर में बुखार का आना
तेजी से खांसी का होना
खांसते समय हूप—हूप की आवाज होना
आंखों का लाल होना
उल्टी होना


रात भर खांसी होते रहना और दिन में खांसी का तेज होते रहना आदि। अब जानते हैं काली खांसी से बचने के कारगर आयुवेर्दिक उपचार क्या हैं। जिनके प्रयोग से आप कूकर खांसी से पूरी तरह से बच सकते हो।काली खांसी होने से पहले शरीर में हल्का बुखार, उल्टी आना, आंखों का लाल होना आदि लक्षण देखने को मिलते हैं और इसके बाद खांसी बढ़ जाती है। यह बीमारी जल्दी ठीक नहीं होती जिससे काफी परेशानी होती है। ऐसे में कुछ घरेलू उपाय करके काली खांसी से छुटकारा पाया जा सकता है।
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*गन्ना और मूली का रस
काली खांसी को जड़ से खत्म करने के लिए मूली के 60 ग्राम रस में बराबर मात्रा में गन्ने का रस मिला लें और कुछ दिनों तक इसका सेवन करें
* चम्मच दही 1 चम्मच चीनी और 6 ग्राम पिसी हुई काली मिर्च का पाउडर मिला कर खाने से आपको खांसी में तुरंत राहत मिलेगी |


*घरेलू उपाय लहसुन का

लहसुन किसी भी तरह के संक्रामक रोगों को खत्म करता है। साथ ही इंसान के शरीर को कई बीमारियों से भी मुक्त रखता है।
कैसे करें लहसुन का प्रयोग काली खांसी दूर करने में आइये जानते हैं। आप सबसे पहले लहसुन की पांच बूदें निलालें अब उसमें बराबर मात्रा में शहद को भी मिला लें। अब इसे किसी गिलास व कप में डाल दें। इसका सेवन आपको एक दिन में कम से कम तीन बार करना है। यह काली खांसी को दूर करता है। इसके साथ—साथ एक प्राचीन उपाय भी आप कर सकते हो ​जिसे आदिवासी ग्रामीण लोग करते हैं। लहसुन की कलियों को छीलकर उसकी माला बना लें और इसे कुछ दिनों तक अपने गले में रखें। एैसा करने से कुकर खांसी ठीक हो जाती है।
*बादाम और मिश्री प्रयोग
बादाम भी एक कारगर औषधि है काली खांसी को खत्म करने के लिए। आप पांच बादाम लें और इन्हें रात में
एक कटोरी पानी में भरकर रख दें। सुबह होते ही आप इन बादामों के छिलके उतार लें और इसे मिश्री और
लहसुन की एक छोटी कली के साथ सेवन करें। एैसा नियमित करते रहने से कुकर खांसी खत्म हो जाएगी
*लौंग
2 -3 लौंग को आग पर भून लें और शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम चाटने पर भी फायदा होता है।


*फिटकरी -

फिटकरी भी काली खांसी को ठीक करती है। आप बहुत ही छोटी मात्रा में फिटकरी लें कम से कम चने की दाल के आकार का हो। आपको इस फिटकरी का सेवन गर्म पानी के साथ करना है। इस अचूक उपाय को भी दिन में तीन बार जरूर करें। एैसा करने से ​काली खांसी का प्रभाव व संक्रमण खत्म होने लगता है।
*पिसी हुई काली मिर्च को एक कप पानी में उबाल ले और ठंडा करे | और फिर इक चम्मच देशी मधु मक्खी के शहद में मिला कर पीने से आपको लाभ होगा | और गले की खराश भी ठीक हो जाएगी |
*काली मिर्च और तुलसी के पत्ते-
काली खांसी की यह समस्या मार्किट से मिलने वाले कफ सिरप से ठीक नहीं होती। ऐसे में काली मिर्च और तुलसी के पत्तों के इस्तेमाल से इससे राहत पाई जा सकती है। इसके लिए इन दोनों को बराबार मात्रा में पीस कर इनकी छोटी-छोटी गोलियां बना लें और 1-1 गोली को दिन में 3-4 बार सेवन करें। कुछ दिनों तक लगातार इन गोलियों का सेवन करने से खांसी से राहत मिलती है।
*तेज खांसी आने पर आप मुलेठी के टुकड़े को कालि मिर्च के साथ पीस ले और खांसी आने पर थोडा थोडा चाटने से जल्दी आराम मिलेगा | और गले के दर्द में भी आराम होगा | और सुजन भी ठीक हो जाएगी |
*सेंधा नमक -
2 ग्राम सेंधा नमक को 250 ग्राम पानी में उबालें | और जब पानी की मात्रा आधी रह जाये तब उसे ठंडा करके बोतल में भरकर रख ले | जब भी आपको खांसी हो तब एक चम्मच पी ले इससे आपको आराम मिलेगा |
*अमरूद का प्रयोग करना ना भूलें
कुकर खांसी में एक रामबाण औषधि का काम करता है अमरूद। यदि काली खांसी हो गई है तो आप गरम राख में अमरूद को डाल दें और इसे सेंक।
अब आप दिन में दो बार इसका सेवन नियमित कुछ दिनों तक करें। इस अचूक उपाय से कुकर खांसी यानि की काली खांसी दूर हो जाती है।काली खांसी में परहेज :-
हमेशा गुनगुना पानी पियें |
फ्रिज का पानी बिल्कुल ना पीये |
हो सके तो मटके के पानी का इस्तेमाल करे |
तली हुई चीजों का प्रयोग बिलकुल भी न करे |
मीठी चीजे खाने के बाद बिल्कुल भी पानी न पीये |





14.9.17

अगर होती है सफर मे उलटी तो करें ये घरेलू उपाय //Motion Sickness Home remedies

Motion Sickness Home remedies
   


कई लोगों को घूमने का शौक तो होता है पर वो उलटी के डर से कहीं बाहर नहीं निकल पाते। ऐसे में परेशान होने की जरूरत नहीं क्योंकि आपके किचन में ही ऐसी कई चीजें मौजूद हैं जिसका इस्तेमाल कर आप सफर के दौरान उलटी की समस्या से बच सकते हैं।आपका भी कोई दोस्त गाड़ी या बस में बैठते ही उलटी करता है? तो उसे भी बताएं ये आसान घरेलू नुस्खे…

पुदीना-
पुदीना पेट की मांसपेशियों को आराम देता है और इस तरह चक्कर आने और यात्रा के दौरान तबीयत खराब लगने की स्थिति को भी खत्म करता है। पुदीने का तेल भी उलटियों को रोकने में बेहद मददगार है। इसके लिए रुमाल पर पुदीने के तेल की कुछ बूंदे छिड़कें और सफर के दौरान उसे सूंघते रहें। सूखे पुदीने के पत्तों को गर्म पानी में मिलाकर खुद के लिए पुदीने की चाय बनाएं। इस मिश्रण को अच्छे से मिलाएं और इसमें 1 चम्मच शहद मिलाएं। कहीं निकलने से पहले इस मिश्रण को पिएं।



नींबू --

नींबू में मौजूद सिट्रिक ऐसिड उलटी और जी मिचलाने की समस्या को रोकते हैं। एक छोटे कप में गर्म पानी लें और उसमें 1 नींबू का रस व थोड़ा सा नमक मिलाएं। इसे अच्छे से मिलाकर पिएं। आप नींबू के रस को गर्म पानी में मिलाकर या शहद डालकर भी पी सकते हैं। यात्रा के दौरान होने वाली परेशानियों को दूर करने का यह एक कारगर इलाज है।
अदरक-
अदरक में ऐंटीमैनिक गुण होते हैं। एंटीमैनिक एक ऐसा पदार्थ है जो उलटी और चक्कर आने से बचाता है। सफर के दौरान जी मिचलाने पर अदरक की गोलियां या फिर अदरक की चाय का सेवन करें। इससे आपको उलटी नहीं आएगी। अगर हो सके तो अदरक अपने साथ ही रखें। अगर घबराहट हो तो इसे थोड़ा-थोड़ा खाते रहें।
प्याज का रस-
सफर में होने वाली उलटियों से बचने के लिए सफर पर जाने से आधे घंटे पहले 1 चम्मच प्याज के रस में 1 चम्मच अदरक के रस को मिलाकर लेना चाहिए। इससे आपको सफर के दौराउलटियां नहीं आएंगी। लेकिन अगर सफर लंबा है तो यह रस साथ में बनाकर भी रख सकते हैं।लौंग -
सफर के दौरान जैसे ही आपको लगे कि जी मिचलाने लगा है तो आपको तुरंत ही अपने मुंह में लौंग रखकर चूसनी चाहिए। ऐसा करने से आपका जी मिचलाना बंद हो जाएगा।.
लौंग- 
सफर के दौरान जैसे ही आपको लगे कि जी मिचलाने लगा है तो आपको तुरंत ही अपने मुंह में लौंग रखकर चूसनी चाहिए। ऐसा करने से आपका जी मिचलाना बंद हो जाएगा।.



तीन नींबू काटकर बेडरूम मे रखें और अगले दिन देखें कमाल !





एक स्‍वस्‍थ शरीर के लिए स्‍वच्‍छ आहार के साथ साथ सबसे जरूरी है अच्छी नींद। ये हम सभी के दिनचर्या का सबसे जरुरी हिस्सा होता है लेकिन अक्‍सर ऐसा हो जाता है कि किसी वजह से हमारी नींद पूरी नहीं हो पाती है इन वजहों में कई बार नकारात्मक उर्जा भी होती है जो हमारे नींद में खलल डालती है। ये नकारात्‍मक उर्जा हमारे चारों तरफ होती है जो हमारे दिमाग पर एक तरह से मानसिक तनाव देती है और यही कारण है कि हम अपनी नींद सही से नहीं ले पाते हैं। तो आज हम इस नकारात्मक उर्जा को कैसे दूर कर सकते हैं उसके लिए नी़बू का उपाय बताने जा रहे हैं जो कि आपके आस पास के सभी नकारात्‍मक उर्जा को दूर करेगा।
हम सभी जानते हैं कि निम्बू के कई सारे फ़ायदे हैं जो हमारे शरीर के लिए काफी लाभदायक है। इसलिए निम्बू आसानी से सभी के घर में मिल जाता है। जहां एक तरफ निम्बू से आप एनर्जेटिक भी महसूस करते है वहीं दूसरी तरफ निम्बू को काटकर घर में रखने से ताज़ी खुशबु आती है।


बताया जाता है कि बेडरूम में निबू रखने से अस्थमा और खासी जुकाम की समस्‍या से जूझ रहे लोगों को सांस लेने में काफी आसानी होती है।जिन लोगों को सुबह उठने पर लो ब्लड प्रेशर की शिकायत है वो भी इस नुस्खे का इस्तेमाल कर सकते हैं। लो ब्लड प्रेशर के मरीज अगर रात को सोते समय अपने बिस्तर के बगल में नींबू का टुकड़ा रखते हैं तो सुबह उनको फ्रेश महसूस होगा। नींबू के गुणों के ऊपर हुए रिसर्च की माने तो नींबू की खुशबू शरीर में सेरोटिन का लेवल बढ़ाने में मदद करती है जिससे ब्लड प्रेशर के मरीजों को राहत मिलती है।
अगर आपके घर में मक्खियों के साथ साथ अन्य दूसरे कीड़े-मकोड़ों भी घर में है तो हमेशा घर में नींबू का टुकड़ा काट कर रखें। नींबू की खुशबू से कीड़े-मकोड़े दूर भागते हैं। रात को सोने से पहले कुछ देर के लिए नींबू का टूकड़ा काटकर बिस्तर के पास रख दें और लाइट बुझा दें। नींबू की खुशबू और अंधेरे के कारण सारे कीड़े-मकोड़े और मक्खियां दूर भाग जाएंगे और आप आराम से सो पाएंगे।
अगर आप सुबह की शुरुआत नींबू पानी के साथ करें तो इसका फायदा बहुत ज्यादा होगा। रोज सुबह नींबू पानी पीने से न सिर्फ आपका मोटापा कम होता है बल्कि आप कई बीमारियों से भी दूर रहेंगे।
नींबू न केवल हमारे स्वास्थ्य के लिए बल्कि हमारे शरीर और बालों के लिए भी काफी फ़ायदेमंद होता है।
ये तो हम सभी जानते हैं लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि निंबू के कुछ साधारण टोटकों के प्रयोग करने से धन प्राप्ति के रास्‍ते अपने आप खुलजाते हैं। शायद नहीं जानते हैं लेकिन नींबू के इन टोटकों का प्रयोग परंपरागत रूप से काफी पहले से से किया जाता आ रहा है।




13.9.17

मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के आधुनिक उपचार के तरीके


विभिन्न प्रकार के उपचार क्या हैं?
इलाज में पहले कदम के रूप में, डॉक्टर पूरी तरह से निदान करते हैं. इस पहचान के नतीजों के आधार पर, वो एक ख़ास उपचार योजना की सिफ़ारिश करते हैं. नियंत्रिक लक्षणों वाली हल्की मानसिक बीमारी के लिए, उपचार कम अवधि वाला हो सकता है. गंभीर मानसिक रोगों से पीड़ित लोगों के लिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम, मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, और साइकेट्रिक सोशल वर्कर, उपयुक्त इलाज मुहैया कराने के लिए एक साथ काम करती है. उपचार में नीचे लिखी विधियों में से कोई एक या मिलीजुली विधियाँ शामिल होती हैं.


नोट:
किसी भी तरह के इलाज के प्रति व्यक्ति जितना तैयार या राज़ी है, उतना जल्दी ही वो ठीक हो सकेगा. कुछ विकार दिमाग में रासायनिक असंतुलन से हो सकते हैं; कभी कभी ये असंतुलन गंभीर भावनात्मक संकटों की वजह से आ जाते हैं. परिवार और दोस्तों की हमदर्दी और भावनात्मक सहायता, व्यक्ति को उपचार में और स्वास्थ्य सुधार में प्रभावी रहती है.
कुछ उपचार विधियां इस तरह से हैं:
औषधि प्रयोग/फ़ार्माकोथेरेपी
औषधि प्रयोग से लक्षणों में सुधार या उन्हें नियंत्रित करने और स्वास्थ्य सुधार में मदद मिलती है. कई मामलों में, दवाओं को उपचार की पहली लाइन के तौर पर रखा जाता है. दवाओं का असर बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है और इस बात पर भी कि मरीज़ का शरीर दवाओं के प्रति कितनी अनुकूलता दिखाता है.
सबसे सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाली कुछ साइकेट्रिक दवाओं में शामिल हैं:
अवसादरोधी दवाएं: मनोचिकित्सक की लिखी दवाएं जो अवसाद और घबराहट के लक्षणों में राहत पहुंचाती हैं. अवसादरोधी दवाएं एडिक्टिव नहीं होती हैं और लंबे समय तक उन्हें इस्तेमाल करने के बावजूद उन की आदत नहीं पड़ती है.
घबराहट निरोधी दवाएं: इन्हें ट्रैगक्वलाइज़र भी कहा जाता है, ये घबराहट को कम करती हैं और इसलिए इनका इस्तेमाल चिंता से जुड़े विकारों में किया जाता है. इन दवाओं का आराम और सुकून वाला प्रभाव होता है और ये क्षोभ, गुस्से और अनिद्रा में भी प्रभावी रहती हैं.
मूड स्थिर करने वाली दवाएं: मनोरोग की दवा और एक मूड स्टेबलाइज़र को मिज़ाज से जुड़े विकारों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है. वे दिमाग के कुछ ख़ास न्यूरोट्रांसमीटरों को संतुलित करने में मदद करती हैं, जो भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं. ये दवाएं बाइपोलर विकार के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं और इस विकार के दौरान उन्माद और अवसाद के अवसरों के लौटने की प्रवृत्ति को रोकती हैं. कुछ मामलों में, ये दवाएं गंभीर अवसाद या शिज़ोफ़्रेनिया से पैदा होने वाले अवसाद के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं.
ग़ैरसाइकोटिक दवाएं: इनका इस्तेमाल आमतौर पर शिज़ोफ्रेनिया जैसे विकारों से जुड़े लक्षणों (संभ्रम, भ्रांति, असंबंद्ध विचार, मूड में बदलाव) के इलाज में किया जाता है. ये दवाएं बाइपोलर विकार और गंभीर अवसाद के इलाज में भी प्रयोग की जाती हैं. इन्हें न्यूरोलेप्टिक्स या प्रमुख टैंगक्वलाइज़र भी कहा जाता है.
थेरेपियां
किसी भी थेरेपी का लक्ष्य होता है मरीज में स्वास्थ्य लाभ और उनकी मानसिक सेहत में सुधार. कुछ लोगों को दवाएं दी जा सकती हैं और उसके साथ एक किस्म की थेरेपी कराने की सलाह दी जा सकती है जबकि कुछ और लोगों को दो थेरेपियों के साथ दवाएं दी जा सकती हैं. बीमारी की गंभीरता और व्यक्ति की शारीरिक और भावनात्मक दशा पर ही ये निर्भर करता है कि उसे कौन से थेरेपी की ज़रूरत है.
साइकोथेरेपी: ये एक ऐसा उपचार है जिसमें चिकित्सा विशेषज्ञ (मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट) वैज्ञानिक रूप से वैध प्रविधियों का इस्तेमाल कर लोगों की, असंबद्ध और अतार्किक विचार प्रक्रिया को एक सकारात्मक, व्यवहारिक और तार्किक सोच में बदलने में मदद करता हैं. वे स्वस्थ आदतों का अनुपालन भी सुनिश्चित करते हैं जिससे सकारात्मक व्यवहार को मजबूती मिले.


थेरेपिस्ट लोगों से उनके लक्षणों और उनसे जुड़े हुए मुद्दों के बारे में बात करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उनके मिजाज़, भावना, विचारों के पैटर्न और व्यवहार को समझने और उनका आकलन करने में मरीज़ों की मदद करते हैं. इस समझ के बूते लोग बीमारी से निपटने और स्वास्थ्य लाभ के बारे में सीखने की बेहतर स्थिति में आ जाते है. साइकोथेरेपियां कई प्रकार की होती हैं और तमाम बीमारियों के लिए कोई एक थेरेपी काम नहीं करती है.

संज्ञानात्मक व्यवहारजन्य थेरेपी (सीबीटी): ये दो थेरेपियों का मिश्रण हैः संज्ञानात्मक थेरेपी और व्यवहारजन्य थेरेपी. संज्ञानात्मक थेरेपी व्यक्ति के विचारों, विश्वासों और उनके व्यक्ति के मूड और क्रियाओं पर होने वाले प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करती है. उसका लक्ष्य होता है व्यक्ति के सोच में बदलाव और उसे अधिक अनुकूलक और स्वस्थ बनाना. व्यवहारजन्य थेरेपी, व्यक्ति की क्रियाओं पर फ़ोकस करती है और उसका लक्ष्य होता है अस्वस्थ व्यवहारजन्य पैटर्न को बदलना.
सीबीटी व्यक्ति को अपनी मौजूदा समस्या को पहचानने और उसके समाधान के लिए काम करने में मदद करती है. व्यक्ति और थेरेपिस्ट दोनों इस प्रक्रिया में सक्रियतापूर्वक शामिल होते हैं. व्यक्ति के विकृत या असहयोगी विचार पैटर्नों की पहचान में, अनुपयुक्त, अतार्कित और अर्थहीन विश्वासों को पहचानने और बदलने में, तदानुरूप व्यवहारों को बदलने में और उनके अंतर्वैयक्तिक रिश्तों को सुधारने में, थेरेपिस्ट मदद करते हैं.
सीबीटी विशेषरूप से उन व्यक्तियों के लिए मददगार होती हैं जिन्हें अपनी समस्याओं को लेकर पूरा ज्ञान होता है क्योंकि सीबीटी में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों में व्यक्ति को सक्रियतापूर्वक शामिल होना होता है. इसमे कई घरेलू कार्य करने होते हैं जैसे अपने मूड की एक डायरी लिखते रहना, निष्क्रिय विचारों की पहचान करना और सकारात्मक अनुभवों को रिकॉर्ड करना.
सीबीटी का इस्तेमाल गंभीर मनोरोगों के इलाज में किया जा सकता है जैसे अवसाद, घबराहट, भोजन विकार और बाइपोलर यानी द्विध्रुवीय विकार.
अंतर्वैयक्तिक थेरेपी (इंटरपर्सनल थेरेपी- आईपीटी): इसका लक्ष्य होता है व्यक्ति में संचार की प्रवृत्ति में सुधार करना और उसमें अन्य लोगों के साथ उठने-बैठने और घुलनेमिलने की आदत का विकास करना. जब किसी मरीज का व्यवहार समस्या पैदा कर रहा होता है तो दवाओं के साथ आईपीटी का इस्तेमाल किया जाता है. शोध बताते हैं कि आईपीटी का प्रभाव निर्भर करता है, बीमारी की गंभीरता और थेरेपी के प्रति मरीज़ की इच्छा और उसके पालन के प्रति उसकी सक्रियता पर.
पारिवारिक थेरेपी: इसका फ़ोकस मरीज़ों और उनके परिजनों के लिए थेरेपी के सत्र संचालित करने पर होता है. पारिवारिक रिश्ते सुधारने की कोशिश की जाती है जिसका फायदा देखरेख के काम में मरीज के स्वास्थ्य लाभ में होता है.
थेरेपिस्च परिजनों के साथ काम करते हुए परिवार के टकरावों की पहचान करता है जो मरीज़ की बीमारी को बढ़ा सकते हैं. इन समस्याओं को देखा जाता है, और एक समाधान निकाला जाता है. और इसकी पहल परिजनों की ओर से ही आती है.
थेरेपिस्ट परिजनों को उनके प्रियजन की बीमारी और उसके लक्षणों के बारे में बताते हैं. थेरेपिस्ट मरीज़ के प्रति परिजनों में आ जाने वाली किसी गंभीर और प्रतिकूल प्रवृत्ति (बीमारी की वजह से जो न चाहते हुए भी दिख जाती है) की पहचान में भी मदद करते हैं और इस तरह के नकारात्मक व्यवहार को भी ठीक करने में मदद करते हैं. इसी के साथ, थेरेपिस्ट इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि इलाज कराने और हालत में सुधार के प्रति मरीज़ में इच्छा होना बहुत ज़रूरी है और इसमें परिजनों की मदद और देखरेख की भी अहम भूमिका है. पारिवारिक थेरेपी परिजनों पर आने वाले दबावों को कम करने पर भी ध्यान केंद्रित करती है, जो लंबे समय तक देखरेख करने से आ सकते हैं.
महत्त्वपूर्ण: इन थेरेपियों का मिलाजुला प्रयोग कभीकभार उपचार के असर को बढ़ा देता है. इसके अलावा कई मामलों में फार्माकोथेरेपी और साइकोथेरेपी को मिलाने की ज़रूरत होती है. उदाहरण के लिए, हल्के अवसाद, सीबीटी जैसी स्थितियों के साथ मददगार साइकोथेरेपी इस्तेमाल की जाए तो इसके अच्छे नतीजे मिल सकते हैं. लेकिन कुछ प्रमुख गंभीर अवसाद में, फार्माकोथेरेपी को साइकोथेरेपी के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन साइकोटिक बीमारी में, साइकोथेरेपी पूरी तरह कारगर नहीं रह पाए और सिर्फ़ दवा या चिकित्सा ही मददगार होती है.
मस्तिष्क उद्दीपन से जुड़े उपचार-
मस्तिष्क को इस इलाज करने वाला इलाज तब किया जाता है, जब दवा या साइकोथेरेपी से कोई नतीजा नहीं मिल पाता. विस्तृत चिकित्सा आकलन और डॉक्टरों के पैनल की व्यक्ति को मिलने वाले फायदे को लेकर सहमति के बाद ही विशिष्ट स्थितियों में ये इलाज दिया जाता है.
महत्त्वपूर्ण: व्यक्ति और उनकी देखरेख करने वाले लोगों को इन उपचारों और उनके साइड अफेक्ट के बारे में पूरी जानकारी रखने की ज़रूरत है. ये उपचार तभी दिया जाता है जब मरीज और उसके परिजन इसके लिए सहमति दे देते हैं.
मस्तिष्क उद्दीपन उपचार में शामिल होती हैं:
विद्युतआक्षेपी उपचार (इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी- ईसीटी): इस थेरेपी में मस्तिष्क पर विद्युत प्रवाह दिया जाता है, इसका इस्तेमाल कुछ खास मनोरोगों के लक्षणों के इलाज में किया जाता है. ईसीटी का उपचार के तौर पर कब, कहां और क्यों इस्तेमाल किया जाता है, इस बारे में जानने के लिए यहां पढ़ें.
कपाल केंद्रित चुंबकीय उद्दीपन (ट्रांसक्रेनीअल मैग्नेटिक स्टीम्युलेशन- टीएमएस): ये एक ऐसी प्रविधि है जिसमें कुछ मनोरोगों के लक्षणों के इलाज के लिए मस्तिष्क की स्नायु कोशिकाओं को उद्दीप्त करने में चुंबकीय क्षेत्रों का इस्तेमाल किया जाता है.


मुझे कैसे पता चलेगा कि कोई विशिष्ट उपचार लाभदायक है?

मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर मेडिकल केस हिस्ट्री को चेक करते हैं, लक्षणों का विश्लेषण करते हैं, परीक्षण और आकलन करते हैं, और बीमारी की सही पहचान के लिए परिवार के सदस्यों से बात करते हैं और उसके बाद ये फ़ैसला करते हैं कि इलाज के लिए कौनसा तरीक़ा अपनाया जाएगा. व्यक्ति और देखरेख करने वाले लोगों को पूरी प्रक्रिया से अवगत रखा जाता है. अगर व्यक्ति ऐसी स्थिति में है कि वे भी इलाज के तरीकों और उनसे क्या सुधार हो सकता है, इस बारे में जानकारी चाहते हैं और अपना इलाज का तरीका समझना चाहते हैं, तो वे ऐसा कर सकते हैं. अगर नहीं तो ये भी काफ़ी है कि व्यक्ति के परिजनों (देखरेख करने वालों) को बीमारी के बारे में पर्याप्त जानकारी हो और इस बारे में पर्याप्त सूचना हो कि उसका इलाज किस तरह चलाया जाएगा ताकि डॉक्टर के साथ इलाज के तरीके को लेकर पहले से ही सहमति बन सके.
क्या योगा का इस्तेमाल मानसिक बीमारी में बतौर इलाज किया जा सकता है?
मनोरोग से जुड़ी दवाओं के क्या दुष्प्रभाव होते हैं?
ये साबित हुआ है कि तमाम दवाओं के दुष्प्रभाव होते हैं. कुछ लोग इन दुष्प्रभावों को महसूस नहीं कर पाते हैं या वे उनका प्रबंध कर लेते हैं. इसके अलावा, मनोरोगों की दवाओं के मामले में, दुष्प्रभावों को एक सूचना शीट में दर्ज किया जाता है और आपकी दवाओं के साथ रखी जाती है. दुष्प्रभाव के बारे में और जानने के लिए अपने डॉक्टर से बात करें और जानिए कि उनसे कैसे निपटा जा सकता है.
मनोरोग से जुड़ी चिकित्सा के कुछ साइड अफेक्ट इस तरह से हैं:
नींद और सुस्ती
वजन बढ़ना
डायबिटीज़ की आशंका
रक्तचाप में उतारचढ़ाव जिससे चक्कर आने लगते हैं
कमज़ोर प्रेरणा, रुचि में कमी और अपनी देखरेख में कमी
आप निम्न महत्त्वपूर्ण चीज़ों पर गौर कर सकते हैं:
दवाओं के लाभ उसके हल्केफुल्के दुष्प्रभाव से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं
डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक निर्धारित समय पर दवाएं लेना सबसे सही है ताकि स्वास्थ्य सुधार को गति मिल सके
दुष्प्रभाव रुक सकते हैं अगर आप कुछ समय तक लगातार दवाएं लेते रहें.
अगर आप तब भी दुष्प्रभाव का अनुभव करते हैं और दवाएं जारी रखने में हिचकते हैं, तो आप अपने डॉक्टर से बातें करें. वो आपकी दवा की खुराक कम कर सकता है, या दवा बदल सकता है.
उपचार के दौरान किसी भी समय, अपनी दवाएं अचानक मत रोक दीजिए, जब तक कि आपका डॉक्टर ऐसा करने के लिए न कहें.



सिर के बाल और नेत्रज्योति के लिए ब्रह्मास्त्र नुस्खा // Brahmastra Nuskha for head hair and sharp eyesight

  
आँखों की रोशनी बढ़ाता है और सिर के बालों को मजबूत बनाता है यह सरल प्रयोग, जरूर पढ़ें 
आधुनिक जीवनशैली की देन बहुत सारे रोगों में से दो समस्याएं बहुत प्रमुख हैं, आखों की रोशनी कम होना और सिर के बालों का कमजोर होकर टूट जाना । ये दोनों ही समस्याएं ऐसी हैं कि धीरे धीरे शुरू होकर स्थायी रूप से आपको परेशान करने लगती हैं । इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको एक ऐसा सरल प्रयोग बता रहे हैं जो बहुत से रोगियों पर आजमाया हुआ और बहुत अच्छे रिजल्ट देने वाला सिद्ध हुआ है । इस प्रयोग को हम आपके लिये प्रकाशित कर रहे हैं, जरूर लाभ उठाइयेगा ।

इस नुस्खे को तैयार करने के लिये आपको निम्नलिखित सामग्री की जरूरत पड़ेगी :-

* साबुत लहसुन चार
* बादाम की गिरी 200 ग्राम
*पिस्ता 200 ग्राम
* गाय के दूध से बना देशी घी आधा किलो
* शुद्ध शहद एक किलो
* काली मिर्च 200 ग्राम
*अलसी के बीज 500 ग्राम
* साबुत लहसुन चार
* बादाम की गिरी 200 ग्राम
*पिस्ता 200 ग्राम




तैयार करने की विधि-

इस नुस्खे को तैयार करने के लिये सबसे पहले अलसी के बीज को धूप में सुखाकर दरदरा कूट लें और काली मिर्च का मिक्सी में चलाकर बारीक पाउडर बना लें । इसके बाद लहसुन की चारों पोथियों की सभी कली को छिलकर बारीक बारीक कतर लें । बादाम और पिस्ते को भी बारीक बारीक काट लें । सभी सामान के तैयार हो जाने के बाद इनको एक साथ मिला लें । अब देशी घी को कढ़ाही में डालकर बस इतना गर्म करें की घी पिघल जाये । अब इस पिघले हुये घी में सभी सामान डालकर मिला दें । सबसे आखिर में जब घी ठण्डा होना शुरू हो जाये तो उसमें शहद भी मिलाकर बहुत अच्छी तरह से मिला लें और काँच के मर्तबान या शीशी में भरकर रख लें ॰आपका नुस्खा तैयार है ।



सेवन विधि :-

इस नुस्खे को सभी उम्र के लोग  खा सकते हैं । उम्र के अनुसार खुराक की मात्रा निम्न प्रकार रहेगी
3 साल तक के बच्चे एक तिहाई चम्मच सुबह और शाम
3 से 8 साल तक के बच्चे आधा चम्मच सुबह और शाम
8 से 16 साल तक के युवा एक चम्मच सुबह और शाम
16 साल से ऊपर दो चम्मच सुबह और शाम