15.1.19

हृदय रोगियों के लिए उपकारी है पोटेशियम युक्त आहार

                                        

उच्च-पोटेशियम वाले खाद्य पदार्थ किसी भी संतुलित आहार का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। खनिज आपके शरीर के द्रव स्तर, मांसपेशियों के कार्य में सहायक और अपशिष्ट को हटाने में मदद करता है और आपके तंत्रिका तंत्र को ठीक से काम करने के लिए प्रेरित करता है। रिसर्च से पता चलता है कि उच्च रक्तचाप वाले लोगों में पोटेशियम युक्‍त फूड रक्तचाप और स्ट्रोक के जोखिम को कम कर सकता है। यहां हम आपको ऐसे ही कुछ पोटैशियम युक्‍त फूड के बारे में बता रहे हैं जिनका सेवन करना आपके लिए पूरी तरह से सुरक्षित है और स्‍वास्‍थ्‍य के लिए फायदेमंद भी है।
पोटैशियम युक्‍त  आहार 

आलू 

आलू में केले से ज्यादा पोटैशियम होता है। हैरान रह गए न आप? जी हां! एक मीडियम साइज के उबले हुए आलू में 941 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। ये दैनिक जरूरत का लगभग 20 प्रतिशत है। लेकिन इसके लिए आलू को उबलने के बाद थोड़ा थंडा हो जाने दीजिए। आलू में मौजूद स्टार्च गठिया रोग में भी फायदेमंद होता है। आलू के अलावा शकरकंद में भी भरपूर पोटैशियम होता है।

पालक

पालक गुणों की खान है और इसमें ढेर सारे मिनरल्स औैर विटामिन्स होते हैं। पालक में पोटैशियम की मात्रा भी भरपूर होती है। एक कप पालक में लगभग 540 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। इसके अलावा पालक आयरन और फाइबर का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए इसके सेवन से शरीर को कई स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं। एनीमिया में पालक के सेवन से लाभ मिलता है।

चुकंदर

चुकंदर में शरीर को फायदा पहुंचाने वाले ढेर सारे तत्व होते हैं। चुकंदर में पोटैशियम भी भरपूर पाया जाता है। एक कप चुकंदर में लगभग 518 मिलीग्राम पोटैशियम होता है जो आपकी दैनिक जरूरत का लगभग 11 प्रतिशत है। चुकंदर में आयरन भी भरपूर होता है इसलिए ये ब्लड में हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाता है और एनीमिया जैसे खून की कमी वाली बीमारियों से बचाता है। 




केला 

यदि आपने किसी पोटेशियम युक्त खाद्य पदार्थ के बारे में सुना है, तो आप शायद जानते होंगे कि केले एक अच्छा स्रोत हैं, जिसमें लगभग 400 मिलीग्राम से अधिक पोटेशियम होता है। केले एक हेल्‍दी और एनर्जी स्नैक हैं। यह विटामिन बी 6 में उच्च होता है और फाइबर और विटामिन सी का एक अच्छा स्रोत है।

शकरकंद

शकरकंद में भरपूर मात्रा में पोटेशियम होता है। एक सामान्‍य आकार की शकरकंद में 694 मिलीग्राम तक पोटेशियम होता है। यह हमारी रोजमर्रा की जरूरत का 15 फीसदी होता है। इसके साथ ही इसमें कैलोरी की मात्रा भी कम होती है। एक शकरकंद में केवल 131 कैलोरी होती हैं। यानी शकरकंद का सेवन हमारी सेहत पर दोतरफा सकारात्‍मक प्रभाव डालता है। इतना ही नहीं शकरकंद में बीटा कोरटेन और विटामिन ए भी भरपूर मात्रा में होता है। इन खूबियों के कारण आप इसे सुपरफूड भी कह सकते हैं। 

संतरे का जूस

संतरे का जूस नाश्‍ते में बेहद फायदेमंद होता है। संतरे को विटामिन सी से भरपूर माना जाता है। लेकिन, इसके साथ ही इसमें भरपूर मात्रा में पोटेशियम भी होता है। इसकी सबसे अच्‍छा बात यह है कि इसे बनाना भी बेहद आसान है। और साथ ही अगर आपको संतरे को यूं ही खाना चाहें तो भी कोई दिक्‍कत नहीं। 

पत्‍तेदार सब्जियां 

यह पत्‍तेदार सब्जी न केवल विटामिन ए और विटामिन 'के' से भरपूर होती है, बल्कि साथ ही इसमें पोटेशियम भी काफी मात्रा में होता है। इसके महज आधे कप में 655 मिलीग्राम पोटेशियम होता है। इसका सेवन करने से पोषण संबंधी आपकी काफी आवश्‍यकतायें पूरी हो सकती हैं। यह सुपरफूड वीटा कोर‍टेन और विटामिन ए से भी भरपूर होता है।

खजूर

अपनी गर्म तासीर के लिए खजूर सर्दियों का खास ड्राई फूट होता है। मूल रूप से मध्‍य एशिया का खजूर स्‍वाद में तो लाजवाब होता ही है साथ ही इसके कई स्‍वास्‍थ्‍य लाभ भी होते हैं। आधा कप खजूर में 584 मिलीग्राम पोटेशियम होता है। खजूर को आप दूध के साथ भी खा सकते हैं। 

टमाटर

टमाटर सलाद से लेकर सब्‍जी तक में इस्‍तेमाल किया जाता है। लाल टमाटर भारत के सतरंगी भोजन का अहम हिस्‍सा है। चौथाई कप टमाटर पेस्‍ट में 2.8 मिलीग्राम विटामिन ई होता है। यह हमारी रोजमर्रा की जरूरत का पांचवां हिस्‍सा होता है। इसके साथ ही इसमें 664 मिलीग्राम पोटेशियम, 34 मिलीग्राम लिकोपिन और 54 कैलोरी होती हैं। अपनी इन खूबियों के कारण इसे सुपरफूड भी कहा जा सकता है। 

दही

दही में कई पोषक तत्‍व होते हैं। इसमें कैल्श्यिम भी भरपूर मात्रा में होता है, जो हमारी हड्डियों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। लेकिन, शायद आपको यह न पता हो कि दही में पोटेशियम भी प्रचुर मात्रा में होता है। करीब 220 ग्राम नॉन-फैट दही में 579 मिलीग्राम तक पोटेशियम होता है।





9.12.18

सूर्य स्नान करने की विधि और फायदे

                                                         
अग्नि तत्व जीवन का उत्पादक होता है। गर्मी के बिना कोई जीव या पौधा न तो उत्पन्न हो सकता है और न ही विकसित। चैतन्यता जहां कहीं भी दिखाई देती है, उसका मूल कारण गर्माहट ही है। गर्माहट के समाप्त होते ही क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है। अगर शरीर की गर्मी का अंत हो जाये तो जीवन का अंत ही समझा जाता है। अग्नि तत्व को सर्वोपरि समझते हुए आदि वेद ऋग्वेद में सर्वप्रथम मंत्र अक्षर 'अग्नि' ही आया है। सूर्य अग्नि तत्व का मूर्तिमान स्वरूप है, इसीलिए सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि जिन पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं को धूप पर्याप्त मात्र में मिलती है, वे स्वस्थ व निरोग रहते हैं। उसके विपरीत जहां सूर्य की जितनी कमी होती है, वहां उतनी ही अस्वस्थता रहती है। एक कहावत है-जहां धूप नहीं जाती, वहां डॉक्टर जाते हैं, अर्थात प्रकाश रहित स्थानों में बीमारियों का निवास हो जाता है। भारतीय तत्ववेत्ता अति प्राचीन काल से सूर्य के गुणों से परिचित हैं, इसीलिए उन्होंने सूर्य की उपासना की अनेक विधि-व्यवस्थायें प्रचलित कर रखी हैं। अब पाश्चात्य भौतिक विज्ञान द्वारा भी सूर्य के अद्भुत गुणों से परिचित होते जा रहे हैं।
 सूर्य की सप्त किरणों में 'अल्ट्रा वायलेट' और 'अल्फा वायलेट' किरणें उपस्थित रहती हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभप्रद होती हैं। आजकल इन किरणों को मशीनों के माध्यम से कृत्रिम रूप में भी पैदा किया जाने लगा है परंतु जितना लाभ सूर्य से आने वाली किरणों द्वारा होता है, उतना मशीन द्वारा कृत्रिम किरणों से नहीं होता। यूरोप एवं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी अब सूर्य किरणों द्वारा उपचार विधियों का चलन जोरों पर हो गया है। वहां अनेक ऐसे औषधालय हैं जो मात्र सूर्य शक्ति से बिना किसी अन्य औषधियों के प्रयोग किए जटिल रोगों की चिकित्सा सफलतापूर्वक कर रहे हैं।
'क्रोमोपैथी' नामक एक स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति का ही आविष्कार हो चुका है, जिसमें रंगीन कांच की सहायता से सूर्य की वांछित किरणों को आवश्यकता के अनुसार रोगी तक पहुंचाया जाता है। रोग के कीटाणुओं का नाश करने की जितनी क्षमता धूप में है, उतनी और किसी वस्तु में नहीं होती। क्षय के कीड़े जो बड़ी मुश्किल से नष्ट होते हैं, सूर्य के सम्मुख रखने से कुछ ही मिनटों में नष्ट हो जाते हैं। वेटिव, लुक्स, जानसन, रोलियर, लुईस, रेडोक, टाइरल आदि अनेक उच्च कोटि के सुप्रसिद्ध चिकित्सकों ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में सूर्य किरणों की सुविस्तृत महिमा का वर्णन किया है और बताया है कि 'सूर्य से बढ़कर अन्य किसी औषधि में रोग निवारक शक्ति है ही नहीं।
सूर्य किरणों से निरोग और रोगी सभी को समान रूप से फायदा होता है, इसलिए नित्य नियमित रूप से अगर 'सूर्य स्नान किया जाय तो स्वास्थ्य सुधार में आश्चर्यजनक रूप से सहायता मिल सकती है। 

सूर्य स्नान की विधि:- नियमित रूप से सूर्य स्नान करते रहने से हर अवस्था के तथा हर रोग से ग्रस्त स्त्री-पुरूष तथा बच्चे स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकते है। सूर्य की किरणें शरीर में भीतर तक प्रवेश कर जाती है और रोग के कीटाणुओं को नष्ट कर देती है। पसीने द्वारा शरीर में स्थित विकारों को बाहर निकालकर अपनी पोषक शक्ति से क्षत विक्षत एवं रूग्ण अंगों को बल प्रदान करना सूर्य-किरणों का प्रमुख कार्य होता है।
टूटी हुई हड्डियों को जोडऩे, घावों को भरने तक से सूर्य-स्नान से लाभ पहुंचता है। यूं तो सूर्य-स्नान किसी भी ऋतु में किया जा सकता है, परंतु इसके लिए शीत-ऋतु अत्यन्त लाभकारी मानी जाती है। सूर्य-स्नान के लिए प्रात: काल का समय सबसे अच्छा माना जाता है। दूसरे दर्जे का समय संध्याकाल का होता है।
इसके लिए हल्की किरणें ही उत्तम होती है। तेज धूप में बैठने से अनेक त्वचा रोग हो सकते हैं। सूर्य-स्नान को आरंभ में आधे घंटे से ही शुरू करना चाहिए। फिर धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हुए एक डेढ़ घंटे तक ले जाना चाहिए।
 सूर्य-स्नान करते समय मात्र तौलिया पहनकर ही धूप में बैठना चाहिए। समस्त शरीर नंगा रहने पर सूर्य की किरणों को शरीर सोखता है। अगर एकांत व सुरक्षित स्थान हो तो तौलिया को भी हटाया जा सकता है। सूर्य-स्नान करते समय सिर को तौलिया या हरे पत्तों से ढक लेना चाहिए।
   केला एवं कमल जैसा शीतल प्रकृति वाला पत्ता मिल जाए तो अति उत्तम होता है। नीम के पत्तों का गुच्छा बनाकर भी सिर पर रखा जा सकता है। जितनी देर सूर्य-स्नान करें, उतने समय को चार भागों में बांटकर अर्थात् पेट का भाग, पीठ का भाग, दाई करवट तथा बाईं करवट को सूर्य की किरणों के सामने बारी-बारी से रखना चाहिए जिससे हर अंग में समान रूप से धूप लग जाये। धूप सेवन करने के बाद ताजे पानी में भिगोकर निचोड़े हुए मोटे तौलिए से शरीर के हर अंग को रगडऩा चाहिए जिससे गर्मी के कारण रोमकूपों द्वारा भीतर से निकाला हुआ विकार शरीर से ही चिपका न रह जाये।
  धूप का सेवन खाली पेट ही करना चाहिए। धूप सेवन के कम से कम दो घंटे पहले और आधे घंटे बाद तक कुछ नहीं खाना चाहिए। सूर्य का स्थान ऐसा होना चाहिए जहां पर जोर से हवा के झोंके न आते हों। धूप सेवन के बाद स्वभावत: शरीर हल्का एवं फुर्तीला हो जाता है परंतु अगर ऐसा न हो तो देह और भारी मालूम पडऩे लगती है।
अगर ऐसी बात हो तो कुछ देर और धूप स्नान करना चाहिए। अगर स्थिति और ऋतु अनुकूल हो तो सूर्य स्नान के बाद ताजे जल से स्नान कर लेना चाहिए। जिस दिन बादल हों या तेज हवा चल रही हो, उस दिन सूर्य स्नान नहीं करना चाहिए।


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

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आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार





5.12.18

नाक, कान, गला के रोगों से निजात पाने के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपाय



ईएनटी (ईयर, नोज एंड थ्रोट) का संक्रमण किसी भी को हो सकता है। फिर चाहे वह बच्‍चा हो या बड़ा। आमतौर पर इस संक्रमण के लक्षण में ही दिखाई देते हैं। इस बीमारी के कुछ लक्षण हैं - गाल में दर्द के साथ नाक से गाढा बलगम निकलना, नाक बहना, सिरदर्द, बुखार और कुछ भी निगलने में परेशानी कान में इंफेक्‍शन होने से हमेशा तरल पदार्थ बाहर निकलता रहता है। सुनने में परेशानी होती है और संक्रमण की वजह से दर्द और सूजन भी हो जाती है।

ईएनटी के संक्रमण से बचने के उपाय –

इस संक्रमण की शुरूआत जुकाम से होती है। इसलिए जुकाम को शुरूआती स्‍तर पर ही पहचान लीजिए। इससे बचने के लिए जुकाम की शुरुआत में ही भाप लीजिए। जिससे संक्रमण नहीं होगा। और संक्रमित बलगम बाहर निकल जाएगा।
ईएनटी के संक्रमण से बचने के लिए तैराकी करते वक्‍त विशेष ध्‍यान देना चाहिए। तैराकी के दौरान कान को और आंख को संक्रमण से बचाने के लिए कान में ईयर प्‍लग और चश्‍मा लगाकर ही तैराकी कीजिए।
अगर गले में खराश हो तो हल्‍के गुनगुने पानी में नमक डालकर गरारा कीजिए। इससे खराश में फायदा होता है। साथ ही गले का संक्रमण नहीं। दिन में कम से कम तीन से चार बार गरारा कीजिए। गरारा करने से रक्‍त संचार भी अच्‍छा होता है।
अगर आपकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है तो लोगों के संपर्क में आने से बचने की कोशिश कीजिए। भीड़-भाड़ वाले इलाके में जाने से परहेज कीजिए। जिससे आपको संक्रमण न हो।
यदि जुकाम से ज्‍यादा परेशान हैं तो हवाई यात्रा नहीं करनी चाहिए। हवाई यात्रा करने से संक्रमण बढ कर साइनस का रूप ले सकता है और कान को भी प्रभावित कर सकता है।
मादक पदार्थों का सेवन करने से बचें। धूम्रपान और शराब पीने से सइनस का संक्रमण बढ जाता है।
फलों और सब्जियों का ज्‍यादा मात्रा में सेवन करें। डेयरी उत्‍पाद का सेवन कम कीजिए।

कान दर्द

कारण

कान इके अन्दर मैल फूल जाने, घाव हो जाने, कान में सूजन होने या संक्रमण के कारण कान में दर्द होता हैं। गले या नाक में संक्रमण होने पर समय रहते चिकित्सा न की जाए, तो उससे भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

कान का सूजना, कान से मल निकलना, कानों में रूक – रूक कर दर्द होना आदि।

घरेलू चिकित्सा

तुलसी के पत्तों का रस निकलकर गुनगुना कर लें और दो – तीन बूँद सुबह – शाम डालें।

नींबू का रस गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
प्याज का रस निकालकर गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
बकरी का दूध उबाल कर ठंडा कर लें। जब गुनगुना रह जाएं, तो इसमें सेंधानमक मिलाकर 2 – 3 बूँद दोनों कानों में टपकाएं।
मूली के पत्तों को कूटकर उसका रस निकालें। रस की एक तिहाई मात्रा के बराबर तिल के तेल के साथ आग पर पकाएं। जब केवल तेल ही बचा रह जाए, तो उतार कर छान लें। कान में 2 -3 बूँद डालें।
कपूर व घी समान मात्रा में लेकर पकाएं। पकने पर उतार कर ठंडा कर लें व 2 – 3 बूँद कानों में डालें।
आक के पत्तों का रस, सरसों का या तिल का तेल तथा गोमूत्र या बकरी का मूत्र बराबर मात्रा में लेकर थोड़ा गर्म करें और कान में 2 – 3 बूँद डालें।
लहसुन की दो कलियाँ छीलकर सरसों के तेल में डाकार धीमी आंच पर पकाएं। जब लहसुन जलकर काला हो जाए, तो उसे उतार कर ठंडा करें व छान कर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
अदरक का रस, सेंधानमक, सरसों का तेल व शहद बराबर मात्रा में लेकर गर्म करें और गुनगुना होने पर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
आक की पकी हुई पीली पत्ती में घी लगाकर आग पर गर्म करें। इसे निचोड़कर रस निकालें व दो – तीन बूँद कानों में डालें।
आम की पत्तियों का रस निकालकर गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

महत्पंचमूल सिद्ध तेल, सुरसादि पक्व तेल का प्रयोग किया जा सकता हैं। रामबाण रस, लक्ष्मीविलास रस व संजीवनी वटी का प्रयोग खाने के लिए करें।




कान बहना


कारण

जुकाम, खांसी या गले के संक्रमण की चिकित्सा न की जाए, तो कान में भी संक्रमण हो जाता हैं। छोटे बच्चे जिनका गला खराब हो या खांसी हो, जब कान में मुंह लगाकर धीरे से कोई बात करते हैं, तो सांस के साथ रोग के जीवाणु कान में पहुँच जाते है। कान में फोड़ा – फुंसी हो, पानी, रूई या अन्य कोई बाहरी वस्तु कान मे रह जाए, तो भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

रोगी के कान से बदबूदार स्राव या मवाद बाहर निकलती हैं।

घरेलू चिकित्सा

लहसुन की दो कलियाँ व नीम की दस कोपलें तेल में गर्म करें। दो – दो बूँद दिन में तीन – चार बार डालें।
150 ग्राम सरसों का तेल किसी साफ़ बर्तन में डालकर गर्म करें और गर्म होने पर 10 ग्राम मोम दाल दें। जब मोम पिघल जाए तो आग पर से उतार लें और इसमें 10 ग्राम पिसी हुई फिटकरी मिला दें। 3 – 4 बूँद दवा सुबह – शाम कान में डालें।
2 पीली कौड़ी का भस्म 200 मिली ग्राम व दस ग्राम गुनगुने तेल में डालें। छानकर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
नींबू के रस में थोड़ा सा सज्जीखार मिलाकर 2 – 3 बूँद कान में टपकाएं। आग से उतार कर ठंडा करें व छानकर रख लें। 2 – 3 बूँद कान में डालें।
10 ग्राम रत्नजोत को 100 ग्राम सरसों के तेल में जलाएं। ठंडा होने पर छानकर रखें और 2 – 3 बूँद कान में डालें।
धतूरे की पत्तियों का रस निकालकर थोड़ा गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।
नीम की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
तुलसी की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
आधा चमच्च अजवायन को सरसों या तिल के तेल में गर्म करें। फिर आंच से उतार लें। गुनगुना रह जाने पर 2 – 3 बूँद डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

आरग्वधादि क्वाथ से कान को धोएं। पंचवकल क्वाथ या पंचकषाय क्वाथ का प्रयोग भी किया जा सकता हैं। समुद्रफेन चूर्ण का प्रयोग भी लाभदायक होता है।



नासास्रोत शोथ


कारण

चेहरे की हड्डियों में स्थित गुहाएं (रिक्त स्थान) जोकि नाक से सम्बद्ध हैं, साइनस कहलाती हैं। ये स्लेश्म्कला से ढकी रहती हैं एवं चार प्रकार की होती हैं और जिस हड्डी में स्थित हैं, उनके अनुसार इनका नामकरण किया गया हैं। जुकाम या इन्फ्लुएंजा के उपद्रव के रूप में या संक्रमण के कारण इनमें सूजन आ जाने को साइनुसाइटिस या नासास्रोत शोथ कहते हैं।

लक्षण

किसी साइनस में शोथ होने पर एक ओर नासिका से स्राव होता हैं, साथ ही वेदना की शिकायत भी रहती हैं। जिस साइनस में शोथ हो, उसी के अनुसार वेदना की प्रतीति भी माथे व चेहरे के विभिन्न भागों में होती हैं।

घरेलू चिकित्सा
रोगी को पसीना आने वाली दवा दें, ताकि शोथ के कारण पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद नासागुह के छिद्र खुल जाएं। इसके लिए रोगी को अदरक, लौंग, काली मिर्च, बनफशा की चाय पिलाएं।
एक ग्राम काली मिर्च को आधा चमच्च देसी घी में गर्म करें। ठंडा होने पर ह्वान लें व दो – तीन बूँद नाक के दोनों छिद्रों में तीन बार डालें।
अदरक या सफेदे के पत्ते पानी में उबालकर भाप लें।
5 ग्राम अदरक घी में भूनकर सुबह – शाम लें।
5 ग्राम अदरक को पाव भर दूध में उबालें। यह दूध नाक के नासाछिद्रों में भर कर रखें।
जलनेति – 1 लीटर पानी को नमक डाल कर उबालें। गुनगुना रहने पर टोंटीयुक्त लोटे में भरकर बाएँ नाक से पानी लेकर दाएं से निकालें।फिर दाएं से लेकर बाएँ से निकालें। अंत मैं बारी – बारी से दोनों नाकों से पानी लेकर मुंह से निकालें।

पेटेंट दवाएं







30.10.18

ईसीपी (एक्सटर्नल काउंटर पल्स) से भी हार्ट ब्लॉकेज का इलाज संभव और कारगर

                                  
हार्ट में ब्लॉकेज को हटाने की बजाय हृदय की क्षमता बढ़ाने का ट्रीटमेंट होने लगा है। इसमें ना एंजियोप्लास्टी और ना ही बायपास सर्जरी की जाती है। ईसीपी (एक्सटर्नल काउंटर पल्स) में अधिकतम 35 दिन के ट्रीटमेंट से हृदय के सारे बायपास रूट खोले जाते हैं। अब तक प्रचलित एंजियोप्लास्टी और बायपास की बजाय ईसीपी से भी इलाज होने लगा है। इसमें ब्लॉकेज 80 फीसदी होने का इंतजार नहीं किया जाता है।
साओल के संस्थापक व कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिमल छाजेड़ बताते हैं कि थोड़े ब्लॉकेज में ही हृदय की क्षमता बढ़ाने का काम शुरू किया जाता है। इसमें प्राकृतिक तरीके से रक्त सप्लाई की मात्रा घटा-बढ़ाकर हृदय की क्षमता बढ़ाई जाती है। खिलाड़ियों के हृदय जितनी हार्ट की कैपेसिटी की जाती है। इसमें अधिकतम 30-35 दिन की सिटिंग में हृदय के सारे बायपास रूट खोल दिए जाते हैं।
वो सबकुछ जो नैचुरल बायपास में होता है
छोटी धमनियां करते हैं सक्रिय :

हृदय की कोई बड़ी धमनी के ब्लॉकेज होने पर छोटी-छोटी कई धमनियां उसका काम संभालती है। बड़ी धमनी के ब्लॉकेज पर इन छोटी धमनियों को खोला जाता है। हृदय के रक्त प्रवाह को सामान्य रखा जाता है। इसे नैचुरल बायपास कहते हैं।

रक्त स्टोरेज को पहुंचाते है दिल तक : इसमें मशीन से हाथ व पैरों में के उन भागों पर पट्टे बांधें जाते हैं जहां रक्त का स्टोरेज ज्यादा है। जब-जब सामान्य प्रक्रिया से रक्त हृदय तक पहुंचता है तब मशीन से दबाव बनाकर सामान्य से अधिक रक्त हृदय तक पहुंचाया जाता हैं। इससे हृदय की धमनियों की क्षमता बढ़ने लगती है।
नार्मल हार्ट अटैक
कारण -हृदय तक रक्त पहुंचाने का काम कोराेनरी आर्टरीज करती हैं। इसकी भीतरी सतह पर वसा के छोटे-छोटे कण एक साथ जमा होने से इसे संकरी कर देते हैं। इससे हृदय तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुंचता और हार्ट अटैक की आशंका रहती है।
सलाह - कॉलेस्ट्रॉल मेंटेन रखने के लिए नियमित वर्कआउट जरूरी है। हर दिन कम से कम 30 मिनट वर्क आउट करना चाहिए। इसके लिए वॉकिंग, जॉगिंग, गार्डनिंग, स्विमिंग और साइकिलिंग कर सकते हैं।


3 तरह के कॉलेस्ट्रॉल जिनसे होता है हृदयाघात

1. एचडीएल : यह गुड कोलेस्ट्रोल है, जिसकी मात्रा 60 एमजीडीएल होनी चाहिए। शहर में इस कोलेस्ट्रोल के कम केस हैं।
2. एलडीएल : यह बेड कोलेस्ट्रोल है, जिसकी सामान्य रेंज 100 एमजीडीएल से कम होती है। पश्चिमी देशों में ज्यादा होता है।
3. ट्राईग्लिसराइड : इसकी मात्रा शरीर में 150 एमजीडीएल से कम होनी चाहिए। शहर में इसी के सबसे ज्यादा केस।
यहां है तकनीक
ईसीपी यूएसए के 200 हॉस्पिटल में है। चाइना में 10 हजार से ज्यादा सेंटरों पर इससे इलाज होता है। भारत में एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट, मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट आदि में इस मशीन से बीते दो-तीन साल से इलाज होने लगा है।
बदलती जीवनशैली से हृदय रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। गांवों में 15 तो शहरों में 30 फीसदी लोग हृदय के किसी न किसी रोग से ग्रसित हैं। पिछले एक दशक में 4 गुना हृदय रोग बढ़ा है। इसमें भी युवाओं व महिलाओं की संख्या ज्यादा है।
महिलाओं में 60 फीसदी हृ़दयाघात के मामलों में चेस्ट पैन महसूस ही नहीं होता है। महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले हृदय घात दबे पांव आता है। समय पर चिकित्सकीय सहायता लेने से 80 फीसदी मामलों में खतरा टाला जा सकता है।


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि



9.10.18

आयुर्वेदिक चिकित्सा मे शल्य क्रिया का महत्व


                                                                          


आयुर्वेद की आठ शाखाओं में से एक शल्य तंत्र या सर्जरी शुरुआत से ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी विधा रही है. वाराणसी के महाराजा काशीराज दिवोदास धन्वंतरि आयुर्वेद में शल्य संप्रदाय के जनक रहे हैं.
आचार्य सुश्रुत (500 ई.पू.) काशीराज दिवोदास धन्वंतरि के सात शिष्यों में प्रमुख थे. उन्होंने काशी (वाराणसी) में शल्य चिकित्सा सीखी और चिकित्सा कार्य किया. उन्होंने आयुर्वेद के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक सुश्रुत संहिता की रचना की जो शल्य चिकित्सा के मूल सिद्धांतों पर उपयोगी जानकारी देती है.
उन्होंने कई शल्य चिकित्साओं से जुड़ी कारगर विधि और तकनीक के बारे में विस्तार से लिखा है. क्षतिग्रस्त नाक को फिर से बनाना (राइनोप्लास्टी), कान की लौ को फिर से ठीक करना (लोबुलोप्लास्टी), मूत्र थैली की पथरी को निकालना, लैपरोटोमी और सिजेरियन सेक्शन, घाव का उपचार, जले, टूटी हड्डी जोडऩा, कोई आंतिरक फोड़ा, आंत और मूत्र थैली के छिद्रों से जुड़े उपचार, प्रोस्टेट का बढऩा, बवासीर, फिस्टुला आदि के उपचार की कारगर विधि की खोज, शल्य चिकित्सा में उनकी दक्षता को दर्शाते हैं.
सुश्रुत के डिजाइन किए हुए सर्जिकल उपकरण
क्षारकर्म, अग्निकर्म और जलौका अवचरण उनके खोजे उपचार की अन्य विधियां हैं जो कई ऐसी बीमारियों को भी ठीक कर सकती हैं जिनके इलाज के लिए सर्जरी ही एकमात्र विकल्प समझा जाता है. उन्होंने छह विभिन्न श्रेणियों में 100 से अधिक विकसित चिकित्सीय औजार और विभिन्न शल्य क्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले 20 प्रकार के धारदार सर्जिकल उपकरणों को विकसित किया.
इसके साथ-साथ विभिन्न सुइयां और टांके लगाने में काम आने वाले रेशम और लिनन के धागे, पौधों के रेशे और कोशिका ऊतक भी डिजाइन किया. उन्होंने आंत के छिद्र की सर्जरी में चींटे के जबड़े का प्राकृतिक रूप से गलकर नष्ट हो जाने वाले क्लिप के रूप में प्रयोग किया, जो नए-नए प्रयोगों और तकनीक के उपयोग में उनकी दूरदर्शिता का परिचय देता है.
वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने नेत्र रचना विज्ञान, नेत्र की व्याधियों और नेत्र चिकित्सा पर चर्चा की. नजर की कमजोरी, मोतियाबिंद की सर्जरी के सफेद भाग, नेत्रों के पलक से जुड़ी समस्याओं एवं अन्य कई नेत्र रोगों और उनके निदान का तरीका बताया.



उन्होंने कान, नाक और गले में होने वाली विभिन्न बीमारियों और उनकी चिकित्सा के बारे में भी विस्तार से वर्णन किया है.
शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान और आयुर्वेद के अन्य मूलभूत सिद्धांतों के क्षेत्र में उनके कार्य को देखते हुए उन्हें 'शल्य चिकित्सा का जनक' भी कहा जाता है.
हालांकि शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में उनका योगदान सर्वाधिक है, पर उन्होंने स्त्रीरोग, प्रसूति चिकित्सा और शिशु चिकित्सा प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है.
सुश्रुत के समय में आयुर्वेद में सर्जरी का बड़ा प्रचलन था. लेकिन समय के साथ शल्य चिकित्सा का प्रयोग कम होता चला गया.
विश्वविद्यालयों में आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को पढ़ाए जाने की शुरुआत 1927 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हुई थी.
फिर 1964 में आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की शुरुआत हुई तो आधुनिक युग में आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के प्रयोग का दौर आरंभ हुआ.
कई प्रसिद्ध आयुर्वेदिक सर्जन विश्वविद्यालय से जुड़े और आयुर्वेद में शल्य प्रणाली के शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध एवं उपयोग के क्षेत्र में सराहनीय योगदान दिया. उनमें से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के संस्थापक निदेशक प्रोफेसर के.एन. उडुपा का विशेष योगदान रहा है. प्रोफेसर उडुपा 1959 में बीएचयू के साथ आयुर्वेद कॉलेज के प्रिंसिपल और सर्जरी के प्रोफेसर के रूप में जुड़े.
प्रोफेसर के.एन. उडुपा के योग्य नेतृत्व में 1970 के दशक में आयुर्वेद और आधुनिक मेडिसिन, दोनों का ही भरपूर विकास हुआ. आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के पुनरुद्धार की इस प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए.
-कई प्राचीन शल्य चिकित्सा सिद्धांत एवं दर्शन को स्थापित करना
-सुश्रुत संहिता जैसे आयुर्वेद के प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ में वर्णित शल्य प्रक्रिया और तकनीक को प्रयोग में लाना
-शल्य कर्म के जरिए ठीक होने वाले रोगों में आयुर्वेद की विशिष्ट चिकित्सा कर्म और औषधि से चिकित्सा करना
-जिन बीमारियों के लिए शल्य क्रिया की जरूरत होती है, उनके स्थान पर क्षारकर्म, अग्निकर्म और जलौका अवचरण जैसे उपचार, जो बस आयुर्वेद में ही हैं और इनके प्रयोग से शल्य क्रिया से बचा जा सकता है.
आयुर्वेद में प्रचलित विभिन्न शल्य क्रियाओं में से कुछ की तो विश्वस्तर पर मान्यता है और क्षारसूत्र से फिस्टुला जैसी बीमारी का उपचार तो इसके सबसे उत्तम और कारगर उदाहरणों में से एक है.
भगंदर का क्षारसूत्र उपचार
गुदामार्ग और गुदाद्वार की बाहरी सतह के बीच एक पुरानी सूजन के कारण एक असामान्य सुराख बन जाने को गुदा का भगंदर कहते हैं. इस बीमारी का सबसे प्रचलित उपाय है—शल्य चिकित्सा. गुदा के भगंदर के उपचार के लिए आधुनिक सर्जरी में कई उपकरण और नई तकनीक के आने से इलाज ज्यादा आधुनिक तो हो गया है लेकिन इसका अंतिम परिणाम अब भी बहुत संतोषप्रद नहीं है, क्योंकि सर्जरी के बाद भी बीमारी फिर से उभर आती है.


साथ ही, मल द्वार के सिकुड़ जाने, सर्जरी के दौरान हुई क्षति के कारण मल को रोकने पर नियंत्रण में कमी जैसी बड़ी परेशानियां आ खड़ी होती हैं. कई बार तो ये परेशानियां मूल बीमारी से ज्यादा गंभीर हो जाती हैं.
आयुर्वेद में गुदा के फिस्टुला के लिए एक अनूठी उपचार पद्धति बताई गई है. एक औषधियुक्त धागा—क्षारसूत्र को भगंदर क्षेत्र में बांधा जाता है. धीरे-धीरे यह पूरे भगंदर क्षेत्र को काटकर अलग कर देता है और गुदा मार्ग की संकुचक मांसपेशियों को बिना कोई नुक्सान पहुंचाए बीमारी को ठीक कर देता है.
उपचार की इस तकनीक को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के शल्य तंत्र विभाग ने फिर से स्थापित किया और इसे केंद्रीय आयुर्वेद शोध परिषद (सीसीआरएएस) एवं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) द्वारा विधिवत मान्यता प्रदान की गई.
क्षारसूत्र एक औषधियुक्त धागा (रासायनिक बत्ती) है जिसे अपामार्ग, कदली, पलाश, नीम आदि वनस्पतियों के अवयव को गुग्गलु और हरिद्रा जैसे अन्य पौधों के साथ मिलाकर बनाया जाता है. शल्य कार्य में प्रयुक्त होने वाले लिनेन के धागे पर इन अवयवों को बार-बार लपेटकर इसे उपचार में प्रयोग के योग्य बनाया जाता है.
सामान्य और छोटे भगंदर की स्थिति में उपचार की सफलता दर शत-प्रतिशत है और जटिल, पुराने और दोबारा उभरे भगंदर के उपचार में इसकी सफलता का दर 93 से 97 प्रतिशत तक रहता है. इस विधि से 40,000 से ज्यादा रोगियों का सफलतापूर्वक उपचार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एस.एस. अस्पताल के गुदा व मलाशय रोग विभाग में किया जा चुका है.
इस उपचार विधि के लाभ को पहचानते हुए आयुष मंत्रालय ने 2013 में क्षारसूत्र उपचार पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल (एस.एस. हॉस्पिटल) में नेशनल रिसोर्स सेंटर की स्थापना की है. यह केंद्र गुदामार्ग और मलाशय में आमतौर पर होने वाली बीमारियों, जिसमें भगंदर भी शामिल है, के उपचार से संबंधित सभी मूलभूत और आधुनिक सुविधाओं से लैस है.
बवासीर भी एक अन्य आम समस्या है और 10 करोड़ से अधिक भारतीय इस रोग के शिकार हैं. आयुर्वेद में कब्ज और आंतों से जुड़ी परेशानियों को जड़ से मिटाने के लिए बहुत-सी औषधीय वनस्पतियां बताई गई हैं. क्षारसूत्र का प्रयोग और अथवा क्षार (औषधीय वनस्पतियों से प्राप्त लेई) का प्रभावित क्षेत्र पर लेप करके बवासीर के मस्से को अलग कर देना इस रोग को ठीक करने के बड़े कारगर उपाय हैं.
शल्य क्रिया में घाव का उपचार भी एक अन्य क्षेत्र है जिसमें आयुर्वेद का योगदान असाधारण है. 100 से ऊपर विधियां और पाउडर, पेस्ट, पत्तों के ताजा रस, मरहम, एवं औषधीय तेल तथा घी से बनी सामग्रियों के रूप में अनेक प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं जिनका प्रयोग करके पुराने और आसानी से नहीं भरने वाले घावों को ठीक किया जा रहा है. आसानी से नहीं सूखने वाले घाव के उपचार का आयुर्वेद का मूलभूत सिद्धांत है- दुष्ट व्रण (घाव) को शुद्ध व्रण में परिवर्तित कर दिया जाए.


इसके लिए विभिन्न स्तरों पर अनेक प्रकार की दवाइयों की जरूरत होती है. दुष्ट व्रण या खराब घाव आमतौर पर निर्जीव उत्तकों से भरे ऐसे संक्रमित घाव होते हैं जिससे दुर्गंध और मवाद आती है. नीम, करंज, पपीता, दारुहरिद्रा आदि वनस्पतियां दुष्ट व्रण को शुद्ध व्रण में बदल देती हैं इसलिए इन्हें व्रण शोधन दवाएं भी कहा जाता है. जबकि चमेली, हरिद्रा, मंजिष्ठा, दूर्वा, चंदन घावों को तीव्रता से भरने में सहयोगी होते हैं इसलिए इन्हें व्रण रोपण दवाएं कहा जाता है.
कुछ दवाएं ऐसी भी हैं जो घावों की चिकित्सा के दोनों चरणों में उपयोगी होती हैं. पंचवल्कल (पंच-पांच, वल्कल-छाल) जो आयुर्वेद में घाव भरने हेतु लाभकारी प्रभाव के लिए वर्णित है, में वट, उदुबंर, पीपल, पारीष और पलक्ष जैसे पांच पौधों की छाल शामिल हैं. ये पौधे पूरे देश में सामान्य रूप से और प्रचुरता से उपलब्ध हैं.
इस यौगिक दवा का वैज्ञानिक मानकों पर मूल्यांकन किया गया और पाया गया कि दवा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकती है, नई रक्त वाहिका के गठन को बढ़ाती है, कोलेजन संश्लेषण में वृद्धि करती है और घाव के त्वरित उपचार के लिए जरूरी कारकों को बढ़ाती है. चूंकि तकनीक और दवाएं, दोनों ही हमारे देश में भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं इसलिए इस विधि से उपचार विदेशों से ड्रेसिंग मटेरियल आयात करने के मुकाबले बहुत सस्ता हो गया है.
जोंक का प्रयोग एक अन्य पैरा सर्जिकल तकनीक है जिसका आयुर्वेदिक सर्जन नहीं सूखने वाले घावों को ठीक करने के साथ ही साथ प्लास्टिक सर्जरी में त्वचा को जोडऩे में प्रयोग करते हैं. जोकों की विशेष प्रजातियां हैं जो विषाक्त प्रकृति की नहीं होतीं.
इनका प्रयोग संक्रमित घाव के चारों तरफ से आवश्यकता अनुसार रक्त को चूसकर निकालने के लिए किया जाता है. इससे रक्त का संचरण बढ़ता है और घाव को तेजी से भरने में मदद मिलती है. जोंक का प्रयोग एग्जिमा और गंजेपन जैसी बीमारियों को ठीक करने में भी बहुत कारगर है.
आयुर्वेद में कई अन्य गैर-शल्य क्रिया वाले प्रयोगों का वर्णन है जिनका वैज्ञानिक रूप से आकलन हुआ है. प्रोस्टेट बढ़ जाए तो इसके उपचार के लिए सर्जरी ही एकमात्र रास्ता बताया जाता था. इसके स्थान पर प्रयोग से प्रमाणित हुआ है कि औषधीय एनिमा के साथ-साथ गोक्षुरादि गुग्गुल और वरुण प्रोस्टेट को ठीक करने में उपयोगी होते हैं जो पीकर सेवन करने वाली औषधियां हैं.
वरुण, गोक्षुर, पाषाणभेद मूत्राशय की पथरी को ठीक करने में बड़े कारगर बताए जाते हैं. ये दवाइयां मूत्र की थैली में पथरी का बनना रोकती हैं और शल्य चिकित्सा के बाद फिर से पथरी बनने की संभावना को समाप्त करती हैं. मूत्र स्टेंट मूत्रवाहिनी में रखा पतला ट्यूब होता है. ये आयुर्वेदिक दवाएं मूत्र स्टेंट को लंबे समय तक कारगर रखने और स्टेंट के मूत्राशय में रखे जाने के बाद उसके भीतर लवण के जमा होने से रोकने में सहायक होती हैं.
हड्डी से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने में आयुर्वेदिक सर्जनों का योगदान सराहनीय है. कुछ ऐसे शिक्षण संस्थान साथ ही साथ निजी प्रेक्टिशनर भी हैं जो हड्डियों से जुड़े मामलों खासतौर से हड्डी की टूट-फूट से जुड़े मामलों, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, डिस्क का खिसकना एवं अन्य पुरानी बीमारियों का इलाज करते हैं. इसके अलावा, कुछ विशेष उपकरणों द्वारा अग्निकर्म और रक्तमोक्षण कुछ दूसरे उपाय हैं जो मांसपेशियों के पुराने दर्द का निवारण करने में बड़े प्रभावी हैं.
आयुर्वेद की शल्य क्रिया में प्रशिक्षित स्त्रीरोग एवं नेत्ररोग के आयुर्वेदिक सर्जन अपने-अपने क्षेत्र में शल्य चिकित्सा भी करते हैं. वे आयुर्वेद में वर्णित उपचार की कुछ विशेष तकनीक के अलावा सामान्य स्त्रीरोगों और प्रसवोत्तर सर्जरी करने में सक्षम हैं.
आयुर्वेदिक नेत्र सर्जन आंखों की सामान्य सर्जरी जैसे मोतियाबिंद निकालना आदि के साथ-साथ दूसरी नेत्र संबंधी सर्जरी में सक्षम हैं. आयुर्वेद में नेत्ररोग से जुड़ी विशेष क्रियाओं को क्रियाकल्प के रूप में जाना जाता है. क्रियाकल्प एक विशेष प्रक्रिया है जिसके द्वारा रेटिना से जुड़ी विभिन्न समस्याओं और अन्य पुराने नेत्र रोगों का सफल उपचार किया जाता है.
हालांकि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा की शुरुआत आजादी के बाद के दौर में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में शल्य तंत्र की पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई और प्रशिक्षण के द्वारा शुरू की गई लेकिन बाद में इसे कई अन्य शिक्षण संस्थानों में भी शुरू किया गया. अब आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन शिक्षण का संचालन सीसीआइएम और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा होता है, कई अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों ने भी शल्य तंत्र में पोस्ट ग्रेजुएशन यानी एमएस (आयुर्वेद) की पढ़ाई शुरू कराई है.
शल्य तंत्र में पोस्ट ग्रेजुएशन प्रशिक्षण तीन साल का होता है जो कि आयुर्वेद में ग्रेजुएशन के बाद किया जा सकता है. आज बिना सुरक्षित एनेस्थेसिया और लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सर्जरी की बात सोची भी नहीं जा सकती और यह बात आयुर्वेदिक सर्जरी पर भी लागू होती है. इसे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में समझा गया और आयुर्वेद में एनेस्थेसिया की शुरुआत की गई और बाद में सीसीआइएम ने आयुर्वेद विभाग में भी एनेस्थेसियोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स शुरू किया.
ये आयुर्वेदिक संस्थानों और निजी संस्थानों में आयुर्वेदिक सर्जनों की जरूरतों को पूरा कर रहे थे लेकिन एनेस्थेसिया पर आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स (संज्ञाहरण) को अचानक बंद कर देने से आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा की विशेषज्ञता की दिशा में हो रहे कार्यों को धक्का पहुंचा है और इस विषय पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है.
-डॉ. मनोरंजन साहू


पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज 







14.9.18

क्रोध से कैसे निपटें?

                                         


     आप इस बात से परेशान हैं कि क्रोध आपको नियंत्रित करता है न कि आप क्रोध को नियंत्रित कर पाते हैं? आप क्रोध को नियंत्रित करने का कोई उपाय खोज रहे हैं? अगर ऐसा तो ध्यान को आजमाएँ.
क्रोध आपको नियंत्रित करता है. न कि आप क्रोध को, इसको लेकर आप व्यथित हैं , पर इसका हल है। लेकिन पहले आइये क्रोध और इसके प्रभावों को और जानते है ।
क्रोध क्या है? |गुस्सा क्या है?
       क्रोध "एक सामान्य और ज्यादातर स्वास्थ्यप्रद मानवीय भावना'' की तरह परिभाषित किया जाता है। क्रोध के उबार के बाद यदि आप इसे भुला पाते हैं तो यह ठीक है । हालाँकि जब हम क्रोध को नियंत्रित नहीं कर पाते है तो जीवन के हर पहलू की समस्या को दावत दे देते हैं चाहे वो शारीरिक हो, मानसिक हो, भावनात्मक हो या फिर सामाजिक।
क्रोध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक क्यों है?
        क्रोध हमारी किसी परिस्थिति में मूलभूत प्रतिक्रिया ‘’सामना करे या भागे’’ को शुरू करता है। दिल की धड़कन में तेजी, रक्तचाप में वृद्धि और तनाव में वृद्धि, ये क्रोध के प्रारंभिक परिणाम हैं। सांस की गति भी बढ़ जाती है। जब क्रोध जीवन में आवर्ती और अनियंत्रित हो जाता है तो समय के साथ हमारे उपापचय में परिवर्तन आ जाता है जो न केवल स्वास्थ्य को प्रभावित करता है अपितु जीवन की सम्पूर्ण गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है।
अनियंत्रित क्रोध के कई बुरे प्रभाव है जैसे:
हृदयाघात
पक्षाघात 
रोग प्रतिकारक क्षमता में कमी
त्वचा के रोग 
अनिद्रा
उच्च रक्तचाप 
पाचन संबंधी समस्याएं
चिंता और अवसाद
सिरदर्द 
नकारात्मक भावनाये |



क्रोध प्रबंधन | क्रोध पर नियंत्रण |

हम चाहे जितनी बार स्वयं को यह समझाए कि क्रोध करना अच्छा नहीं है फिर भी जब ये भावना उठती है हम इसे संभाल नहीं पाते हैं । हमें सिर्फ इतना बताया गया है कि क्रोध नहीं करना चाहिए पर यह नहीं कि यदि क्रोध आये तो क्या करें ।
    आपने यह ध्यान दिया होगा कि हम चाहे जितना खुद को समझाए कि क्रोध करना ठीक नहीं है पर जब क्रोध आता है तो हम इसे नियंत्रित करने में खुद को असमर्थ पाते हैं। पूरे बचपन में हम यही सीखते रहे कि क्रोध नहीं करना चाहिए लेकिन यह प्रश्न कि ''क्रोध को नियंत्रित कैसे करे'' ज्यों का त्यों बना हुआ है । जब यह भावनाओं का गुबार फूटता है, तब हम क्या करें ?
चलिए क्रोध के मूल कारणों को समझते हैं और कुछ सुझाव कि इसे कैसे संभालें
क्रोध को समझे
जब हम अपने आस पास गलतियां देखते हैं हम उसे स्वीकार करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं । उदहारण के लिए जब कोई गलती करता है हमारा क्रोध एक लहर की तरह उठता है और शांत होता है लेकिन हमें हिलाकर या फिर कभी कभी पश्चाताप में छोड़कर जाता है।
   जब हम क्रोध में होते हैं, हम सजग नहीं होते हैं । समझने के लिए पहली बात है कि क्रोध हुई गलती को बदल नहीं सकता है । और जो समझने की बात है कि जब तक हम परिस्थिति को यथावत स्वीकारते नहीं है तब तक हम उसे सजगता के साथ सुधार भी नहीं सकते हैं ।
    यह कहना करने से कहीं आसान है क्योंकि मन और भावनाओं का सीधा सामना करना कभी भी आसान नहीं हैं .अतः हमें अपनी मदद के लिए कुछ तकनीकों की मदद चाहिए होगी । आइये उन तकनीकों को सीखकर अपने क्रोध और तनाव को संभाले और अपने स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर करें ।
शरीर और मन में बेचैनी के साथ काम करके अपने गुस्से को काबू में करें
गुस्से पर काबू पाने के लिए ७ युक्तियाँ 
जैसा आप खाते हैं वैसे आप होते हैं (जैसा अन्न वैसा मन)
विश्राम की शक्ति को अनुभव करें |
योग आसन लाभकारी हैं |
मन को अपना मित्र बनाएँ |
हर समय का प्रतिकारक |
२० मिनट की अंतर्यात्रा |
क्या आपने हमम्म गुनगुनाया है?
खाने पर ध्यान दे | जैसा आप खाते हैं वैसे आप होते हैं ( जैसा अन्न वैसा मन)आपने ध्यान दिया होगा कि किसी किसी दिन आप बहुत शांत व विश्राम की अवस्था में होते हैं और किसी दिन बेहद असहज। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारा आहार हमारे मन व भावनाओं को बहुत प्रभावित करता है। कुछ तरह का भोजन मन व शरीर में असहजता व बेचैनी लाता है इस तरह के भोजन से दूर रहने से आपको क्रोध पर नियंत्रण में मदद मिलेगी जैसे माँसाहार, अधिक मसाले वाला व तेलयुक्त आहार इनमें प्रमुख हैं।
विश्राम करें
अगर आप रात में सोए नहीं हैं l तो सुबह कैसा महसूस करेंगे? आप आसानी से क्रोधित हो सकते हैं। शरीर की थकावट व बेचैनी मन में झुंझलाहट व व्यग्रता लाती है। प्रतिदिन ६-८ घंटे सोना बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये आपके शरीर व मन का विश्राम निश्चित करता है। और आपके बेचैन होने की संभावना कम होती है
मन को अपना मित्र बनाएँ
भास्त्रिका व नाड़ी शोधन प्राणायाम मन की बेचैनी को कम करने में मदद करते हैं। जब मन शांत व स्थिर होता है, आपके झुंझलाने या क्रोधित होने की संभावना कम हो जाती है।
योग आसन लाभकारी हैं
१०-१५ मिनट के योग आसन शरीर की असहजता निकालने में मदद करते हैं। सूर्य नमस्कार के कुछ आवर्तन राउंड्स) एक अच्छी शुरुआत हो सकते हैं। किसी भी शारीरिक व्यायाम से योग आसन का लाभ है कि योग आसान सांस के साथ लयबद्ध होते हैं और शरीर के आवश्यक खिंचाव के साथ ऊर्जा का स्तर भी बढ़ाते हैं।
प्रियम खन्ना बताते हैं "किसी किसी दिन जब मैं बहुत तनाव में होता हूँ, मैं अपने शरीर में एक अकड़न महसूस करता हूँ। ये मुझे बहुत असहज व बेचैन कर देता है। और मुझे क्रोध जल्दी आ जाता है। योग शरीर से अकड़न निकल देता है। और परिणामस्वरूप मन शांत व प्रसन्न हो जाता है।"
ध्यान
योग, प्राणायाम का नियमित अभ्यास और आहार पर ध्यान असहजता को शांत करता है। पर मन को शांत व संतुलित अवस्था में लगातार कैसे रखे l नियमित ध्यान इसका उत्तर है l बस २० मिनट का प्रतिदिन का ध्यान दिनभर के लिए पर्याप्त है।
हर समय का प्रतिकारक
कुछ गहरी साँसें लेना व छोड़ना आपके क्रोध को तत्काल शांत करता है। जिस क्षण आप क्रोध में हैं, आँखे बंद करें और कुछ गहरी साँसें लें और देखे कि मन की अवस्था में बदलाव आ जाता है। सांस तनाव को दूर करती है और मन को शांत होने में मदद होती है।
क्या आपने हमम्म गुनगुनाया है?
सुरभि शर्मा बताती हैं " ध्यान मुझे शांत और क्रोध से दूर रखता हैl"
ये क्रोध का दूसरा प्रतिकारक है। हमम्म प्रक्रिया एक से दो मिनट लेती है लेकिन आपको तुरंत शांत कर देती है।
जीवन में किसी न किसी कारण से क्रोध हो जाता है। आपने कभी क्रोध के बारे में गंभीरता से सोचा है? क्रोध क्या है? क्रोध क्यों आता है और उसके परिणाम क्या हैं? आपसी संबंध में अक्सर एक-दूसरे पर क्रोध हो जाता है? 

क्रोध से कैसे छुटकारा पाएँ?
जो हमें सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं, उन्हीं के साथ हम अपने संबंध बिगाड़ देते हैं। हम अपने बच्चों को सहारा, सहूलियत और सुरक्षित वातावरण देना चाहते हैं, लेकिन हमारा गुस्सा ही बच्चों को डरा देता है।
क्रोधी स्वभाववाले लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? जब मशीन ज़्यादा गरम हो जाएँ, तब थोड़ी देर के लिए उसे बंद कर देना चाहिए। तब वह ठंडी हो जाएगी। लेकिन आप उससे कुछ छेड़छाड़ करोगे तो जल जाओगे।
रिश्तों में होनेवाली समस्याओं का हल पाने के लिए पढ़िए।
इसके अलावा, ज्ञानविधि में भाग लेकर अपने सच्चे आत्मस्वरूप को जानें। यह वास्तव में क्रोध से मुक्त बनने के लिए मदद करता है।
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हर्बल चिकित्सा के अनमोल  रत्न-

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 




9.9.18

कंधे के दर्द,सूजन से मुक्ति पाने के उपाय

                                                       


मनुष्य के शरीर में सभी हिस्से टीम की तरह काम करते हैं। ऐसे में किसी भी एक हिस्से में होने वाली तकलीफ पूरे शरीर को पीड़ा से भर देती है। कंधे का डिसलोकेट हो जाना भी ऐसी ही एक तकलीफ है। जब यह तकलीफ बढ़ जाती है तो गंभीर रूप ले सकती है। समय पर होने वाला इलाज इसमें काफी राहत मिल सकती है।
हमारे शरीर में कंधे सबसे ज्यादा मूव करने वाले जोड़ के रूप में उपस्थित होते हैं। ये खुद कई दिशाओं में घूमने के साथ ही बांहों को घुमा सकता है, उन्हें सिर तक ऊंचा कर सकता है और आस-पास फैलाने में मदद कर सकता है। ऐसे में कंधे के डिसलोकेट होने से कई सारी गतिविधियों पर रोक लग सकती है। साथ ही तेज दर्द भी हो सकता है। ऐसा कई कारणों से हो सकता है, लेकिन त्वरित उपचार और सही तरीकों से इसे कंट्रोल में किया जा सकता है।
हमारे कंधे तीन हड्डियों से मिलकर बने होते हैं। ऊपरी बांहों की हड्डी यानी ह्यूमरस, शोल्डर ब्लेड स्कैप्युला तथा कॉलरबोन क्लेविकल। ह्यूमरस का बॉलनुमा सिर, शोल्डर ब्लेड के एक खांचे जैसे सॉकेट 'ग्लेनॉइड' में फिट हो जाता है और इसके आस-पास मौजूद टिशूज इस बॉल को खांचे में फिट बनाए रखने में मदद करते हैं। जब किसी कारण से यह बॉल, सॉकेट से बाहर निकल आती है तो शोल्डर डिसलोकेट हो जाता है और ऐसी हालत में वह अपनी पकड़ स्थाई नहीं रख पाता और बार-बार डिसलोकेट होने लगता है।
इस स्थिति को क्रॉनिक शोल्डर इनस्टेबिलिटी कहते हैं। ज्यादातर मामलों में इसके पीछे कोई चोट या लगातार कंधों पर पड़ने वाला दबाव जिम्मेदार होता है। कुछ केसेस में मसल्स के कमजोर होने या शोल्डर सॉकेट के सही आकार में न होने पर भी यह तकलीफ पनपती है, तब इसे एट्रॉमेटिक शोल्डर इनस्टेबिलिटी कहा जाता है।



पीड़ादाई लक्षण

शोल्डर के इस स्थिति में आ जाने से उसकी कार्यप्रणाली बाधित हो जाती है और समस्या खड़ी हो जाती है। इसके अलावा अन्य लक्षण जो क्रॉनिक शोल्डर इनस्टेबिलिटी में नजर आते हैं, वे हैं-
शोल्डर का कुछ विशेष स्थितियों में बार-बार अपनी जगह से खिसक जाना या ढीला महसूस होना। जैसे हाथों को सिर के ऊपर ले जाते हुए ऐसा महसूस होना
खिंचाव, चिमटी काटने जैसा अहसास
तेज दर्द
बांहों में किसी जगह पर सुन्न् होने का अहसास होना
कमजोर मूवमेंट और मसल्स में कमजोरी, आदि।
उपचार से मिलती राहत
सामान्य मामलों में कंधे का खिसक जाना कभी-कभार की घटना हो सकती है लेकिन इसका बार-बार खिसकना गंभीर समस्या का कारण बन सकता है। ऐसे में उपचार जरूरी हो जाता है। इसके लिए सर्जिकल और नॉनसर्जिकल दोनों ही तरह की उपचार पद्धतियां अपनाई जा सकती हैं। नॉनसर्जिकल तरीकों में सबसे पहले सूजन कम करने वाली दवाओं और दर्दनिवारकों के जरिए तकलीफ कम करने का लक्ष्य रखा जाता है। कई बार दर्द के काबू में आने पर कुछ विशेष इंजेक्शन भी दिए जा सकते हैं।
साथ ही फिजियोथैरेपी की भी नियमित मदद ली जा सकती है। थैरेपीज लगभग 6-8 हफ्तों तक जारी रखी जा सकती है। सर्जरी के जरिए टूटे या खिंचे हुए लिगामेंट्स को रिपेयर करने का प्रयास किया जाता है। साथ ही सॉकेट के हिस्से को भी सुधारने की कोशिश की जाती है। सर्जरी के बाद बताए गए व्यायामों को नियमित करना फायदे को बढ़ाने में मदद करता है।
कंधे का दर्द काफी समय तक बना रहने पर रोगी को आमतौर पर कंधे के कुछ प्रकार के व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। और इस काम में कुछ प्रभावी थेरेपी एक्सरसाइज बेहद मददगार होती हैं।
कंधे के थेरेपी व्यायाम
कंधे का दर्द काफी समय तक बना रहने पर रोगी को आमतौर पर कंधे के कुछ प्रकार के व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। इसका उद्देश्य जितना संभव हो, कंधे को जकड़न से मुक्त करना और उसकी गतिशीलता बनाये रखना है। कुछ जटिल मामलों में जब इन सबसे फायदा नहीं होता है, तो डॉक्टर सर्जरी की सलाह भी दे सकते हैं। हालांकि सर्जरी की सलाह केवल कुछ गंभीर मामलों में ही दी जाती है। आमतौर पर तो निम्न प्रभावी थेरेपी एक्सरसाइज की मदद से ही कंधे के दर्द का उपचार हो जाता है।
फ्रोजन शोल्डर है बड़ा कारण
आमतौर पर फ्रोजन शोल्डर के तीन चरण होते हैं। पहले चरण में व्यक्ति को कंधे में दर्द होने लगता है। दूसरे में उसे कंधे को हिलाने-डुलाने या कोई काम करने में परेशानी होती है। वहीं तीसरे चरण में कंधे की मूवमेंट बिल्कुल रुक जाती है। अधिकांश वृद्ध लोगों कोतो बालों में कंघी करने या कपड़े पहनने तक में परेशानी महसूस होती है। ऐसे में कप को उठाने जैसी दैनिक गतिविधियों में भी कंधे में दर्द होता है।
आइसोमेट्रिक नेक एंड शोल्डर एक्सरसाइज
आइसोमेट्रिक नेक एंड शोल्डर एक्सरसाइज घर पर ही दिन में 3 से 4 बार किया जा सकता है। इसे करने के लिये सिर और गर्दन को सीधा करके बैठ जाएं। हाथों को कान के ऊपर रखें और हथेली से सिर पर दबाव डालें। सिर को हिलाए बिना ही इस प्रक्रिया को कम से कम दोनों हाथों से आठ से दस बार करें। इससे अलावा कंधों को मजबूत करने के लिए दोनों हाथों को सामने की ओर दीवार पर रखकर दीवार पर दबाव डालें। पांच से दस सेकेंड के बाद हाथों को वहां से हटा दें। आठ से दस बार इस प्रक्रिया को करें, लाभ होगा।
समय रहते अगर इस पर ध्‍यान न दिया जाए तो कुछ समय बाद कंधे का दर्द नियमित होता जाता है। ऐसे में दर्द से तो जुझने के साथ ही साथ आपके काम में भी बाधा पहुंचने लगती है।
कहा जाता है कि ज्यादा नमक खाना सेहत के लिए नुकसानदायक है, लेकिन यह नमक हो सकता है आपके लिए बेहद फायदेमंद। जी हां, आयुर्वेद के अनुसार सेंधा नमक स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है, इसलिए इसे सर्वोत्तम नमक कहा गया है। सेंधा नमक में लगभग 65 प्रकार के खनिज लवण पाए जाते हैं, जो कई तरह की बीमारियों से बचाने में मददगार होते हैं।
वहीं इसका एक बढ़ि‍या फायदा यह है कि यह पाचन के लिए फायदेमंद है। चूंकि यह पाचक रसों का निर्माण करता है, इसलिए कब्ज भी दूर करने में सहायक है। यह कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक है, जिससे दिल के दौरे की संभावना को भी कम करता है। इसके अलावा हाई ब्लडप्रेशर को कंट्रोल करने में भी सेंधा नमक फायदेमंद होता है।
तनाव अधिक होने पर सेंधा नमक का सेवन करना लाभकारी होगा, यह सेरोटोनिन और मेलाटोनिन हार्मोन्स का स्तर शरीर में बनाए रखता है, जो तनाव से लड़ने में आपकी मदद करते हैं। बढ़ती उम्र में अक्सर ही लोगों को जोड़ों में दर्द की समस्या से जुझना पड़ता है। इन जोड़ों के दर्द में सबसे ज्यादा परेशानी कंधो के दर्द को लेकर होती है।
कई बार तो अचानक ही कंधे में असहनीय दर्द होने लगता है। लेकिन कुछ समय बाद आप पाते हैं कि कंधे का दर्द नियमित होता जा रहा है। ऐसे में दर्द से तो जुझने के साथ ही साथ आपके काम में भी बाधा पहुंचने लगती है। यह बात भी सही है कि हर किसी के लिए मंहगी डॉक्टरी इलाज का बोझ उठा पाना संभव नहीं होता है। इसलिए यहां पर हम आपको कुछ ऐसे ही आसान तरीके बता रहे हैं जिन्हें अपनाकर आप बढ़ती उम्र में होने वाले कंधे के दर्द से निजात पा सकते हैं।


सेंधा नमक का इस्तेमाल भी कंधे के दर्द से निपटने का एक आसान सा तरीका है। पिछले काफी समय से लोग इसे उपयोग में ला रहे हैं। लेकिन यह विधि ऊपर दी गई विधियों से काफी अलग है। इसके लिए आप एक टब में हल्का गर्म पानी लेकर उसमें एक या दो कप सेंधा नमक डालें। इसके बाद उसी पानी में पंद्रह मिनट के आस-पास के लिए बैठ जायें। ध्यान रहे कि आपका कंधा भी पानी में डुबा होना चाहिए। सेंधा नमक में मैग्नीशियम सल्फेट पाया जाता है। जो प्राकृतिक रूप से दर्द को कम करके आपकी मांसपेशियों को आराम पहुंचाता है।

कंधे में दर्द किसी भी उम्र में हो सकता है. लेकिन जो लोग लैपटॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन पर अधिक समय बिताते हैं उन्हें कंधे में दर्द की समस्या अधिक रहती है. कुछ घरेलू नुस्खों को अपनाकर आप आसानी से कंधे के दर्द से छुटकारा पा सकते हैं.
*कंधे के दर्द से छुटकारा पाने के लिए ठंडे पानी से सिंकाई करनी चाहिए. ये दर्द से राहत देने के लिए बहुत फायदेमंद है. एक प्लास्टिक बैग में बर्फ के टुकड़े रखकर बैग को तौलिए में लपेट लो और दर्द की जगह पर 10 से 15 मिनट तक रखों. दिनभर में कई बार और कुछ दिनों तक लगातार ऐसा ही करें. आप तौलिए को ठंडे पानी में भिगोकर भी ऐसा कर सकते हैं. ध्यान रहे, बर्फ को सीधे दर्द की जगह पर ना लगाएं.
* ठंडे पानी से सिंकाई की तरह ही गर्म सिंकाई भी कंधे के दर्द और सूजन से राहत देती है. कंधे में यदि चोट लग जाए तो 48 घंटे बाद गर्म सेंक का इस्तेमाल करना चाहिए. इससे मसल्स का तनाव भी दूर होगा और मांसपेशियों के तनाव को दूर करने में भी मदद मिलेगी. एक बैग में गर्म पानी भरकर 10 से 15 मिनट दर्द की जगह पर लगाएं. दिनभर में कई बार और कुछ दिनों तक लगातार इसी प्रक्रिया को दोहराएं जब तक दर्द से राहत नहीं मिलती.


* कंधे में दर्द की जगह पर दबाव बनाएं इससे कंधे की सूजन कम होगी. इलास्टिक बैन्डेज या गर्म पट्टी से कंधे पर दबाव बनाया जा सकता है. दर्द की जगह पर बैन्डेज तब तक बांधें जब तक सूजन और दर्द कम ना हो जाएं. इसके अलावा तकिए की मदद से भी कंधे को सपोर्ट किया जा सकता है. ध्यान रहे, बैन्डेज बहुत टाइट ना बांधें.

* सेंधा नमक के पानी में नहाने से कंधे के दर्द में आराम मिलेगा. इससे मांसपेशियों का तनाव भी दूर होगा और ब्लड सरकुलेशन भी बढ़ेगा. साथ ही शरीर को भी आराम मिलेगा. बाथटब को गुनगुने पानी से भर लें. इसमें 2 चम्मच सेंधा नमक अच्छे से मिलाएं. 20 से 25 मिनट तक इस पानी में कंधे को डूबोए रखें. सप्ताह में तीन बार ऐसा करें.
* कंधे के दर्द से राहत पाने के लिए मसाज भी की जा सकती है. मसाज के जरिए कंधे की मांसपेशियों का तनाव कम किया जा सकता है. इससे ब्लड सरकुलेशन भी ठीक रहता है और सूजन भी आसानी से कम हो जाती है. आपको किसी ऐसे व्यक्ति से मसाज करवानी चाहिए जो अच्छी मसाज कर सकें. मसाज के लिए जैतून का तेल, नारियल तेल या सरसों के तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है. तेल को हल्का सा गर्म कर लें. इसके बाद हल्के दबाव के साथ मसाज शुरू करें. 10 मिनट मसाज के बाद गर्म तौलिये को दर्द की जगह पर रखें, इससे आपको बेहतर रिजल्ट मिलेगा. इस प्रक्रिया को दिन में कई बार, कई दिन तक दोहराएं.
* कई बार कंधें में दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी की वजह से होने लगता है. ऐसे में आप दर्द को दूर करने के लिए प्रोटीन, कैल्‍शियम और विटामिन का ओरली सेवन करें. इससे राहत मिलेगी.
* दर्द होने पर भी कई लोग लगातार काम करते रहते हैं, वो काम नहीं करते हैं बल्कि अपने लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं. जब भी दर्द हो, तो आराम करें. आराम करने से शरीर को राहत मिलेगी.
* कई बार गलत तकिया लगाने से भी दर्द होने लगता है. कंधे में दर्द होने पर तकिया न लगाएं या फिर सॉफ्ट तकिया लगाएं.
* अगर आप धूम्रपान करते हैं तो करना छोड़ दें. ऐसा करने से शरीर में रक्‍त का संचार अच्‍छी तरह होगा और दर्द जैसी कई समस्‍याओं से छुटकारा मिल जाएगा.
* रोजमेरी का ह फूल, कंधे के दर्द में बहुत फायदा करता है. इसे उबाल कर इसका काढ़ा पीने से काफी लाभ मिलता है.
* कंधें में दर्द होने स्‍ट्रेचिंग करें. इससे आपको दर्द में राहत महसूस होगी. लेकिन भारी वजह उठाने से बचें.


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1.9.18

पैरों के दर्द के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

                                                                    


     हम में से जादातर लोगो को कभी न कभी पैर में दर्द की शिकायत होती है कभी अचानक तो कभी रुक-रुक कर पैर में दर्द होने लगता है। पैर में दर्द के कई कारण हो सकते हैं, मसलन मांसपेशियों में सिकुड़न, मसल्स की थकान, ज्यादा वॉक करना, एक्सरसाइज, स्ट्रेस, ब्लड क्लॉटिंग की वजह से बनी गांठ, घुटनों, हिप्स व पैरों में सही ब्लड सर्कुलेशन न होना, पानी की कमी, खाने में कैल्शियम व पोटेशियम जैसे मिनरल्स और विटामिंस की कमी, किसी प्रकार की गहरी चोट होना, किसी प्रकार का संक्रमण या बीमारी होने के कारण आदि। कई बार शरीर की हड्डियां कमजोर होने से भी पैरों में दर्द की शिकायत हो जाती है।
हमारे पैर हड्डियों, लिगामेंट्स, टेंडन्स (ligament, tendons) और मांसपेशियों से बने होते हैं। इन चारो का सही से काम न करना पैर में दर्द का कारण बनता है जब भी हम खड़े होते है या चलते है तो हमारे पैरों पर दबाव पड़ता है, जिसकी वजह से पैर में दर्द होना आम बात है।



पैर के एक या एक से अधिक हिस्सों में होने वाले किसी भी दर्द या परेशानी को पैर दर्द कहा जाता है। पैर के इन हिस्सों में निम्न शामिल हो सकते हैं –
पैर की उंगलियाँ में दर्द
एड़ियां में दर्द
आर्च तलवे की एड़ी और पंजे के बीच के भाग ने दर्द
तलवे में दर्द आदि
यह दर्द कम और जादा भी हो सकता है। जादातर पैरों का दर्द जल्दी ठीक हो जाता है, परन्तु कभी-कभी यह समस्या लम्बे समय तक रह सकती है।
*अगर आपका दर्द लम्बे समय से है और किसी भी तरीके से आराम नहीं लग रहा है तो आपको डॉक्टर से पैर दर्द की जांच करनी चाहिए, खासकर जब यह किसी चोट के कारण शुरू होता है। कई बार चोट का असर बाहर नहीं दीखता है पर अंदरूनी मांशपेशियो पर इस चोट का असर होता है जो बाद में दर्द का कारण बनता है
इंसान के पैर में कुल 26 हड्डियां होती हैं। इसमें से एड़ी की हड्डी (कैलकेनियस) सबसे बड़ी होती है। इंसान की एड़ी की हड्डी को कुदरती रूप से शरीर का वजन उठाने और संतुलन के उद्देश्‍य से तैयार किया गया है। जब हम पैदल चलते या दौड़ते हैं तो यह उस दबाव को झेलती है जो पैर के जमीन पर पड़ने के बाद उत्‍पन्‍न होता है। और इसके साथ ही यह हमें अगले कदम की ओर धकेलती भी है। आइये जानते है पैर में दर्द से बचने के कुछ आसान उपायों के बारे में-



*हॉट एंड कोल्‍ड वॉटर थेरेपी पैर में दर्द के इलाज के लिए एक कारगर तरीका है। गर्म पानी ट्रीटमेंट ब्‍लड फ्लों को बढ़ावा देने और ठंडा पानी से ट्रीटमेंट सूजन को कम करने में मदद करता है। दो पानी की बाल्‍टी लें एक में ठंडा पानी और दूसरें में सहने करने योग्‍य गर्म पानी डालें। अपने पैरों को तीन मिनट गर्म पानी की बाल्‍टी में डालें और तीन मिनट के बाद अपने पैरों को 10 सेकंड के लिए ठंडे पानी की बाल्‍टी में डालें। इस प्रक्रिया को 2-3 बार दोहराये। लेकिन ध्‍यान रहें कि आप गर्म पानी से शुरूआत और ठंडे पानी पर समाप्‍त करें। आप पैरों में दर्द को कम करने के लिए 10 मिनट के लिए बारी-बारी गर्म और ठंडा पैक भी लगा सकते हैं।
*सेंधा नमक एक और प्रभावी घरेलू उपाय है, जो पैरों के दर्द से तत्‍काल राहत प्रदान करने में मदद करता है। गर्म पानी के एक टब में 2-3 बड़े चम्‍मच सेंधा नमक के मिलाकर, इसमें अपने पैरों को 10 से 15 मिनट के लिए डालें। फिर अपने पैरों को ड्राईनेस से बचाने के लिए उनपर मॉश्‍चराइजर लगाये।
लौंग का तेल सिरदर्द, जोड़ों के दर्द, एथलीट फुट, नेल फंगस और पैरों के दर्द को दूर करने वाला एक अद्भुत तेल है। तुरंत राहत पाने के लिए लौंग के तेल का इस्‍तेमाल पैरों में धीरे-धीरे मालिश करने के लिए करें। मसाज रक्‍त के प्रवाह को उत्‍तेजित करता है और मांसपेशियों को आराम देता है। पैरों में दर्द की समस्या से जल्‍द राहत पाने के लिए एक दिन में कई बार मालिश करें।
*सरसों के बीज का इस्‍तेमाल शरीर से विषाक्त पानी निकालने, रक्त परिसंचरण में सुधार करने और सूजन को कम करके पैर में दर्द के उपचार के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ सरसों के बीज लेकर, पीस लें और फिर इन्‍हें गर्म पानी की एक बाल्टी में मिलाये। अपने पैरों को इस पानी में 10 से 15 मिनट के लिए डालें।
*अगर आपको दबाव, मोच या चोट के कारण पैरों में दर्द का अनुभव हो रहा हैं, तो आप परेशानी से राहत पाने के लिए तेजपात का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा यह पैरों की दुर्गंध को दूर करने में मदद करता है। एक कप सेब के सिरके में एक मुट्ठी तेजपात मिलाकर कुछ मिनट के लिए उबाल लें। अब सूती कपड़े की मदद से दर्द वाले हिस्‍से पर लगाये। पैर में दर्द ठीक होने तक इस उपाय को दनि में कई बार दोहराये।
*अगर आपकी मांस-पेशियों में किसी तरह की तकलीफ है और वही दर्द की वजह है तो मसाज करना फायदेमंद रहेगा. आप चाहें तो मसाज करने के लिए ऑलिव ऑयल या नारियल तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं. दिन में दो से तीन बार मसाज करना फायदेमंद होगा.
*पैर के दर्द से छुटकारा पाने के लिए हल्दी का इस्तेमाल करना भी फायदेमंद होता है. हल्दी में एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेट्री गुण पाया जाता है. हल्दी में मिलने वाला करक्यूमिन नाम का यौगिक दर्द को कम करने में बहुत फायदेमंद होता है.


*अपनी एड़ी को आराम दें और उस पर ज्यादा वजन ना डालें।
किसी भी एथलीट एक्टिविटी से पहले स्‍ट्रेचिंग व्‍यायाम जरूर करें। क्योंकि आपके पैर का संतुलन बनाएं रखने के लिए जरूरी व्‍यायाम आपकी मदद कर सकते हैं।
*अच्‍छी क्‍वालिटी के जूते पहनें जो आपके खेल और पैरों के लिहाज से अनुकूल हों।
कई लोग पैर की एड़ी में दर्द होने पर भी तेजी से चलते या दौड़ते हैं। इसलिए अचानक तेज गति से न मुड़ें। अन्यथा स्थिति गंभीर भी हो सकती है।
*दौड़, साइक्लिंग और स्‍वमिंग आदि से पैरों और टांगों को मजबूती प्रदान करने वाले व्‍यायाम करें। प्रभावित हिस्से को रगड़ से बचाने के लिए फुट पैड का उपयोग करें
*जिस पैर में दर्द हो रहा है, उसे थोड़ा ऊपर उठाकर रखें
*अपने पैर को जितना संभव हो, उतना आराम दें

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31.8.18

नशा मुक्ति के उपाय:शराब,गाँजा,भांग,बीड़ी,सिगरेट की लत कैसे छोड़ें?


                                   

    किसी भी चीज़ की अधिकता हमारा नुकसान ही करती है, फिर चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक नुकसान। नशा एक ऐसी चीज है जिसे यदि जरूरत से अधिक लिया जाए तो यह हमारे शरीर को अंदर से खोखला करने लगती है। वैसे सीमित मात्रा में नशा करने के भी नुकसान हैं, किंतु जैसे ही सीमा बढ़ा दी जाए इसके नकारात्मक प्रभाव कई गुणा बढ़ जाते हैं।
जब तक लोगों को इसके बुरे होने की बात समझ आने लगती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है, शरीर विभिन्न बीमारियों की चपेट में आ जाता है। लेकिन अगर समय से इलाज कर लिया जाए तो बचाव किया जा सकता है।
आज हम आपको नशा छोड़ने से संबंधित एक अचूक उपाय बताने जा रहे हैं। यह एक प्रकार की दवा है जो हर तरह का नशा छुड़ाने में सहायक सिद्ध होती है। नशा चाहे कोई भी - शराब, गुटखा, तम्बाकू आदि, किसी भी तरह के नशे से छुटकारा पाया जा सकता है।
इस दवा को तैयार करने के लिए सबसे पहले अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े काट लें। अब इन पर सेंधा नमक डालें और साथ ही नीम्बू निचोड़ दें।
अंत में टुकड़ों को धूप में सूखने के लिए रख दें। जब टुकड़े सूख जाएं तो इन्हें एक डिब्बे में रख लें। लीजिए बन गई नशा छुड़ाने की दवा
अब जब भी किसी नशे की लत लगे तो ये टुकड़ा निकालें और चूसते रहें। ये अदरक मुंह में घुलती नहीं है और इसे आप सुबह से शाम तक मुंह में रख सकते हैं, यकीन मानिए कि किसी दूसरे नशे को करने का मन भी नहीं करेगा।



इसके पीछे एक ठोस कारण है... दरअसल नशा युक्त पदार्थों में भारी मात्रा में सल्फर पाया जाता है और अदरक से बनाई गई यह दवा सल्फर युक्त होती है। इसलिए जैसे ही शरीर को सल्फर की मात्रा मिल जाएगी, किसी अन्य नशे को करने का मन नहीं करेगा।

नशा उतारने के तरीके
नशा करने वाले व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है उसे सही गलत का होश नहीं रहता। नशे में व्यक्ति की हरकतें बर्दाश्त के बाहर हो जाती है। इस कारण से दूसरे लोग बहुत परेशान हो जाते है। ऐसे में नशा उतारना जरुरी हो जाता है।
नशा उतारने के उपाय इस प्रकार है :
शराब का नशा उतारने का तरीका – 
* एक कप पानी में एक नीम्बू का रस मिलाकर कर हर दस मिनट में पिलाएं।
*सेब ( apple ) का जूस पिलाएं।
* सिर पर ठण्डा पानी डालें।
* अमरुद खिलाएं।
* एक गिलास पानी में इमली को भिगोकर मसलकर छान लें। इसमें गुड़ मिलाकर पिलायें।
*पिसा हुआ धनिया और शक्कर मिलाकर खिलाएं।
* दो चम्मच देसी घी में दो चम्मच शक्कर मिलाकर खिलाएं।
भांग का नशा उतारने का तरीका
* एक गिलास पानी में इमली को भिगोकर मसलकर छान लें। इसमें गुड़ मिलाकर पिलायें।
* एक गिलास छाछ पिलाएं।
* एक कटोरी दही खिला दें।
* नीम्बू का अचार खिलाएं।
*अमरुद खिलाएं।
* जामुन के पेड़ की कोमल पत्ती खिलाएं।
अफीम का नशा उतारने का तरीका –
* गुनगुने पानी में या छाछ में शुद्ध हींग मिलाकर पिलाएं।
* हर एक घंटे से एक कप दूध पिलाएं।
* पानी में थोड़ी फिटकरी मिलाकर पिलाएं।


* उल्टी कराएँ और सोने मत दें।

गांजे का नशा उतारने का तरीका – 
*पोदीने का रस पिलाएं।
*एक गिलास पानी में इमली को भिगोकर मसलकर छान लें। इसमें गुड़ मिलाकर पिलायें।
*देसी घी पिलाएं।
सभी प्रकार के नशे उतारने का तरीका
*अगूर के रस में नमक , जीरा , कालीमिर्च डालकर पिलाने से हर प्रकार का नशा उतर जाता है।
* ढाक ( पलाश , केसु ) के पत्ते के दो तीन डंठल मुंह में लेकर चबाने से हर प्रकार का नशा उतर जाता है। ये डंठल पानी के साथ पीस कर छान कर पिलाने से भी नशा उतर जाता है।
*प्याज का रस पिलाने से हर प्रकार का नशा कम हो जाता है।
शराब छुड़ाने के घरेलु उपाय
चार गिलास पानी ( लगभग एक लीटर ) कांच के बर्तन में लें। इसमें 100 ग्राम नई देसी अजवायन दरदरी पीस कर भिगो दें। इसे दो दिन भीगने दें। अब इसे धीमी आंच पर उबालें। पानी एक गिलास जितना रह जाये तब उतार कर ठण्डा कर ले।
अगले दिन थोड़ा मसल कर छान लें। इसे एक शीशी में भर लें। जब भी शराब पीने की इच्छा हो तो इसमें से चार पाँच चम्मच पी लें। एक महीने तक इस तरह ये पानी पीने से शराब की लत sharab ki lat छूट जाती है। थोड़ी इच्छा शक्ति भी मजबूत रखें।
दिन में तीन चार बार उबले हुए सेव खाने से शराब के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है और शराब पीने की आदत छूट जाती है।
सेव का रस तीन चार बार पीने और सेव अधिक खाने से शराब पीने की तलब नहीं लगती और शराब छोड़ना आसान हो जाता है।
सिगरेट बीड़ी तम्बाकू छुड़ाने के उपाय – 
50 ग्राम अजवायन , 50 ग्राम सौंफ और 25 ग्राम काला नमक मिलाकर बारीक पीस लें। इसमें चार चम्मच नीम्बू का रस मिलाकर रात भर के लिए रख दें। अगले दिन सुबह इस चूर्ण को गर्म तवे पर थोड़ा सूखा लें।
इसे एक शीशी में भर लें। जब भी तम्बाकू या सिगरेट की तलब लगे तो ये चूर्ण थोड़ा सा मुँह में डाल कर चूसें। कुछ दिनों में तम्बाकू की लत tambaku ki lat छूट जाएगी। मन पर काबू रखें।
सिगरेट की तलब talab लगने पर छोटी हरड़ मुँह में रखकर चूसने से तलब शांत हो जाती है। इस तरह आदत छोड़ सकते है।
दालचीनी को बारीक पीस कर इसमें शहद मिला लें। तम्बाकू की तलब लगने पर थोड़ा सा ये शहद चाट लें। तलब मिट जाएगी।
रोजाना चार चम्मच प्याज का रस पीने से तम्बाकू की तलब लगनी बंद हो जाती है। सिगरेट गुटका छूट जाता है।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ,भारत सरकार भी नशा छुड़वाने के लिए प्रयासरत है। शराब और दूसरी नशीली चीजों से मुक्ति पाने के लिए नेशनल टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर 1800-11-0031 से भी मदद ली जा सकती है।
नशे के चंगुल से अवश्य मुक्त हो सकते है। जरुरत है थोड़े धीरज और इच्छा शक्ति की। ये तो आप भी जानते है कि यदि आपने कुछ करने का निश्चय कर लिया तो फिर आपको कोई रोक नहीं सकता। तो फिर देर किस बात की आपके सबसे बड़े दुश्मन नशे की तलब को दबाकर कुचल दीजिये और आजादी का जश्न मनाइये।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि