26.4.21

वजन कम करने के लिए इंडियन डायट चार्ट



वजन घटाने की बात आते ही लोग विदेशी डायट और नुस्खों की तरफ ध्यान देने लगते हैं, लेकिन ताजा रिपोर्ट आपको चौंका सकती है। भारतीय डायट वजन कम करने में ज्यादा प्रभावी मानी जा रही है और अब लोगों की मानसिकता बदलने लगी है। शिल्पा शेट्टी से लेकर बाबा रामदेव हों या रु​जुता दिवेकर हर कोई भारतीय डायट का महत्व लोगों तक पहुंचा रहा है। यही कारण है कि भारतीय लोग ही नहीं विदेशी भी वेट लॉस के लिए इंडियन वेट लॉस डायट चार्ट को फॉलो करने लगे हैं।

इंडियन डायट पोषक तत्वों से भरपूर होती है
इंडियन डायट चार्ट पोषक तत्वों से भरपूर होती है। इसमें अनाज, फल, सब्जियां, डेयरी प्रोडक्ट आदि सबकुछ शामिल होता है। भारतीय खाने में जिन मसालों का इस्तेमाल किया जाता है वह सेहतमंद तो होते ही हैं साथ ही उनके शरीर में गुणकारी फायदे भी हैं। उदाहरण के तौर पर हल्दी का ही लें तो हल्दी कई बीमारियों को दूर करने में मददगार होती है। भारतीय डायट में 70 प्रतिशत सब्जियों का इस्तेमाल किया जाता है।
भारतीय खाने की एक और खासियत यह भी कि इनमें कम फैट वाला खाना भी होता है। जैसे सलाद, दाल सब्जियांं। पाश्चात्य खाने की तरह भारतीय खाने में चीज या क्रीम की मात्रा बहुत ज्यादा नहीं होती है। भारतीय खाने के बारे में कहा जाता है कि इसमें बहुत सारे विकल्प वह भी विभिन्न स्वाद से भरपूर होते हैं। इसलिए इसे खाने में बोरियत नहीं होती। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक आप नाना प्रकार के पकवान खा सकते हैं।
इंडियन वेट लॉस डायट टिप्स 
डायट में सभी प्रकार के फल, सब्जियां और अनाज आदि को ​शामिल करें।
उठने के आधे घंटे के अंदर नाश्ता कर लें।
लंच में दाल, सब्जी, रोटी व दही का मेल हो तो अच्छा है।
रात के खाने को हल्का ही रखें।
सोने के कम से कम दो घंटे पहले रात का खाना खा लें।
वेट लॉस के लिए भूखा न रहें।
वेट लॉस डायट चार्ट हर किसी के लिए अलग होती है चाहे बच्चा हो, महिला हो या पुरुष हो। यह भारतीय वेट लॉस डायट चार्ट भूगोल पर भी निर्भर करता है। उत्तर प्रांत से लेकर दक्षिण तक हर जगह का खानपान मौसम के अनुरूप बदल जाता है। यह डायट प्लान मांसाहारी व शाकाहारी के हिसाब से बदल सकता है। अपने भोजन में कुछ अन्य चीजों को शामिल करके आप अपने वेट लॉस डायट चार्ट में शामिल कर के वजन कम कर सकते हैं।
वेट लॉस डायट चार्ट (weight Loss Diet Chart) में इन चीजों के करें शामिल
सब्जियां (Green Vegetable) : हरी पत्तेदार सब्जियां, टमाटर, बैंगन, सरसों का साग, प्याज, फूलगोभी, पत्तागोभी, मशरूम, करेला आदि सब्जियां खाने से वेट लॉस होता है।
जड़ें : कुछ सब्जियों की जड़े खाने से भी वेट लॉस होता है। इसलिए अपने वेट लॉस डायट चार्ट में इन्हें जरूर शामिल करें। आलू, गाजर, स्वीट पोटैटो या शकरकंद, शलजम, चुकंदर, सूरन या जिमीकंद
नट्स और बीज (Nuts & Seeds) : काजू, बादाम, मूंगफली, पिस्ता, कद्दू का बीज, सीसम बीज, तरबूजे का बीज को अपने वेट लॉस डायट चार्ट का हिस्सा बनाएं।
दाल (lentils) : मूंग दाल, काला चना, सेम के बीज, लोबिया, मसूर दाल, राजमा और अन्य दालें आपके वेट लॉस डायट चार्ट में चार चांद लगा सकती हैं।
फल (Fruit) : वेट लॉस डायट चार्ट के लिए मौसमी फल बहुत जरूरी है। इसलिए आप मौसमी फलों का अधिक से अधिक सेवन करें। आप वेट लॉस डायट चार्ट में पपीता, आम, अनार, अमरूद, संतरा, इमली, लीची, सेब, सीताफल, केला, आड़ू, तरबूज, खरबूज आदि फलों को जोड़ लें।
अनाज(Grain): ब्राउन राइस, बासमती चावल, किनोवा, बाजरा, मक्का, बकव्हीट, जौ आदि खाएं।
डेयरी (Dairy) : चीज, योगर्ट, दूध, घी आदि की एक नियमित मात्रा लेने से आप वेट लॉस कर सकते हैं।
मसाले और हर्ब्स (Herbs): लहसुन, अदरक, दालचीनी, जीरा, धनिया, गरम मसाला, हल्दी, काली मिर्च, मेथी, तुलसी और सब्जा बीज आदि का सेवन करने से आपके वेट लॉस डायट चार्ट का बैलेंस बना रहेगा।
फैट्स (Fats) : फैट्स का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में ‘मोटापा बढ़ जाएगा’ ऐसी बातें आती रहती है। लेकिन, मोटापा तब होता है, जब आप बैड फैट्स लेते हैं। इसलिए आप अपने वेट लॉस डायट चार्ट के लिए गुड फैट्स को चुनें। जैसे- कोकोनट मिल्क, एवोकैडो, कोकोनट ऑयल, सरसों का तेल, जैतून का तेल, मूंगफली का तेल, सीसम ऑयल, घी का सेवन कर सकते हैं।
वेट लॉस डायट चार्ट से हट के करें ये काम
वेट लॉस डायट चार्ट तो तैयार कर लिया आपने, लेकिन अब इसके साथ-साथ आपको क्या करना है ये मुद्दे की बात है। वेट लॉस डायट चार्ट के अलावा आपको अपने खाने-पीने के तरीकों पर भी ध्यान देना होगा।
अपना खाना खुद ही घर पर बनाएं
आपका भोजन तभी हेल्दी और पौष्टिक हो सकता है। जब आप उसे सही मात्रा में खुद से ही बनाएं। जब आप खाना खुद बनाएंगी तो आप उसमें अपने वेट लॉस डायट चार्ट के अनुसार बना सकते हैं और फॉलो कर सकते हैं। साथ ही आप अपने कैलोरी को भी नियंत्रित रख सकते हैं।
खुद की थाली में डालें छोटा हिस्सा
आप जब भी खाने बैठें तो अपने बर्तनों का चुनाव छोटा कर लें। इसका मतलब यह है कि आप खाना खाने के लिए छोटे प्लेट्स, कटोरियां और कप का ही प्रयोग करें। इससे आपको वेट लॉस डायट चार्ट को फॉलो करने में मदद मिलेगी। अगर आप ज्यादा बड़े बर्तन लेंगे तो ज्यादा खाना खा जाते हैं। इसलिए छोटा बर्तन रहेगा तो आप नियंत्रित मात्रा में ही खाएंगे।
ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं 
पानी हर मर्ज की दवा हैं। इसलिए अगर वेट लॉस डायट चार्ट को फॉलो करना है तो पानी उसके लिए सोने पर सुहागा जैसा होगा। आप खूब पानी पिएं, लगभग दिन में 10 गिलास पानी तो जरूर पिएं।
डिनर से ज्यादा ब्रेकफास्ट पर दें ध्यान
अध्ययन बताते हैं कि नाश्ते में ज्यादा और डिनर में कम कैलोरी लेने से आप जल्दी वेट लॉस कर सकते हैं। इसके लिए आप नाश्ते में ही ज्यादा कैलोरी को लेने की कोशिश करें। वहीं, रात में बहुत हल्का और कम कैलोरी का सेवन करें।
रोजाना 14 घंटे का व्रत रखें
आप अपने डिनर और ब्रेकफास्ट में लगभग 14 घंटे का अतर रखें। ऐसा करने से आपका पाचन तंत्र दुरुस्त रहेगा। साथ ही आपका वजन भी घटेगा। वेट लॉस डायट चार्ट के नियम में लगभग 14 घंटे के व्रत का नियम भी जोड़ लें।
रोजाना का वर्कआउट करेगा वेट लॉस
वेट लॉस डायट चार्ट को फॉलो करते हुए अगर आप रोजाना वर्कआउट करते हैं तो और जल्दी वजन घटेगा। इसलिए आप कोशिश करें कि साइकलिंग, वॉकिंग, जॉगिंग आदि करें। साथ ही प्लैंक्स, स्क्वैट्स, पुशअप्स आदि करने से ज्यादा फायदा होगा।


17.4.21

किडनी फेल्योर के मरीजों का आहार विहार खान-पान






हम जानते हैं कि किडनी शरीर के अधिक पानी, नमक और अन्य क्षार को पेशाब द्वारा दूर करके शरीर में इन पदार्थो का संतुलन बनाने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। किडनी फेल्योर में यह नियंत्रण का कार्य ठीक तरह से नहीं होता है। परिणामस्वरूप किडनी फेल्योर के मरीजों में पानी, नमक, पोटैशियमयुक्त खाध्य पदार्थ आदि सामान्य मात्र में लेने पर भी कई बार गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है। किडनी फेल्योर के मरीजों में कम कार्यक्षम किडनी को अधिक बोझ से बचाने के लिए तथा शरीर में पानी, नमक और क्षारयुक्त पदार्थ कि उचित मात्रा बनाये रखने के लिये आहार में जरुरी परिवर्तन करना आवश्यक है। क्रोनिक किडनी फेल्योर के सफल उपचार में आहार के इस महत्व को ध्यान में रखकर यहाँ आहार संबंधी विस्तृत जानकारी और मार्गदर्शन देना उचित समझा गया है। लेकिन आपको अपने डॉक्टर के परामर्श अनुसार आहार निश्चित करना अनिवार्य है।
सी. के. डी. रोगियों में आहार चिकित्सा के क्या लाभ हैं?
क्रोनिक किडनी डिजीज की प्रगति को धीमा करना और स्थगित करना।
डायालिसिस की आवश्यकता को लम्बे समय तक टालना।
रक्त में अतिरिक्त यूरिया के ज़हरीले प्रभाव को कम करना।
उच्च पोषण की स्थिति बनाए रखना और शरीर के द्रव्य के नुकसान को रोकना।
तरल और इलेक्ट्रोलाइट की गड़बड़ी का खतरा कम करना।
ह्रदय रोग का खतरा कम करना।
आहार योजना के सिद्धान्त
क्रोनिक किडनी फेल्योर के अधिकांश मरीजों को सामान्यतः निम्नलिखित आहार लेने कि सलाह दी जाती है
पानी और तरल पदार्थ निर्देशानुसार कम मात्रा में लेना ।
आहार में सोडियम पोटैशियम और फॉस्फोरस कि मात्रा कम होनी चाहिए ।
प्रोटीन कि मात्रा अधिक नहीं होनी चाहिए। सामान्यतः 0.8 से 1.0 ग्राम / किलोग्राम शरीर के वजन के बराबर प्रोटीन प्रतिदिन लेने कि सलाह दी जाती है ।
जो मरीज पहले से ही डायालिसिस पर हों उन्हें प्रोटीन की मात्रा में वृध्दि की आवश्यकता होती है (1.0-1.2 gm/kg body wt/day)। इस प्रतिक्रिया के दौरान जो प्रोटीन का नुकसान होता है, उसकी भरपाई करने के लिए यह आवश्यक है।
कार्बोहाइड्रेट पूरी मात्रा में (35-40 कैलोरी / किलोग्राम शरीर के वजन के बराबर प्रतिदिन ) लेने कि सलाह दी जाती हैं । घी, तेल , मक्खन और चर्बीवाले आहार कम मात्रा में लेने कि सलाह दी जाती है ।
विटामिन्स की आपूर्ति करें और पर्याप्त मात्रा में आवश्यक तत्वों की पूर्ति करें। उच्च मात्रा का फाइबर आहार लेने की सलाह भी दी जाती है।
उच्च कैलोरी का सेवन
शरीर के तापमान, विकास, दैनिक गतिविधियों और शरीर के वजन को बनाये रखने के लिए पर्याप्त कैलोरी की आवश्यकता होती है। मुख्यतः कैलोरी की आपूर्ति वसा और कार्बोहाइड्रेट से की जाती है।
सामान्यतः 35 -40 कैलोरी/किलोग्राम की आवश्यकता क्रोनिक किडनी डिजीज (सी. के. डी.) के मरीज को प्रतिदिन होती है। अगर कैलोरी का सेवन अपर्याप्त हो तो शरीर में कैलोरी प्रदान करने के लिए शरीर द्वारा प्रोटीन का इस्तेमाल किया जाता है। प्रोटीन के इस विघटन से हानिकारक प्रभाव हो सकता है। जैसे कुपोषण और अपशिष्ट उत्पादों का अधिक से अधिक उत्पादन होना। इसलिए सी. के. डी. के रोगियों के लिए कैलोरी की गणना करना महत्वपूर्ण है, साथ ही वर्तमान वजन को ध्यान में रखना चाहिए।

कार्बोहाइड्रेट-

कार्बोहाइड्रेट शरीर के लिए कैलोरी का प्राथमिक स्त्रोत है। गेहूँ, दाल, चावल, आलू, फल, सब्जी, शक्कर, मधु, केक, बिस्कुट, मिठाई और पेय पदार्थ से कार्बोहाइड्रेट मिलता है। इसलिए मधुमेह और मोटापे से ग्रस्त मरीज को कार्बोहाइड्रेट का सीमित मात्रा में सेवन करना चाहिए। अच्छा हो यदि मरीज चोकर युक्त गेहूँ, बिना पोलिश किया गया चावल, जैसे जटिल कार्बोहाइड्रेट का उपयोग करे क्योंकि इससे फाइबर (रेशयुक्त) आहार मिलता है। यह शरीर के लिए लाभदायक होता है। कार्बोहाइड्रेट के लिए इन खाघ पदार्थों का एक बड़ा हिस्सा आहार में होना चाहिए। विशेष रूप से मधुमेह के रोगियों में अन्य सभी साधारण चीनी युक्त पदार्थों का कुल 20% से अधिक का सेवन नहीं होना चाहिए। जिन मरीजों में मधुमेह नहीं हैं वे अपने आहार में कैलोरी की मात्रा उन प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों से ले सकते हैं जिसमें कार्बोहाइड्रेट है, जैसे फल, केक, कुकीज, जेली, मधु सीमित मात्रा में चाकलेट, बादाम, केला, मिठाई आदि।

फैट/वसा -

वसा शरीर के लिए कैलोरी का महत्वपूर्ण स्त्रोत है। प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की तुलना में वसा दुगनी मात्रा में कैलोरी प्रदान करती है। असंतृप्त या अच्छी वसा, के कुछ स्त्रोत है जैतून के तेल, मूंगफली का तेल, कनोला तेल, कुसुम तेल, मछली और बादाम का तेल आदि। संतृप्त या बुरी वसा के कुछ स्त्रोत है लाल मांस, अंडा, दूध्र, मक्खन, गहि, पनीर, और चर्बी की तुलना में बेहतर है। सी. के. डी. के मरीज को अपने आहार में संतृप्त या बुरी वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम रखनी चाहिए क्योंकि यह ह्रदय रोग पैदा कर सकती है।

असंतृप्त वसा (Unsaturated) -

इस दौरान मोनोअनसेचुरेटेड और पॉली अनसेचुरेटेड के अनुपात को ध्यान में रखना जरुरी है। ज्यादा मात्रा में ओमेगा 6 पॉलीअनसेचुरेटेड फैटी एसिड (वसा अम्ल) लेने और ज्यादा ओमेगा 6 : ओमेगा 3 का अनुपात भी हानिकारक होता है, जबकि कम मात्रा का ओमेगा 6 : ओमेगा 3 का अनुपात लाभकारी प्रभाव डालता है। एकल तेल के उपयोग के बजाय अलग-अलग वनस्पति तेल का उपयोग करने से उस उद्देश्य को प्राप्त करना संभव है। आलू के चिप्स, डोनट्स, व्यवसाहिक तौर पर तैयार कुकीज और केक जैसे वसा के खाघ पदार्थ संभावित हानिकारक है और उनका कम से कम इस्तेमाल करना चाहिए या उपयोग में लाने से बचना चाहिए।
प्रोटीन की मात्रा को सीमित रखना

शरीर के उतकों की मरम्मत और रख रखाव के लिए प्रोटीन आवश्यक है। यह संक्रमण से लड़ने और घाव भरने में भी सहायता करता है। सी. के. डी. के रोगी जो डायालिसिस पर नहीं हैं उन्हें 20.8 gm/ kg शरीर के वजन/दिन के हिसाब से प्रोटीन लेना चाहिए। यह किडनी के कार्यों में गिरावट की दर और किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत को आगे टाल देता है। प्रोटीन पर तीव्र प्रतिबंध से बचना चाहिए, क्योंकि इससे कुपोषण का खतरा हो सकता है।
सी. के. डी. के मरीज में अपर्याप्त भूख का होना आम बात हैं। अपर्याप्त भूख और प्रोटीन सख्त प्रतिबंध, दोनों के कारण रोगी में कुपोषण, वजन घटना, शरीर में उर्जा की कमी और शरीर में प्रतिरोधक क्षमता में कमी हो जाती है, जो भविष्य में मृत्यु के खतरे को बढ़ा सकता है। वे प्रोटीन जिनमें जैविक मूल्यों की मात्रा ज्यादा होती हैं जैसे पशु प्रोटीन (मांस, अंडा, मछली) ऐसे खाघ पदार्थों को प्राथमिकता दी जाती है। सी. के. डी. मरीज को उच्च प्रोटीन आहार जैसे अटकिन्स आहार (Atkins Diet) से परहेज करना चाहिए। इसी तरह उन प्रोटीन की खुराक एवं वे दवाइयाँ जो मांसपेशियों के विकास के लिए इस्तेमाल की जाती हैं उनसे परहेज करना चाहिए और उनका सेवन चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ की सलाह पर ही करना चाहिए। किन्तु यदि एक बार मरीज डायलिसिस पर चला जाता हैं तो प्रोटीन की मात्रा में 1.0-1.2 ग्राम प्रतिकिलो शरीर का वजन प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ा देना चाहिए जिससे इस प्रक्रिया के दौरान जो प्रोटीन में आती है उसकी भरपाई हो सके।
पानी तथा पेय पदार्थ
किडनी फेल्योर के मरीजों को पानी या अन्य पेय पदार्थ ( द्रव ) लेने में सावधानी क्यों जरुरी हैं ?
किडनी की कार्यक्षमता कम होने के साथ साथ अधिकतर मरीजों में पेशाब कि मात्रा भी कम होने लगती हैं। इस अवस्था में अगर पानी का खुलकर प्रयोग किया जाये, तो शरीर में पानी की मात्रा बढ़ने से सूजन और साँस लेने की तकलीफ हो सकती हैं, जो ज्यादा बढ़ने से प्राणघातक भी हो सकती हैं
शरीर में पानी की मात्रा बढ़ गई हैं, यह कैसे जाना जा सकता हैं?
सूजन आना, पेट फूलना, साँस चढ़ना, खून का दबाव बढ़ना, कम समय में वजन में वृद्धि होना इत्यादि लक्षणों की मदद से शरीर में पानी की मात्रा बढ़ गई हैं, यह जाना जा सकता हैं ।
किडनी फेल्योर के मरीजों को कितना पानी लेना चाहिए?
किडनी फेल्योर के मरीजों को कितना पानी लेना हैं , यह मरीज को होनेवाली पेशाब और शरीर में आई सूजन को ध्यान में रखते हुए तय किया जाता है। जिस मरीज को पेशाब पूरी मात्रा में होता है, एवं शरीर में सूजन भी नहीं आ रही हो , तो ऐसे मरीजों को उनकी इच्छा के अनुसार पानी - पय पदार्थ की छूट दी जाती है .
जिन मरीजों को पेशाब कम मात्रा में होता हो, साथ ही शरीर में सूजन भी आ रही हो, ऐसे मरीजों को पानी कम लेने की सलाह दी जाती हैं । सामान्यतः 24 घंटे में होनेवाले कुल पेशाब के मात्रा के बराबर पानी लेने की छूट देने से सूजन को बढ़ने से रोका जा सकता है।

सी. के. डी. के रोगियों को क्यों अपने दैनिक वजन का रिकार्ड बना कर रखना चाहिए?

रोगियों को अपने शरीर के तरल पदार्थ की मात्रा पर नजर रखने के लिए और तरल पदार्थ के लाभ या नुकसान का पता लगाने के लिए अपने दैनिक वजन का एक रिकार्ड रखना चाहिए। जब तरल पदार्थ के सेवन के बारे में दिए गए निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाता है तब शरीर का वजन लगातार सही बना रहता है। अचानक वजन में वृध्दि रोगी को चेतावनी है की द्रव पर अधिक प्रतिबंध की आवश्यकता है। आमतौर पर वजन का घटना, तरल पदार्थ पर प्रतिबंध और अधिक पेशाब निष्कासन का संयुक्त प्रभाव होता है।

पानी कम मात्रा में लेने के लिए सहायक उपाय:
प्रतिदिन वजन नापना: निर्देशानुसार कम पानी लेने से , वजन स्थिर रहता है । यदि वजन में अचानक वृद्धि होने लगे तो यह दर्शाता है की पानी ज्यादा मात्र में लिया गया है । ऐसे मरीजों को पानी कम लेने की सलाह दी जाती है।
जब बहुत ज्यादा प्यास लगे तब भी कम मात्रा में पानी पीना चाहिए अथवा मुह में बर्फ का छोटा टुकड़ा रखकर उसे चूसना चाहिए । जितना पानी रोज पिने की छूट दी गई हो, उतनी मात्रा में बर्फ के छोटे टुकड़े चूसने से प्यास को बहुत संतुष्टि मिलती है।
आहार में नमक की मात्रा कम करने से प्यास घटाई जा सकती है। जब मुँह सूखने लगे, तब पानी के कुल्ले करके मुँह को गीला करना चाहिए एवं पानी नहीं पीना चाहिए। च्युइंगम चबाकर मुँह का सूखना कम किया जा सकता है।
चाय पीने के लिए छोटा कप तथा पानी पीने के लिए छोटा गिलास उपयोग में लेना चाहिये।
भोजन के बाद जब पानी पिया जाये, तभी दवा ले लेनी चाहिए, जिससे दवा लेते समय अलग से पानी नहीं पीना पड़े।
डॉक्टरों द्वारा 24 घंटे में कुल कितना तरल पदार्थ (द्रव) लेना चाहिए, इसकी सुचना भी मरीज को दी जाती है। यह मात्रा केवल पानी की नहीं है। इसमें पानी के अलावा चाय, दूध, दही, मट्ठा (छाछ), जूस, बर्फ, आइसक्रीम, शरबत, दाल का पानी इत्यादि सभी पेय पदार्थों का समावेश होता है। 24 घंटे में लिये जानेवाले पेय की गणना उपरोक्त सभी तरल पदार्थ एवं पानी की मात्रा को जोड़कर किया जाता है।
मरीज को किसी न किसी कार्य में संलग्न रहना चाहिए। खाली निकम्मे बैठने से प्यास की इच्छा ज्यादा एवं बार-बार होती है।
डायाबिटीज के मरीजों के खून में ग्लूकोज (शर्करा ) की मात्रा ज्यादा होने से प्यास ज्यादा लगती है। इसलिए डायाबिटीज के मरीजों में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रण में रखने से प्यास कम लगती है, जो पानी कम लेने में सहायक होती है।
गर्मी के मौसम में प्यास बढ़ जाती है, अतः मरीज को ए.सी. या कूलर में रहना आवश्यक होता है।
सी. के. डी. के रोगी को तरल पदार्थों के सेवन को नियंत्रित करने के लिए क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?
तरल पदार्थ की कमी से बचने के लिए तरल पदार्थ की मात्रा दर्ज करनी चाहिए और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उसका पालन करना चाहिए। हर सी. के. डी. के मरीज के लिए तरल पदार्थ की मात्रा भिन्न-भिन्न हो सकती है और यह प्रत्येक रोग के पेशाब उत्पादन और तरल पदार्थ की स्थिति के आधार पर तय की जाती है।
मरीज नापकर उचित मात्रा में ही पानी/तरल पदार्थ ले सके इसके लिये कौन सी पध्दति अपनाने की सलाह दी जाती है?
मरीज को जितना पानी लेने की सलाह दी गई हो, उतना पानी एक जग में रोज भर लेना चाहिए।
जितनी मात्रा में मरीज कप, गिलास या कटोरी में पानी पिए उतना ही पानी जग में से उसी बर्तन की सहायता से निकालकर फेंक देना चाहिए।
दूसरे दिन फिर माप के अनुसार जग में पानी भर कर उतनी ही मात्रा में पानी लेने की छूट दी जाती है।
इस प्रकार मरीज सरलता से डॉक्टर द्वारा बताई गई मात्रा में पानी और पेय पदार्थ ले सकता है।
कम नमक (सोडियम) वाला आहार :
किडनी फेल्योर के मरीजों को आहार में कम मात्रा में नमक (सोडियम) लेने की सलाह क्यों दी जाती है?
शरीर में सोडियम (नमक) पानी को और खून के दबाव को उचित मात्रा में कायम रखने में सहायक होता है। शरीर में सोडियम की उचित मात्रा का नियमन किडनी करती है। जब किडनी की कार्यक्षमता में कमी होती है, तब शरीर से, किडनी द्वारा ज्यादा सोडियम निकलना बंद हो जाता है और इसलिए शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ने लगती है।
शरीर में ज्यादा सोडियम के कारण होनेवाली समस्याओं में प्यास ज्यादा लगना, सूजन बढ़ना, साँस फूलना, खून का दबाव बढ़ना इत्यादि का समावेश होता है। इन समस्याओं को रोकने अथवा कम करने के लिए किडनी फेल्योर के मरीजों को नमक का उपयोग कम करना अनिवार्य है।
सोडियम और नमक में क्या अंतर है?
सोडियम और नमक दोनों को नियमित रूप से समानार्थ शब्द के रूप से इस्तेमाल किया जाता हैं। साधारण नमक या टेबल नमक सोडियम क्लोराइड है और इसमें 40 प्रतिशत सोडियम रहता है। हमारे आहार में सोडियम का प्रमुख स्त्रोत नमक है। लेकिन नमक, सोडियम का एकमात्र स्त्रोत नहीं है। उपर वर्णित कई खाघ पदार्थों में सोडियम शामिल होता है पर वे स्वाद में खारे नहीं होते है। सोडियम इन यौगिकों में छुपा रहता है।
आहार में कितनी मात्रा में नमक लेना चाहिए?
अपने देश में सामन्य व्यक्ति के आहार में पुरे दिन के लिये जानेवाले नमक की मात्रा 6 से 8 ग्राम तक होती है। किडनी फेल्योर के मरीजों को, डॉक्टर की सलाह के अनुसार नमक लेना चाहिए। अधिकांश उच्च रक्तचाप और सूजन वाले किडनी फेल्योर के मरीजों को रोज 3 ग्राम नमक लेने की सलाह दी जाती है।

किस आहार में नमक (सोडियम) की मात्रा ज्यादा होती है?

ज्यादा नमक (सोडियम) युक्त वाले आहार का विवरण
नमक, खाने का सोडा, चाट मसाला
पापड़, आचार, कचूमर, चटनी
खाने का सोडा या बेकिंग पाउडर वाले खाध्य पदार्थ जैसे बिस्कुट, ब्रेड, केक, पिज़्ज़ा, गांठिया, पकौड़ा, ढोकला, हांडवा इत्यादि
तैयार नास्ते जैसे नमकीन ( सेव, चेवड़ा, चक्री, मठरी, इत्यादि ) वेफर्स , पॉपकॉर्न, नमक लगा मूंगफली का दाना, चना, काजू, पिस्ता वगैरह
तैयार मिलने वाला नमकीन मक्खन और चीज़
सॉस, कोर्नफ्लेक्स, स्पेगेटी, मैक्रोनी वगैरह
साग सब्जी में मेथी, पालक, हरा धनिया, बंदगोभी, फूलगोबी, मूली, चुकंदर ( बिट ) वगैरह
नमकीन लस्सी , मसाला सोडा, नींबू शरबत, नारियल का पानी
दवायें - सोडियम बाइकार्बोनेट की गोलियां एंटासिड लेकसेटिव वगैरह
कलेगी, किडनी, भेजा, मटन
शल्कोवाली मछली और तेलवाली मछली जैसे कोलंबी, करंगी, केकड़ा, बांगड़ वगैरह और सूखी मछली
खाने में सोडियम की मात्रा कम करने के उपाय:
प्रतिदिन भोजन में नमक का कम प्रयोग करना तथा साथ ही भोजन में नमक उपर से नहीं छिड़कना चाहिये। यघपि श्रेष्ठ पध्दति तो बिना नमक के खाना बनाना है। ऐसे खाने में मरीज डॉक्टर की सुचना अनुसार मात्रा में ही नमक अलग से डाले। इस विधि से निश्चित रूप से निर्धारित मात्रा में नमक लिया जा सकता है।
खाने में रोटी, भाखरी, भात जैसी चीजों में नमक नहीं डालना चाहिए।
पूर्व में बताई गई अधिक सोडियम की मात्रा वाली वस्तुओं का प्रयोग नहीं करना चाहिए अथवा कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। ज्यादा सोडियम वाली साग-सब्जी को पानी से धोकर, एवं उबालकर, उबाला हुआ पानी फेंक देने से साग-सब्जी में सोडियम की मात्रा कम हो जाती है।
कम नमकवाले आहार को स्वादिष्ट बनाने के लिए प्याज, लहसुन, नींबू, तेजपत्ता, इलायची, जीरा, कोकम, लौंग, दालचीनी, मिर्ची व केसर का उपयोग किया जा सकता है।
नमक की जगह कम सोडियम वाला नमक (लोना) नहीं लेना चाहिए। लोना में पोटैशियम की मात्रा ज्यादा होने से वह किडनी फेल्योर वाले मरीजों के लिए जानलेवा हो सकता है।
नरम (Soft) पानी नहीं पीना चाहिए क्योंकि पानी को नरम बनाने की प्रक्रिया में कैल्शियम की जगह सोडियम लगता है। रिवर्स ओसमोसिस की प्रक्रिया शुध्द पानी में सोडियम सहित सभी खनिजों को कम कर देती है। अतः यह पीने के लिए उपयुक्त होता है। रेस्त्रां में खाते समय उन खाघ सामग्री का चयन करें जिनमें सोडियम की मात्रा कम हो।
कम पोटैशियम वाला आहार:
किडनी फेल्योर के मरीजों को सामान्यतः आहार में कम पोटैशियम लेने की सलाह क्यों दी जाती है?
शरीर हृदय और स्नायु के उचित रूप से कार्य के लिए पोटैशियम की सामान्य मात्रा जरुरी होती है। किडनी फेल्योर के मरीजों में खून में पोटैशियम बढ़ने का खतरा रहता है। क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीज के खून में से किडनी द्वारा पौटेशियम को हटाना अपर्याप्त हो सकता है और इससे आगे चलकर खून में पौटेशियम की मात्रा बढ़ सकती है। इस परिस्थिति को "हाइपरकेलेमिया" कहते हैं। हीमोडायलिसिस की तुलना में वे मरीज जो पेरिटोनियल डायलिसिस के दौरे से गुजर रहे हैं उन्हें हाइपरकेलेमिया का खतरा कम रहता है। दोनों समूहों में खतरा अलग-अलग होता है क्योंकि पेरिटोनियल डायलिसिस की प्रक्रिया लगातार होती हैं जबकि हीमोडायलिसिस रुक रुक कर होता है।
खून में पोटैशियम की ज्यादा मात्रा हृदय और शरीर के स्नायुओं की कार्यक्षमता पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। पोटैशियम की मात्रा ज्यादा बढ़ने से होनेवाले जानलेवा खतरों में ह्रदय की गति घटते-घटते एकाएक रुक जाना और फेफड़ों के स्नायु काम नहीं कर सकने के कारण साँस का बंद हो जाना है।
शरीर में पोटैशियम की मात्रा बढ़ने की समस्या जानलेवा साबित हो सकती है, फिर भी इसके कोई विशेष लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। इसलिए इसे 'साइलेन्ट किलर' कहते हैं।
खून में सामान्यतः कितना पोटैशियम होता है? यह मात्रा कितनी बढ़ने पर चिंताजनक होती है?
सामान्यतः शरीर में पोटैशियम की मात्रा 3.5 से 5.0 mEq/L होती है। जब यह मात्रा 5 से 6 mEq/L हो जाये तो खाने पीने में सतर्कता जरुरी हो जाती है। जब यह 6.5 mEq/L से ज्यादा बढ़ती है, तब यह भयसूचक होती है और जब पोटैशियम की मात्रा 7 mEq/L से ज्यादा हो जाए, तो यह किसी भी समय जानलेवा हो सकती है।
पोटैशियम की मात्रा के अनुसार खाघ पदार्थ का वर्गीकरण?
किडनी फेल्योर के मरीजों में, खून में पोटैशियम नहीं बढ़े, इसके लिए डॉक्टरों की सुचना के अनुसार आहार लेना चाहिए। पोटैशियम की मात्रा को ध्यान में रखते हुए खाघ पदार्थ का वर्गीकरण तीन भाग में किया गया है। ज्यादा, मध्यम और कम पोटैशियम वाले खाघ पदार्थ।
सामान्य रूप से ज्यादा पोटैशियम वाले खाघ पदार्थ पर निषेध, मध्यम पोटैशियमवाले खाघ पदार्थ मर्यादित मात्रा में और कम पोटैशियमवाले खाघ पदार्थ पर्याप्त मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है। 100 ग्राम खाघ पदार्थ में पोटैशियम की मात्रा के आधार पर ज्यादा, मध्यम और कम पोटैशियम वाले आहार का वर्गीकरण नीचे किया गया है:
ज्यादा पोटैशियम = 200 मि. ग्रा. से अधिक
मध्यम पोटैशियम = 100 - 200 मि. ग्रा. के बीच
कम पोटैशियम = 0 - 100 मि. ग्रा.
समूह - 1: अधिक पोटैशियम वाले आहार
फल - केला, चीकू, पका हुआ आम, मोसंबी, शरीफा, खरबूजा, अन्नानास, आँवला, जरदालू, पीच, आलू, अमरूद, संतरा, पपीता, अनार
साग-सब्जी - अरबी के पत्ते, शकरकंद, सहजन की फली, हरा धनिया, सूजन, पालक, गुवार की फली, मशरूम, कद्दू और टमाटर
सूखा मेवा - खजूर, किशमिश, काजू, बादाम, अंजीर, अखरोट
दालें - अरहर की दाल, मूंग की दाल, चना, चने की दाल, उड़द की दाल
मसाले - सूखी मिर्च, धनिया, जीरा, मेथी
पेय - नारियल का पानी, ताजे फलों का रस, उबाला हुआ डिब्बाबंद गाढ़ा दूध, सूप, बोर्नबीटा, बीयर, ड्रिंकिंग चोकलेट, शराब, भैंस का दूध, गाय का दूध
अन्य - लोना साल्ट, चोकलेट, कैडबरी, चोकलेट केक, चॉक्लेट आइसक्रीम इत्यादि

समूह - 2. मध्यम पोटैशियम आहार
फल - चेरी, अंगूर, नाशपाती, तरबूज, लीची
साग-सब्जी - बैंगन, बंदगोभी, गाजर, प्यास, मूली, करेला, भिण्डी, फूलगोभी, टमाटर, कच्चे आम, हरी मटर
अनाज - मैदा, ज्वार, पौआ (चिउडा), मक्का, गेहूं की सेव
पेय - दही
समूह - 3. कम पोटैशियम आहार
फल - सेब, जामुन, बेर, निम्बू, अनानास और स्ट्रॉबेरी
साग-सब्जी - घीया, ककडी, अमियां (टिकोरा), तोरई, परवल, चुकंदर, मेंथी की सब्जी, लहसुन
अनाज - सूजी, चावल
पेय - कॉफी, नींबू पानी, कोको कोला, फेंटा, लिम्का, सोडा
अन्य - शहद, जायफल, राई, सोंठ, पुदीने के पत्ते, सिरका (Vinegar), लौंग, काली मिर्च
भोजन में पौटेशियम कम करने के लिए व्यवहारिक सुझाव?
जिसमे कम मात्रा में पौटेशियम हो ऐसे दल का सेवन कर सकते हैं।
प्रतिदिन एक कप चाय या कॉफी लें।
जिन सब्जियों में पौटेशियम होता है उनकी मात्रा कम कर देनी चाहिए।
नारियल पानी, फलों का रस और वह खाघ सामग्री जिसमें पौटेशियम की मात्रा ज्यादा हो उनका परहेज करना चाहिए। जहां तक हो सके वह खाघ सामग्री चुनें जिसमें कम मात्रा में पौटेशियम हो।
डायलिसिस के पूर्व सी. के. डी. के मरीजों के लिए ही पौटेशियम का प्रतिबंध नहीं होता है, यह डायलिसिस की शुरुआत के बाद भी आवश्यक होता है।
साग-सब्जी में पाया जानेवाला पोटैशियम किस प्रकार कम किया जा सकता है?
साग-सब्जी बारीक काटने के बाद उनके छोटे-छोटे टुकडे करना चाहिए एवं छिलकेवाली सब्जी (आलू, सुरन इत्यादि के छिलके निकाल लेना चाहिए।
गुनगुने पानी में से धोकर साग-सब्जी को गरम पानी में एक घंटे तक रखना चाहिए। पानी की मात्रा साग-सब्जी से 5 से 10 गुनी ज्यादा होनी चाहिए।
दो घंटे बाद, फिर से गुनगुने पानी में 2 से 3 बार सब्जी को धोकर, सब्जी को ज्यादा पानी डालकर उबालना चाहिए।
जिस पानी में सब्जी उबाली गई हो, उस पानी को फेंक देना चाहिए और साग भाजी को स्वादानुसार बनाना चाहिए।
इस प्रकार साग सब्जी में उपस्थित पोटैशियम की मात्रा को घटाया / कम किया जा सकता है। परन्तु पोटैशियम को पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता है। इसलिए ज्यादा पोटैशियम वाली साग सब्जी कम या बिलकुल नहीं खाने की सलाह दी जाती है।
इस तरह से बनाए गए खाने में पोटैशियम के साथ-साथ विटामिन्स भी नष्ट हो जाते हैं, इसलिए डॉक्टर की सलाह लेकर विटामिन की गोली लेना जरुरी है।
1. फॉस्फोरस कम लेना किडनी फेल्योर के मरीजों को फॉस्फोरस वाला आहार क्यों कम लेना चाहिए?
शरीर में फॉस्फोरस और कैल्सियम की सामान्य मात्रा हडिड्यों के विकास, तंदुरुस्ती और मजबूती के लिए जरुरी होती है। सामान्यतः आहार में उपस्थित ज्यादा फॉस्फोरस को किडनी पेशाब के रास्ते बाहर निकालकर उचित मात्रा मेंउ से खून में स्थिर रखती है।
सामान्यतः खून में फॉस्फोरस की मात्रा 4.5 से 5.5 मि. ग्रा. प्रतिशत होती है। किडनी फेल्योर के मरीजों में ज्यादा फॉस्फोरस का पेशाब के साथ निष्कासन नहीं होने से उस की मात्रा खून में बढ़ती जाती है। खून में उपस्थित फॉस्फोरस की अधिक मात्रा हडिड्यों में से कैल्सियम खींच लेता है, जिससे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।
शरीर में फॉस्फोरस बढ़ने के कारण होनेवाली मुख्य समस्याओं में खुजली होना, स्नायु का कमजोर होना, हडिड्यों में दर्द होना, हडिड्यों का कमजोर होना और सख्त हो जाने के कारण फ्रैक्चर होने की संभावना का बढ़ना इत्यादि है।
किस आहार में ज्यादा फॉस्फोरस होने के कारण उसे कम लेना चाहिए या नहीं लेना चाहिए?
ज्यादा फॉस्फोरस वाले आहार का विवरण इस प्रकार है:
दूध की बनी वस्तुएं - पनीर, आइसक्रीम, मिल्कशेक, चॉकलेट
काजू, बादाम, पिस्ता, अखरोट, सुखा नारियल
शीतल पेय (Cold Drinks) - कोकाकोला, फेंटा, माजा, फ्रूटी
मूंगफली का दाना, गाजर, अरबी के पत्ते, शकरकंद, मक्के के दाने, हरा मटर
उच्च विटामिन और फाइबर का सेवन
कम भूख लगने के कारण सी. के. डी. के रोगी आमतौर पर विटामिन की अपर्याप्त आपूर्ति की वजह से पीड़ित रहते हैं। आहार पर एक प्रतिबंध रहता है ताकि किडनी की बीमारी न बढ़े। डायलिसिस के दौरान कुछ विटामिन्स विशेष रूप से पानी में घुलनशील विटामिन B, विटामिन C, और फोलिक एसिड लुप्त हो जाते हैं। अपर्याप्त सेवन एवं इन विटामिनों के नुकसान की भरपाई करने के लिए सी. के. डी. रोगियों को पानी में घुलनशील विटामिन्स और तत्वों के पूरक की आवश्यकता होती है।
सी. के. डी. के मरीजों के लिए उच्च फाइबर का सेवन फायदेमंद है। इसलिए रोगियों को ताजी सब्जी और फल जिसमें विटामिन और फाइबर की मात्रा अधिक हो, लेने की सलाह दी जाती है। पर उन फल और सब्जियों से जिनमें ज्यादा मात्रा में पौटेशियम हो, परहेज रखना चाहिए।
दैनिक आहार की रचना
किडनी फेल्योर के मरीजों को प्रतिदिन किस प्रकार का और कितनी मात्रा में आहार एवं पानी लेना चाहिए, यह चार्ट नेफ्रोलॉजिस्ट की सूचना के अनुसार डायटीशियन द्वारा तैयार किया जाता है। परन्तु, आहार के लिए सामान्य सूचना इस प्रकार है:

1. पानी और तरल पदार्थ :

डॉक्टर द्वारा दी गई सुचना के अनुसार इतनी ही मात्रा में पेय पदार्थ लेना चाहिए। रोज वजन करके चार्ट रखना चाहिये। यदि वजन में एकाएक बढ़ोतरी होने लगे, तो समझना चाहिए की ज्यादा पानी लिया गया है।

2. कार्बोहाइड्रेटस:

शरीर को पर्याप्त मात्रा में कैलोरी मिले उसके लिए अनाज एवं दालों के साथ (यदि डायाबिटीज नहीं हो, तो) चीनी अथवा ग्लूकोज की अधिक मात्रा वाले आहार का उपयोग किया जा सकता है।

3. प्रोटीन :

प्रोटीन मुख्यतः दूध, दलहन, अनाज, अण्डा, मुर्गी में ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। जब डायालिसिस की जरूरत नहीं हो, उस अवस्था के किडनी फेल्योर के मरीजों को थोड़ा कम प्रोटीन (0.8 ग्राम/किलोग्राम शरीर के वजन के बराबर) लेने की सलाह दी जाती है। जबकि नियमित हीमोडायालिसिस एवं सी.ऐ.पी.डी. (C.A.P.D) कराने वाले मरीजों में ज्यादा प्रोटीन लेना अत्यंत आवश्यक होता है। सी.ऐ.पी.डी. का द्रव जब पेट से बहार निकलता है तभी उसी द्रव के साथ प्रोटीन निकल जाता है, जिससे यदि भोजन में ज्यादा प्रोटीन नहीं दिया जाये, तो शरीर में प्रोटीन कम हो जाता है, जो हानिकारक होता है।

4. चर्बीवाले पदार्थ (वसायुक्त पदार्थ):

चर्बीवाले पदार्थों को कम लेना चाहिए। घी, मक्खन इत्यादि खाने में कम लेना चाहिए। परन्तु इनको बिलकुल बंद कर देना भी हानिकारक है। तेलों में सामान्यतः मूंगफली का तेल या सोयाबीन का तेल दोनों शरीर के लिए फायदेमंद हैं, फिर भी उन्हें कम मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है।

5. नमक:

अधिकांश मरीजों को नमक कम लेने की सलाह दी जाती है। उपर से नमक नहीं छिड़कना चाहिये। खाने का सोडा - बेकिंग पाउडर वाली वस्तुएं कम लेनी चाहिए अथवा नहीं लेना चाहिए। नमक के बदले सेंधा नमक और लोन (कम सोडियम वालानमक - low sodium salt) कम लेना चाहिए या नहीं लेना चाहिए।

6. अनाज:

अनाज में चावल या उससे बने पौआ (चिउड़ा), मुरी (फरही) जैसी चीजों का उपयोग करना चाहिए। हर रोज एक ही अनाज लेने की जगह गेहूं, चावल, पौआ, साबूदाना, सूजी, मैदा, ताजा मक्का, कार्नफ्लेक्स इत्यादि चीजें ली जाती सकती हैं। ज्वार, मकई तथा बाजार कम लेना चाहिए।

7. दालें :

अलग-अलग तरह की दालें सही मात्रा में ली जा सकती हैं, जिससे खाने में विविधता बनी रहती है। दाल के साथ पानी की मात्रा कम लेनी चाहिए। जहाँ तक हो सके, दाल गाढ़ी लेनी चाहिए। दाल की मात्रा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए। दालों में से पोटैशियम कम करने के लिए उसे ज्यादा पानी से धोने के बाद गरम पानी में भिगो कर उस पानी को फेक देना चाहिए। ज्यादा पानी में दाल को उबालने के बाद पानी को फेंक कर स्वादानुसार बनाना चाहिए। दाल और चावल के स्थान पर उनसे बनी खिचडी, डोसा वगैरह भी खाये जा सकते हैं।

8. साग-सब्जी :

पूर्व में बताये अनुसार कम पोटैशियमवाली साग-सब्जी बिना किसी परेशानी के उपयोग की जा सकती हैं। ज्यादा पोटैशियम वाली साग-सब्जी पूर्व में बताये अनुसार पोटैशियम की मात्रा में ही बनाई जानी चाहिए तथा स्वाद के लिए दाल सब्जी में नींबू निचोड़ा जा सकता है।

9. फल :

कम पोटैशियमवाले फल जैसे सेब, पपीता, अमरुद, बेर, वगैरह दिन में एक बार से ज्यादा नहीं खाना चाहिए। डायालिसिस वाले दिन डायालिसिस से पहले कोई भी एक फल खाया जा सकता है। नारियल का पानी या फलों का रस नहीं लेना चाहिए।

10. दूध और उससे बनी वस्तुएं:

हर रोज 300 से 350 मिली लीटर दूध या दूध से बनी अन्य चीजें जैसे खीर, आइसक्रीम, दही, मट्ठा इत्यादि लिया जा सकता है। साथ ही पानी कम लेने के निर्देश को ध्यान में रखते हुए मट्ठा कम मात्रा में लेना चाहिए।

11. शीतलपेय:

पेप्सी, फेंटा, फ्रूटी जैसे शीतल पेय नहीं लेने चाहिए। फलों का रस एवं नारियल का पानी भी नहीं लेना चाहिए।

12. सूखामेवा :

सूखा मेवा, मूंगफली के दाने, तिल, हरा या सूखा नारियल नहीं लेना चाहिए।

विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -


लेटेस्ट  केस रिपोर्ट -26/10/2020

नाम किडनी फेल रोगी : अमरसिंगजी -जुझारसिंगजी यादव   
स्थान : टाटका तहसील -सीतामऊ,जिला मंदसौर,मध्य प्रदेश 
इलाज से पहिले की टेस्ट रिपोर्ट 26/10/2020 के अनुसार 

serum Creatinine :7.18mg/dl

Urea                    :129mg/dl 


 यह औषधि पीने के 20 दिन बाद की स्थिति-

दिनांक-  15 /11/2020 की रिपोर्ट 

Serum creatinine :     2.18 mg/dl

urea:                          69  mg/dl  

तेजी से सुधार होते हुए स्थिति नॉर्मल होती जा रही है|
अभी इलाज जारी है| 





इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl






हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl








जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 

सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 







 केस रिपोर्ट 2-

रोगी का नाम - Awdhesh 

निवासी - कानपुर 

ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट






दिनांक - 26/4/2016

Urea- 55.14   mg/dl

creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -




creatinine 1.34 
mg/dl

urea 22  mg/dl















15.4.21

जामुन के सिरके के फायदे




जामुन के फल की तरह ही जामुन का सिरका  भी काफी गुणकारी होता है और इसको पीने से कई तरह के रोगों से निजात मिल जाती है। आप जामुन के सिरके को आसानी से घर पर भी बना सकते हैं। जामुन का सिरका (Jamun ka sirka) पीने से क्या-क्या लाभ जुड़े हुए हैं और जामुन का सिरका किस तरह से बनाया जाता है। आइये जानते है जामुन के सिरके के फायदे :

जामुन के सिरके के फायदे
पाचन तंत्र हो मजबूत
जामुन का सिरका पीने से पाचन तंत्र पर अच्छा असर पड़ता है और पेट संबंधित कई रोगों से राहत मिल जाती है। इसलिए आप कब्जा, गैस या पेट में दर्द होने पर जामुन के सिरके का सेवन करें। एक चम्मच जामुन का सिरका पीते ही आपके पेट को काफी आराम पहुंच जाएगा।
शुगर का स्तर कंट्रोल में रखे
मधुमेह के मरीजों के लिए जामुन का सिरका काफी गुणकारी होती है और इसे पीने से शुगर का स्तर कंट्रोल में रहता है। इसलिए शुगर के मरीजों को रोजाना जामुन का सिरका पीना चाहिए। इसे पीने से खून में शुगर का स्तर नहीं बढ़ेगा है और शुगर कंट्रोल में रहेगी।
खांसी के लिए लाभदायक
खांसी होेने पर आप जामुन का सिरका पीएं। जामुन का सिरका पीने से खांसी तुरंत ठीक हो जाती है और कफ की समस्या से भी राहत मिल जाती है। खांसी के अलावा गला खराब होने पर भी जामुन का सिरका पीया जाए तो गला एकदम सही हो जाती है।
मुंह के छाले हो सही
मुंह में छाले होने पर आप जामुन का सिरका  पी लें। जामुन का सिरका पीने से आपके मुंह के छाले तुरंत सही हो जाएंगे। छालों के अलावा मूसड़ों में दर्द होने पर भी अगर जामुन का सिरका पीया जाए तो मसूड़ों का दर्द भी एकदम सही हो जाता है।
लीवर के लिए लाभदायक
जामुन का सिरका पीने से लीवर एकदम सही रहता है और अच्छे से कार्य करता है। लीवर के अलावा किडनी के लिए भी जामुन का सिरका फायदेमंद साबित होता है। जिन लोगों को लिवर में सूजन की समस्या हैं वह जामुन की गुठली के रस का सेवन अवश्य करें। अगर आप रोजाना जामुन के सिरके का सेवन करेंगे आके लिवर की समस्या ठीक होने लग जाएगी।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़े
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी जामुन का सिरका  कारगर साबित होता है और रोज दो समय जामुन का सिरका पीने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर अच्छा असर पड़ता है। ऐसा कहा जाता है कि जो लोग रोजाना इसका सेवन किया करते हैं उनका शरीर अंदर से मजबूत बन जाता है और शरीर की रक्षा कई तरह के रोगों से होती है।
उल्टी आने पर पीएं सिरका
उल्टी आने पर आप जामुन के सिरके का सेवन करें। जामुन का सिरका पीने से मन एकदम सही हो जाएगा और उल्टी की समस्या से राहत मिल जाएगी। उल्टी के अलावा दस्त होने पर भी जामुन का सिरका पीया जाए तो दस्त एकदम सही हो जाते हैं। यदि आपको बार बार उल्टी हो रही हैं तो आप 20 ग्राम जामुन के पत्ते लें अब इसको 400 मिली पानी में उबालें। यह पानी तब तक उबालें जब तक यह आधा न रह जाए। अब यह पानी ठंडा होने पर पिए। इससे आपकी उल्टी बंद हो जाएगी।
विटामिन सी की कमी हो पूरी
जामुन के सिरके में विटामिन सी अच्छी मात्रा में मौजूद होता है। इसलिए शरीर में विटामिन सी की कमी होने पर आप जामुन का सिरका पीएं। इसे पीने से शरीर में विटामिन की कमी पूरी हो जाएगी।
कैसे बनाएं जामुन का सिरका
जामुन का सिरका (Jamun ka sirka) आप आसानी से अपने घर पर बना सकते हैं। जामुन का सिरका बनाने के लिए आपको कुछ जामुन की जरूरत पड़ेगी। आप जामुन लेकर पहले उन्हें पानी की मदद से अच्छे से साफ कर दें। फिर आप जामुन को एक बर्तन में डालकर इस बर्तन को धूप में रखे दें। एक सप्ताह तक जामुन को धूप में रखने के बाद आप इसका गूदा बना लें। फिर आप इस गूदे को सूती के कपड़े में डाल लें और इसका रस निकाल लें।
इस रस को आप बोतलों में भरकर रख लें। आप चाहें तो इस रस के अंदर नमक और काली मिर्च भी डाल सकते हैं। इस तरह से आपका जामुन का सिरका बनकर तैयार हो जाएगा। कई सारी कंपनियों द्वारा जामुन का सिरकाबेचा भी जाता है और आप चाहें तो इसे बाजार से भी खरीद सकते हैं।
रखें इन बातों का ध्यान
जामुन एक लाभदायक फल होता है और इसको खाने से शरीर को कई तरह के लाभ मिलते हैं। हालांकि आप इस फल का सिरका पीते समय थोड़ा ध्यान रखें और कभी भी भोजन करने के तुरंत बाद जामुन का सिरका ना पीएं।
जामुन का सिरका आप हमेशा भोजन करने के एक घंटे बाद ही पीया करें। जामुन का सिरका पीने के कम से कम एक घंटे तक आप दूध या दही का सेवन भी ना करें।

16.3.21

प्रवाल पिष्टी के फायदे




प्रवाल पिष्टी में पाये जाने वाले कई प्रभावशाली तत्व हमारे स्वास्थ्य व कई बिमारियों में फायदेमंद होती है।

प्रवाल पिष्टी प्रवाल से बनायी जाती है।
इसको आम भाषा में मूंगा कहा जाता है व अंग्रेजी में Coral Calcium कहते हैं।
जिन लोगों में कैल्शियम की कमी होती हैं उन लोगों ने इसका प्रयोग करना चाहिए यह उनके लिए फायदेमंद होती है।
इसके अतिरिक्त इसमें प्रचूर मात्रा में विटामिन सी और प्राकृतिक रूप से कैल्शियम पाया जाता है जो हमारी इम्युनिटी बढ़ाने का कार्य करता है।
इस लेख में हम आपको प्रवाल पिष्टी के फायदों के साथ इसके बारे में पूरी जानकारी देने का प्रयास करेंगे।
इसके फायदे जानने से पहले हमें यह जानना होगा कि यह क्या है और कैसे कार्य करता है।
प्रवाल पिष्टी आयुर्वेदिक दवा है, जिसका प्रयोग कई रोगों जैसे जुखाम, खांसी और पित्त के रोगों में आयुर्वेदिक दवा के रूप में करते हैं।
खाने में इसका स्वाद मीठा सा होता है। प्रवाल पिष्टी में विटामिन सी व कैल्शियम की अत्यधिक मात्रा पायी जाती है जो हमारे लिए फायदेमंद होती है।
यह बाजार में तरल एवं पाउडर के रूप में मिलती है।
प्रवाल पिष्टी के गुण
प्रवाल पिष्टी का उपयोग कैल्शियम की कमी, कमजोरी, सुखी खांसी, शरीर में किसी भी स्थान से भी खून बहने पर, सर दर्द, गैस की परेशानी, अल्सर, हेपेटाइटिस, पेशाब में जलन होना जैसे कई और रोगों में किया जाता है।
आयुर्वेदिक दवा के रूप में प्रवाल पिष्टी का उपयोग बड़े स्तर पर किया जाता है।
मगर प्रवाल अर्थात मूंगा कैल्शियम का सीधे तौर पर उपयोग नहीं किया जाता है।
इसके लिए इसको खाने योग्य बनाने के लिए गुलाब जल के साथ तैयार किया जाता है और इसका पाउडर बनाया जाता है।
अत: प्रवाल को गुलाब जल के साथ संसाधित कर जो पाउडर या चूर्ण तैयार किया जाता है उसी का प्रवाल पिष्टी कहा जाता है।
प्रवाल भस्म और प्रवाल पिष्टी दोनों ही कैल्शियम की कमी, रक्त स्रात के रोगों, खांसी, कमजोरी, सिरदर्द, पित्त रोग, पीलिया, आंखों का लाल होना, पेट की परेशानी आदि में फायदेमंद होते हैं।
इसके साथ ही यह गठिया में भी लाभदायक होती हैं प्रवाल पिष्टी की तासरी ठण्डी होती है और यह तीनों प्रकार के विकारों अर्थात वात दोष, कफ दोष एवं पित्त दोष में लाभदायक होती है।
प्रवाल पिष्टी के फायदे
1. शरीर की गर्मी को शांत करने में फायदेमंद
प्रवाल पिष्टी उन लोगों के लिए फायदेमंद होती है जिनको शरीर के किसी हिस्से में गर्मी या जलन का एहसास होता है।
प्रवाल पिष्टी शरीर की गर्मी के तो कम करता ही है बुखार के कारण जो शरीर का तापमान बढ़ जाता है उसके भी कम करने में मदद करता है।
बुखार होने पर यह एसिटामिनोफेन के जैसे कार्य करता है और हमारे शरीर को ठण्डा करने में मदद करता है। क्योंकि इसकी तासीर ठण्डी होती है।
2. बुखार में प्रवाल पिष्टी के फायदे
बुखार में इसका प्रयोग लाभदायक होता है मगर केवल इसी के प्रयोग से लाभ नहीं होता इसके लिए इसको गोदंती भस्म के साथ प्रयोग किया जाता है।
इसके प्रयोग से शरीर के तापमान को कम करने में मदद मिलती है।
इससे बुखार तो ठीक होता ही है बुखार से होने वाली कमजोरी को दूर करने में यह लाभदायक है।
3. हड्डियों के लिए प्रवाल पिष्टी के फायदे
प्रवाल पिष्टी का प्रयोग करना हड्डियों की कमजोरी के लिए फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें प्रचूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है।
कैल्शियम हमारे शरीर की हड्डियों के लिए एक आवश्यक पदार्थ होता है।
इसके अलावा इसमें मैग्नीशियम के साथ ही अन्य खनिज तत्व भी होते हैं जो हमारे शरीर व हड्डियों के लिए फायदेमंद होते हैं।
4. कमजोरी में प्रवाल पिष्टी के फायदे
जिन लोगों को कमजोरी की परेशानी रहती है यह उनके लिए फायदेमंद होती है।
इतना ही नहीं यह अधिक समय तक बिमार रहने के बाद जो कमजोरी रहती है उसके लिए सर्वथा उचित दवा है।
ऐसी अवस्था में इसका प्रयोग करना आपके लिए लाभदायक होगा।
प्रवाल पिष्टी के कुछ और फायदे
कफ से पैदा होने वाले रोगों में यह फायदेमंद होता हैं
बच्चों में, गर्भवती महिलाओं व बुजुर्गो में यह कैल्शियम की कमी को दूर करता है। क्योंकि यह एक प्राकृतिक रूप में कल्शियम से युक्त होता है जो सीधे शरीर द्वारा अवशोषित हो जाता हैं।
प्रवाल पिष्टी के प्रयोग से शरीर में पैदा होने वाली अम्ल की अधिकता होने पर यह लाभदायक होता है। क्योंकि अम्ल की अधिकता से कई प्रकार की परेशानिंया उत्पन्न हो जाती हैं। जैसे — जलन होना, गैस बनना, हाथ पैरों के तलवों में जलन होना आदि।
इसका प्रयोग गुलकंद के साथ प्रयोग करने से पित्त से उत्पन्न होने वाले रोगों में यह लाभदायक होता है।
मानसिक रोगों, चिंता, तनाव व डिप्रेशन प्रवाल पिष्टी का प्रयोग करना लाभ दायक होता है।
प्रवाल पिष्टी पाचन उत्तेजक, गठिया नाशक, अम्ल नाशक होता है।
प्रवाल पिष्टी बाल झड़ने से रोकने में सहायता करता है।
अगर महिलाओं को गर्भाशय एवं मासिक धर्म में अत्यधिक रक्तस्राव हो तो प्रवाल पिष्टी का सेवन करना उनके लिए लाभदायक होता है।
यह गुदा विकार, बवासीर मगर जिसमें रक्त बहने की समस्या हो, हड्डियों को जोड़ने में सहायक, बालों का जल्द सफेद होने में सहायक होता है।
प्रवाल पिष्टी की सेवन विधि
प्रवाल पिष्टी का सेवन दिन में दो से तीन बार करना चाहिए।
इसकी 125 मिलीग्राम से 500 मिलीग्राम तक की मात्रा को लिया जा सकता है।
मगर ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसकी 2500 मिलीग्राम से ज्यादा की मात्रा को एक दिन में नहीं लेना चाहिए नहीं हो परेशानी हो सकती है।
इसकी मात्रा आपके रोगा पर निर्भर करती है। इसको लेने से पहले किसी अच्छे आयुर्वेदाचार्य से सलाह ले लेनी चाहिए।
प्रवाल पिष्टी को कभी भी अकेले नहीं खाया जाता है।
इससे अधिकतम लाभ लेने के लिए गुलकंद या शहद के साथ ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

3.3.21

दालचीनी वाला दूध पीने के फायदे






दालचीनी वाला दूध पीने से इम्यून सिस्टम मजबूत हो जाता है, जिससे आप जल्दी बीमार नहीं पड़ते। आपकी बॉडी पर वायरस जल्दी असर नहीं डाल पाते। इसके साथ ही यह थकान को भी दूर करता है।
दालचीनी वाला दूध पीने से इम्यून सिस्टम मजबूत होने के साथ पुरुषों में स्‍पर्म काउंट भी बढ़ते हैं।
पाचन शक्ति बढ़ती है और हड्डियां मजबूत बनती है।
ब्लडप्रेशर भी कंट्रोल में रहने लगता है।
ठंड आते ही लोगों को जोड़ों के दर्द की शिकायत होने लगती है। ज्यादातर इस समस्या से बुजुर्ग परेशान रहते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए गुनगुने दूध में दालचीनी पाउडर डालकर दें।
दालचीनी वाला दूध पीने से शुगर लेवल ठीक रहने लगता है। इससे शुगर की बीमारी से जल्दी से निजात पाई जा सकती है।
दालचीनी वृक्ष की छाल होती है जिसे औषधि और मसालों के रूप में प्रयोग किया जाता है। दालचीनी मन को प्रसन्न करती है। सभी प्रकार के दोषों को दूर करती है। इसे गर्भवती स्त्री को नहीं लेना चाहिए। जो दालचीनी, पतली, मुलायम चमकदार, सुगंधित और चबाने पर मिठास उत्पन्न करने वाली हो, वह अच्छी होती है।
परन्तु यदि किसी प्रकार की हानि हो तो सेवन को कुछ दिन में ही बंद कर देना चाहिए और दुबारा थोड़ी सी मात्रा में लेना शुरू करें। दालचीनी पाउडर की उपयोग की मात्रा 1 से 5 ग्राम होती है। बच्चों को भी इसी प्रकार कम मात्रा में ही दें ।
दालचीनी की तासीर गर्म होती है। गर्मी के मौसम में इसका कम से कम मात्रा में सेवन करना चाहिए। दालचीनी का सेवन लम्बे समय तक नहीं करना चाहिए।
दालचीनी में कुछ ऐसे तत्व होते हैं,जो आपके शरीर के लिए औषधि का काम करते हैं और अगर दूध के साथ मिलाकर इसे पिया जाए, तो इससे शरीर भी ताकतवर होगा और सुंदरता भी बढ़ेगी।
एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर मिला लें और इसे थोड़ा उबालकर गुनगुना होने पर इसे रात को सोने से पहले सेवन करें। आओ जानते हैं इसके सेवन से शरीर में क्या फर्क नजर आने लगता है।
रोज रात को सोने से पहले अगर दालचीनी वाला दूध पीए तो 1 महीने में 2-3 किलो वजन कम हो जाता है, वह भी बिना किसी डाइटिंग या कसरत से।
दालचीनी वाला दूध पीने से सर्दी जुकाम, बलगम आदि से भी बहुत जल्दी निजात मिलती है।
दालचीनी वाला दूध त्वचा को चमकदार बनाता है और त्वचा खूबसूरत दिखने लगती है।
दालचीनी के रोजाना सेवन से बालों की सभी प्रकार की समस्याएं दूर हो जाती है।
दालचीनी वाला दूध पीने से दिमाग की ताकत बढ़ती है। पढऩे वाले बच्चों को दूध में दालचीनी मिला कर देने से भी बहुत फायदा होता है।
सोने से पहले एक गिलास दालचीनी वाला दूध पीलें इससे नींद अच्छी आने लगती है।
दालचीनी वाला दूध पीने से मोटापा भी छूमंतर हो जाता है।






26.2.21

लोध्रा के आयुर्वेदिक लाभ और उपयोग





लोध्रा क्या है?

लोध्रा (lodhra herb) के पेड़ मध्यम आकार के होते हैं। इसकी छाल पतली तथा छिलकेदार होती है। इसके फूल सफेद और हल्के पीले रंग के तथा सुगन्धित होते हैं। लोध्रा के द्वारा लाख (लाक्षा) को साफ किया जाता है, इसलिए इसे लाक्षाप्रसादन भी कहते हैं।
इसकी दो प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिन्हें क्रमश: लोध्र व पठानीलोध्र कहते हैं। लोध्रा कषैला, कड़ुआ, पचने में हल्का, रूखा, कफ-पित्त का नाशक और आँखों के लिए लाभकारी होता है।
अनेक भाषाओं में लोध्रा के नाम
लोध्रा का लैटिन नाम Symplocos racemosa Roxb. (सिम्प्लोकॉस रेसिमोसा) Syn-Symplocos intermedia Brand है और यह कुल Symplocaceae (सिम्प्लोकेसी) का है। इसे अन्य इन नामों से भी जाना जाता हैः-
Lodhra in –
Hindi (lodhra meaning in hindi) – लोध
Urdu – लोधपठानी (Lodapathani)
Oriya – लोधो (Lodho)
English – Californian cinchona (कैलीफोर्नियन सिनकोना) लोध बार्क (Lodh tree), स्माल बार्क ट्री (Small bark tree), लॉटर बार्क (Lotur bark)
Arabic – मूगामा (Moogama)।
Sanskrit – लोध्र, तिल्व, तिरीट, गालव, स्थूलवल्कल, जीर्णपत्र, बृहत्पत्र, पट्टी, लाक्षाप्रसादन, मार्जन
Assamese -भोमरोटी (Bhomroti); कन्नड़ : पाछेट्टू (Pachettu), लोध (Lodh), लोध्र (Lodhara)
Konkani – लोध (Lodh), लोध्र (Lodhra)
Gujarati – लोधर (Lodar)
Telugu (Lodhra in Telugu) – लोड्डूगा (Lodduga), लोधूगा चेट्टु (Lodhdhuga-chettu)
Tamil (Lodhra Meaning in Tamil) – वेल्ली-लोथी (Velli-lothi), काम्बली वेत्ती (Kambali vetti)
Bengali – लोध (Lodh), लोध्र (Lodhra)
Marathi – मराठी – लोध (Lodh), लोध्र (Lodhra)
Nepali – लोध्र (Lodhara)
Malayalam – पाछोत्ती (Pachotti)
लोध्रा का औषधीय गुण
लोध्रा आँख, कान, मुंह और स्त्री रोगों आदि के लिए रामबाण का काम करती है। यह खून की गर्मी, मधुमेह, थैलीसिमिया आदि रक्त से जुड़े रोग, बुखार, पेचिश, सूजन, अरुचि, विष तथा जलन आदि का नाश करता है। इसके फूल तीखे, कड़ुए, ठंडी तासीर वाले होते हैं जो कफ व पित्त का नाश करने वाले होते हैं। इसके तने की छाल सूजन कम करने वाली, बुखार को ठीक करने वाली, खून का बहाव रोकने वाली, पाचन सुधारने वाली होती है।
लोध्रा के फायदे
अब तक आपने जाना कि लोध्रा के कितने नाम हैं। आइए अब जानते हैं कि लोध्रा का औषधीय प्रयोग कैसे और किन बीमारियों में किया जा सकता हैः-
मोटापा घटाने के लिए करें लोध्रा का सेवन
लोध्रा का औषधीय गुण वजन कम करने में बहुत काम आता है। 15-20 मिली लोध्रासव का सेवन करने से मोटापा जल्दी कम होने में मदद मिलती है।
आँखों के रोग में लोध्रा का प्रयोग 
आँखों के रोग में लोध्रा का इस्तेमाल कई तरह से किया जाता हैं-
आँख में शुक्र रोग होने पर हल्दी, मुलेठी, सारिवा तथा पठानी लोध्र के काढ़ा से सेंकना चाहिए। इसके अलावा लोध्र के सूक्ष्म चूर्ण (Lodhra Powder) को स्वच्छ कपड़े के टुकड़े में बांधकर पोटली बना लें। इसे गुनगुने जल में डुबाकर आंखों को सेंकना चाहिए।
सफेद लोध्र को घी में भूनकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को गुनगुने जल में भिगोकर, खूब मल लें। इसे ठंडा करके कपड़े से छानकर आंखों को धोने से आँखों के दर्द से छुटकारा मिलता है।
लोध्र को पीसकर आंखों के बाहर चारों तरफ लेप करने से भी आंखों के रोगों का नाश होता है।
सेंधा नमक, त्रिफला, पीपल, लोध्र तथा काला सुरमा को बराबर मात्रा में लें। इसे नींबू के रस में घोंटकर आंख में काजल की तरह लगाएं। इससे भी आंखों के रोगों का नाश होता है।
हरड़ की गुठली की मींगी, हरड़ चूर्ण, हल्दी, नमक तथा लोध्र का बराबर मात्रा ले। इनके चूर्ण को हरड़ के पत्तों के रस में घोटकर आंख पर लगाने से भी आंखों से जुड़े विकारों का नाश होता है।
आँख आने पर पठानी लोध्र की छाल के चूर्ण को घी में भून लें। इसे आँख के बाहरी भाग में लेप लगाने से लाभ होता है। आप चिकित्सक से सलाह लेकर पतंजलि लोध्रा चूर्ण का प्रयोग भी कर सकते हैं।
पित्तरक्त के कारण आँख आने पर बराबर मात्रा में श्वेत लोध्र की छाल तथा मुलेठी का चूर्ण बना लें। इन्हें घी में भूनकर उसकी पोटली बनाकर दूध से भिगोएं। इसकी बूंदों को आंखों में डालने से काफी लाभ होता है।
आँख फूलने पर सफेद लोध्र की छाल के चूर्ण को गाय के घी में भून लें। इसकी पोटली बनाकर गुनगुने जल में भिगोकर, मसलकर, ठंडा कर लें। इस जल से आंखों को धोने से लाभ होता है।
आँखों में जलन, खुजली तथा दर्द आदि की हालत में घी में भुने लोध्र एवं सेंधा नमक को कांजी से पीसकर पोटली बना लें। इसकी बूँदों को आंखों में गिरने से जलन, खुजली तथा दर्द का नाश होता है।
पित्त, रक्त एवं वात विकार के कारण आँख आने पर नींबू के पत्ते तथा लोध्र की छाल को पुटपाक विधि से पकाएं।। इसके चूर्ण अथवा काढ़े में दूध मिलाकर आंखों में 2-2 बूंद टपकाने से लाभ होता है।
लोध्र तथा मुलेठी को समान मात्रा में लें। इनके चूर्ण बनाकर घी में भूनकर, बकरी के दूध में मिला लें। इसे आँखों पर लगाने से भी आँख आने की समस्या में लाभ होता है।
खून की अशुद्धता से आंख आने पर त्रिफला, लोध्र, मुलेठी, शक्कर और नागरमोथा का उपयोग करें। इनको समान मात्रा में लेकर जल में पीसकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को आंखों के बाहर चारों तरफ लगाने से लाभ होता है।
लाख, मुलेठी, मंजीठ, लोध्र, कृष्ण सारिवा तथा कमल को समान मात्रा में लेकर जल में पीसकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को आंखों के बाहर लगाने से भी आंखों की समस्या में लाभ होता है।
पीलिया में लोध्रा का इस्तेमाल लाभदायक
अगर पीलिया के लक्षणों से आराम नहीं मिल रहा है तो 15-20 मिली लोध्रासव (symplocos racemosa) का सेवन करने से पाण्डु (पीलिया) रोग में लाभ मिलने की संभावना रहती है।
कान के रोग में लोध्रा का इस्तेमाल फायदेमंद
कान के रोग से परेशान हैं? लोध्रा को दूध में पीसकर, छान लें। इसे कान में 1-2 बूंद डालने से कान के रोगों से राहत मिलती है।

दांतों के रोग में लोध्रा के उपयोग से लाभ

दांत की जड़ों/मसूड़ों से खून आने की स्थिति में लोध्रा की छाल का काढ़ा बना लें। इसका गरारा/कुल्ला करने से दांतों से खून आना बंद हो जाता है और मुंह के रोगों में लाभ होता है।
लोध्रा के सेवन से सूखी खाँसी का इलाज
लोध्रा के 2-3 ग्राम पत्तों को पीस लें। इसे घी में भूनकर उसमें शक्कर मिला लें। इसका सेवन करने से उल्टी बंद होती है, अधिक प्यास लगने की समस्या ठीक होती है, खांसी ठीक होती है तथा आँव-पेचिश आदि में लाभ होता है।
पेट के कीड़े को खत्म करने के लिए करें लोध्रा का उपयोग
पेट में कीड़ा हुआ है और इस परेशानी के कारण रातों की नींद हराम है। इसके लिए 15-20 मिली लोध्रासव का सेवन करने से पेट के कीड़े या तो नष्ट हो जाते हैं या निकल जाते हैं।
लोध्रा के उपयोग से श्वेतप्रदर/ल्यूकोरिया का इलाज
2-3 ग्राम पठानी लोध्र की छाल के पेस्ट में बरगद की छाल का 20 मिली काढ़ा मिला लें। इसे पीने से श्वेत प्रदर मतलब ल्यूकोरिया में लाभ होता है।
लोध्र का काढ़ा बनाकर योनि को धोने से ल्यूकोरिया तथा अन्य योनि-विकारों में लाभ होता है।
तुम्बी के पत्ते और लोध्र की छाल को बराबर मात्रा में पीस लें। इसे योनि पर लेप करने से प्रसूता स्त्री के योनि के घाव भर जाते हैं।
गर्भपात रोकने में मदद करता है लोध्रा
आठवें माह में यदि गर्भपात की आशंका हो तो 1-2 ग्राम लोध्र चूर्ण (lodhra powder), मधु और एक ग्राम पिप्पली चूर्ण को दूध में घोलकर गर्भवती को पिलाने से गर्भ स्थिर हो जाता है और गर्भपात होने का खतरा कम हो जाता है।
मासिक धर्म विकार में लोध्रा से फायदा
लोध्र की छाल को पीसकर पेट के निचले हिस्से में लगाएं। इससे मासिक धर्म विकारों में लाभ होता है। लोध्र को पीसकर स्तनों पर लेप करने से स्तन के दर्द ठीक होते हैं।
घाव सुखाने के लिए करें लोध्रा का इस्तेमाल
अर्जुन, गूलर, पीपल, लोध्र, जामुन तथा कटहल की छाल के महीन चूर्ण को घाव पर छिड़कने से घाव जल्दी भरता है।
लोध्र, मुलेठी, प्रियंगु आदि के चूर्ण को घाव के मुंह पर छिड़कें। इसे हल्का रगड़ कर पट्टी बाँध देने से खून का थक्का जम जाता है।
उभर रहे घाव में प्रियंगु, लोध्र, कट्फल, मंजिष्ठा तथा धातकी के फूल का चूर्ण छिड़कें। इससे घाव शीघ्र भर जाता है।
मुक्ताशुक्ति चूर्ण मिले हुए धातकी फूल के चूर्ण तथा लोध्र के चूर्ण (lodhra Churna) का प्रयोग करने से भी घाव शीघ्र भर जाता है।
डायबिटीज में लोध्रा 
डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए 15-20 मिली लोध्रासव का सेवन करने से धीरे धीरे रक्त मे शर्करा की मात्रा को कम करने में मदद मिलती है।
रक्तपित्त (नाक-कान से खून आना) की समस्या में लोध्रा 
खून की अशुद्धता में उशीरादि चूर्ण (खस, कालीयक, लोध्र आदि) अथवा लोध्र चूर्ण (1-2 ग्राम) में बराबर मात्रा में लें। इनमें लाल चंदन चूर्ण मिला लें। इसे चावल के धोवन में घोल कर शक्कर मिला कर पिएं। इससे रक्तपित्त (नाक-कान से खून आना), जलन, बदबूदार सांसों की बीमारी ठीक होती है।
लोध्रा के इस्तेमाल से मुंहासे का इलाज
लोध्र तथा अरहर को पीसकर मुंह पर लेप के रूप में लगाने से चेहरा कान्तियुक्त होता है तथा मुंहासों का नाश होता है।
बवासीर में लोध्रा 
15-20 मिली लोध्रासव (lodhradi) का सेवन करने से अर्श (बवासीर) में फायदा होता है।
बुखार में लोध्रा से फायदा
लोध्र (lodhradi), चन्दन, पिप्पली मूल तथा अतीस के 1-2 ग्राम चूर्ण में शक्कर, घी तथा शहद मिलाकर दूध के साथ पीने से बुखार उतर जाता है।
कुष्ठ रोग में लोध्रा 
कुष्ठ रोग के लक्षणों से आराम पाने के लिए 15-20 मिली लोध्रासव का सेवन करने से कुष्ठ (कोढ़) रोग से राहत मिलने में आसानी होती है।
त्वचा के लिए फायदेमंद लोध्रा
लोध्रा में शीत और कषाय गुण होने के कारण यह त्वचा पर होने वाले कील मुंहासे, जलन आदि स्थिति में ठंडक प्रदान करता है साथ ही त्वचा की सामान्य संरचना को बनाये रखता है।
अल्सर में सहायक लोध्रा 
अल्सर होने का कारण पित्त दोष का बढ़ना होता है जिसके वजह से प्रभावित स्थान पर अत्यधिक जलन होने लगता है। ऐसे में लोध्र के शीत गुण के कारण यह अल्सर जैसी परेशानी में भी लाभ पहुंचाता है साथ ही ये कषाय होने से अल्सर को शीघ्र भरने में मदद करता है।
नकसीर के इलाज में लोध्रा का उपयोग 
नकसीर होने का मुख्य कारण शरीर में पित्त होता है। ऐसे में शरीर में गर्मी बढ़ती है जो कि नकसीर का कारण बनती है। ऐसे में लोध्रा में पाए जाने वाले शीत गुण के कारण यह इस अवस्था में लाभ मदद करता है।
लोध्रा के सेवन की मात्रा

पेस्ट – 2-3 ग्राम