28.11.21

गाय के घी के कमाल के फायदे/Benefits of Cow Ghee

 



अध्यात्म और शारीरिक दोनों ही रूप से गाय के घी का बहुत ही महत्व है। शास्त्रों में और आयुर्वेद में इसको अमृत सामान माना गया है। इसको देवी देवता को खुश करने के लिए शुद्ध घृत की ज्योति एवं हवन में उपयोग किया जाता है। इसके सेवन से कमजोर व्यक्ति के कई रोग दूर होकर शरीर बलवान और शक्तिशाली बनता है। इससे त्वचा,सिर,पेट के रोगो में लाभ होता है। इसकी कुछ बुँदे नाक में डालने से, एनिमा लेने से पित्त और वात रोग का इलाज किया जाता है। घृत के सेवन के अनगिनत फायदे है।
स्त्री यौन रोग (श्वेत प्रदर) में
घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा गुनगुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है।
गाय के घी के सेवन कमजोरी का इलाज
यह स्मरण रहे कि घृत के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।
आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए
एक चम्मच शुद्ध घृत में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।
यादाशत बढाएं
गाय के घी को नाक में डालने से यादाशत अच्छी होती है और बच्चों के लिए यह बहुत फायदेमंद है।
बलगम से छुटकारा
घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।
फफोले का उपचार
फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।
अच्छी नींद
रात को नींद नहीं आती तो रात को नाक में घी डालकर सोएं,नींद अच्छी आएगी और सारा दिन फ्रैश रहेगें।
पुराने जुखाम से राहत
लंबे समय से जुखाम से परेशान हैं और दवाइयों से भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा तो रात को रोजाना गाय का घी डालकर सोएं। इसके लगातार इस्तेमाल से जुखाम से राहत पाई जा सकती है।
उच्च कोलेस्ट्रॉल
उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। आप घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार, नाक में प्रयोग करें।
खर्राटे गायब
रात को सोने से पहले हल्का गुनगुना करके एक-एक बूंद नाक में डाल कर सोमे से खर्राटों की परेशानी दूर हो जाएगी।
तनाव दूर
किसी भी तरह के मानसिक तनाव से दूर हैं तो गाय का शुद्ध घी रात को रोजाना नाक में डालकर सोएं। इससे तनाव दूर हो जाएगा और कोई नुकसान भी नहीं होगा।
गाय के घृत से सांप काटने पर उपचार
सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।
चर्म रोग का इलाज
चर्म रोग का घरेलू इलाज – गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर इसको पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है।
अन्य लाभ 
गाय के घी के नियमित सेवन से आपको कब्ज और एसिडिटी की समस्या नहीं होगी|
अगर आपके हाथ पैर में जलन हो रही है तो गाय के घी से तलवों की मालिश करें| ऐसा करने से हाथ पैरों की जलन समाप्त हो जाएगी|
शरीर में थकान या कमजोरी महसूस हो रही है तो आप दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री को मिलाकर पीएं, कमजोरी दूर हो जाएगी|
अगर आप माइग्रेन के दर्द से पीड़ित है तो गाय के घी की 2 बूंदे सुबह व शाम नाक में डालें| आपको आराम मिलेगा|
गाय के घी के इस्तेमाल से शरीर का मोटापा नहीं बढ़ता क्यूंकि इसके सेवन से कोलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता|
गाय के घी के प्रयोग से व्यक्ति की शारीरिक व मानसिक ताकत बढ़ती है|
गाय के घी को नाम में डालने से एलर्जी की समस्या दूर हो जाती है|
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26.11.21

अलसी के तेल के इतने सारे फायदे नहीं पता होंगे आपको! Flax seed oil benefits


 

 अलसी को स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि अलसी का तेल भी स्वास्थ्य गुणों से भरपूर है. अलसी का तेल फ्लैक्ससीड ऑयल के नाम से जाना जाता है. अलसी के तेल में औषधीय गुण पाए जाते हैं. अलसी में लिगनेंस एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो कैंसर, डायबिटीज और हार्ट प्रॉब्लम के रिस्क को कम करने में मदद करते हैं. इतना ही नहीं अलसी में ओमेगा-3 फैटी एसिड, मैग्नीशियम और विटामिन बी जैसे गुण पाए जाते हैं. जो शरीर को कई बीमारियों से बचाने में मदद कर सकते हैं. एनीमिया के शिकार लोगों के लिए अलसी काफी फायदेमंदबीमारियों के खतरे को कम कर सकते हैं।

  अलसी के बीज से बनने वाला तेल में औधषीय गुणों से भरपूर होता हैं। सेहतमंद रहने के साथ-साथ यह कई गंभीर बीमारियों को दूर करने में मदद करता है। कई लोग याददाश्त बढ़ाने के लिए अलसी के बीज का सेवन करते हैं। बता दें कि अलसी में ओमेगा-3 फैटी एसिड, मैग्नीशियम और विटामिन बी जैसे गुण पाए जाते हैं, जिससे कई स्वास्थ्य लाभ होते हैं। वहीं अलसी के तेल में मछली से 50 प्रतिशत ओमेगा 3 फैटी एसिड पाया जाता है, जिसका इस्तेमाल कई तरीके से किया जाता है।
 वजन घटाने के लिए अलसी के तेल काफी फायदेमंद होते हैं। इसके अलावा ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने और पाचन क्रिया को दुरुस्त करने के लिए अलसी के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं अलसी के तेल कई बीमारियों के लिए रामबाण इलाज है। आइए जानते हैं कि किन-किन बीमारियों में अलसी के तेल का इस्तेमाल करना फायदेमंद हैं।

गठिया मरीजों के लिए-

बढ़ती उम्र में ज्यादातर लोगों को गठिया की परेशानी शुरू हो जाती है। इस बीमारी में हड्डियों में असहनीय दर्द शुरू हो जाता है। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए अलसी के तेल का इस्तेमाल करें। नियमित इसके सेवन से गठिया की परेशानी से राहत पा सकते हैं। इसके अलावा इसमें पाए जाने वाला ओमेगा 3 फैटी एसिड की वजह से यह आर्थराइटिस पीड़ितों के लिए लाभदायक होता है।अलसी के तेल में ओमेगा -3 फैटी एसिड हड्डियों और शरीर के अन्य हिस्सों की कठोरता को कम करने में मदद कर सकता है। (घुटने के रोगी)ऑस्टियोआर्थ्रिटिक रोगी इन आवश्यक फैटी एसिड का जवाब भी दे सकते हैं। यह साबित हो गया है कि ये फैटी एसिड जोड़ों में कठोरता को कम करने में मदद करते हैं। यह उस गति को भी तेज करता है जिस पर पुराने ऑस्टियोआर्थराइटिस के रोगी चल सकते हैं।

कोलेस्ट्रॉल और हृदय रोग से बचाव में अलसी के तेल के लाभ-


कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से दिल की बीमारियों और स्ट्रोक का खतरा काफी बढ़ जाता है। बढ़ते कोलेस्ट्रोल को कंट्रोल करने के लिए अलसी के तेल का इस्तेमाल करें। इसमें ओमेगा 3 फैटी पाया जाता है जो कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने में मददगार साबित हो सकता हैं। इसके लिए नियमित तौर पर अलसी के तेल का इस्तेमाल करें।
अलसी का तेल हृदय से जुड़ी समस्याओं से बचाव में कारगर हो सकता है। वैज्ञानिक भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि अलसी के तेल का सेवन करने से कार्डियोवैस्कुलर (हृदय) स्वास्थ्य में सुधार हो जा सकता है। अलसी का तेल रक्तचाप को नियंत्रित करके हृदय पर पड़ने वाले अनावश्यक भार को कम कर सकता है। साथ ही इसमें मौजूद एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों के कारण भी यह हृदय के लिए फायदेमंद साबित को सकता है । इसके अलावा, अलसी में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा जीरो होती है, जिस कारण कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित मरीजों के लिए अलसी का तेल सुरक्षित हो सकता है|अलसी के तेल जैसे अल्फा-लिनोलेनिक एसिड में समृद्ध भोजन हृदय रोगों को रोकने और उनका इलाज करने में मदद कर सकता है। ए ल ए कार्डियोप्रोटेक्टिव के रूप में भी कार्य करता है अर्थात्, वे विभिन्न हृदय रोगों को रोकते हैं और एक स्वस्थ हृदय प्रणाली के कामकाज को बढ़ाते हैं। अलसी के तेल के नियमित सेवन से दिल के दौरे की संभावना कम हो जाती है। यह रक्तचाप को कम करता है, शरीर में कुल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बनाए रखता है, रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है और दिल की धड़कन को नियंत्रित करता है।

बालों को दें पोषण-

 सेहत के साथ-साथ बालों को पोषण देने के लिए भी अलसी के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। अलसी के तेल विटामिन और मिनरल्स जैसे तत्व पाए जाते हैं जो हेल्दी बालों के लिए जरूरी होते हैं। इसके अलावा इसमें मौजूद ओमेगा 3 फैटी एसिड बालों को पोषण देते हैं। बालों को स्वस्थ रखने के लिए 2 चम्मच अलसी के तेल को हल्का गर्म करें और स्कैल्प पर अच्छी तरीके से मसाज करें। कुछ देर बाद अपने बालों को धो लें।

कब्ज में मदद करता है

अलसी के तेल के लिए मुख्य उपयोग कब्ज के दर्द से राहत के लिए है। बृहदान्त्र के लिए एक स्नेहक के रूप में कार्य करके, अलसी के तेल आसान और प्राकृतिक आंत्र आंदोलन को बढ़ावा देता है। उनके उच्च फाइबर सामग्री के साथ, तेल स्वस्थ पाचन को बढ़ावा देता है और कब्ज के कारण होने वाली बेचैनी से राहत देता है। अलसी का तेल बृहदान्त्र स्वास्थ्य और कठोर मल की कमी में सहायक है। यह ओमेगा -3 फैटी एसिड, फोलेट, मैंगनीज, तांबा, फॉस्फोरस और विटामिन बी 6 से समृद्ध है।

वजन कम करने के लिए फायदेमंद- 

वजन कम करने के लिए भी अलसी के तेल का सेवन फायदेमंद होता है। इसमें मौजूद ओमेगा 3 फैटी एसिड फैट बर्न करने में मदद करते हैं। अगर आप शरीर से चर्बी कम करना चाहते हैं तो नियमित रूप से अलसी के तेल का सेवन करें, इससे काफी फायदा होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक अलसी के तेल का सेवन करने से पाचन तंत्र दुरुस्त होते हैं।

दृष्टि दोष में अलसी के तेल का उपयोग-

आंखों के लिए भी अलसी कुदरत का वरदान है। ओमेगा-3 फैटी एसिड युक्त होने की वजह से इसे आंखों के लिए फायदेमंद माना जा सकता है। आंखों में सूखापन जैसी समस्याओं में अलसी के तेल के फायदे देखे गए हैं। आंखों में सूखापन एक प्रकार का विकार है, जिसमें आंखें सूखी, लाल और सूजी हुई होती हैं। अलसी में मौजूद एसेंशियल फैटी एसिड (EFA) एंटीइंफ्लेमेटरी प्रभाव के कारण आंखों की इस समस्या से राहत दे सकता है। इसलिए, नेत्र विशेषज्ञ अलसी के तेल को सप्लीमेंट के रूप में आहार में शामिल करने की सलाह देते हैं

कैंसर के खतरे होते हैं कम- 

रिसर्च के मुताबिक अलसी का तेल कैंसर के खतरे को कम कर सकता है। स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर के खतरे को कम करने के लिए महिलाएं अलसी के तेल का सेवन कर सकती हैं। इसके सेवन से महिलाओं के साथ पुरुषों को भी काफी फायदा मिलता है। इससे प्रोस्टेट कैंसर और पेट के कैंसर का खतरा कम होता है।कैंसर एक जानलेवा बीमारी है, जिसके इलाज के लिए व्यापक चिकित्सा प्रक्रिया की जरूरत होती है। वहीं, खान-पान और अच्छी दिनचर्या के जरिए इस खतरनाक बीमारी से बचना आसान है। ऐसे में अलसी के तेल का सेवन कैंसर के जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकता है। खासतौर पर स्तन कैंसर के खतरे को कम करने में अलसी और इसके यौगिकों को फायदेमंद पाया गया है।अलसी के तेल लाभों में स्तन ट्यूमर, प्रोस्टेट कैंसर और पेट के कैंसर के विकास को रोकने में मदद करना शामिल है। अलसी का तेल कैंसर कोशिका गुणन को कम करता है और एपोप्टोसिस को बढ़ाता है, अर्थात कैंसर कोशिकाओं की कोशिका मृत्यु। फ्लैक्ससीड्स में लिग्नन्स होते हैं, जो कि हार्मोन के प्रति संवेदनशील कैंसर के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं। लिग्नन्स एंजाइमों को अवरुद्ध करते हैं जो हार्मोन चयापचय में कार्य करते हैं और ट्यूमर कोशिकाओं के विकास को रोकते हैं।

सूजन कम करने के लिए- 

शरीर में किसी तरह के सूजन को कम करने के लिए अलसी के तेल का इस्तेमाल करें। दरअसल अलसी में म्यूसिलेज पाया जाता है जो शरीर के डिटॉक्स करने में मदद करता है। यह शरीर के अंदर और बाहर किसी भी तरह के सूजन से राहत दिलाने में मदद कर सकता है।अलसी के तेल के फायदे में सूजन को कम करना शामिल है। इस तेल में अल्फा लिनोलेनिक एसिड (ALA) पाया जाता है जो ओमेगा-3 फैटी एसिड में से एक है। अल्फा लिनोलेनिक एसिड(ALA) एंटीइंफ्लेमेटरी प्रभाव दिखा सकता है, जो शरीर में आई सूजन को कम करने में मदद कर सकता है। वैज्ञानिक शोधों में अलसी के एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों का प्रभाव अर्थराइटिस (जोड़ों में दर्द की समस्या) और जोड़ों की सूजन (joint oedema) पर देखा गया है। अलसी में एंटीअर्थराइटिस गुण पाया जाता है। इसलिए, कहा जा सकता है कि सूजन से बचने के लिए अलसी एक उत्तम विकल्प साबित हो सकती है

अलसी के तेल का सेवन कैसे करें :

अलसी के तेल को सलाद की ड्रेसिंग में इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसे मफिन या केक बनाते समय इस्तेमाल किया जा सकता है।
अलसी के तेल का प्रयोग स्मूदी या शेक बनाने में किया जा सकता है।
डॉक्टर के सुझाव पर इसे कैप्सूल के रूप में भी लिया जा सकता है।
परामर्श-
अलसी के तेल का उपयोग खाना पकाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि अधिक गरम करने पर ये अपनी पौष्टिकता खो सकता है|

असली का सेवन करने का सही तरीका

हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो साबुत अलसी के बीज (Whole Flaxseed) खाने की बजाए अलसी के बीज को पीसकर (Ground Flaxseed) खाना ज्यादा फायदेमंद होता है. दरअसल, साबुत अलसी के बीज में ऊपर भूरे रंग का एक कवर जैसा होता है, जिसे पचाना आंत के लिए काफी मुश्किल होता है और इस वजह से अलसी के पोषक तत्वों को शरीर अवशोषित नहीं कर पाता. यही वजह है कि असली को पीसकर खाने की सलाह दी जाती है.

25.11.21

पेट के अल्सर के हर्बल ,आयुर्वेदिक नुस्खे /Gastric Ulcer

    


  


 अल्सर एक खतरनाक बीमारी है।  पेप्टिक अल्सर की वजह से कई समस्याएं हो सकती हैं। पेट के अंदर की सतह पर छाले होते हैं जो धीरे-धीरे जख्मों में बदलने लगते हैं। और अल्सर से परेशान इंसान को कई तरह की समस्याएं आने लगती हैं। पेट का अल्सर यानि पेप्टिक अल्सर दो तरह का होता है एक डयूडिनल अल्सर और दूसरा है गैस्ट्रिक अल्सर। समय पर इलाज न मिलने से अल्सर के रोगी की मौत भी हो सकती 
है।

   अल्‍सर कई प्रकार का होता है -

 अमाशय का अल्‍सर, 
पेप्टिक अल्‍सर 
या
 गैस्ट्रिक अल्‍सर। 
अल्‍सर उस समय बनते हैं जब खाने को पचाने वाला अम्ल अमाशय की दीवार को क्षति पहुंचाता है। पहले पोषण की कमी, तनाव और लाइफ-स्‍टाइल को अल्‍सर का प्रमुख कारण माना जाता था। लेकिन, वैज्ञानिकों ने नये शोध में यह पता लगाया है कि ज्यादातर अल्सर एक प्रकार के जीवाणु हेलिकोबैक्टर पायलोरी या एच. पायलोरी द्वारा होता है। अल्‍सर की समस्‍या का इलाज समय पर नही किया जाए तो यह गंभीर समस्‍या बन जाती है। इस बैक्‍टीरिया के अलावा अल्‍सर के लिए कुछ हद तक खान-पान और लाइफस्‍टाल भी जिम्‍मेदार है।
अल्सर होने के संकेत साफ होते हैं इस रोग में रोगी को पेट संबंधी दिक्कते जैसे पेट में जलन, दर्द और उल्टी में खून आदि आने लगता है। और कुछ समय बाद जब यह अल्सर फट जाता है तब यह जानलेवा बन जाता है।

 अल्सर के मुख्य लक्षण :

मल से खून का आना।
बदहजमी का होना।
सीने में जलन।
वजन का अचानक से घटना।
पेट में बार-बार दर्द का उठना और किसी पेनकिलर या एंटी-एसिड की दवाओं से ही पेट दर्द का ठीक होना अल्सर का लक्षण हो सकता है।
ड्यूडिनल अल्सर का मुख्य लक्षण है खाली पेट में दर्द होना। और खाना खाने के बाद ही दर्द का ठीक होना। वहीं पेप्टिक अल्सर में इंसान को भूख कम लगती है।
इसके अलावा भी अल्सर के रोगी को बार-बार कई दिक्कतें आती हैं जैसे पेट में जलन और मिचली का आना।

 अल्सर का कारण :

अधिक तनाव लेना।
गलत तरह के खान-पान करना।
अनियमित दिनचर्या।
अधिक धूम्रपान करना।
अत्याधिक दर्द निवारक दवाओं का सेवन करना।अधिक चाय या काफी पीना।
अधिक गरम मसालें खाना।

गाजर और पत्ता गोभी का रस :


 पत्तागोभी पेट में खून के प्रभाव को बढ़ाती है और अल्सर को ठीक करती है। पत्ता गोभी और गाजर का रस मिलाकर पीना चाहिए। पत्ता गोभी में लेक्टिक एसिड होता है जो शरीर में एमीनो एसिड को बनाता है।

सहजन : 

दही के साथ सहजन के पत्तों का बना पेस्ट बना लें और दिन में कम से कम एक बार इसका सेवन करें। इस उपाय से पेट के अल्सर में राहत मिलती है।

मेथी का दाना : 

अल्सर को ठीक करने में मेथी बेहद लाभदायक होती है। एक चम्मच मेथी के दानों को एक गिलास पानी में उबालें और इसे ठंडा करके छान लें। अब आप शहद की एक चम्मच को इस पानी में मिला लें और इसका सेवन रोज दिन में एक बार जरूर करें। ये उपाय अल्सर को जड़ से खत्म करता है।

 शहद :
 पेट के अल्सर को कम करता है शहद। क्योकिं शहद में ग्लूकोज पैराक्साइड होता है जो पेट में बैक्टीरिया को खत्म कर देता ह। और अल्सर के रोगी को आराम मिलता है।

नारियल : 

नारियल अल्सर को बढ़ने से रोकता है साथ ही उन कीड़ों को भी मार देता है जो अल्सर को बढ़ाते हैं। नारियल में मौजूद एंटीबेक्टीरियल गुण और एंटी अल्सर गुण होते हैं। इसलिए अल्सर के रोगी को नारियल तेल और नारियल पानी का सेवन अधिक से अधिक करना चाहिए।

केला : 

केला भी अल्सर को रोकता है। केले में भी एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो पेट की एसिडिटी को ठीक करते हैं। पका और कच्चा हुआ केला खाने से अल्सर के रोगी को फायदा मिलता है।आप चाहें तो केले की सब्जी बनाकर भी खा सकते हैं।
*हालांकि दूध खाने से गैस्ट्रिक एसिड बनाता है, लेकिन आधा कप ठंडे दूध में आधा नीबू निचोड़कर पिया जाए तो वह पेट को आराम देता है। जलन का असर कम हो जाता है और अल्‍सर ठीक होता है।

पोहा 

अल्‍सर के लिए बहुत फायदेमंद घरेलू नुस्‍खा है, इसे बिटन राइस भी कहते हैं। पोहा और सौंफ को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लीजिए, 20 ग्राम चूर्ण को 2 लीटर पानी में सुबह घोलकर रखिए, इसे रात तक पूरा पी जाएं। यह घोल नियमित रूप से सुबह तैयार करके दोपहर बाद या शाम से पीना शुरू कर दें। इस घोल को 24 घंटे में समाप्‍त कर देना है, अल्‍सर में आराम मिलेगा।
*अल्‍सर के मरीजों के लिए गाय के दूध से बने घी का इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है।
*अल्‍सर के मरीजों को बादाम का सेवन करना चाहिए, बादाम पीसकर इसका दूध बना लीजिए, इसे सुबह-शाम पीने से अल्‍सर ठीक हो जाता है।
*आंतों का अल्सर होने पर हींग को पानी में मिलाकर इसका एनीमा देना चाहिये, इसके साथ ही रोगी को आसानी से पचने वाला खाना चाहिए।
*अल्सर होने पर एक पाव ठंडे दूध में उतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर देना चाहिए, इससे कुछ दिनों में आराम मिल जायेगा।

छाछ की पतली कढ़ी 

बनाकर रोगी को रोजाना देना चाहिये, अल्‍सर में मक्की की रोटी और कढ़ी खानी चाहिए, यह बहुत आसानी से पच जाती है।

लहसुन :

लहुसन की तीन कच्ची कलियों को कुटकर पानी के साथ सेवन करें।

बेलफल की पत्तियों का सेवन : 

बेल की पत्तियों में टेनिन्स नामक गुण होता है जो पेट के अल्सर को ठीक करते हैं। बेल का जूस पीने से पेट का दर्द और दर्द ठीक होता है।

शहद : 

पेट के अल्सर को कम करता है शहद। क्योकिं शहद में ग्लूकोज पैराक्साइड होता है जो पेट में बैक्टीरिया को खत्म कर देता ह। और अल्सर के रोगी को आराम मिलता है।

नारियल : 

नारियल अल्सर को बढ़ने से रोकता है साथ ही उन कीड़ों को भी मार देता है जो अल्सर को बढ़ाते हैं। नारियल में मौजूद एंटीबेक्टीरियल गुण और एंटी अल्सर गुण होते हैं। इसलिए अल्सर के रोगी को नारियल तेल और नारियल पानी का सेवन अधिक से अधिक करना चाहिए। 

केला :

 केला भी अल्सर को रोकता है। केले में भी एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो पेट की एसिडिटी को ठीक करते हैं। पका और कच्चा हुआ केला खाने से अल्सर के रोगी को फायदा मिलता है।आप चाहें तो केले की सब्जी बनाकर भी खा सकते हैं।

बादाम : 

बादाम को पीसकर इसे अल्सर के रोगी को देना चाहिए। इन बादामों को इस तरह से बारीक चबाएं कि यह दूध की तरह बनकर पेट के अंदर जाएं।

लहसुन : 

लहुसन की तीन कच्ची कलियों को कुटकर पानी के साथ सेवन करें।

गाय का दूध : 

गाय के दूध में हल्दी को मिलाकर पीना चाहिए। हल्दी में मौजूद गुण अल्सर को बढ़ने नहीं देते हैं।

गुडहल : 

गुडहल की पत्तियों के रस का शरबत बनाकर पीने से अल्सर रोग ठीक होता है।
बेलफल की पत्तियों का सेवन : बेल की पत्तियों में टेनिन्स नामक गुण होता है जो पेट के अल्सर को ठीक करते हैं। बेल का जूस पीने से पेट का दर्द और दर्द ठीक होता है।

गाजर और पत्ता गोभी का रस :

 पत्तागोभी पेट में खून के प्रभाव को बढ़ाती है और अल्सर को ठीक करती है। पत्ता गोभी और गाजर का रस मिलाकर पीना चाहिए। पत्ता गोभी में लेक्टिक एसिड होता है जो शरीर में एमीनो एसिड को बनाता है।
सहजन : दही के साथ सहजन के पत्तों का बना पेस्ट बना लें और दिन में कम से कम एक बार इसका सेवन करें। इस उपाय से पेट के अल्सर में राहत मिलती है।
अल्सर के लिए जरूरी परहेज :

अधिक दवाओं का सेवन न करें

अल्सर का अधिक बढ़ने पर इसका ऑपरेशन ही एक मात्र उपाय है। यदि यह कैंसर में बदल जाता है तो अल्सर की कीमोथैरेपी की जाती है।
यदि आप चाहते हैं कि अल्सर का रोग आपको न लगें तो आपको अपने खान-पान और गलत लतों को छोड़ना होगा।

अल्सर के लिए जरूरी परहेज :

अधिक मिर्च मसाले और जंक फूडस से परहेज करें।
चाय, काफी और कोल्ड ड्रिंक्स का सेवन करना बंद कर दें।
अपने को तनाव मुक्त रखें। हर रोज सुबह-शाम पैदल घूमें।
अधिक दवाओं का सेवन न करें।
अल्सर का अधिक बढ़ने पर इसका ऑपरेशन ही एक मात्र उपाय है। यदि यह कैंसर में बदल जाता है तो अल्सर की कीमोथैरेपी की जाती है।
यदि आप चाहते हैं कि अल्सर का रोग आपको न लगें तो आपको अपने खान-पान और गलत लतों को छोड़ना होगा।

गरम पानी के स्वास्थ्य लाभ /Health benefits of hot water

 

  
गर्म पानी (Hot Water) का स्‍वाद भले ही अच्‍छा नहीं लगता लेकिन सेहत के लिए यह बहुत ही फायदेमंद (Benefits) है. आप अगर नियमित रूप से पीने के लिए गर्म पानी का प्रयोग करें तो कई बीमारियां आपसे दूर रहेंगी.
इस थेरेपी में मरीज को दिन भर में 8-10 बार केवल गुनगुना पानी पीने के लिए दिया जाता है। पानी हमेशा स्टील, पीतल या सेरेमिक के गिलास में ही पीने के लिए कहा जाता है। गुनगुना पानी पीने से शरीर में मौजूद टॉक्सिन बाहर निकल जाते हैं। इस थेरेपी से बलगम, गैस, एसिडिटी और शरीर में इकट्ठा हुई अतिरिक्त वसा की समस्या दूर होती है।

कैसे देते हैं यह थेरेपी

आथ्र्राइटिस के मरीज थोड़े-से गुनगुने पानी में कच्ची हल्दी का पेस्ट मिला लें। इस पानी को सुबह खाली पेट पिएं औैर शाम को डिनर से एक घंटा पहले पिएं। इससे जोड़ों के अंदर की अकड़न दूर होगी। थाइरॉइड पीड़ित व्यक्ति रात को एक चम्मच साबुत धनिया एक गिलास पानी में भिगो दें। सुबह खाली पेट पानी को आधा रह जाने तक उबालें। इसे गुनगुना होने पर पी लें। हाइपर एसिडिटी के मरीज को दिन भर में कम से कम 6 गिलास गर्म पानी पीने के लिए कहा जाता है। गुनगुना पानी पेट में जाकर इकट्ठी एसिडिटी को घोल देता है और 30 से 45 मिनट के भीतर एसिडिटी से आराम देता है। मोटापे से ग्रस्त व्यक्ति को दिन में कम से कम 10-12 गिलास गर्म पानी पीना चाहिए। उसमें नीबू, कच्ची हल्दी का पेस्ट, आंवले का रस, शुद्ध शहद भी मिला सकते हैं। मरीज डायबिटिक है तो उसे शहद नहीं देते। किडनी के मरीजों को पानी थोड़ा-थोड़ा करके देते हैं।  त्वचा की समस्या से पीड़ित मरीज को गुनगुने पानी में नीबू मिलाकर पीने के लिए दिया जाता है और नीम के पत्तों का पेस्ट नहाने के पानी में मिलाकर नहाने के लिए कहा जाता है। उल्टी, खट्टी डकार आ रही हो, भूख नहीं लग रही हो, आंतों में सूजन हो तो पीड़ित व्यक्ति को गर्म पानी पिलाया जाता है।

वार्म वॉटर वॉश थेरेपी: 

 इसमें मरीज को वार्म वॉटर में नहाने को कहा जाता है या वार्म वॉटर से प्रभावित जगह की क्लीनिंग की जाती है।

क्लीनिंग बाथ थेरेपी:

 इसके तहत नीम के गुनगुने पानी से एनीमा किया जाता है। इसमें नीम के पत्ते और थोड़ा कपूर मिलाकर बनाए गर्म एंटीफंगल पानी से योनि मार्ग की बाहर से सफाई की जाती है।

स्पंज बाथ थेरेपी:  

जोड़ों के दर्द या आथ्र्राइटिस में गुनगुने पानी से नहाना फायदेमंद होता है। चाहें तो गुनगुने पानी में नहाएं या पानी में तौलिया को भिगोकर शरीर को स्पंज करें। इससे मसाज भी हो जाएगी और जोड़ों की अकड़न धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी।

हाट फुट बाथ थेरेपी:

  जिन्हें पैरों में ठंड लगती है या जलन रहती है या सूजन रहती है, उन्हें हाट फुट बाथ देते हैं। मरीज को स्टूल पर बिठा कर टब में गुनगुना पानी दिया जाता है, जिसमें वो पैर डुबो कर बैठता है। सिर पर गीला तौलिया रखते हैं, ताकि कोई बुरा प्रभाव न हो। वार्म वॉटर चुंबक की तरह रक्त को खींचता है, रक्त संचार ठीक करता है और पैरों की परेशानी कम करता है।

स्पाइनल बाथ थेरेपी:

  अगर किसी मरीज को सिरदर्द, चक्कर या घबराहट की शिकायत हो तो उसे वार्म स्पाइनल बाथ दिया जाता है। गुनगुने पानी में तौलिये को भिगोकर थोड़ा निचोड़ कर जमीन पर बिछा देते हैं। मरीज को उस तौलिये पर पीठ के बल लेटने के लिए कहा जाता है। पानी की गर्मी या हीट से स्पाइन पर असर होता है, जिससे नर्वस सिस्टम संबंधी या न्यूरोलॉजिकल संबंधी बीमारियों में आराम मिलता है। इससे ठीक होने वाली समस्याओं में सिरदर्द, डिप्रेशन, मिर्गी, माइग्रेन आदि शामिल हैं।

इंटरनल स्टीम थेरेपी: 

 अस्थमा, साइनस, गले का संक्रमण, थाइरॉइड के मरीज को यह थेरेपी दी जाती है। मुंह और नाक से स्टीमर, बॉयलर या पतीले से वार्म वॉटर स्टीम दी जाती है। मरीज सिर पर तौलिया या चादर लपेटकर स्टीम लेते हैं। पानी में युकेलिप्टस या अजवायन के पत्ते या युकेलिप्टस ऑयल की 4-5 बूंदे डाल कर स्टीम दी जाती है। स्टीम लेने से पहले मरीज को एक गिलास पानी पिलाया जाता है, ताकि उसे घबराहट न हो|

रोगप्रतिरोधक क्षमता को बनाता है मजबूत

बदलते मौसम में हेल्दी बने रहने के लिए रोज सुबह खाली पेट 1 ग्‍लास गर्म पानी में नींबू डालकर पीएं. इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. इसके नियमित सेवन से खांसी, सर्दी, जुकाम आदि भी दूर रहते हैं.
                  
 कब्ज़ से आराम

अगर आप रोजाना सुबह खाली पेट गर्म पानी पीने की आदत डाल लें तो इससे कब्ज़ से आसानी से छुटकारा मिलता है. यही नहीं मल त्याग की प्रक्रिया भी आसान हो जाती है. इसलिए अगर आप सुबह चाय या कॉफ़ी की बजाय एक गर्म पानी का सेवन करें तो यह हर मामले में आपके सेहत के लिए फायदेमंद होगा. वन करने की सलाह डॉक्‍टर भी देते हैं.

साइनस की समस्‍या में आराम

अगर आपको साइनस की पुरानी समस्‍या है और कई दिनों तक नाक बंद और सिरदर्द से आप परेशान रहते हैं तो सुबह एक ग्‍लास गर्म पानी पीने की आदत डालनी चाहिए. ऐसा करने से साइनस के लक्षणों में कमी आती है और बहुत आराम मिलता है.

दांत दर्द में फायदेमंद

अगर आप दांत और मसूड़ों में दर्द से परेशान रहते हैं तो रोजाना सुबह गर्म पानी पीने की आदत डाल लें. इससे आपके दांत लम्बे समय तक हेल्‍दी रहेंगे और स्‍वेलिंग में आराम मिलेगा. गर्म पानी पीते समय इस बात का ध्यान हमेशा रखें कि पानी अधिक गर्म ना हो. ऐसा होने पर यह दातों के इनेमल को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

पाचन तंत्र में सहायक

अगर आपको रोजाना कब्ज़ और अपच की समस्या रहती है तो आप अपने खाने पीने में कुछ बदलाव करें. सबसे पहले तो पीने के लिए गुनगुना पानी को दिनचर्या में शामिल करें. ऐसा आप एक सप्‍ताह तक करके देखें. दरअसल गर्म पानी पीने से रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो जाती है और आंतों में रक्त प्रवाह बढ़ जाता है जिससे पाचन तंत्र बेहतर तरीके से काम करने लगता है. गर्म पानी के प्रयोग से एसिडिटी की समस्‍या भी नहीं होती है.

डिटॉक्स प्रक्रिया में सहायक

गर्म पानी पीने से शरीर का तापमान बढ़ जाता है और शरीर से पसीना ज्यादा निकलता है. पसीने के माध्यम से शरीर में मौजूद हानिकारक टॉक्सिन शरीर से आसानी से बाहर निकल जाते हैं. अगर आप गुनगुने पानी में नींबू या ग्रीन टी डालकर पीते हैं तो यह शरीर के अंदर के टॉक्सिन आसानी से बाहर निकाल जाते हैं.

दर्द और सूजन में आराम

अगर आपके पेट में दर्द, सिर में दर्द या शरीर के किसी मसल्‍स में दर्द है तो आप गर्म पानी का प्रयोग करें. इसे पीने से तो दर्द मे आराम मिलता ही है, मांसपेशियों के सूजन में भी आराम मिलता है.

पीरियड के दर्द से आराम

हर महीने होने वाले पीरियड्स में आप दर्द से परेशान रहती हैं तो आप गर्म पानी की मदद से इस परेशानी को दूर कर सकती हैं. आप गर्म पानी को हर कुछ घंटे में चाय की तरह पिएं. इससे पेट की सिकाई होती है और कैम्‍प में आराम मिलता है.

वेट लूज करने में सहायक

अगर आप वजन कम करने के लिए जिम में घंटों पसीना बहा रहे हैं और डाइटिंग कर रहे हैं तो आपको बता दें कि अगर आप अपने डाइट में ठंडे पानी की जगह गर्म पानी को जगह दें तो आपका वजन तेजी से घट सकता है. इसके लिए आप रोजाना सुबह एक से दो ग्‍लास गुनगुना पानी पिएं और इसके बाद ही ही बाद दिन की शुरुआत करें. इसके सेवन से शरीर के हानिकारक टॉक्सिन बाहर निकल जाते हैं और पेट लम्बे समय तक भरा हुआ रहता है. जिससे बेवजह भूख भी नहीं लगती और वजन कम होने लगता है.

24.11.21

किडनी खराब, वृक्क अकर्मण्यता ,Kidney Failure की अचूक हर्बल औषधि (with case reports)



  हर व्यक्ति के शरीर में दो गुर्दे होते हैं, जो मुख्य रूप से यूरिया, क्रिएटिनिन, एसिड, आदि जैसे नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थों को रक्त में से छानने के लिए जिम्मेदार होते हैं। (जो सभी शरीर में चयापचय के उत्पाद हैं) और इस तरह मूत्र का उत्पादन करते हैं।
 लाखों लोग विभिन्न प्रकार के गुर्दे की बीमारियों के साथ रह रहे हैं और उनमें से अधिकांश को इसके बारे भनक तक नहीं है। यही कारण है कि गुर्दे की बीमारी को अक्सर एक ‘साइलेंट किलर’ के रूप में जाना जाता है क्योंकि अधिकांश लोगों को बीमारी का पता तब तक नहीं चलता जब तक यह उग्र रूप धारण नहीं कर लेता। जबकि लोग अपने रक्तचाप, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर की नियमित रूप से जांच करवाते रहते हैं, वे अपने गुर्दे की किसी भी समस्या का पता लगाने के लिए अपने रक्त में एक सरल क्रिएटिनिन परीक्षण भी नहीं करवाते। 2015 के ग्लोबल बर्डन डिजीज (GBD) के अध्ययन के अनुसार, क्रोनिक किडनी रोग (CKD) को भारत में मृत्यु दर के आठवें प्रमुख कारणों में से एक के रूप में स्थान दिया गया है।किडनी विकार के चेतावनी के कई संकेत होते हैं, हालांकि, अधिकांश समय इन्हें अनदेखा किया जाता है या किसी और तरह की समस्या समझकर लोग भ्रमित हो जाया करते हैं। इसलिए, हर व्यक्ति को बहुत ही सतर्क रहना चाहिए और किडनी विकार का कोई भी लक्षण दिखने पर जल्द से जल्द पुष्टिकरण परीक्षण (रक्त, मूत्र और इमेजिंग सहित) करवाना चाहिए। ऐसे किसी व्यक्ति को किसी नेफ्रोलॉजिस्ट के पास जाना चाहिए और अपने संदेह को स्पष्ट करना चाहिए। लेकिन अगर आपको उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, मेटाबॉलिक सिंड्रोम है, या कोरोनरी आर्टरी डिजीज, और / या किडनी फेल होने का पारिवारिक इतिहास है या आप 60 वर्ष से अधिक उम्र के हैं तो आज के युग में आपको नियमित रूप से गुर्दे की जांच करवाते रहना चाहिए।
 जबकि गुर्दे की बीमारी के निदान का एकमात्र निश्चित तरीका पुष्टि संबंधी परीक्षण करना है, यहाँ किडनी रोग के कुछ शुरुआती चेतावनी के संकेत दिए गए हैं:
 शुरुआती संकेतों में से एक है टखनों, पैरों या एड़ी के पास सूजन का दिखना है: ऐसी जगहों पर एडिमा दिखाई देने लगेगी, जो दबाव देने पर पिट करते हैं, और इन्हें पिटिंग एडिमा कहा जाता है। जैसे-जैसे गुर्दे अपने काम करने में गड़बड़ी करने लगते हैं, शरीर में नमक जमा होने लगता है, जिससे आपकी पिंडली और टखनों में सूजन आने लगती है। संक्षेप में, अगर किसी भी व्यक्ति में इस तरह के लक्षण दिखें तो उसे नेफ्रोलॉजिस्ट से मिलकर अपने गुर्दे की कार्यप्रणाली का तत्काल मूल्यांकन करवाना चाहिए।

 पेरिऑर्बिटल एडिमा: 

इसमें आंखों के आसपास सूजन दिखने लगता है जो कोशिकाओं या ऊतकों में तरल पदार्थ के संचय के कारण होता है। यह गुर्दे की बीमारी के शुरुआती लक्षणों में से एक है। यह उन व्यक्तियों में विशेष रूप से होता है जिनमें गुर्दे के माध्यम से काफी मात्रा में प्रोटीन का रिसाव होता है। शरीर से प्रोटीन का नाश इंट्रावस्कुलर ऑन्कोटिक दबाव को कम करता है और आंखों के आसपास के विभिन्न जगहों पर तरल पदार्थ का अतिरिक्त संचय होने लगता है।
कमजोरी: गुर्दे की बीमारी का एक सामान्य लक्षण है शुरुआत में थकावट का होना। जैसे-जैसे गुर्दे की खराबी बढती जाती है यह लक्षण और अधिक स्पष्ट होता जाता है। सामान्य दिनों की तुलना में वह व्यक्ति अधिक थका हुआ महसूस कर सकता है और ज्यादा गतिविधियों को करने में असमर्थ होता है, तथा उसे बार-बार आराम की आवश्यकता होती है। ऐसा काफी हद तक रक्त में विषाक्त पदार्थों और अशुद्धियों के संचय के कारण होता है, जिसके परिणामस्वरूप गुर्दे खराब होते जाते हैं। गैर-विशिष्ट लक्षण होने के नाते इसे अक्सर अधिकांश लोगों द्वारा अनदेखा किया जाता है और इसकी पूरी तरह से जांच नहीं की जाती है।

भूख में कमी: 

 यूरिया, क्रिएटिनिन, एसिड जैसे विषाक्त पदार्थों के जमा होने से व्यक्ति की भूख कम होने लगती है। इसके अलावा, जैसे-जैसे गुर्दे की बीमारी बढती जाती है, रोगी के स्वाद में बदलाव होता जाता है, जिसे अक्सर रोगियों द्वारा धातु के रूप में बताया जाता है। यदि किसी को दिन में बिना कुछ खाए भी पेट भरे का अहसास होता हो, तो दिमाग में खतरे की घंटी बजनी चाहिए और उसके गुर्दे की जांच करवानी चाहिए।
सुबह की मिचली और उल्टी: गुर्दे के खराब होने के शुरुआती लक्षणों में से एक और लक्षण है सुबह-सुबह मिचली और उल्टी का होना, और इसका पता तब चलता है जब रोगी सुबह बाथरूम में अपने दांतों को ब्रश करता है। इससे व्यक्ति की भूख भी कम होती जाती है। गुर्दे फेल होने के अंतिम चरण में, मरीज को बार-बार उल्टी आती है और भूख कम लगती है।

एनीमिया:

 हीमोग्लोबिन का स्तर गिरना शुरू हो जाता है, और व्यक्ति पीला दिखने लग सकता है, बिना शरीर से खून का बाहर हुए। यह गुर्दे की बीमारी की सामान्य जटिलताओं में से एक है। इससे कमजोरी और थकान भी हो सकती है। कई कारणों से यह एनीमिया होता है जिसमें एरिथ्रोपोइटिन का स्तर कम होना(गुर्दे में एरीथ्रोपोइटिन संश्लेषित किया जा रहा है), लोहे का स्तर कम होना, विष संचय के कारण अस्थि मज्जा का दमन होना इत्यादि होता है।

पेशाब करने की आवृत्ति में परिवर्तन: 

किसी को अपने मूत्र उत्पादन पर बहुत सावधानी से ध्यान रखना पड़ता है। उदाहरण के लिए, रोगी के मूत्र उत्पादन में कमी हो सकती है या उसे अधिक बार पेशाब करने की आवश्यकता महसूस हो सकती है, विशेष रूप से रात में (जिसे रात्रिचर कहा जाता है)। यह एक चेतावनी का संकेत हो सकता है और यह संकेत दे सकता है कि गुर्दे की फ़िल्टरिंग इकाइयाँ क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं या क्षतिग्रस्त होने की प्रक्रिया में हैं। कभी-कभी यह पुरुषों में कुछ मूत्र पथ के संक्रमण या बढ़े हुए प्रोस्टेट का संकेत भी हो सकता है। इस प्रकार, मूत्र उत्पादन में एक परिवर्तन (वृद्धि या कमी) को अपने नेफ्रोलॉजिस्ट को तुरंत सूचित करना चाहिए।
 
मूत्र में झाग या रक्त का होना: 

पेशाब में अत्यधिक झाग मूत्र में प्रोटीन की उपस्थिति को इंगित करता है (जो सामान्य परिस्थितियों में नगण्य होना चाहिए)। जब गुर्दे का फ़िल्टरिंग तंत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है या क्षतिग्रस्त हो रहा होता है, तो प्रोटीन, रक्त कोशिकाएं मूत्र से रिसने लगती हैं। गुर्दे की बीमारी का संकेत देने के अलावा, मूत्र में रक्त ट्यूमर, गुर्दे की पथरी या किसी भी तरह के संक्रमण का संकेत दे सकता है। साथ ही, बुखार या ठंड लगने के साथ पेशाब से निकलने वाला मवाद गंभीर हो सकता है और फिर से गंभीर मूत्र पथ के संक्रमण का संकेत हो सकता है। इस प्रकार मूत्र के रंग, स्थिरता या प्रकृति में परिवर्तन को गुर्दे के विशेषज्ञ को जल्द से जल्द सूचित किया जाना चाहिए।

 सूखी और खुजली वाली त्वचा: 

सूखी और खुजली वाली त्वचा गुर्दे की बीमारी के उन्नत होने का संकेत हो सकती है। जैसे-जैसे गुर्दे की कार्य क्षमता कम होते जाती है, शरीर में विषाक्त पदार्थों का जमाव होता जाता है, जिससे त्वचा में खुजली, सूखापन और दुर्गंध होती है।

पीठ दर्द या पेट के निचले हिस्से में दर्द: 

पीठ, बाजू या पसलियों के नीचे दर्द गुर्दे की गड़बड़ी के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं जैसे कि गुर्दे की पथरी या पाइलोनफ्राइटिस। इसी तरह, पेट के निचले हिस्से में दर्द मूत्राशय के संक्रमण या एक मूत्रवाहिनी (गुर्दे और मूत्राशय को जोड़ने वाली ट्यूब) में पत्थर होने से जुड़ा हो सकता है। इस तरह के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और एक्स-रे केयूबी या अल्ट्रासाउंड एब्डोमेन जैसे नियमित इमेजिंग अध्ययन द्वारा आगे की जांच की जानी चाहिए।

उच्च रक्तचाप: 

किडनी की बीमारी का एक लक्षण उच्च रक्तचाप हो सकता है। उच्च रक्तचाप का निदान करने वाले किसी भी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप के वृक्क एटियलजि का पता लगाने के लिए गुर्दे की कार्यप्रणाली और गुर्दे की इमेजिंग का विस्तृत विवरण होना चाहिए। जैसे-जैसे गुर्दे की कार्यक्षमता बिगड़ती जाती है, शरीर में सोडियम और पानी जमने लगते हैं जिससे उच्च रक्तचाप होता है। उच्च रक्तचाप के लक्षणों में सिरदर्द, पेट में दर्द, अँधेरा छाना और शायद गुर्दे की बीमारी के शुरुआती लक्षणों में शामिल हैं।
 चेतावनी के संकेतों की पहचान की जागरूकता होने पर और समय पर इलाज करने पर गुर्दे की गड़बड़ी या गुर्दे की विफलता से बचा जा सकता है अन्यथा रोगी को डायलिसिस, या गुर्दा प्रत्यारोपण करवाना पड़ता है और ज्यादा लापरवाही करने पर उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

गुर्दों को स्वस्थ रखने के टिप्स:

गुर्दे की बीमारी को रोकने ले लिए कई तरीके हैं। तो, जब तक आपकी किडनी रोगग्रस्त नहीं होती, तब तक आप प्रतीक्षा क्यों करें? अपने गुर्दे के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए निम्नलिखित कुछ उपाय हैं:

खूब पानी पिएं: 

यह आपके किडनी को स्वस्थ रखने का सबसे आम और सरल तरीका है। भरपूर पानी, विशेष रूप से गर्म पानी का सेवन करने से गुर्दे को शरीर से सोडियम, यूरिया और विषाक्त पदार्थों को साफ करने में मदद करता है।

कम सोडियम / नमक वाले आहार: 

अपने काने में सोडियम या नमक का सेवन नियंत्रण में रखें। इसका मतलब है कि आपको पैकेज्ड / रेस्टोरेंट के खाद्य पदार्थों से भी परहेज करना होगा। इसके अलावा, अपने खाने में अतिरिक्त नमक न डालें। कम नमक का आहार गुर्दे पर भार को कम करता है और उच्च रक्तचाप, उच्च रक्तचाप से संबंधित विकारों के विकास को रोकता है और गुर्दे की बीमारी की प्रगति को भी रोकता है।

शरीर का वजन उचित बनाए रखें: 

स्वस्थ भोजन करें और अपना वजन नियंत्रित रखें। अपने गुर्दे की धमनियों में कोलेस्ट्रॉल के जमाव को रोकने के लिए अपने शरीर के कोलेस्ट्रॉल के स्तर की नियमित जाँच करवाएँ। इसके अलावा, आहार से संतृप्त वसा / वसायुक्त तले हुए खाद्य पदार्थों को दूर रखें और रोजाना ढेर सारे फल और सब्जियां खाने पर जोर दें। किसी व्यक्ति का वजन बढ़ने से गुर्दे पर भार बढ़ता है। विशेष रूप से भारतीय परिदृश्य में 24 या उससे कम के बीएमआई के लिए लक्ष्य बनाने का प्रयास करें।

नियमित रूप से रक्त शर्करा के स्तर की जाँच करें और उन्हें इष्टतम स्तरों के तहत रखें: 

मधुमेह के रोगियों में गुर्दे की खराबी बहुत आम बात है और अगर जल्दी पता चल जाए तो इसे रोका जा सकता है। इसलिए, अपने रक्त शर्करा के स्तर पर नियमित जांच रखने, मीठे खाद्य उत्पादों से बचने और एक चिकित्सक से आपको मिलने की सलाह दी जाती है यदि रक्त शर्करा (उपवास या पोस्टप्रैंडियल) स्तर या एचबीए 1सी से ज्यादा हो। एचबीए 1सी का स्तर 6.0 से कम रखें।

नियमित रूप से रक्तचाप पर नजर रखें और इसे नियंत्रण में रखें: 

यदि आपको उच्च रक्तचाप है, तो अपने चिकित्सक द्वारा सलाह के अनुसार एंटीहाइपरटेन्सिव लें, और स्वस्थ जीवन शैली बनाए रखें तथा आहार में आवश्यक परिवर्तन करें। सामान्य रक्तचाप का स्तर <120/80 होता है। हाई ब्लड प्रेशर से गुर्दे में गड़बड़ी के अलावा स्ट्रोक या दिल का दौरा भी पड़ सकता है।
 किडनी फंक्शन टेस्ट करवाएं जिसमें आपके वार्षिक चेकअप के एक भाग के रूप में नियमित रूप से मूत्र विश्लेषण किया जाता है: जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है कि आपको मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा है या यदि आपकी उम्र 60 वर्ष से अधिक है, तो किडनी फंक्शन टेस्ट, रीनल इमेजिंग, और मूत्र विश्लेषण नियमित रूप से किया जाना चाहिए। मूत्र में भी मामूली प्रोटीन का पता लगने पर, अपने नेफ्रोलॉजिस्ट से मिलें। मधुमेह के रोगियों को इसपर विशेष रूप से नजर रखनी चाहिए।

धूम्रपान छोड़ें: 

धूम्रपान गुर्दे के रोग की प्रगति में बहुत ही जोखिम कारकों में से एक है। यहां तक कि 1 सिगरेट पीने से पहले से कमजोर किडनी को और नुकसान पहुंच सकता है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, और सीएडी के लिए भी धूम्रपान एक जोखिम कारक है। इसलिए किसी को भी धूम्रपान तुरंत बंद कर देना चाहिए, जो न केवल गुर्दे के लिए बल्कि शरीर के समग्र स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण है।
 रोजाना नहीं तो हफ्ते के 7 दिनों में से कम से कम 5 दिन जॉगिंग, साइकलिंग, स्विमिंग, रैकेट गेम्स जैसे खेल खेलें जो रोजाना लगभग 45 मिनट तक का हो और इस तरह हल्की-फुल्की कसरत करके एक स्वस्थ स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखें। अपनी गतिहीन जीवन शैली को बदलें, कार्यालय में घूमें या दोपहर के भोजन के बाद टहलें या सुबह-शाम व्यायाम करें।
 एक दिन में कम से कम रात की 8 घंटे की आरामदायक नींद लेकर अपनी जीवनशैली को ठीक से संतुलित करें। स्वस्थ रहने के लिए रात को अच्छी नींद लेना आवश्यक है।किडनी शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। किडनी रक्त में मौजूद पानी और व्यर्थ पदार्थो को अलग करने का काम करता है। इसके अलावा शरीर में रसायन पदार्थों का संतुलन, हॉर्मोन्स छोड़ना, रक्तचाप नियंत्रित करने में भी सहायता प्रदान करता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है। इसका एक और कार्य है विटामिन-डी का निर्माण करना, जो शरीर की हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है। लगातार दूषित पदार्थ ,दूषित जल पीने और नेफ़्रोंस के टूटने से किडनी के रोग उत्पन्न होते|इसके कारण किडनी शरीर से व्यर्थ पदार्थो को निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। बदलती   लाइफस्टाइल व काम के बढ़ते दबाव के कारण लोगों में जंकफूड व फास्ट फूड का सेवन ज्यादा करने लगे हैं। इसी वजह से लोगों की खाने की प्लेट से स्वस्थ व पौष्टिक आहार गायब होते जा रहें हैं। किडनी के रोगों को दूर करने के लिए कुछ प्राकृतिक उपायों की मदद लेना बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। ऐसे ही कुछ खास उपाय लेकर आए हैं हम आपके लिए।

विटामिन-

कुछ खास तरह के विटामिन के सेवन से किडनी को स्वस्थ व मजबूत बनाया जा सकता है। यूं तो विटामिन पूरे शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं लेकिन कुछ खास तरह के विटामिन का सेवन किडनी को स्वस्थ रखने के लिए किया जाता है। विटामिन डी के सेवन से किडनी के रोगों के लक्षणों को कम किया जा सकता है। अगर आप हर रोज विटामिन बी6 का सेवन करें तो किडनी स्टोन की समस्या से बच सकते हैं या आप इस समस्या से ग्रस्त हैं तो बिना किसी डर इस विटामिन का सेवन कर सकते हैं। कुछ ही दिनों स्टोन की समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी। इसके अलावा विटामिन सी के सेवन से किडनी को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सकता है।

बेकिंग सोडा 

ब्रिटिश शोधर्कर्ताओं के मुताबिक किडनी के रोगों से बचने के लिए सोडियम बाइकार्बोनेट का सेवन फायदेमंद होता है। इसके सेवन से किडनी के रोगों की गति को कम किया जा सकता है। बेकिंग सोडा की मदद से रक्त में होने वाली एसिडिटी की समस्या खत्म हो जाती है जो कि किडनी की समस्याओं के मुख्य कारणों में से एक है।

एप्पल साइडर विनेगर 

इसका प्रयोग कई शारीरिक जरूरतों के लिए किया जाता है। इसके अलावा किडनी संबंधी समस्याओं के बारे में भी काफी कारगर साबित होता है। इसमें मौजूद एंटी बैक्टीरियल तत्व शरीर को बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचाते हैं जिसमें किडनी भी शामिल है। एप्पल साइडर विनेगर प्रयोग से किडनी में मौजूद स्टोन धीरे-धीरे अपने आप खत्म हो जाता है। इसमें मूत्रवर्धक तत्व होते हैं जो किडनी से व्यर्थ पदार्थों को बाहर निकालते हैं और किडनी को स्वस्थ रखते हैं।

सब्जियों का रस

 किडनी की समस्या होने पर गाजर, खीरा, पत्तागोभी तथा लौकी के रस पीना चाहिए। इससे किडनी के रोगों से उबरने में मदद मिलती है और किडनी स्वस्थ रहती है। इसके अलावा तरबूज तथा आलू का रस भी गुर्दे के रोग को ठीक करने के लिए सही होता है इसलिए पीड़ित रोगी को इसके रस का सेवन सुबह शाम करना चाहिए।

मुनक्का का पानी

व्यक्ति को रात के समय में सोते वक्त कुछ मुनक्का को पानी में भिगोने के लिए रखना चाहिए तथा सुबह के समय में मुनक्का पानी से निकाल कर, इस पानी को पीना चाहिए। ऐसा कुछ दिनों तक लगातार करने से गुर्दे का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

पानी ज्यादा पीएं 

गुर्दे के रोगों से बचने के लिए थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहें। इससे किडनी में मौजूद व्यर्थ पदार्थ यूरीन के जरिए बाहर निकल जाएगें और आप किडनी के रोगों से बचे रहेंगे। चाहें तों पानी में नींबू के रस को निचोड़ कर भी पी सकते हैं इससे शरीर को विटामिन सी व पानी दोनों साथ मिलेगा।

 नमक की मात्रा कम लें किडनी की समस्या से ग्रस्त लोगों को अपने आहार पर खास ध्यान देना चाहिए। खाने में नमक व प्रोटीन की मात्रा कम रखनी चाहिए जिससे किडनी पर कम दबाव पड़ता है। इसके अलावा फासफोरस और पौटेशियम युक्त आहार से भी दूर ही रहना चाहिए।
  • लिपि 
    13529
  •  
  • शब्द 
    2674
  •  
  • वाक्य 
    3
  •  
  • पैराग्राफ 
    0
  •  
  • रिक्त स्थान 
    2656

विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -





इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-
रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl
हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl
जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 
सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 
 केस रिपोर्ट 2-
रोगी का नाम - Awdhesh 
निवासी - कानपुर 
ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट
दिनांक - 26/4/2016
Urea- 55.14   mg/dl
creatinine-13.5   mg/dl 
यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -


creatinine 1.34 mg/dl
urea 22  mg/dl





















लेटेस्ट  केस रिपोर्ट -26/10/2020

नाम किडनी फेल रोगी : अमरसिंग 50 वर्ष 
स्थान : ताटका तहसील -सीतामऊ,जिला मंदसौर,मध्य प्रदेश 
इलाज से पहिले की टेस्ट रिपोर्ट 26/10/2020 के अनुसार 

serum Creatinine :7.18mg/dl

Urea                    :129mg/dl 



 यह औषधि पीने के 20 दिन बाद की स्थिति-

दिनांक-  15 /11/2020 की रिपोर्ट 

Serum creatinine :     2.18 mg/dl

urea:                          68  mg/dl  

तेजी से सुधार होते हुए स्थिति नॉर्मल होती जा रही है|
अभी इलाज जारी है|