12.1.21

घुटनों के दर्द के प्रभावी उपचार

 



  1. हरसिंगार एक पौधा है जिसके सफेद रंग के फूल होते है ये फूल रात को खिलकर सुबह गिर जाते है इस पौधे के 6 से 7 पत्तों को सिल बट्टे पर पीसकर इसकी चटनी बना ले और एक गलास पानी में उबाले। उबलते उबलते जब यह आधा रहा जाये तो इसको गुनगुना करके प्रतिदिन खाली पेट पीये। ऐसा करने से आपके सरीर और जोड़ो के दर्द से आपको मुक्ति मिलेगी। इस औषधि के साथ कोई अन्य दवा नहीं लेनी है। यह उपाय सबसे ज्यादा कारगर और सफल है। 
  2. कनेर के पत्तों को उबालकर उसको उसके पत्तों की चटनी बना ले और तिल के तेल में मिलाकर घुटनों पर मालिश करे ऐसा करने से आपको दर्द से मुक्ति मिलेगी। 
  3. आपके घुटनों में दर्द रहता है तो रोज रात को 2 चम्मच मैथी को एक ग्लास पानी में भिगो कर रख दे। और प्रात: काल खाली पेट मेथी को चबा चबा कर खाने से और मेथी का पानी पीने से आपको कभी भी घुटनो का दर्द नही होगा।
  4. एक ग्लास दूध में 4-5 लहसुन की कलियाँ डाल कर अच्छी तरह से उबाले और गुनगुना पीने से भी घुटनों के दर्द में आराम मिलता है।
  5. हर रोज आधा कच्चा नारियल खाने से बुढ़ापे में भी कभी आपको घुटनों के दर्द का परेशानी नही होगी।
  6. 5 अखरोट प्रतिदिन खाली पेट खाने से आपके घुटने में कभी कष्ट नही होगा।
  7. रोज रात को सोने से पहले एक ग्लास दूध ने हल्दी डाल कर पीने से आपको हड्डियों में दर्द की समस्या से मुक्ति मिलेगी।एक दाल के दाने के बराबर थोड़ा सा चूना (जो आप पान में लगा कर खाते है) को दही में या पानी में मिला कर पीने से आपको हड्डियों में कभी दर्द नही होगा। चूने के पानी को हमेशा सीधे बैठकर ही पिए इससे आपको जल्दी आराम होगा। यह औषधि सिर्फ 1 महीने पीने से ही शरीर की किसी भी हड्डी में दर्द हो तो वो जल्दी ठीक हो जाएगा।
  8. सुबह और शाम को भद्र आसन करने से आपको लाभ मिलेगा।
  9. हड्डियों के दर्द से बचने के लिए आप अपने भोजन में 25% फल और सब्जियों को शामिल करेगे तो आपको कभी भी हड्डियों के दर्द का सामना नहीं करना पड़ेगा।
  10. नारियल, सेब, संतरे, मौसमी, केले, नाशपति, तरबूज और खरबूजे आदि फलों का सेवन हर रोज जरुर करे।
  11. गोभी, सोयाबीन, हरी पत्तेदार सब्जियों के साथ खीरे, ककड़ी, गाजर, और मेथी को अवश्य शामिल करे।
  12. दूध और दूध से बनी चीजे भरपूर मात्रा में खाए और कच्चा पनीर भी भोजन में शामिल करे, ऐसा करने से आपके जोड़ों के दर्द में कमी आएगी।
  13. मोटा अनाज, मकई, बाजरा, चोकर वाले आटे की रोटियों का जरुर उपयोग करे। क्योंकि इनमे वो सभी तत्व होता है जो आपकी हड्डियों और जोड़ो के दर्द से मुक्ति दिलाता है।

  14. 14. अगर अत्यधिक सर्दी की वजह से आपके दादा या दादी के घुटनों में बहुत अधिक पीड़ा है तो सरसों के तेल में लहसुन और अजवायन को पकाये और फिर जब यह तेल गुनगुना हो जाये तो घुटनों पर मालिश करे, उनका दर्द छू मंतर हो जायेगा।

    विशिष्ट परामर्श-


    संधिवात,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| औषधि से बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त गतिशीलता हासिल करते हैं| बड़े अस्पतालों के महंगे इलाज़ के बावजूद निराश रोगी इस औषधि से आरोग्य हुए हैं| त्वरित असर औषधि के लिए वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|


6.1.21

शिशुओं में गैस की समस्या के घरेलू उपाय




दिन में अक्सर गैस छोड़ना शिशुओं में एक सामान्य बात है। दिन भर दूध पीने के कारण, लगभग 15 से 20 बार गैस छोड़ना आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। लगभग हर बच्चे को पेट में गैस बनने के कारण कभी न कभी परेशानी होती ही है और हर बच्चे में यह अलग–अलग होती है, कुछ आसानी से गैस छोड़ते हैं और कुछ बच्चों को इसके लिए अत्यधिक ज़ोर लगाना पड़ता है। गैस को रोकने और उसका इलाज करने का तरीका सीखना आपको और आपके बच्चे को बहुत सारे तनाव से बचा सकता है।

शिशुओं में गैस कैसे बनती है
शिशुओं में गैस स्तन के दूध या उसे खिलाए जानेवाले आहार में मौजूद प्रोटीन और वसा के पाचन से बनती है। गैसें पेट में बहती रहती है और थोड़ी मात्रा में दबाव बनाकर और पाचन तंत्र के साथ–साथ बहते हुए बाहर निकलती है। कभी–कभी, खिलाने या स्तनपान के दौरान बननेवाली या चूसने की क्रिया से अंदर जानेवाली अतिरिक्त गैस आंतों में फंस सकती है और दबाव पैदा कर सकती है जिससे शिशुओं को दर्द हो सकता है। निम्नलिखित कारक हैं जो शिशु के पेट में गैस बनने का कारण बनते हैं:
दूध पीते समय स्तन या दूध पिलाने की बोतल का ठीक से मुँह में नहीं बैठना अतिरिक्त हवा निगलने का कारण हो सकता है।
दूध पिलाने से पहले, शिशु का अत्यधिक रोना उनके हवा निगलने का कारण हो सकता है।यह भी एक गैस के निर्माण का कारण बन सकता है।
जन्म से ही एक नवजात शिशु की आंत विकसित होने लगती है और यह क्रिया बाद तक जारी रहती है। इस चरण में, शिशु यह सीख रहा होता है कि भोजन कैसे खाया जाए और मलत्याग कैसे किया जाए, जिस कारण भी अतिरिक्त गैस बनती है।
शिशुओं में गैस, आंतों में अविकसित जीवाणु के पनपने का एक परिणाम भी हो सकती है।
स्तन के दूध में माँ के द्वारा खाए गए भोजन के अंश होते हैं, स्तनपान करते समय कुछ खाद्य पदार्थ शिशुओं में गैस बनने का कारण बनते हैं, जैसे नट्स, कॉफ़ी, दूध से बने उत्पाद पनीर, मक्खन, घी) बीन्स और मसाले।
अत्यधिक स्तनपान कराने से बच्चे की आंत का भारीपन भी गैस के उत्पादन का कारण हो सकता है। यह भी माना जाता है कि स्तनपान के दौरान शुरुआत का दूध और आखिरी में आता दूध शिशु के पेट में गैस बनने को प्रभावित करता है। शुरु का दूध लैक्टोज़, जैसे शक्कर से भरपूर होता है और आखिरी का दूध वसा से भरपूर होता है। लैक्टोज़ की अधिकता शिशुओं में गैस और चिड़चिड़ापन का कारण हो सकती है।
हॉर्मोन संचालन, कब्ज़ और कार्बोहाइड्रेट का सेवन जैसे अनेकों कारक भी पेट में गैस बनने के कारण हो सकते हैं ।

शिशुओं में गैस की समस्या के संकेत और लक्षण

शिशुओं के पास अपनी आवश्यकताओं को बताने का केवल एक ही मौखिक तरीका होता है, “रोना”। यह भूख, दर्द, बेचैनी, थकान, अकेलापन या गैस इनमें से क्या है, यह जानने के लिए कुछ अवलोकन कौशल की ज़रूरत होती हैऔर प्रत्येक को समझने के लिए संकेत होते हैं। जब वे पेट की गैस के कारण दर्द से रोते हैं, तो रोना अक्सर तेज़, उन्मत्त और अधिक तीव्र होता है जो शारीरिक इशारों के साथ होता है, जैसे फुहार करना, मुट्ठियों को दबाना, दबाव डालना, घुटनों को छाती तक खींचना और घुरघुराना।
नवजात शिशु में गैस के कारण होने वाली समस्या – घरेलू उपचार
यदि आप सोच रहे हैं कि नवजात शिशुओं को गैस से राहत देने में मदद कैसे करें, तो निम्नलिखित प्रक्रियाएं आपकी मदद कर सकती हैं:
शिशुओं में गैस के कुछ घरेलू उपचारों में शामिल हैं:
1. उन्हें दूध पिलाते समय उचित स्थिति बनाए रखें
स्तनपान कराते समय, बच्चे के सिर और गर्दन को ऐसे कोण पर रखें ताकि वे पेट की तुलना में अधिक ऊपर हों। इससे यह सुनिश्चित होता है कि दूध पेट में नीचे तक जाता है और हवा ऊपर आ जाती है। यही बात बोतल से दूध पिलाने पर भी लागू होती है, बोतल को इस प्रकार झुकाएं ताकि हवा ऊपर की ओर उठे और निप्पल के पास जमा न होने पाए ।
2. खाने या दूध पीने के बाद शिशु को डकार लेने में मदद करें
यह शिशु द्वारा ग्रहण अतिरिक्त वायु को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है। दूध पिलाते समय, हर 5 मिनट का एक ब्रेक लें और धीरे से बच्चे की पीठ पर थपकी दें ताकि उसे डकार लेने में मदद मिल सके। जिससे दूध को पेट में स्थिर होने और गैस को बुलबुलों के रूप में बाहर आने में मदद मिलती है।
3. रोना बंद करने के लिए ध्यान भटकाना
रोने से बच्चे हवा निगलते हैं और जितना अधिक वे रोते हैं, उतना ही अधिक हवा निगलते हैं। लक्ष्य यह होना चाहिए कि शिशु का ध्यान, वस्तुओं और ध्वनियों से भटकाकर जितना ज़ल्दी संभव हो सके उसका रोना रोक दिया जाए।
4. पेट की मालिश
शिशुओं में गैस बनना कम करने के लिए पेट की मालिश एक बेहतरीन तरीका होता है। बच्चे को पीठ के बल लिटाएं और पेट पर धीरे–धीरे, घड़ी की दिशा में सहलाएं और फिर हाथ को उसके पेट के नीचे की गोलाई तक ले जाएं । यह प्रक्रिया आंतों के बीच से फंसी हुई गैस को सरलता से निकलने में मदद करती है।
5. पैडियाट्रिक प्रोबायोटिक्स
दही जैसे प्रोबायोटिक्स, भरपूर मात्रा में सहायक बैक्टीरिया से परिपूर्ण होता है जो आंतों के लिए अच्छे होते हैं। नए शोध से पता चला है कि पैडियाट्रिक प्रोबायोटिक्स, जब कई हफ्तों की अवधि के लिए दिए जाते हैं तो गैस और पेट की समस्याओं से निपटने में आसानी होती है।
6. ग्राईप वाटर
शिशुओं की गैस समस्याओं और उदरशूल को शांत करने के लिए दशकों से ग्राइप वॉटर का उपयोग किया जाता रहा है। ग्राइप वाटर, सोडियम बाइकार्बोनेट, डिल का तेल और चीनी के साथ मिश्रित पानी का एक घोल होता है जो 5 मिनट से कम समय में गैस से सुरक्षित और प्रभावी राहत देता है।
7. सरसों के तेल की मालिश
शिशु को गुनगुने सरसों के तेल से मालिश करने और गुनगुने पानी से स्नान कराने से गैस की समस्या से छुटकारा मिल सकता है । मालिश की क्रिया, आंत से गैस को निकालने में मदद करती है और गर्म पानी उनींदापन लाता है, जिस कारण शिशु को शांति मिलती है।
8. हींग
यदि शिशु, गैस से पीड़ित है तो लगभग दो सरसों के दाने के आकार की हींग को गर्म पानी में मिलाकर उसे पिलाएं, इसकी थोड़ी सी मात्रा गैस से राहत दिलाने में कारगर है। चूंकि यह एक तेज़ मसाला भी है, इसलिए ऊपर दी गई मात्रा से ज़्यादा हींग का उपयोग न करें ।
9. सीमेथिकॉन
सीमेथिकॉन, यह शिशु के लिए एक प्रकार की दवा है जिसे गैस की समस्याओं को ख़त्म करने के लिए दिया जाता है। यह दवा पेट में गैस के छोटे बुलबुलों को मिलाकर एक बड़े बुलबुले का रूप देने में मदद करती है है जिसे आसानी से बाहर निकाला जा सकता है। यह दवा कृत्रिम स्वाद और रंगों के साथ आती है इसलिए इसका उपयोग करने से पहले बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना अनिवार्य है ।
गैस की समस्या को रोकने के लिए आप क्या कर सकते हैं
जैसे कि कहावत है, “रोकथाम इलाज से बेहतर है”। शिशु को दिए जाने वाले उन खाद्य पदार्थों पर नज़र रखें जिनके कारण पेट में गैस इकठ्ठा हो सकती है। यह आपको कुछ प्रकार के खाद्य पदार्थों को प्रतिबंधित करने या दिन में अलग–अलग समय पर उन्हें देने में मदद कर सकती है। यह भी सलाह दी जाती है कि स्तनपान कराने वाली मांओं को कुछ खाद्य पदार्थों का सेवन करने से बचना चाहिए जो गैस उत्पादन का कारण बनते हैं, जैसे सूखी मछली और झींगे, मसालेदार मांस के व्यंजन, मेवे, दालें, दूध के उत्पाद और ब्रोकोली, फूलगोभी इत्यादि । कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ भी हैं जो गैस से राहत देने के लिए खाए जा सकते हैं जैसे अदरक, हींग, लहसुन, सौंफ के बीज, जीरा, पानी आदि।
सुनिश्चित करें कि शिशु को कुछ समय के लिए पेट के बल लिटाया जाए। शिशु को कुछ मिनटों के लिए पेट के बल लिटाने के बाद पेट पर डाला गया हल्का सा दबाव गैस को निकालने में मदद करता है और बच्चे की पीठ और गर्दन की मांसपेशियों को भी मज़बूत बनाता है। जब आप बच्चे को पकड़ें और उसके साथ खेलें तो उसकी पीठ को ज़रूर थपथपाएं, यह उसकी प्रणाली में गैस को एकत्रित करने और आसानी से बाहर निकालने में मदद करता है।




3.1.21

सुबह-सुबह पीएंगे ऐलोवेरा जूस, तो ये होंगे फायदे





आपने एलोवेरा का बहुत नाम सुना होगा, और यह भी सुना होगा कि एलोवेरा को औषधि की तरह इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एलोवेरा के औषधीय गुण क्या-क्या हैं। क्‍या आपको पता है कि किस-किस रोग में एलोवेरा के इस्तेमाल से लाभ मिलता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में एलोवेरा के फायदे के बारे में कई सारी अच्छी बातें बताई गई हैं।
अगर सुबह-सुबह पीएंगे ऐलोवेरा जूस, तो ये होंगे फायदे
अगर आपका पेट साफ नहीं रहता है या पेट से संबंधित कोई समस्या है तो आप खाली पेट ऐलोवेरा के जूस का सेवन कर सकते हैं. पानी के साथ इस जूस का सेवन करने से पेट साफ होता है. इसके साथ ही कब्ज की समस्या भी आसानी से दूर हो जाती है. ऐलोवेरा एक ऐसा पौधा है, जो आजकल हर घर में मिल जाता है. यह एक औषधि भी है, जिससे जुड़े कई घरेलू नुस्‍खे मौजूद हैं. ऐलोवेरा का इस्तेमाल करने से स्किन से संबंधित समस्याओं, पेट से संबंधित कई बीमारियों, दांतों की समस्या, सिरदर्द, भूख न लगना जैसी दिक्कतों को बड़ी आसानी से दूर किया जा सकता है.
इसमें प्रोटीन, विटामिन समेत एंटी-ऑक्‍सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं, जो आपके शरीर को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. आपको भले विश्वास न हो लेकिन ऐलोवेरा का जूस पेट से संबंधित 200 से ज़्यादा बीमारियों को दूर करता है. ऐलोवेरा के जूस से रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. ऐलोवेरा का जूस पीने में भले ही थोड़ा कड़वा लगे लेकिन इसके फायदे अनेक हैं. बाज़ार में ऐलोवेरा के इन फायदों की वज़ह से ही कई फ्लेवर में ये जूस आसानी से मिलता है. ऐसे में इस स्वास्थ्यवर्धक जूस का सेवन आप आसानी से कर सकते हैं.
अगर अक्सर रहता है सिरदर्द तो पिएं इसे
अगर आपको अक्सर सिरदर्द रहता है तो आप ऐलोवेरा के जूस का खाली पेट सेवन कर सकते हैं. इससे आपको अक्सर रहने वाले सिरर्द की समस्या से भी छुटकारा मिल जाएगा.
कब्ज की समस्या से मिलेगा छुटकारा
अगर आपका पेट साफ नहीं रहता है या पेट से संबंधित कोई समस्या है तो आप खाली पेट ऐलोवेरा के जूस का सेवन कर सकते हैं. पानी के साथ इस जूस का सेवन करने से पेट साफ होता है. इसके साथ ही कब्ज की समस्या भी आसानी से दूर हो जाती है.
शरीर के विषैले तत्वों को करता है दूर
हमारी बदलती दिनचर्या में सही खान पान और सही समय पर पोषक तत्व न मिल पाने की वजह से शरीर के अंदर कई विषैले तत्व पैदा हो जाते हैं. इन विषैले तत्वों से सिर्फ पेट की ही नहीं बल्कि स्किन से संबंधित समस्याएं हो जाती हैं. ऐलोवेरा शरीर की डिटॉक्सीफिकेशन की प्रक्रिया के जरिए उससे विषैले तत्वों को बाहर निकालता है.
खून की नहीं होगी कमी
ऐलोवेरा का जूस खाली पेट पीने से रेड ब्लड सेल्स की संख्या बढ़ने लगती है. ऐसे में अगर शरीर में ख़ून की कमी है तो इस जूस का सेवन रोज़ाना खाली पेट करें.
नहीं होगी भूख न लगने की समस्या
अगर आपको भूख न लगने की समस्या है तो ऐलोवेरा का जूस आपके लिए रामबाण की तरह है. ये आपके भूख न लगने की परेशानी को दूर करता है. दरअसल पेट न साफ होने की वजह से आपकी भूख पर भी सीधा असर पड़ता है. जब आपका पेट साफ होने लगता है तो भूख भी आसानी से लगने लगती है.
दांतों से संबंधित नहीं होगी समस्या
ऐलोवेरा में मौजूद एंटी - माइक्रोवाइल प्रॉपर्टी आपके दांतों को साफ रखती है. इसके साथ ही बैक्टीरियल इंफैक्शन से भी आपको बचाती है. मुंह में अगर छाले होते हैं तो ऐलोवेरा का जूस उन्हें भी दूर करने में मदद करता है.
चेहरा चमकने लगेगा
ऐलोवेरा का जूस पीने से चेहरे पर चमक आती है. क्योंकि कील, मुहांसे और स्किन से संबंधित बीमारियां अक्सर पेट की बीमारियों से संबंध रखती हैं. ऐलोवेरा का जूस इन सारी परेशानियों को दूर कर चेहरे पर चमक लाता है.
आंखों की बीमारी का इलाज
आप एलोवेरा के औषधीय गुण से आंखों की बीमारी का इलाज कर सकते हैं। एलोवेरा जेल को आंखों पर लगाएंगे तो आंखों की लालिमा खत्म होती है। यह विषाणु से होने वाले आखों के सूजन (वायरल कंजक्टीवाइटिस) में लाभदायक होता है।
एलोवेरा का औषधीय गुण आँखों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। आप एलोवेरा के गूदे पर हल्दी डालकर थोड़ा गर्म कर लें। इसे आंखों पर बांधने से आंखों के दर्द का इलाज होता है।
कान दर्द में भी एलोवेरा से लाभ मिलता है। एलोवेरा के रस को हल्का गर्म कर लें। जिस कान में दर्द हो रहा है, उसके दूसरी तरफ के कान में दो-दो बूंद टपकाने से कान के दर्द में आराम (aloe vera ke fayde) मिलता है।
खांसी-जुकाम में एलोवेरा के फायदे लेने के लिए इसका गूदा निकालें। गूदा और सेंधा नमक लेकर भस्म तैयार कर लें। इस भस्‍म को 5 ग्राम की मात्रा में मुनक्का के साथ सुबह-शाम सेवन करें। इससे पुरानी खांसी और जुकाम में लाभ होता है।

घृतकुमारी  के औषधीय गुण से पेट के रोग में भी लाभ होता है। गूदे को पेट के ऊपर बांधने से पेट की गांठ बैठ जाती है। इस उपचार से आंतों में जमा हुआ मल भी आराम से बाहर निकल जाता है।
एलोवेरा की 10-20 ग्राम जड़ को उबाल लें। इसे छानकर भुनी हुई हींग मिला लें। इसे पीने से पेट दर्द में आराम मिलता है।
एलोवेरा के 6 ग्राम गूदा और 6 ग्राम गाय का घी, 1 ग्राम हरड़ चूर्ण और 1 ग्राम सेंधा नमक लें। इसे मिलाकर सुबह-शाम खाने से वात विकार से होने वाले गैस की समस्या ठीक होती है।
गाय के घी में 5-6 ग्राम घृतकुमारी के गूदे में त्रिकटु सोंठ, मरिच पिप्‍प्‍ली, हरड़ और सेंधा नमक मिला लें। इसका सेवन करने से गैस की समस्या में लाभ होता है।
60 ग्राम घृतकुमारी के गूदे में 60 ग्राम घी, 10 ग्राम हरड़ चूर्ण तथा 10 ग्राम सेंधा नमक मिला लें। इसे अच्छी तरह मिला लें।इसको 10-15 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से वात दोष से होने वाले पेट की गैस की समस्या से निजात मिलता है। इस पेस्‍ट का सेवन पेट से जुड़ी बीमारियों व वात दोष से होने दूसरे रोगों में भी फायदेमंद होता है।
एलोवेरा के पत्ते के दोनों ओर के कांटों को अच्छे से साफ कर लें। इसके छोटे-छोटे टुकड़े काटकर मिट्टी के एक बर्तन में रख लें। इसके 5 किलो के टुकड़े में आधा किलो नमक डालकर बर्तन का मुंह बंद कर दें। इसे 2-3 दिन धूप में रखें। इसे बीच-बीच में हिलाते रहें। तीन दिन बाद इसमें 100 ग्राम हल्दी, 100 ग्राम धनिया, 100 ग्राम सफेद जीरा, 50 ग्राम लाल मिर्च, 6 ग्राम भुनी हुई हींग डाल लें। इसी में 30 ग्राम अजवायन, 100 ग्राम सोंठ, 6 ग्राम काली मिर्च, 6 ग्राम पीपल, 5 ग्राम लौंग भी डाल लें। इसके साथ ही 5 ग्राम दाल चीनी, 50 ग्राम सुहागा, 50 ग्राम अकरकरा, 100 ग्राम कालाजीरा, 50 ग्राम बड़ी इलायची और 300 ग्राम राई डालकर महीन पीस लें। रोगी की क्षमता के अनुसार 3-6 ग्राम तक की मात्रा में सुबह-शाम देने से पेट के वात-कफ संबंधी सभी विकार खत्म होते हैं। सूखने पर अचार, दाल, सब्जी आदि में डालकर प्रयोग करें।
तिल्ली बढ़ गई हो तो एलोवेरा के इस्तेमाल से फायदा होता है। 10-20 मिलीग्राम एलोवेरा के रस में 2-3 ग्राम हल्दी चूर्ण मिलाकर सेवन करें। इससे तिल्‍ली के बढ़ने के साथ-साथ अपच में लाभ होता है।
 बवासीर में एलोवेरा के प्रयोग से फायदा ले सकते हैं। एलोवेरा जेल के 50 ग्राम गूदे में 2 ग्राम पिसा हुआ गेरू मिलाएं। अब इसकी टिकिया बना लें। इसे रूई के फाहे पर फैलाकर गुदा स्‍थान पर लंगोट की तरह पट्टी बांधें। इससे मस्‍सों में होने वाली जलन और दर्द में आराम मिलता है। इससे मस्‍से सिकुड़कर दब जाते हैं। यह प्रयोग खूनी बवासीर में भी लाभदायक है।     
पीलिया का इलाज करने के लिए भी एलोवेरा का सेवन करना फायदेमंद होता है। इसके लिए 10-20 मिलीग्राम एलोवेरा के रस को दिन में दो तीन बार पिलाने से पीलिया रोग में लाभ होता है।
इस प्रयोग से कब्‍ज से मुक्ति पाने में भी मदद मिलती है।
एलोवेरा रस की 1-2 बूंद नाक में डालने से भी लाभ होता है।
कुमारी लवण को 3-6 ग्राम तक की मात्रा में छाछ के साथ सेवन करें। इससे लीवर, तिल्‍ली के बढ़ाना, पेट की गैस, पेट में दर्द और पाचनतंत्र से जुड़ी अन्य समस्‍याओं में लाभ होता है
लीवर विकार में एलोवेरा (ग्वारपाठा) के फायदे
दो भाग एलोवेरा के पत्तों का रस और 1 भाग शहद लेकर उसे चीनी मिट्टी के बर्तन में रखें। इस बर्तन का मुंह बन्द कर 1 सप्ताह तक धूप में रख दें। एक सप्ताह बाद इसे छान लें। इस औषधि को 10-20 मिलीग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से लीवर से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है।
अधिक मात्रा में इसका सेवन करने से पेट साफ होता है। उचित मात्रा में सेवन करने से मल एवं वात से जुड़ी समस्‍याएं ठीक होने लगती हैं। इससे लीवर स्वस्थ हो जाता है।
मासिक धर्म विकार में एलोवेरा के सेवन से लाभ
एलोवेरा के 10 ग्राम गूदे पर 500 मिलीग्राम पलाश का क्षार बुरककर दिन में दो बार सेवन करें। इससे मासिक धर्म की परेशानियां दूर होती हैं।
मासिक धर्म के 4 दिन पहले से दिन में तीन बार कुमारिका वटी की 1-2 गोली का सेवन करें। इसे मासिक धर्म खत्म होने तक सेवा करना है। इससे मासिक धर्म के समय होने वाला दर्द, गर्भाशय का दर्द और योनि से जुड़ी अनेक बीमारी से आराम मिलता है।
गठिया के इलाज की आयुर्वेदिक दवा है एलोवेरा
जोड़ो के दर्द में भी एलोवेरा के इस्तेमाल से फायदे मिलते हैं। 10 ग्राम एलोवेरा जेल नियमित रूप से सुबह-शाम सेवन करें। इससे गठिया में लाभ होता है।
एलोवेरा के सेवन से कमर दर्द का इलाज
कमर दर्द से परेशान रहते हैं तो एलोवेरा के इस्तेमाल से फायदा ले सकते हैं। गेंहू का आटा, घी और एलोवेरा जेल (एलोवेरा का गूदा इतना हो जिससे आटा गूंथा जाए) लेकर आटा गूंथ लें। इससे रोटी बनाएं। रोटी का चूर्ण बनाकर लड्डू बना लें। रोज 1-2 लड्डू को खाने से कमर दर्द ठीक होता है।
एलोवेरा जेल कमर दर्द में दर्दनिवारक दवा की तरह काम करता है।
घाव और चोट में एलोवेरा के गुण से फायदा
फोड़ा ठीक से पक न रहा हो तो एलोवेरा के गूदे में थोड़ा सज्जीक्षार और हरड़ चूर्ण मिलाकर घाव पर बांधें। इससे फोड़ा जल्दी पक कर फूट जाता है।
घृतकुमारी के पत्ते को एक ओर से छील लें। इस पर थोड़ा हरड़ का चूर्ण बुरक कर हल्‍का गर्म कर लें। इसे गांठ पर बांधें। इससे गांठों की सूजन दूर होगी।
स्त्रियों के स्तन में गांठ पड़ गई हो या सूजन हो गई हो तो एलोवेरा की जड़ का पेस्‍ट बना लें। इसमें थोड़ा हरड़ चूर्ण मिलाकर गर्म करके बांधने से लाभ होता है। इसे दिन में 2-3 बार बदलना चाहिए।
घृतकुमारी का गूदा घावों को भरने के लिए सबसे उपयुक्त औषधि है। रेडिएशन के कारण हुए गंभीर घावों पर इसके प्रयोग से बहुत ही अच्छा फायदा मिलता है।
आग से जले हुए अंग पर एलोवेरा के गूदे को लगाने से जलन शांत हो जाती है। इससे फफोले नहीं होते हैं।
एलोवेरा और कत्‍था को समान मात्रा में पीसकर लेप करने से नासूर में फायदा होता है।
एलोवेरा के रस को तिल और कांजी के साथ पका लें। इसका लेप करने पर घाव में लाभ होता है।
केवल एलोवेरा के रस को पकाकर घाव पर लेप करने से भी लाभ होता है।





2.1.21

नाक में तेल डालने के फायदे और नुकसान




नाक में तेल डालना हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। यह न केवल नाक में होने वाली परेशानी को दूर करता बल्कि अन्य शारीरिक समस्याओं को भी दूर करने में सहायक होता है।

नाक में तेल डालने से यह मौसमी बीमारियों जैसे कि सर्दी, जुकाम, फ्लू, फंगल इंफेक्शन और बैक्टीरियल इंफेक्शन के खतरे को कम करता है। यह गले और फेफड़े में होने वाले इंफेक्शन और खुजली, रैशेज और फंगस जैसी दिक्कतें को दूर करने में सहायक होता है।

सरसों का तेल
सबसे लोकप्रिय तेलों में से एक माना जाता है। इसका उपयोग बहुत सारे आयुर्वेदिक उपचारों में किया जाता है। सरसों का तेल एंटी बैक्टीरियल, एंटीफंगल और एंटीइंफ्लेमेटरी गुणों से समृद्ध होता है। नाक में सरसों का तेल डालने से कई प्रकार के लाभ होते है। इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट सूजन संबंधी समस्याओं से निजात दिलाने का काम कर सकता है।
नाक में सरसों का तेल डालने से यह यह मौसमी बीमारियों जैसे कि सर्दी, जुकाम, छींक आना और साँस लेने में परेशान होना आदि समस्यों को दूर करने में मददगार होता है। इसके लिए आप दिन में 3 बार सरसों के तेल को अपनी नाक के दोनों नॉस्टल्स में डालें। यह ड्राईनेस को दूर करके खुजली को खत्म करता है।


बादाम तेल नाक में डालने के फायदे

बादाम की तरह बादाम का तेल भी बहुत ही लाभकारी होता है। बादाम का तेल त्वचा संबंधी बीमारियों एवं संक्रमण के इलाज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह त्वचा की जलन एवं खुजलाहट को कम करके त्वचा को आराम देता है।
नाक में बादाम का तेल डालने से यह आपको कई प्रकार की बीमारियों से दूर रखता है। यह बाल झड़ने से रोकने, सिर दर्द ठीक करने, याददाश्त बढ़ाने और साइनस की समस्या को दूर करने मदद करता है। दिन में 2 बार बादाम तेल को नाक में जरूर डालें।


नाक में नारियल तेल डालने के फायदे

सर्दियों के मौसम में जुकाम होना और फिर नाक का बंद होना आम बात है। आप इसके लिए नारियल के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। जब भी आपको सर्दी हो जाएं और नाक बंद हो जाएं तो आप नारियल तेल की कुछ बूंदों को अपनी नाक में डालें। इससे आपकी बंद नाक खुल जाएंगी और सर्दी भी ठीक हो जाएगी।
इसके अलावा नारियल का तेल एक प्राकृतिक मॉश्चराइजर की तरह कार्य करता है। यह ड्राई स्किन को मॉश्चराइज करके नाक में होने वाली खुजली को भी दूर करता है।


नाक में तिल का तेल डालने के फायदे

तिल के तेल को इसके औषधीय गुणों के कारण जाने जाते है। इस तेल में एक जीवाणुरोधी गुण होते है जो सामान्य त्वचा रोगजनकों जैसे स्‍ट्रेप्‍टोकोकस और स्‍टाफिलोकोकस और एथलीट पैर जैसी त्वचा कवक को ठीक करता है। यह एक प्राकृतिक एंटीवायरल, एंटी इंफ्लामेंट्री (anti-inflammatory) होता है।
नाक में तिल का तेल डालने से बालों का सफ़ेद होना और झड़ना, नाक की खुश्की, दांत दर्द ,सेंसिटिविटी और मसूड़ों की समस्या आदि में लाभ मिलता है। इसके लिए आप रोज रात में सोने से पहले तिल के तेल की दो बूंदों को नाक में डालें।

जैतून के तेल
में भरपूर मात्रा में विटामिन E और एंटीऑक्सीडेंट होता है जो त्वचा को इन्फेक्शन से बचाये रखता है। जैतून के तेल का उपयोग मोइस्चराइजर के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है। आप अपनी नाक में जैतून का तेल की कुछ बूंदों को रात में सोने से पहले डालें। इससे साइनस और साँस लेने में होने परेशानी में राहत मिलेगी।
नाक में तेल डालने से कफ जमने की समस्या दूर होती है।
आँखों की रोशनी बढ़ाने के लिए आप रात में सोते समय नाक में दो बूंद तेल डालें।
नाक में तेल डालने से वात, पित्त और कफ दोष को संतुलित किया जा सकता है।
नाक में तेल डालना तनाव दूर करने में सहायक होता है।
रात में सोने से पहले नाक में तेल की दो बूंद डालने से अनिद्रा की समस्या दूर होती है।





दिव्य हृदयामृत वटी के फायदे और नुकसान




दिव्य हृदयामृत वटी का उपयोग ह्रदय रोगों में किया जाता है। यह एक आयुर्वेदिक औषधि है। आइये इस ड्रग के बारे में और अधिक विस्तार से जानते हैं कि यह कहाँ इस्तेमाल होती है, कैसे काम करती है और इसके क्या साइड इफेक्ट्स होते हैं। नीचे के लेख में आप जानेगे Divya Hridyamrit Vati के लाभ, उपयोग करने के तरीके, खुराक और साइड इफेक्ट्स, नुकसान के बारें में।
दिव्य हृदयामृत वटी में इस्तेमाल होने वाली सामग्री
अर्जुन छाल – Terminalia Arjuna 157.61 मिलीग्राम
निर्गुन्डी – Vitex Negundo 11 मिलीग्राम
रासना – Pluchea Lanceolata 11 मिलीग्राम
मकोय (काकमाची) – Solanum Nigrum 11 मिलीग्राम
गिलोय – Tinospora Cordifolia 11 मिलीग्राम
पुनर्नवा – Boerhavia Diffusa 11 मिलीग्राम
चित्रक – Plumbago Zeylanica 11 मिलीग्राम
नागरमोथा – Cyperus Rotundus 11 मिलीग्राम
वायविडंग – Embelia Ribes 11 मिलीग्राम
हरीतकी (हरड़ छोटी) – Terminalia Chebula 11 मिलीग्राम
अश्वगंधा – Withania Somnifera 11 मिलीग्राम
शुद्ध शिलाजीत – Asphaltum 11 मिलीग्राम
शुद्ध गुग्गुलु – Commiphora Mukul 21 मिलीग्राम
संजयस्व पिष्टी 0.1 मिलीग्राम
अकीक पिष्टी 0.1 मिलीग्राम
मुक्ता पिष्टी 0.05 मिलीग्राम
हीरक भस्म 0.005 मिलीग्राम
रजत भस्म 0.03 मिलीग्राम
जहरमोहरा पिष्टी 0.005 मिलीग्राम

दिव्य हृदयामृत वटी कैसे काम करती है

यह औषधि मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करती हैं और दिल से सम्बंधित रोगो की कठिनाईयों को दूर करती हैं। इसके अतिरिक्त यह उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने का भी कार्य करती है।
दिव्य हृदयामृत वटी के सेवन की विधि –
यह दवा बच्चों को एक बार में 1 गोली लेनी चाहिए एवं वयस्कों को 2 गोली लेनी चाहिए, और अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
यह दवा सुबह – शाम ( दिन में 2 बार) लेनी चाहिए, और अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
इस दवा को गुनगुने पानी से या फिर दूध से या फिर अर्जुन क्षीर पाक से लेना चाहिए।
इस दवा बेहतर परिणाम के लिए कम से कम 3 माह तक सेवन करना चाहिए। और इस बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
दिव्य हृदयामृत वटी के साइड इफेक्ट्स और नुकसान
दिव्य हृदयामृत वटी का इस्तेमाल करने से आपको कई सारे साइड इफ़ेक्ट हो सकते हैं लेकिन ये साइड इफेक्ट्स आपको हमेशा महसूस नहीं होंगे। जब भी आपको नीचे बताये गये साइड इफेक्ट्स महसूस हों तो आप तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
उलटी होना
कब्ज
अनिद्रा
थकान
चक्कर आना
पेट खराब होना
मितली
सिर दर्द
दस्त
हृदयामृत वटी की पारस्परिक क्रिया
अगर आप इस टैबलेट के साथ कोई अन्य दूसरी ड्रग इस्तेमाल करना चाहते हैं तो हो सकता है कि इसके साइड इफेक्ट्स बढ़ जाएं या फिर इसका प्रभाव कुछ कम हो जाए। अगर इसके इस्तेमाल से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो रही है तो आप तुरंत डॉक्टर से सलाह लें जिससे कि आपको कोई गंभीर समस्या ना हो। निम्नलिखित ड्रग के साथ पारस्परिक क्रिया हो सकती है।
Corticosteroids
Clonazepam
Basiliximab
Antibiotics
Cortisol
Azathioprine
Cyclosporine

हृदयामृत वटी के इस्तेमाल में सावधानियां
यदि आप अतिसंवेदनशीलता से पीड़ित हैं, तो इस दवा का प्रयोग न करें।
यदि आप अस्थमा से पीड़ित हैं, तो इस दवा का प्रयोग न करें।
इस दवा को 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को इस्तेमाल में नहीं लाया जाना चाहिए।
अगर आपको इसमें मौजूद सामग्री से एलर्जी है तो इसका इस्तेमाल ना करें या फिर डॉक्टर से सलाह लें।
स्तनपान के समय इस टैबलेट का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरुर लें।
प्रेगनेंसी के दौरान इसका इस्तेमाल करने के लिए डॉक्टर से सलाह जरुर लें।
अगर आप पहले से ही कोई विटामिन ले रहें हैं तो इस टैबलेट का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।
इस ड्रग को ऐल्कोहल के साथ इस्तेमाल न लें।
हृदयामृत वटी अधिक मात्रा में इस्तेमाल करने पर होने वाले लक्षण
यदि आप बहुत अधिक मात्रा में इस टैबलेट इस्तेमाल करते हैं, तो आपके शरीर में दवा के खतरनाक स्तर हो सकते हैं। ओवरडोज के लक्षणों में निम्न दुष्प्रभाव शामिल हो सकते हैं, जैसे
उलटी होना
कब्ज
अनिद्रा
थकान
चक्कर आना
पेट खराब होना
मितली
सिर दर्द
दस्त
बेहतर परिणाम के लिए इस दवा को कितने समय तक उपयोग किया जा सकता है?
बेहतर परिणाम के लिए इस दवा को कम से कम 3 महीने तक उपयोग किया जाना चाहिए, इस बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से संपर्क करें।
क्या इस ड्रग को लेने के बाद वाहन चलाना सुरक्षित है?
जी नही इस दवा को वाहन चलाते समय लेना सुरक्षित नही है, क्योंकि इसको लेने के बाद नींद आना, चक्कर आना, फोकस करने में कमी और सिर दर्द आदि समस्याओं का खतरा बना रहता है।
इस दवा को दिन में कितनी बार सेवन करना चाहिए?
इस दवा दिन में 2 बार सेवन करने की सलाह दी जाती है, और अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से संपर्क करें।





1.1.21

अगर वृक्ष के आयुर्वेदिक उपचार




अगर के पेड़ असम, मालाबार, चीन की सीमा के निकटवर्ती क्षेत्रों, बंगाल के दक्षिण की ओर के उष्णकटिबन्ध के ऊपर के प्रदेश में और सिलहट जिले के आसपास ‘जातिया’ पर्वत पर अधिक मात्रा में होता है।


व्यवहारिक नाम:

‌‌‌अंगेजी: ईगलवुड (Eaglewood)।

अरबी: ऊदगर की।

कर्नाटकी: अगर।

गुजराती: अगरू।

ग्रीक: अगेलोकन।

तमिल: अगर।

तेलुगु: अगरू चेट्टु।

फारसी: कसबेबवा।

बंगाली: अगर।

मराठी: अगर।

मलयालम: आकेल।

लैटिन: एक्वीलारिया (Aquilaria sp.)

‌‌‌संस्कृत: स्वाद्वगरू।

हिन्दी: अगर।

स्वाद: ‌‌‌अगर तेज, कड़वा और सुगन्ध मिश्रित होता है।
‌‌‌पौधे का स्वरूप: ‌‌‌अगर एक पेड़ की लकड़ी है। वैसे तो यह कई प्रकार की होती है परन्तु इनमें काली अगर ही श्रेष्ठ होती है। अगर का पेड़ बहुत बड़ा होता है और हमेशा हरा रहता है। अगर का पेड़ ऊबड़-खाबड़ होता है। ‌‌‌इसमें मार्च-अप्रैल मास में फूल आते हैं, अगर के बीज जुलाई में पकते हैं। इसकी लकड़ी नर्म होती है। इसके छिद्रों में राल की तरह कोमल और सुगन्धित पदार्थ भरा रहता है। लोग उसे चाकू से कुतरकर रख लेते हैं, अगर की अगरबत्ती बनाने और शरीर पर मलने के काम में लाया जाता है, अगर की सुगन्ध से मन प्रसन्न होता ‌‌‌है। ‌‌‌अगर का रंग काला और भूरा होता है। इसकी लकड़ी जलाने में ‌‌‌सुगन्ध देती है।
‌‌‌विशेष: ‌‌‌अगर पित्त प्रकृति वालों के लिए हानिकारक होता है। ‌‌‌कपूर और गुलाब के फूल अगर के दोषों को दूर करते हैं और इसके गुणों में सहायक होते हैं।
स्वभाव: ‌‌‌अगर खुष्क और गर्म प्रकृति का होता है।
‌‌‌औषधीय गुण: ‌‌‌अगर गर्म, चरपरी, त्वचा को हितकारी, कड़वी, तीक्ष्ण, शीत, वात और कफनाशक और मन को प्रसन्न करती है, शरीर में स्फूर्ति लाती है, स्मरण शक्ति को बढ़ाती है, मस्तिष्क को ताजा करती है और गर्भाशय की सर्दी को दूर करती है।
अगर के पेड़ असम, मालाबार, चीन की सीमा के निकटवर्ती क्षेत्रों, बंगाल के दक्षिण की ओर के उष्ण कटिबन्ध के ऊपर के प्रदेश में और सिलहट जिले के आस-पास ‘जातिया’ पर्वत पर अधिक मात्रा में होता है।






आयुर्वेद उपचार में गोदन्ती भस्म के प्रयोग


 
गोदंती भस्म एक सुरक्षित दर्द निवारक औषधि है | गोदंती भस्म को गोदंती हरताल , घाषान , कर्पूर शिला व अंग्रेजी में Gypsum(जिप्सम) भी कहते है | गोदंती एक प्रकार का खनिज है | इसका यह नाम गोदंती = गो + दंती , यहाँ गो का आशय गाय से है व दंती का दांत से | यह दिखने में बिल्कुल गाय के दांत के जैसा दिखाई प्रतीत होता है इसलिए इसका नाम गोदंती रखा गया है | आयुर्वेद में गोदंती भस्मका प्रयोग बहुत अधिक किया जाता है | गोदंती भस्म का प्रयोग ज्वर पीड़ा में , सिर दर्द में , कैल्शियम पूरक के रूप में , टाइफाइड बुखार में , हड्डियों के रोग और भी विभिन्न रोगों के उपचार में किया जाता है |
गोदंती भस्म बनाने की विधि :
गोदंती शोधन विधि : अच्छी गोदंती को गर्म पानी से धोकर साफ़ करके धुप में सुखाकर रख ले |
भस्म विधि : जमीन में एक हाथ गहरा गड्डा बना उसका चौथाई भाग कंडों से भरकर उस पर गोदंती की टुकड़ों को अछि तरह बिछा दे और ऊपर कंडों से शेष भाग को भरकर आँच दे | स्वांगशीतल होने पर कंडों की राख को सावधानी से हटाकर गोदन्ती भस्म को निकाल चन्दानादि अर्क ( उत्तम चन्दन का चूर्ण, मौसमी गुलाब तथा केवड़ा, वेदमुश्क या मौलसरी और कमल के फूल सबको एकत्र कर उसमें आठ गुना पानी डालकर भबके से आधा अर्क खींचे ) इसमें या ग्वारपाठा(घीकुमारी) के रस में घोंट टिकियाँ बना धुप में सुखावें, जब टिकियाँ खूब सूख जाए तो सराव सम्पूट में बंद कर लघुपट में फूंक दे | यह स्वच्छ-सफेद और बहुत मुलायम भस्म तैयार होगी |
गोदन्ती भस्म के लाभ 
आयुर्वेद में गोदन्ती भस्म को एक अच्छी दर्द निवारक औषधि के रूप में जाना गया है | जिसके प्रयोग से रोगी अपने दर्द से शीघ्र ही राहत पाता है |
हर प्रकार के ज्वर में शरीर का ताप कम करने में गोदन्ती भस्म का प्रयोग किया जाता है | ज्वर( बुखार) होने पर गोदंती भस्म पैरासिटामोल के रूप में कार्य करती है |
मलेरिया रोग में भी गोदंती भस्म का प्रयोग बड़े स्तर पर किया जाता है |
स्त्रियों के श्वेत प्रदर, रक्त प्रदर, रक्तस्त्राव में गोदन्ती भस्म लाभ प्रदान करती है |
सिर दर्द दूर करने में भी गोदंती भस्म का प्रयोग किया गया है |
शरीर में कैल्सियम की कमी को दूर करने में गोदंती भस्म उपयोगी है | हड्डियों की सूजन व हड्डियों की कमजोरी दूर करने में भी इसका प्रयोग बड़े स्तर पर किया गया है |
सूखी खांसी दूर करने में यह उपयोगी है
पेट में एसिड की समस्या या पेट का अल्सर दूर करने में भी इसका प्रयोग अन्य औषधियों के साथ में किया जाता है |
शरीर में कोई भी सामान्य दर्द व पीड़ा दूर करने में भी गोदंती भस्म का प्रयोग लाभप्रद सिद्ध होता है |
कब्ज व अजीर्ण आदि रोग दूर करने में भी इसका प्रयोग किया गया है |
रोगों के उपचार में गोदंती भस्म के प्रयोग :
गोदन्ती भस्म के उपयोग :
मलेरिया बुखार में गोदंती भस्म से उपचार : गोदंती भस्म 2 रत्ती , फिटकरी भस्म 2 रत्ती , सफ़ेद जीरे का चूर्ण 4 रत्ती – तीनों को तुलसीपत्र -रस और शहद में मिलाकर चटाने और ऊपर से सुदर्शन अर्क 5 तोला पिलाने से मलेरिया की गर्मी दूर होकर रोगी को आराम मिलता है |
शीत ज्वर व पारी वाले बुखार में गोदंती भस्म से उपचार : गोदंती भस्म 6 रत्ती में एक चावल संखिया भस्म मिला शहद के साथ दे | इसके तुरंत बाद सुदर्शन चूर्ण का क्वाथ बनाकर अथवा सुदर्शन अर्क 5 तोला पिला देने से बहुत लाभ मिलता है |
सिरदर्द के उपचार में गोदन्ती भस्म का प्रयोग : 3 रत्ती गोदन्ती भस्म और 1 माशा मिश्री तथा 1 तोला गोघृत सब को मिलाकर दिन में तीन बार देने से रोगी को विशेष लाभ मिलता है | इसी प्रकार सूर्यावर्त, अर्धावभेदक(अधकपारी) में सूर्योदय से एक -एक घंटा पहले दो मात्रा गोदन्ती भस्म शहद के साथ देने से अवश्य लाभ मिलता है |
स्त्रियों के श्वेत प्रदर में गोदन्ती भस्म का प्रयोग : गोदंती भस्म 6 रत्ती तथा त्रिवंग भस्म 1 रत्ती मिला शर्बत बनप्सा या मधूकाद्य्वलेह के साथ देने से उत्तम लाभ होता है | रक्त प्रदर में पूर्व मिश्रण सहित देकर ऊपर से अशोकारिष्ट या पत्रांगासव पिलाने से बहुत शीघ्र लाभ मिलने लगता है |
मात्रा व सेवन विधि :
गोदन्ती भस्म के सेवन की मात्रा रोगी की उम्र व उसके वजन के अनुसार 125 मिलीग्राम से लेकर एक ग्राम तक हो सकती है | बच्चों के लिए 65 मिलीग्राम से लेकर 250मिलीग्राम तक इसकी मात्रा हो सकती है | व्यस्क के लिए 250 मिलीग्राम से 1 ग्राम तक हो सकती है |
ध्यान देने योग्य :
गोदन्ती भस्म के उपरोक्त सभी प्रयोग सिर्फ और सिर्फ आपकी जानकारी हेतु प्रस्तुत किये गये है | बिना उचित जानकारी के स्वयं से रोग का उपचार हानिकारक सिद्ध हो सकता है | गोदंती भस्म का प्रयोग एक सीमित अवधि के लिए ही किया जाना चाहिए | चिकित्सक की देख-रेख में ही इस औषधि का सेवन करना चाहिए |







पुनर्नवादि मंडूर के फायदे उपयोग



पुनर्नवादि मंडूर क्या है?

पुनर्नवादि मंडूर एक आयुर्वेदिक औषधि है जिसका उपयोग शरीर में आयरन के स्तर को बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह एनीमिया, पीलिया, हेपेटाइटिस, कोलाइटिस, गठिया जैसे रोगों का इलाज करने में मदद करता है। इसमें होग्वीड (पुनर्नवा), सूखी अदरक, ट्रिविट, काली मिर्च, लंबी काली मिर्च, देवदार, हल्दी, हरीतकी, बिभीत्की, आंवला, कैरम और कैरावे सहित कई तत्व होते हैं। ये सारी चीज़ें स्वस्थ शरीर और स्वस्थ दिमाग में योगदान करती हैं। इस दवा के लाभों के बारे में जानने के लिए आगे पढ़ें।

पुनर्नवादि मण्डूर के फायदे

जैसा कि पुनर्नवादि मंडूर कई महत्वपूर्ण सामग्रियों का एक पॉली हर्बल रूप है जिसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं। इनमे से कुछ नीचे दिए गये हैं:—
जिगर की समस्याएं
अध्ययनों से यह पता चला है कि पुनर्नवादि मंडूर का सेवन करने से हेपेटोसाइट्स या जिगर की कोशिकाओं के बनने से जिगर की खराबी ठीक हो जाती है। यह लीवर की कोशिकाओं में फैट के इकठ्ठे होने को भी कम करता है जो कि फैटी लिवर जैसे रोगों और फॉस्टर लिवर के कार्य को रोकता है।
आयरन की कमी को रोकता है
यह मुख्य रूप से आयरन की कमी को रोकने के लिए दी जाती है। पुनर्नवादि मंडूर को नियमित रूप से लेने से हीमोग्लोबिन के स्तर में सुधार होता है और एनीमिया, क्रोनिक कोलाइटिस, वर्म के इन्फेक्शन आदि रोगों की घटना को कम किया जा सकता है।
हृदय संबंधी विकार
इसकी कार्डियो प्रोटेक्टिव प्रॉपर्टी ड्यूरेसिस को बढ़ावा देती है और फ्लूड रिटेंशन को खत्म कर देती है जो बदले में दिल से जुड़ी बीमारियों को कम करता है। यह पंपिंग की दर को बढ़ाकर हार्ट फेल होने से रोकता है, जिससे आपका दिल स्वस्थ रहता है।
गुर्दे से संबंधित समस्याएं
यह अपने औषधीय गुणों के कारण किडनी के काम को बढ़ा देता है और किडनी को फूलने से रोकता है जो कि किडनी से संबंधित सबसे अधिक समस्याओं में से एक है।
महिलाओं के लिए लाभ
एक महिला मासिक धर्म के दौरान लगभग 10 मि.ली. से 35 मि.ली. खून खो देती है। पुनर्नवादि मंडूर का सेवन करने से शरीर में आयरन के बनने की क्षमता में सुधार करता है जिससे महिलाओं को शीघ्र स्वस्थ होने में मदद मिलती है।
पुनर्नवादि मंडूर के उपयोग
पुनर्नवादि मंडूर में बहुत से उपयोग और लाभ हैं जो कई समस्याओं का हल कर सकते हैं। कुछ सर्वोत्तम उपयोग नीचे सूचीबद्ध हैं:
हेमेटोजेनिक प्रकृति
पुनर्नवादि मंडूर विशेष रूप से आयरन टॉनिक के रूप में उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें आयरन ऑक्साइड होता है। इसके हेमेटोजेनिक गुण लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी) बनाते हैं जो मासिक धर्म चक्र के दौरान खोए हुए खून की मात्रा को कम करने में मदद करता है और एनीमिया, जलोदर, पुराने बुखार जैसी समस्याओं से बचाता है।
एंटी इंफ्लेमेटरी
इसका उपयोग इसके तीव्र रूप में त्वचा की सूजन को ठीक करने के लिए भी किया जाता है। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो त्वचा को ठंडा करने में मदद करती है। 1 से 2 महीने के लिए इसका उपयोग करना अच्छे परिणाम देता है|
आयुर्वेदिक दवा
इसमें शुंती, मरिचा, पुर्नवा, त्रिवृत, दंती, अमलकी आदि आयुर्वेदिक तत्व पाए जाते हैं जो पीलिया, बवासीर, पुराने बुखार, मलबासर्शन सिंड्रोम जैसे रोगों से लड़ने में बहुत प्रभावी तरीके से मदद करता है।
पुनर्नवादि मंडूर का उपयोग कैसे करें?
पुनर्नवादि मंडूर में उच्च गुणवत्ता वाले प्राकृतिक तत्व होते हैं जो विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य मुद्दों को पूरा करते हैं। पुनर्नवादि मंडूर का सेवन छाछ, गुड़ या दूध के साथ किया जा सकता है। हर रोज़ 500 मि.ग्रा. से ज्यादा का सेवन न करें। पुनर्नवादि मंडूर के सेवन से संबंधित कुछ प्रश्न नीचे दिए गए हैं:
क्या इसका सेवन भोजन से पहले या बाद में किया जा सकता है?
पुनर्नवादि मंडूर एक आयुर्वेदिक दवा है जिसका सेवन भोजन करने से पहले या बाद में किया जाना चाहिए। इसे डॉक्टर द्वारा तय किये अनुसार 500 मि.ग्रा. से 1 ग्रा. के अनुपात में लेना चाहिए।
क्या पुनर्नवादि मंडूर को खाली पेट लिया जा सकता है?
भोजन के बाद पानी, छाछ या गुड़ के साथ इसका सेवन करना सबसे फायदेमंद है।
क्या पुनर्नवादि मंडूर को पानी के साथ लिया जा सकता है?
हाँ। पुनर्नवादि मंडूर पानी के साथ लेने पर प्रभावी होता है। इसका सेवन छाछ या गुड़ के साथ भी लिया जा सकता है।
पुनर्नवादि की खुराक
इसका उपयोग शरीर में आयरन के स्तर को बढ़ाता है। पुनर्नवादि मंडूर को रोगी की समस्या की ऊंचाई, आयु, वजन और गंभीरता जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया गया है।
आयु मात्रा समय
वयस्क 500 मि.ग्रा. से 1 ग्रा. भोजन के बाद
बच्चे अधिकतम 250 मि.ग्रा. एक दिन में
भोजन के बाद
इसका सेवन भोजन से पहले किया जाता है लेकिन यह सबसे अच्छा काम तब करता है जब इसका सेवन भोजन के बाद किया जाता है।
इसे सबसे प्रभावी बनाने के लिए, इसे पानी, छाछ या गुड़ के साथ लेना चाहिए।
पुनर्नवादि मंडूर के साइड इफेक्ट्स
पुनर्नवादि मंडूर कई बीमारियों से निपटने के लिए उपयोगी है। इसके सेवन से कोई दुष्प्रभाव नहीं हैं। लेकिन कुछ मामलों में इसके तत्वों के कारण इसका कुछ लोगों पर निम्न तरीकों से प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है:
उच्च रक्तचाप: उच्च रक्तचाप से पीड़ित रोगियों में रक्तचाप में वृद्धि देखी जा सकती है जो तनाव, अपर्याप्त नींद, थकान जैसे कई कारकों का परिणाम है।
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल प्रभाव: यह पाचन तंत्र में रुकावट या अत्यधिक गैस का कारण हो सकता है जिससे गैसट्रोइंटेस्टिनल समस्याएं हो सकती हैं।
पुनर्नवादि मंडूर को लेने से कई अन्य दुष्प्रभाव जैसे रेस्पिरेटरी अरेस्ट, ऑप्टिक अट्रोफी, मतली, पेट में जलन, खुजली, खराश आदि होते हैं।
ऊपर पूरी सूची नहीं है। ये पुनर्नवादि मंडूर के कुछ सबसे ज्यादा ध्यान देने लायक दुष्प्रभाव हैं जो ज्यादातर लोगों में देखे जाते हैं। ऊपर बताये गये दुष्प्रभावों से ज्यादा और भी कई हो सकते हैं जो मेटाबोलिज्म पर डिपेंड होता है।
पुनर्नवादि मंडूर से बचाव और चेतावनी
क्या गाड़ी चलाने से पहले इसका सेवन किया जा सकता है?
ज्यादातर रोगियों को यह प्रभावित नहीं करता लेकिन यदि किसी को उनींदापन, सिरदर्द आदि हों तो डॉक्टर को बताएं|ऐसी स्थिति में ड्राइव करने से पहले पुनर्नवादि मंडूर ना लें|
क्या इसे शराब के साथ लिया जा सकता है?
नहीं, शराब शरीर में उनींदापन लाती है जो किसी पर भी निगेटिव प्रभाव डालती है। इसलिए इस दवा को शराब के साथ नहीं लिया जाना चाहिए।
क्या इसकी लत लग सकती है?
नहीं, इसकी तय की गयी मात्रा में लेने से नशा नहीं होता| यह आयुर्वेदिक तत्वों से भरपूर है|
क्या यह मदहोश कर सकता है?
पुनर्नवादि मंडूर लेने वाले दुष्प्रभावों में से एक उनींदापन है। यदि आपको किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो तुरंत अपने डॉक्टर को सूचित करें|
क्या पुनर्नवादि मंडूर को ज्यादा मात्रा में ले सकते हैं?
नहीं, अधिक मात्रा में इसे लेने से आपकी बीमारी ठीक नहीं होगी। बल्कि यह गंभीर दुष्प्रभाव को जन्म देता है| इसलिए आयुर्वेदिक डॉक्टर द्वारा तय की गयी मात्रा से ज्यादा इस दवा को नहीं लेना चाहिए।
पुनर्नवादि मंडूर के बारे में पूछे गए महत्वपूर्ण सवाल
यह किस चीज से बना है?
यह काली मिर्च, चित्रक मूल, वैदिंग, सोंठ, आंवला, दंती की जड़ें, कुटकी, मस्ताक, काला जीरा जैसी हर्बल सामग्री से बना है। इन सभी चीज़ों का मेल इसे एक रोग से लड़ने वाली दवा बनाता है।
भंडारण?
इसे कमरे के तापमान पर और सूखी जगह पर रखा जाना चाहिए। एक बार खोलने के बाद इसे बच्चों की पहुंच से दूर रखें|
जब तक हालत में सुधार ना दिखे क्या तब तक पुनर्नवादि मंडूर का उपयोग करने की जरूरत है?
आम तौर पर यह आयुर्वेदिक दवा पूरी तरह से 4 से 8 हफ्ते में परिणाम दिखाना शुरू कर देती है। इस दवा को नियमित रूप से लेना चाहिए और इसे तय की गयी मात्रा में ही लेना चाहिए।
पुनर्नवादि मंडूर को दिन में कितनी बार लेने की जरूरत है?
इसे दिन में दो बार लेना चाहिए। यह सबसे अच्छा काम तब करता है जब इसे गुनगुने पानी और भोजन के बाद लिया जाता है| इसे दिन में 2 से 3 ग्रा. से ज्यादा नहीं लेना चाहिए|
क्या इसका स्तनपान पर कोई असर पड़ता है?
हाँ, यदि आप स्तनपान करा रही हैं तो पुनर्नवादि को लेना उचित नहीं है। इसका दुष्प्रभाव आपको थका हुआ महसूस कराता है।
क्या यह बच्चों के लिए सुरक्षित है?
यह बच्चों के लिए सुरक्षित माना जाता है। लेकिन बच्चों को इसे तय की गयी मात्रा में ही दिया जाना चाहिए| यदि इसे तय की गयी मात्रा से ज्यादा दिया जाता है तो कई नकारात्मक प्रभाव को जन्म दे सकता है।
क्या गर्भधारण पर इसका कोई असर पड़ता है?
यह गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताओं पर नेगेटिव प्रभाव डाल सकता है क्योंकि यह रक्तचाप को बढ़ा सकता है| कुछ मामलों में यह सिरदर्द या मरोड़ पैदा कर सकता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं के लिए यह उचित नहीं है।
क्या इसमें शुगर होती है?
हाँ, इसमें चीनी होती है और इस प्रकार यह मधुमेह से पीड़ित रोगियों के लिए सही नहीं है।






दशमूलारिष्ट के फायदे और उपयोग



 

यह एक ऐसी औषधि है जो महिलाओं के लिए काफी लाभदायी है। महिलाओं को होने वाली कई समस्याओं में यह औषधि एक रामबाण इलाज करती है।

दशमूलारिष्ट  जिन औषधियों से मिलकर बना है वह मुख्य रूप से यह से वात संबंधी विकारों, उदर रोग और मूत्र रोगों में लाभ देती है। इसके साथ ही यह प्रसूता स्त्रियों के लिए अमृत के समान गुण देने वाली औषधि है। इस औषधि का सेवन महिलाओं को संतान प्राप्ति में सहायक होता है। यह औषधि गर्भाशय की शुद्धि करती है और निर्बलों को बल, तेज और वीर्य प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त यह औषधि अन्य बहुत रोगों में भी लाभदायी होती है। तो चलिए इस पोस्ट के जरिये हम आपको बताते हैं इस औषधि के बारे में।
दशमूलारिष्ट  में पाए जाने वाले तत्व
दशमूल 200 तोला या लगभग 2400 ग्राम
चित्रक छाल 100 तोला या लगभग 1200 ग्राम
लोध 80 तोला या लगभग 960 ग्राम
गिलोय 80 तोला या लगभग 960 ग्राम
आंवला 64 तोला या लगभग 768 ग्राम
धमासा 48 तोला या लगभग 576 ग्राम
खेर की छाल 32 तोला या लगभग 384 ग्राम
विजयसार की छाल 32 तोला या लगभग 384 ग्राम
हरड़ की छाल 32 तोला या लगभग 384 ग्राम
कूठ 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
मजीठ 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
देवदारु 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
बायबिडंग 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
मुलेठी 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
भारंगी 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
कबीठ 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
बहेड़ा 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
सांठी की जड़ 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
चव्य 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
जटामांसी 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
गेऊँला 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
अनंतमूल 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
स्याह जीरा 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
निसोत 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
रेणुक बीज 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
रास्र 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
पीपल 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
सुपारी 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
कचूर 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
हल्दी 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
सूवा 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
पद्म 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
काष्ठ 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
नागकेसर 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
नागर मोथा 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
इन्द्र जौ 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
काकड़ासिंगी 8 तोला या लगभग 96 ग्राम
बिदारी कंद 16 तोला या लगभग 192 ग्राम
असगंध 16 तोला या लगभग 192 ग्राम
मुलेठी 16 तोला या लगभग 192 ग्राम
वाराही कंद 16 तोला या लगभग 192 ग्राम
दशमूलारिष्ट के बनाने की विधि
1. ऊपर दिए गए सभी घटकों को अच्छी तरह से पीस कर इनका मिश्रण बना लें। इसके पश्चात इस मिश्रण को आठ गुना पानी (मिश्रण की मात्रा से आठ गुना पानी) में मिलाकर इसको गर्म करने के लिए रखें। इस मिश्रण को तब तक उबालें जब तक यह अपने कुल मिश्रण का एक चौथाई शेष ना रह जाए।
2. 3 किलो मुनक्का को लगभग 12 लीटर पानी में डालकर उबाल लें और इसको तब तक उबालें जब तक ये अपने कुल मिश्रण का एक चौथाई ना हो जाए।
3. इसके पश्चात इन दोनों काढ़ों को अच्छी तरह मिला कर इनकों छान लें।
4. शहद लगभग 1560 ग्राम, गुड़ लगभग 19 किलो 200 ग्राम, धाय के फूल लगभग 1440 ग्राम और शीतल मिर्च, नेत्रबाला, सफ़ेद चन्दन, जायफल, लौंग, दालचीनी, इलायची, तेजपत्ता, पीपल, नागकेशर प्रत्येक को लगभग 96 ग्राम लें। फिर इन सभी को काढे को छानने के बाद बची हुई सामग्री के साथ मिलाकर इनका चूर्ण बना लें।
5. इस चूर्ण में लगभग 3 ग्राम कस्तूरी मिलाकर 1 महीने के लिए रख दें।
6. इसके पश्चात इसे छान लें और थोड़े से निर्मली के बीज मिलाकर दशमूलारिष्ट (dashmularishta) को स्वच्छ बना लें।
दशमूलारिष्ट के फायदे
दशमूलारिष्ट महिलाओ के लिए बहुत गुणकारी माना जाता हैं। दशमूलारिष्ट हमारे शरीर के बहुत से विकारो को दूर करता हैं। और हमारे शरीर में नई सी जान देता हैं। दशमूलारिष्ट (dashmularishta) औषधि के महत्वपूर्ण लाभ एवं प्रयोग निम्नलिखित है:
प्रसूता स्त्रियों के लिए दशमूलारिष्ट के लाभ
दशमूलारिष्ट में प्रयोग किए गए तत्व शरीर की प्रतिरोधक क्षमताओं को बढ़ाती है। जब कोई स्त्री शिशु को जन्म देने के बाद दशमूलारिष्ट का सेवन करती है तो वह कई रोगों का शिकार होने से बच जाती है। क्योकि इसमें उपयोग किए गए तत्व शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता हैं। इसका सेवन आम का पाचन करता है जिस से ज्वर, जीर्णज्वर, आम और वात सम्बंधित बीमारियां नहीं होती है। यह प्रसूता के कास और श्वास में भी काफी लाभदायक है। इसमें उपयुक्त तत्व शरीर में प्रसव के बाद आने वाली निर्बलता को दूर करती है।
गर्भपात और गर्भस्राव होने में में दशमूलारिष्ट का उपयोग
स्त्रियों में गर्भाशय की शिथिलता गर्भपात अथवा गर्भस्त्राव का कारण बनता है। गर्भाशय की शिथिलता को दूर करने के लिए दशमूलारिष्ट एक उतकृष्ट औषधि है। इस औषधि में जिन तत्वों का उपयोग होता है वह स्त्री के गर्भाशय को ताकत देते हैं। यह बार बार होने वाले गर्भस्त्राव का इलाज करता है साथ ही एक स्वस्थ संतान की प्राप्ति भी होती है। यदि किसी भी स्त्री को ऐसी कोई भी समस्या है तो इस औषधि का प्रयोग कम से कम 3 महीने तक करना चाहिए। साथ ही संतान प्राप्ति के प्रयास भी करते रहने चाहिए।
पूयशुक्र बीमारी में दशमूलारिष्ट का उपयोग
दशमूलारिष्ट एक ऐसी औषधि है जिसमें शुक्र शोधक पाया जाता है। इस औषधि का उपयोग रौप्य भस्म और त्रिफला चूर्ण के साथ सेवन करने से शुक्रशुद्धि होती है। साथ ही वीर्यन(स्पर्म) में आ रही पस सेल्स को भी कम करता है।
दर्द निवारक और शोथहर में दशमूलारिष्ट का उपयोग
दशमूलारिष्ट के सेवन से वात का शमन होता है। इसमें कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो दर्द निवारक होते हैं। इसी कारण इस औषधि का उपयोग दर्द से निवारण करने में होता है। यह स्त्रियों में होने वाली पीठ दर्द, गर्भाशय के दर्द, तीव्र शिर: शूल और पेट के दर्द का उपचार करने में सहायक होती है।
श्वास रोग में दशमूलारिष्ट के उपयोग
श्वास संबंधी रोगो में दशमूलारिष्टएक चमत्कारी औषधि है। यदि रोगी को जोर से खांसी आती हो, कफ निकलता हो, बैचेनी होती हो, सांस लेने में हाफन आना, नाड़ी की गति का तेज होना यदि इनमें से कोई भी परेशानी है तो आपके लिए ये औषधि अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगी।
बढ़ती उम्र को रोकन में दशमूलारिष्ट के उपयोग
दशमूलारिष्ट एक ऐसी आर्युवेदिक औषधि है जो कई बीमारियों का प्राभावी इलाज करने में सक्षम होती है। इसके कई फायदे हैं जिनमें से एक ऐसा फायदा है जिसे जानकर आप इसका सेवन करने में जरा भी देरी नहीं करेंगे। इसमें कई ऐसे औषधीय गुण होते हैं जो आपको युवा बनाए रखने में मदद करते हैं और बढ़ती उम्र के प्रभावों को कम कर देते हैं।
शारीरिक-मानसिक रूप से मजबूत बनाने में दशमूलारिष्ट के उपयोग
दशमूलारिष्ट में उपयोग की गई औषधियां शरीर को मजबूती प्रदान करने में भी काफी लाभदायी होती है। यह शारिरिक और मानसिक दोनों तरह की कमजोरी को दूर करने के लिए एक अच्छा उपाय है।
पाचन क्रिया को सुधारने में दशमूलारिष्ट के उपयोग
दशमूलारिष्ट का सेवन करने से शरीर की पाचन क्रिया पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। यदि आपका पाचन तंत्र सही नहीं है तो ऐसे में यह शरीर को कई बीमारियों के लिए न्यौता देता है और बीमारियों का घर बन जाता है। ऐसे में दशमूलारिष्ट का उपयोग करने से पाचन तंत्र सही रहता है जिससे आप कई अनावश्यक बीमारी का शिकार होने से बच सकते हैं।
स्टेमिना बढ़ाने में दशमूलारिष्ट के उपयोग
दशमूलारिष्ट का सेवन नियमित रूप से करने से यह स्टेमिना को भी बढ़ाता है। जिससे आप में शारीरिक ताकत और सहनशक्ति में प्रभावी रूप से वृद्धि होती है।
त्वचा के लिए दशमूलारिष्ट के उपयोग
शारीरिक और मानसिक रूप से ही नहीं बल्कि इसका सेवन हमारी त्वचा के लिए भी काफी लाभकारी होता है। इसके सेवन से त्वचा में चमक आती है।
दशमूलारिष्ट का सेवन और मात्रा विधि
औषधीय मात्रा
बच्चे 5 से 10 मिलीमीटर
वय्स्क 10 से 25 मिलीमीटर
सेवन
दवा लेने का उचित समय सुबह और रात में भोजन के बाद
दिन में कितनी बार लें? 2 बार
किसके साथ लें? बराबर मात्रा में गुनगुना पानी मिला कर
कितने समय के लिए लें? चिकित्सक की सलाह से
दशमूलारिष्ट से होने वाले दुष्प्रभाव
पूरी तरह से आर्युवेदिक है दशमूलारिष्ट, ऐसे में इसके साइड इफेक्ट नहीं होते हैं लेकिन इसकी मात्रा और सेवन चिकित्सक की सलाह से ही करें।
(नोट: दशमूलारिष्ट वात और कफ प्रधान रोगों और लक्षणों में प्रभावशाली है। यदि प्रसूता स्त्रियों में पित्तप्रधान लक्षण जैसे कि मुँह में छाले, दाह, गरम जल, सामान पतले दस्त, अधिक प्यास आदि लक्षण हों तो दशमूलारिष्ट का प्रयोग नहीं करना चाहिए।)
दशमूलारिष्ट प्राचीन आयुर्वेदिक औषधियों में से एक है, जो एक ऐसी औषधि है जों महिलाओं के लिए एक गुणकारी और चमत्कारी है। महिला के शरीर को समय-समय पर कई तरह के बदलाव झेलने पड़ते हैं। जिस वजह से उसका शरीर काफी कमजोर हो जाता है। ऐसे में यह औषधि महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखती है।






द्राक्षासव सिरप के फायदे और उपयोग




द्राक्षासव सिरप शुद्ध हर्बल तत्वों से बनी एक चिकित्सीय आयुर्वेदिक दवा हैं। इस दवा को ज्यादा प्रभावी और असरदार बनाने का कार्य इसमें उपस्थित प्राकृतिक एल्कोहोल करता हैं। द्राक्षासव सिरप उत्पाद का निर्माण बहुत सारी कंपनिया करती है, जिसमें डाबर, पतंजलि, बैद्यनाथ और झंडू सबसे ऊपर है।
द्राक्षासव सिरप का उपयोग विशेष रूप से पेट की बीमारियों से निपटने हेतु किया जाता हैं। यह दवा भोजन के पाचन हेतु आवश्यक एंजाइमों का स्राव नियंत्रित कर पाचन क्रियाओं का सुचारू रूप से संचालन करती हैं और पाचन तंत्र को मजबूती प्रदान करती हैं।
इसके साथ ही यह दवा रक्त की समस्याओं, दिल की परेशानियों और मानसिक विकारों के खिलाफ भी अच्छे से कार्य करती हैं। बिगड़े हालातों की वजह से आई शारीरिक कमजोरी और थकावट का अंत भी इस दवा द्वारा आसानी से किया जा सकता हैं। मधुमेह और एलर्जी के मामलों में इस दवा के सेवन से पूरी तरह परहेज किया जाना चाहिए।
द्राक्षासव सिरप की संरचना –
द्राक्षासव सिरप को प्रभावी बनाने के लिए कुछ अनुकूल सक्रिय घटकों की आवश्यकता होती हैं। इस दवा को बनाने में लगे हर्बल तत्वों की सूची निम्नलिखित हैं।द्राक्षा + नागकेशर + पिप्पली + धातकी पुष्प + मरिच (कालीमिर्च) + इलायची + तेजपता + विडंग + प्रियंगु
+ दालचीनी + गुड़
द्राक्षासव सिरप के घटक मिलकर एक रेचक का कार्य करते हैं। ये पेट में जमा हुए मल को चिकना बनाकर मलमार्ग से निष्कासित करने का कार्य करते हैं और पेट की अच्छे से सफाई कर पेट की समस्याओं (गैस, अपच, भूख में कमी, पेट दर्द आदि) का निपटारा करते हैं।
यह दवा पाचन तंत्र को सुधारकर रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर कार्य करती हैं, जिससे शरीर को रोगों के प्रति लड़ने हेतु ताकत मिल सकें।
इस दवा के घटक मानसिक विकारों के प्रति अच्छे से कार्य करते हैं और चिंता, अवसाद, तनाव, निष्क्रियता, नींद न आना जैसे लक्षणों का इलाज करते हैं।
कुछ स्थितियों में चोंट लगने पर खून का रुकाव नहीं होता हैं और खून लगातार बहता रहता हैं। यह दवा प्रभावित क्षेत्र में रक्त का थक्का जल्दी बनाकर रक्त की अनावश्यक हानि को बचाती हैं।
द्राक्षासव सिरप के नियमित सही सेवन के निम्न उपयोग व फायदे है।
बवासीर में फायदेमंद
आंतों में फैले संक्रमण का इलाज
भूख में बढ़ोतरी
पाचन में सुधार
रक्त का थक्का जल्दी बनाने में सहायक
मासिक धर्म में अत्यधिक रक्तस्राव की रोकथाम
कब्ज, अपच, गैस से छुटकारा
लीवर को सुरक्षा प्रदान करना
हृदय की दक्षता में सुधार
उच्च रक्तचाप की मुश्किलों को दूर करना
खून में क्षति की भरपाई
तनाव, अवसाद और चिंता से मुक्ति
एपिस्टैक्सिस (नाक से खून बहने) का इलाज
अरुचि और आलस दूर करना
शारीरिक ऊर्जा का संरक्षण
पुरानी कमजोरी और थकावट मिटाना
मलशुद्धि पर ध्यान देना
अच्छी नींद आना
द्राक्षासव सिरप को स्वास्थ्य सुधारक के रूप में देखते हुए इसको निर्मित किया जाता हैं और इसकी कुशलता तथा शुद्धता का पूरा ध्यान रखा जाता हैं। इसलिए इस दवा के कोई दुष्प्रभाव या नुकसान देखने को नहीं मिलते हैं।
कुछ मामलों में इस दवा की ज्यादा खुराक से थोड़ी-सी शारीरिक पीड़ा महसूस की जा सकती हैं। अगर इस दवा की खुराक से छेड़खानी करते हुए इसका अनियंत्रित सेवन किया जायें, तो पेट में जलन तथा सूजन पैदा हो सकती हैं और कभी-कभी पेट खराब होने की संभावना भी रहती हैं।
मरीज में द्राक्षासव सिरप की खुराक का अध्ययन एक अच्छे आयुर्वेदिक चिकित्सक द्वारा किया जाना चाहिए। इसका का कॉर्स लंबा हो सकता हैं, इसलिए इससे जुड़ी सारी जानकारी डॉक्टर से लेते रहें।
इस दवा की खुराक को लक्षणों के आधार पर कम या ज्यादा किया जा सकता हैं।
10 साल से अधिक आयु के बच्चों में इसकी खुराक दिन में 10-15ml सुरक्षित तय की गई हैं। इस विषय में बाल रोग विशेषज्ञ को प्राथमिकता देवें।
द्राक्षासव सिरप को भोजन के बाद सुबह-शाम दो टाइम गुनगुने पानी के साथ लेने की सलाह दी जाती हैं।
दो खुराकों के बीच तय एक सख्त समय अंतराल का पालन करें, जिससे दवा की मौजूदगी शरीर में बनी रहें।
इसकी छुटी हुई खुराक याद आने पर जल्द से जल्द लेने का प्रयास करें।
ओवरडोज़ महसूस होने पर खुराक बंदकर तुरुंत नजदीकी चिकित्सा सुविधा तलाश करें।
निम्न सावधानियों के बारे में द्राक्षासव सिरप के सेवन से पहले जानना जरूरी है।
इसे लेने से पहले एक बार अच्छे डॉक्टर को जरूर सूचित कर देवें।
दवा को रोजाना एक निश्चित समय और एक नियत समय अंतराल में लेवें।
इस दवा की ज्यादा खुराक लेने से बचें।











अर्जुनारिष्ट के फायदे और उपयोग




अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) किसी भी प्रकार के दिल के रोग से पीड़ित लोगों के लिए फायदेमंद एक लिक्विड दवा है। इस आयुर्वेदिक दवा का उपयोग सीने में दर्द, रक्तचाप, हार्ट फेल, मायोकार्डीयल इन्फ्राकशन, दिल में ब्लोकेज, इस्केमिक कार्डियोमायोपैथी आदि से पीड़ित लोगों के लिए किया जा सकता है।

अर्जुनारिष्ट को पार्थियारदिष्ट के रूप में भी जाना जाता है और इसे नेचुरल फेर्मेंटेशन का उपयोग करके तैयार किया जाता है। इस दवा में मुख्य तत्व के रूप में अर्जुन के पेड़ की की छाल या टर्मिनलिया अर्जुन होते हैं जो एक शक्तिशाली कार्डियोप्रोटेक्टिव है।
“अर्जुनारिष्ट में फ्लेवोनोइड्स, टैनिन और खनिज होते हैं जो एंटी-ऑक्सीडेशन, एंटी-इंफ्लेमेटरी और लिपिड को कम करने वाले गुण देते हैं। पेड़ की छाल से इनोट्रोपिक और हाइपोटेंशन प्रभाव होता है जो कोरोनरी धमनी के प्रवाह को बढ़ाता है – “डॉ. श्रीधर द्वेदी, प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी ग्रुप, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ मेडिकल साइंसेज, दिल्ली विश्वविद्यालय|
अर्जुनारिष्ट के फायदे
हर्बल कार्डियक टॉनिक होने के इलावा यह छाती की चोटों, कमजोरी, थकान, पुरानी सांस, खांसी और गले की बीमारियों का इलाज करने में मदद करता है। यह ताकत में भी सुधार करता है और आंतों को साफ करने में मदद करता है।
अर्जुनारिष्ट के स्वास्थ्य लाभ
कार्डिएक अरिथमिया
यह विभिन्न मेल में लिए जाने पर दिल की असामान्य धड़कन, तेज और धीमी गति से दिल की धड़कन को कम करता है।
उच्च और निम्न रक्तचाप की जाँच करता है
अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) कार्डियो-वैस्कुलर में सुधार करता है और रक्तचाप को सामान्य स्तर पर स्थिर करता है। अर्जुनारिष्ट में सक्रिय फाइटोकेमिकल्स और शारीरिक गुण होते हैं जो दिल के रोगों का इलाज करने में मदद करते हैं।
हार्ट अटैक को रोकता है
अर्जुनारिष्ट का उपयोग म्योकार्डिअल इन्फ्राक्शन और कंजेस्टिव हार्ट फेल के मामलों में किया जाता है। यह खून की नालियों की रुकावट को रोकता है और दिमाग को खून की उचित मात्रा देता है। यह शरीर के एक तरफ की कमजोरी या पक्षाघात, सिरदर्द, आवाज़ का धीमा होना, भ्रम, अशांति, चेतना में बदलाव और सिर में चक्कर आने का कारण बन सकता है। अर्जुनारिष्ट दिल की रुकावट को रोकने में मदद करता है।
छाती में दर्द
दौड़ते समय, सीढ़ियों पर चढ़ते समय या साइकिल चलाने पर होने वाले सीने के दर्द को अर्जुनरिष्ट के उचित सेवन से कम किया जा सकता है।
इस्केमिक कार्डियोमायोपैथी
यह कोरोनरी हृदय रोग के कारण होता है जब दिल अन्य अंगों में पर्याप्त मात्रा में खून पंप करने की स्थिति में नहीं रहता। उचित जीवनशैली में बदलाव करके और इस दवा का सेवन इसे ठीक करने में मदद मिलती है।
माइट्रल रिग्रिटेशन का इलाज करता है
जब भी बायाँ वेंट्रिकल सिकुड़ता है तो माइट्रल वाल्व से खून का रिसाव होता है। अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) इस स्थिति का इलाज करने में मदद करता है। डॉ. श्रीधर द्विवेदी, प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी ग्रुप, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ मेडिकल साइंसेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, अर्जुनारिष्ट माइट्रल रिग्रिटेशन और एंजाइनल फ्रीक्वेंसी को कम करता है। इसके अलावा डायस्टोलिक डिसफंक्शन में सुधार करता है।
सांस के रोगों में मदद करता है
इसका उपयोग अस्थमा, पुरानी ब्रोंकाइटिस और सीओपीडी जैसे पुराने श्वसन रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। यह फेफड़ों के टिश्यूओं को मजबूत करता है और फेफड़ों की क्षमता में सुधार करता है। यह एक एंटी-एलर्जी प्रतिक्रिया भी पैदा करता है और अस्थमा को रोकता है। यह धूम्रपान, फ्री-रेडिकल्स, धूल और अन्य विषाक्त पदार्थों से होने वाले नुकसान से फेफड़ों की रक्षा करके सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) की प्रगति को कम करता है।
अर्जुनारिष्ट के उपयोग
अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) में निम्न गुण इसके लाभों में बहुत योगदान देते हैं:
कार्डियोटोनिक के रूप में उपयोग किया जाता है
अर्जुनारिष्ट दिल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है और हृदय की मांसपेशियों को मजबूत करता है। यह जड़ी बूटी शरीर में स्वस्थ रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के लेवल के रखरखाव में भी उपयोगी है।
एंटी-अस्थमेटिक
अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) वायुमार्ग से बलगम को हटाने के लिए उपयोगी है और अस्थमा के इलाज़ के लिए एक प्रभावी उपाय के रूप में काम करता है।
प्रजनन क्षमता को बढ़ाता है
अर्जुनारिष्ट स्पर्म के बनने को बढ़ाता है और स्पर्म की क्वालिटी में सुधार की दिशा में सक्रिय रूप से काम करता है।
अर्जुनारिष्ट का उपयोग कैसे करें?
क्या इसे भोजन से पहले या बाद में लिया जा सकता है?
भोजन के बाद अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) गुनगुने पानी के साथ दिन में दो बार लेना उचित है।
क्या इसे खाली पेट लिया जा सकता है?
हृदय के टॉनिक के रूप में इसके लाभों का अनुभव करने के लिए इसे भोजन के बाद लेना चाहिए। अर्जुनारिष्ट हृदय की असामान्य धड़कन को कम करता है, कार्डियो-वैस्कुलर में सुधार करता है और रक्तचाप को सामान्य स्तर पर स्थिर करता है।
क्या इसे पानी के साथ लेना चाहिए?
अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) एक सिरप है इसलिए इसे हमेशा दिन में दो बार गुनगुने पानी के साथ लेना चाहिए।
क्या इसे दूध के साथ लेना चाहिए?
रक्तचाप को ठीक करने के लिए अर्जुनारिष्ट को दिन में दो बार दूध के साथ लेने की सलाह दी जाती है।
अर्जुनारिष्ट का सेवन करते समय क्या परहेज करना चाहिए?
अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) को किसी विशेषज्ञ की देखरेख में लेना चाहिए। मधुमेह के रोगियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान के दौरान भी इसे लेने से बचना चाहिए।
अर्जुनारिष्ट: खुराक
यह तरल रूप में मिलता है। अर्जुनारिष्ट सिरप 2 से 4 चम्मच (20 मि.ली.) दिन में दो बार बराबर मात्रा में पानी के साथ या डॉक्टर के बताये अनुसार लेना चाहिए।
अर्जुनारिष्ट के प्रभाव
इसे किसी प्रोफेशनल की सलाह से ही लिया जाना चाहिए|
मधुमेह के रोगियों को इससे बचना चाहिए|
5 वर्ष से ज्यादा उम्र के बच्चों के लिए यह सुरक्षित है|
गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान इसे लेने से बचें|अर्जुनारिष्ट से बचाव और चेतावनी
क्या गाड़ी चलाने से पहले इसका सेवन किया जा सकता है?
यदि अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) लेते हुए आपको उनींदापन, चक्कर आना, निम्न रक्तचाप या सिरदर्द का अनुभव होता है तो गाड़ी चलाने से बचना चाहिए।
क्या इसका सेवन शराब के साथ किया जा सकता है?
अर्जुनारिष्ट में 6 से 12% अल्कोहल होती है, इसलिए इसे शराब के साथ नहीं लेना चाहिए। इस सिरप को पानी या दूध के साथ लेने की सलाह दी जाती है।
क्या यह नशे की लत हो सकती है?
नहीं, अर्जुनारिष्ट नशे की लत नहीं है।
क्या यह मदहोश कर सकता है?
अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) लेने से होने वाले दुष्प्रभावों के रूप में नींद आना, चक्कर आना, निम्न रक्तचाप या सिरदर्द का अनुभव हो सकता है। लेकिन इस आयुर्वेदिक दवा का प्रभाव हर व्यक्ति पर अलग-अलग होता है।
क्या अर्जुनारिष्ट ज्यादा मात्रा में ले सकते हैं?
हाँ, लेकिन इसका ज्यादा मात्रा में सेवन न करें। इसे लगभग 2 से 4 चम्मच लें। इस सिरप की एक समान मात्रा में दिन में दो बार या चिकित्सक के बताये अनुसार लेनी चाहिए।
यह किस चीज़ से बना है?
अर्जुनारिष्ट बनाने के लिए प्रयोग होने वाली सामग्री निम्न है-
अर्जुन तवाक – टर्मिनलिया अर्जुन – स्टेम बार्क – 4.8 कि.ग्रा.
मृदविका – सूखे अंगूर – फल – 2.4 कि.ग्रा.
मधुका – मधुका इंडिका – फूल – 960 ग्रा.
धाताकी – वुडफोडिया फ्रुटिकोसा – फूल – 960 ग्रा.
गुड़ – गुड़ – 4.8 कि.ग्रा.
भंडारण
इसे प्रकाश और नमी से बचाकर कसकर बंद किये हुए कंटेनर या बोतल में ठंडी जगह पर रखना चाहिए।
अपनी हालत में सुधार देखने तक मुझे कितने समय तक अर्जुनारिष्ट का उपयोग करने की जरूरत है?
हर्बल हार्ट टॉनिक के रूप में इसके प्रभाव का अनुभव करने के लिए अर्जुनारिष्ट को लगभग 4 से 6 सप्ताह तक लिया जाता है।
अर्जुनारिष्ट को दिन में कितनी बार लेने की जरूरत है?
अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) सिरप को 2 से 4 चम्मच दिन में दो बार पानी के साथ ले सकते हैं। लेकिन इस दवा को लेने से पहले किसी योग्य डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
क्या इससे स्तनपान कराने पर कोई प्रभाव पड़ता है?
यदि आप स्तनपान कराने वाली माँ हैं तो आपको अर्जुनारिष्ट लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
क्या यह बच्चों के लिए सुरक्षित है?
केवल 5 वर्ष से ज्यादा आयु के बच्चों को ही चिकित्सकीय देखरेख में अर्जुनारिष्ट दी जानी चाहिए।
क्या गर्भावस्था पर इसका कोई प्रभाव पड़ता है?
गर्भावस्था के दौरान अर्जुनारिष्ट लेने से बचना उचित है।
क्या इसमें चीनी होती है?
हां, अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) में चीनी होती है और इसे मधुमेह के रोगियों को नहीं देना चाहिए। सिरप में चीनी आमतौर पर अर्जुनारिष्ट तरल के 20 मि.ली. प्रति 2 ग्रा. से कम है।
क्या अर्जुनारिष्ट और सरस्वतारिष्ट को भोजन के बाद ले सकते हैं?
हाँ, अर्जुनारिष्ट और सरस्वतारिष्ट दोनों को भोजन के बाद लगभग एक साथ लिया जा सकता है। इसके 10 से 15 मि.ली. की मात्रा आधा गिलास पानी में मिलकर पतला करें|
आयुर्वेदिक उपचार से दिल की बीमारियों को कैसे ठीक किया जाता है?
आयुर्वेदिक इलाज़ किसी भी तरह की बीमारी के लिए सबसे अच्छा और प्रभावी उपचार है। जबकि कई आयुर्वेदिक उपचार हैं जो बीमारी को ठीक कर सकते हैं और आपको अपनी ताकत वापस पाने में मदद करते हैं| आयुर्वेद को हृदय संबंधी कई बीमारियों को ठीक करने के लिए जाना जाता है। आयुर्वेद दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला कार्डियक टॉनिक, अर्जुनारिष्ट सबसे प्रभावी और कुशल आयुर्वेदिक दवाओं में से एक है जो हृदय रोगों को रोकने में मदद करता है। अक्सर ब्राह्मी, अश्वगंधा, गुग्गुल और अन्य प्रभावी उपचारों के साथ मिलाकर अर्जुनारिष्ट का उपयोग एक आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की सलाह से लिया जाना चाहिए।
रक्तचाप को सामान्य रखने के लिए सबसे अच्छा घरेलू उपाय क्या है?
दिल के रोगों के लिए अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) जैसे आयुर्वेदिक उपचारों को चुनने के साथ-साथ रोजाना लगभग 30 से 60 मिनट तक नियमित रूप से व्यायाम करके, ताजे फल और सब्जियां खाकर अपने रक्तचाप को सामान्य रख सकते हैं। इसके अलावा नमक (सोडियम) का सेवन कम रखना और स्पष्ट रूप से तनाव के लेवल को कम रख सकता है।
एचडीएल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कैसे बढ़ा सकता है?
अर्जुनारिष्ट(Arjunarishta) हृदय को मजबूत बनाने और खून में कोलेस्ट्रॉल के ऊंचे स्तर को कम करने के लिए एक प्रभावी उपाय है| अपने सामान्य खाना पकाने के तेल को जैतून का तेल के साथ बदलकर, कम कार्ब वाले आहार का पालन करके, नियमित रूप से व्यायाम करके और नारियल के तेल का नियमित रूप से उपयोग करके बढ़ा सकते हैं।
कोरोनरी थ्री वेसल ब्लॉकेज के लिए सबसे अच्छा सलूशन क्या हैं?
इस तरह की ब्लॉकेज को ठीक करने के लिए अर्जुनारिष्ट सबसे अच्छा समाधान है। एक कार्डियक वैसोडिलेटर अर्जुनारिष्ट किसी भी जमा के बहाव को कम करके खून की नलियों को चौड़ा करने में मदद करता है। दिल की रक्षा करने और खून के दौरे को आसान बनाने के लिए प्रभावी अर्जुनारिष्ट को अक्सर आयुर्वेदिक विशेषज्ञों द्वारा लेने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा आप अपनी जीवनशैली में बदलाव भी ला सकते हैं जैसे स्वस्थ भोजन करना, नियमित रूप से व्यायाम करना और हृदय को स्वस्थ को बनाए रखने के लिए हृदय रोग विशेषज्ञ से सलाह आदि भी ले सकते हैं