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9.7.17

लम्बी आयु पाने के रहस्य, उपाय // Ways to get long life (longevity)



लम्बी उम्र पाने के घरेलू प्राकृतिक उपाय Top Tips To Live A Long Healthy Life – यदि वैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग किया जाए तो कहना होगा कि जब हमारी कोशिकाओं में डी.एन.ए. की अतिरिक्त मात्रा इकट्ठी हो जाती है, तो यह ऐसे स्तर तक पहुंच जाती है जिससे कोशिका का सामान्य कार्य अवरुद्ध हो जाता है जिसके फलस्वरुप हम धीरे-धीरे बूढ़े होते जाते हैं।
बुढ़ापा एक मायने में तन-मन के क्षय का ही एक रूप है। वर्तमान शोधों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि मनुष्य की जीवनावधि सम्यक आहार, व्यायाम, पोषण और हार्मोन पूर्ति से बढ़ाई जा सकती है। इन चीजों से हमारी सक्रियता भी बरकरार रह सकती है और हम एक सार्थक व कर्मशील जीवन जी सकते हैं। प्राचीन मनीषा में इन सभी उपायों का पहले से ही वर्णन मिलता है। हमारे विभिन्न आरोग्य शास्त्र, योग आदि जीवन की अवधि बढ़ाने के शास्त्र ही हैं। परंतु आज हम प्राचीन शास्त्रों के इन गुणों को भूलकर विज्ञान की नई खोजों का मुह ताक रहे हैं।
कुछ लोग लम्बी उम्र क्यों पाते हैं
आज के वैज्ञानिक यह सिद्ध कर रहे हैं कि वह व्यक्ति ज्यादा दिनों तक जिंदा रहते हैं जो कम कैलोरी का भोजन करते हैं उनका कहना है कि विलकाबंबा के दक्षिणी अमरीकी, हिमालय क्षेत्र की डूजा जाति के लोग, मध्य यूरोप के काकेशियंस सभी प्रतिकूल परिस्थितियों में कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी वे अधिक समय तक जिंदा रहते हैं क्योंकि वे 1600 कैलोरी का ही भोजन करते हैं। इसी प्रकार जापान के ओकीनावा शहर के व्यक्ति शतायु होते हैं तथा सारी दुनिया में जापान में ही सर्वाधिक दीर्घजीवी लोग रहते हैं।

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इसका कारण है कि उनका भोजन कम कैलोरी युक्त कितुपोषक तत्त्वों से भरपूर होता है। एक मोटा सिद्धांत यह है कि ‘कम खाओ, लंबी उम्र पाओ।’ यह सिद्धांत वैज्ञानिक आधार पर भी तकसंगत है। कैलोरी की मात्रा कम करने पर चयापचय (Metabolism) की क्रिया धीमी हो जाती है क्योंकि मुक्त मूलक चयापचय के उप-उत्पाद हैं, कैलोरी नियंत्रण से उनके द्वारा की जानेवाली विनाशलीला में कमी आती है और फिर कैलोरी नियंत्रण से शरीर का तापक्रम भी थोड़ा कम रहता है।
इसलिए कोशिकाओं की क्षति भी कम होती है। प्रयोगों के निष्कर्ष के आधार पर यह तथ्य सामने आता है कि कैलोरी नियंत्रण से न केवल जीवन की अवधि में वृद्धि हो सकती है बल्कि रोगों की प्रक्रिया में भी इसके कारण धीमापन आता है। इन शोधों से यह आशा बंधती है कि कैलोरी नियंत्रण के सिद्धांत से बुढ़ापे में होनेवाले रोगों के कारणों का पता लगाने में भी सहायता मिलेगी।
आजकल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विभिन्न शारीरिक व्यायामों की अनुशंसा की जाती है, इनसे जीवनावधि में वृद्धि होती है, परंतु इनकी अपनी निश्चित सीमाएं हैं। योगाभ्यास भी जीवन बढ़ाने हेतु समग्र प्रक्रिया है। लंबी उम्र और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए योगाभ्यास सर्वश्रेष्ठ उपाय है। योगमय जीवन द्वारा हम बुढ़ापे को पछाड़ सकते हैं।



ऋतु अनुसार वर्जित पदार्थ वर्षों से हमारे देश में कई उपयोगी व सारगर्भित कहावतें तथा तुकबदियां प्रचलित रही हैं, जिनमें स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी जानकारियां मिलती हैं। इसी संदर्भ में ऋतुओं के अनुसार कुछ भोज्य पदार्थों के सेवन को हानिकारक बतानेवाली एक तुकबंदी यहां प्रस्तुत है।

चैत्र में गुड़, वैशाख में तेल जेठ में महुआ, अषाढ़े बेल॥
सावन दूध, भादो में मही। क्वांर करेला, कार्तिक दही॥
अगहन जीरा, पूस धना। माघ में मिश्री फागुन चना॥
इनका परहेज कर नहीं। मरे नहीं तो पड़े सही॥
नीरोग जीवन एक ऐसी विभूति है जो हर किसी को अभीष्टहै । कौन नहीं चाहता कि उसे चिकित्सालयों-चिकित्सकों का दरवाजा बार-बार न खटखटाना पड़े, उन्हीं का, ओषधियों का मोहताज होकर न जीना पड़े । पर कितने ऐसे हैं जो सब कुछ जानते हुए भी रोग मुक्त नहीं रह पाते ? यह इस कारण कि आपकी जीवन शैली ही त्रुटि पूर्ण है मनुष्य क्या खाये, कैसे खाये! यह उसी को निर्णय करना है । आहार में क्या हो यह हमारे ऋषिगण निर्धारित कर गए हैं । वे एक ऐसी व्यवस्था बना गए हैं, जिसका अनुपालन करने पर व्यक्ति को कभी कोई रोग सता नहीं सकता । आहार के साथ विहार के संबंध में भी हमारी संस्कृति स्पष्ट चिन्तन देती है, इसके बावजूद भी व्यक्ति का रहन-सहन, गड़बड़ाता चला जा रहा है । परमपूज्य गुरुदेव ने इन सब पर स्पष्टसंकेत करते हुए प्रत्येक के लिए जीवन दर्शक कुछ सूत्र दिए हैं जिनका मनन अनुशीलन करने पर निश्चित ही स्वस्थ, नीरोग, शतायु बना जा सकता है ।
जीवन जीने की कला का पहला ककहरा ही सही आहार है। इस संबंध में अनेकानेक भ्रान्तियाँ है कि क्या खाने योग्य है क्या नहीं ? ऐसी अनेकों भ्रान्तियों यथा नमक जरूरी है, पौष्टिता संवर्धन हेतु वसा प्रधान भोजन होना चाहिए, शाकाहार से नहीं-मांसाहार स्वास्थ्य बनता है-पूज्यवर ने विज्ञान सम्मत तर्क प्रस्तुतः करते हुए नकारा है । एक-एक स्पीष्टरण ऐसा है कि पाठक सोचने पर विवश हो जाता है कि जो तल-भूनकर स्वाद के लिए वह खा रहा है वह खाद्य है या अखाद्यं अक्षुण्ण स्वास्थ्य प्राप्ति का राजमार्ग यही है कि मनुष्य आहार का चयन करें क्योंकि यही उसकी बनावट नियन्ता ने बनायी है तथा उसे और अधिक विकृति न बनाकर अधिकाधिक प्राकृतिक् रूप में लें



अनेक व्यक्ति यह जानते नहीं हैं कि उन्हें क्या खाना चाहिए, क्या नहीं ? उनके बच्चों के लिए सही सात्विक संस्कार वर्धक आहार कौन सा है, कौन सा नहीं ? सही, गलत की पहचान कराते हुए पूज्यवर ने स्थान-स्थान पर लिखा है कि एक क्रांति आहार संबंधी होनी चाहिए, पाककला में परिवर्तन कर जीवन्त खाद्यों को निष्प्राण बनाने की प्रक्रिया कैसे उलटी जाय, यह मार्गदर्शन भी इसमें है । राष्ट्र् के खाद्यान्न संकट को देखते हुए सही पौष्टि आहार क्या हो सकता है यह परिजन इसमें पढ़कर घर-घर में ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं । अंकुरित मूँग-चना-मूँगफली-हरी सब्जियों के सलाद आदि की व्यवस्था कर सस्ते शाकाहारी भोजन व इनके भी व्यंजन कैसे बनाये जायँ इसका सर्वसुलभ मार्गदर्शन इस खण्ड में है । शाकाहार-मांसाहार संबंधी विवाद को एकपक्षीय बताते हुए शाकाहार के पक्ष में इतनी दलीलें दी गयी हैं कि विज्ञान-शास्त्र सभी की दुहाई देनेवाले को भी नतमस्तक हो शाकाहार की शरण लेनी पड़ेगी, ऐसा इसके विवेचन से ज्ञात होता है ।

हमारी जीवन शैली में कुछ कुटेवें ऐसी प्रेवश कर गयी हैं कि वे हमारे 'स्टेटस' का अंग बनकर अब शान का प्रतीक बन गयीं हैं । उनके खिलाफ सरकारी, गैरसरकारी कितने ही स्तर पर प्रयास चलें हो, उनके तुरन्त व बाद में संभावित दुष्परिणामों पर कितना ही क्यों न लिखा गया हो, ये समाज का एक अभश्प्त अंग बन गयीं हैं । इनमें हैं तम्बाकू का सेवन, खैनी, पान मसाले या बीड़ी-सिगरेट के रूप में तथा मद्यपान । दोनों ही घातक व्यसन हैं । दोनों ही रोगों को जन्म देते हैं-काया को व घर को जीर्ण-शीर्ण कर बरबादी की कगार पर लाकर छोड़ देते हैं । इनका वर्णन विस्तार से वैज्ञानिक विवेचन के साथ करते हुए पूज्यवर ने इनके खिलाफ जेहाद छेड़ने का आव्हान किया है ।
इन सबके अतिरिक्त नीरोग जीवन का एक महत्वपूर्ण सूत्र है हमारा रहन-सहन । हम क्या पहनते हैं ? कितना कसा हुआ हमारा परिधान है ? हमारी जीवनचर्या क्या है ? इन्द्रियों पर हमारा कितना नियंत्रण है ? क्या हमारी रहने की जगह में धूप व प्रचुर मात्रा में है या हम सीलन से भरी बंद जगह में रहकर स्वयं को धीरे-धीरे रोगाणुओं की निवास स्थली बना रहे हैं, यह सारा विस्तार इस वाङ्मय के उपसंहार प्रकरण में है । आभूषणों, सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग, नकली मिलावटी चीजों का शरीर पर व शरीर के अन्दर प्रयोग यह सब हमारे स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डालता है यह बहुसंख्य व्यक्ति नहीं जानते । हमारी जीवन-शैली कैसे समरसता से युक्त, सुसंतुलित एवं तनावयुक्त बने, यह शिक्षण जीवन जीने की कला का सर्वांगपूर्ण शिक्षण है|
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