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1.2.17

अमलतास के गुण ,लाभ,उपचार//Cassia properties, benefits, treatment


      

     शहरों में उद्यानों और सड़कों के सौंदर्यीकरण के लिए लगाए जाने वाले अमलतास के पेड़ के सभी अंग जैसे छाल, फल और पत्तियों का इस्‍तेमाल प्राचीन काल से ही औषधि के रूप में किया जा रहा है।
   पीले फूलों वाले अमलतास का पेड़ सड़कों के किनारे और बगीचों में प्राय देखने को मिल जाता हैं। इस खूबसूरत पेड़ को शहरों में सड़क के किनारे अक्सर सजावट वाले पेड़ के तौर पर लगाया जाता है। इसकी पत्तियां गहरे हरे रंग की और फूल पीले चमकीले होते है। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि शहरों में उद्यानों और सड़कों के सौंदर्यीकरण के लिए लगाए जाने वाले इस पेड़ के सभी अंगों जैसे छाल, फल और पत्तियों का इस्‍तेमाल प्राचीन काल से ही औषधि के रूप में किया जा रहा है।
     भारत में इसके वृक्ष प्राय: सब प्रदेशों में मिलते हैं। तने की परिधि तीन से पाँच कदम तक होती है, किंतु वृक्ष बहुत उँचे नहीं होते। शीतकाल में इसमें लगनेवाली, हाथ सवा हाथ लंबी, बेलनाकार काले रंग की फलियाँ पकती हैं। इन फलियों के अंदर कई कक्ष होते हैं जिनमें काला, लसदार, पदार्थ भरा रहता है। वृक्ष की शाखाओं को छीलने से उनमें से भी लाल रस निकलता है जो जमकर गोंद के समान हो जाता है। फलियों से मधुर, गंधयुक्त, पीले कलझवें रंग का उड़नशील तेल मिलता है।
इसका प्रयोग कई रोगों को ठीक करने में किया जाता है और इसके मुख्य प्रयोग नीचे दिये है-
   



श्वास कष्ट ठीक करने के लिए-

अस्थमा के रोगी में कफ को निकालने और कब्ज को दूर करने के लिये फलों का गूदा दो ग्राम पानी में घोलकर गुनगुना सेवन करना चहिये ।अस्थमा की शिकायत होने पर पत्तियों को कुचलकर 10 मिली रस पिलाया जाए तो सांस की तकलीफ में काफी आराम मिल जाता है।प्रतिदिन दिन में दो बार लगभग एक माह तक लगातार पिलाने से रोगी को राहत मिल जाती है।
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सर्दी जुकाम में लाभकारी-
अमलतास आम सर्दी जुकाम के उपचार में कारगर होता है। जलती अमलतास जड़ का धुआं बहती नाक का इलाज करने में सहायक होता है। यह धुआं बहती नाक को उत्‍तेजित करने के लिए जाना जाता है, और तुरंत राहत प्रदान करता है।
शरीर में जलन होने पर-
पेशाब में जलन होने पर अमलतास के फल के गूदे, अंगूर, और पुनर्नवा की समान मात्रा (प्रत्येक ६ ग्राम) लेकर 250 मिली पानी में उबाला जाता है और 20 मिनिट तक धीमी आँच पर उबाला जाता है। ठंडा होने पर रोगी को दिया जाए तो पेशाब में जलन होना बंद हो जाती है।
घाव ठीक करने के लिए- :
 इसकी छाल के काढ़े का प्रयोग घावों को धोने के लिये किया जाता है । इससे संक्रमण नही होता है ।



बुखार में प्रयोग-

बुखार होने पर अमलतास के गूदे की 3 ग्राम मात्रा दिन में तीन बार 6 दिनों तक लगातार दिया जाए तो बुखार में आराम मिल जाता है और बुखार के साथ होने वाले बदन दर्द में भी राहत मिलती है।
गले की खरास ठीक करने के लिए: -
इसके लिए जड़ की छाल का काढ़ा बनाकर, गुनगुने काढ़े से गरारा करने से फायदा मिलता है |
शुगर के लिए फायदेमंद-
आदिवासी मधुमेह (डायबिटीज़) के रोगियों को प्रतिदिन अमलतास की फल्लियों के गूदे का सेवन करने की सलाह देते हैं। प्रतिदिन सुबह शाम 3 ग्राम गूदे का सेवन गुनगुने पानी के साथ करने से मधुमेह में आराम मिलने लगता है।
एसिडिटी ठीक करने के लिए:-
 फल के गूदे को पानी मे घोलकर हलका गुन्गुना करके नाभी के चारों ओर 10-15 मिनट तक मालिस करें । यह प्रयोग नियमित करने से स्थायी लाभ होता है ।
अमलतास की फल्लियों और छाल के चूर्ण को उबालकर पिया जाए तो आर्थरायटिस और जोड़ दर्द में आराम देता है। 
सूखी खांसी ठीक करने के लिए :-
 इसकी फूलों का अवलेह बनाकर सेवन करने से सूखी खांसी दूर हो जाती है |
आंवला और अमलतास के गूदे की समान मात्रा को मिलाकर 100 मिली पानी में उबाला जाए और जब यह आधा शेष बचे तो इसे छान लिया जाए और रक्त विकारों से ग्रस्त रोगियों को दिया जाए तो विकार शांत हो जाते है।



पेट के रोगों में लाभकारी-

बच्‍चों को अक्‍सर पेट में गैस, दर्द और पेट फूलना जैसी समस्‍याएं होती है। इन समस्‍याओं के होने पर अमलतास के गूदे को नाभि के आस-पास के हिस्‍से में लगाने फायदा होता है। यह प्रयोग नियमित रूप से करने से स्‍थायी रूप से फायदा होता है। इसके अलावा गूदे को बादाम या अलसी के तेल के साथ मिलाकर लेने से मल त्‍याग की समस्‍याओं को दूर करने में मदद मिलती है।|
त्वचा रोग- : 
त्वचा रोगों में इसका गूदा 5 ग्राम इमली और 3 ग्राम पानी में घोलकर नियमित प्रयोग से लाभ होता है | इसके पत्तों को बारीक पीसकर उसका लेप भी साथ-साथ करने से लाभ मिलता गये है |अमलतास की पत्तियों को छाछ के साथ कुचलकर त्वचा पर लगाया जाए तो त्वचा संबंधित अनेक समस्याओं में आराम मिल जाता है। दाद खाज खुजली होने पर अमलतास की फल्लियों के पल्प/ गूदे और मीठे नीम की पत्तियों को साथ में कुचला जाए और संक्रमित त्वचा पर इसे लेपित किया जाए तो आराम मिल जाता है।
कब्ज दूर करने के लिए - 
एक चम्मच फल के गूदे को एक कप पानी में भिगोकर मसलकर छान ले | इसके प्रयोग से कब्ज दूर हो जाता है |
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21.8.16

ब्राम्ही के फायदे ,उपयोग ,उपचार //Health benefits of hydrocotyle asiatica


 ब्राह्मी (वानस्पतिक नाम :Bacapa monnieri) का एक औषधीय पौधा है जो भूमि पर फैलकर बड़ा होता है। इसके तने और पत्तियाँ मुलामय, गूदेदार और फूल सफेद होते है। यह पौधा नम स्‍थानों में पाया जाता है, तथा मुख्‍यत: भारत ही इसकी उपज भूमि है। इसे भारत वर्ष में विभिन्‍न नामों से जाना जाता है जैसे हिन्‍दी में सफेद चमनी, संस्‍कृत में सौम्‍यलता, मलयालम में वर्ण, नीरब्राम्‍ही, मराठी में घोल, गुजराती में जल ब्राह्मी, जल नेवरी आदि तथा इसका वैज्ञानिक नाम बाकोपा मोनिएरी है।

Brahmi का पौधा हिमालय की तराई में हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण के मार्ग में अधिक मात्रा में पाया जाता है। जो बहुत उत्तम किस्म का होता है। ब्राह्मी पौधे का तना जमीन पर फैलता जाता है। जिसकी गांठों से जड़, पत्तियां, फूल और बाद में फल भी लगते हैं। इसकी पत्तियां स्वाद में कड़वी और काले चिन्हों से मिली हुई होती है। ब्राह्मी के फूल छोटे, सफेद, नीले और गुलाबी रंग के होते हैं। ब्राह्मी के फलों का आकार गोल लम्बाई लिए हुए तथा आगे से नुकीलेदार होता है जिसमें से पीले और छोटे बीज निकलते हैं। ब्राह्मी की जड़ें छोटी और धागे की तरह पतली होती है। इसमें गर्मी के मौसम में फूल लगते हैं। जहां नदी, नाले और नहरों की बहुलता होगी, वहां इसे अध्कि मात्रा में उपलब्ध् किया जा सकता है। जडी-बूटी की पहचान न होने के कारण लोग कभी-कभी मण्डूकपर्णी को भी ब्राह्मी समझ बैठते है। जबकि उसके गुण र्ध्म बिल्कुल पृथक है। इसकी पत्तियाँ एक इंच अथवा इंच के चौथाई भाग तक चौडी गोलाकार होती है। फलों का रंग नीला अथवा हल्का गुलाबी होता है। पफलों की आकृति गोल और अग्रभाग नुकीला रहता है। गर्मी के दिनों में फल और बाद में पफलित होती है। औषध्यि दृष्टि से पूरा पंचाग ;जड, तना, पत्ती, फल और पफलद्ध ही प्रयुक्त होता है।

Brahmi के पत्ते पतले, पुष्प सफेद अथवा नीले और स्वाद में कडवापन होता है। जबकि मण्डूकपर्णी के फूल लाल तीखा स्वाद होता है और सूखने के बाद उसकी औषधीय विशेषताएँ प्रायः नष्ट हो जाती है। ब्राह्मी को सुखाकर भी पाउडर के रूप में उतना ही उपयोगी माना जाता रहा है। एक वर्ष की अवधि तक इसका पूर्ण प्रयोग किया जा सकता है।
यह पूर्ण रूपेण औषधीय पौधा है। यह औषधि नाडि़यों के लिये पौष्टिक होती है। कब्‍ज को दूर करती है। इसके पत्‍ते के रस को पेट्रोल के साथ मिलाकर लगाने से गठिया दूर करती है। ब्राह्मी में रक्‍त शुद्ध करने के गुण भी पाये जाते है। यह हृदय के लिये भी पौष्टिक होता है।
*मिर्गी (अपस्मार) होने पर :-14 से 28 मिलीलीटर ब्राह्मी की जड़ का रस या 3 से 6ग्राम चूर्ण को दिन में3 बार 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ लेने से मिर्गी का रोग ठीक हो जाता है।
*धातु क्षय (वीर्य का नष्ट होना) :-15 ब्राह्मी के पत्तों को दिन में 3 बार सेवन करने से वीर्य के रोग का नष्ट होना कम हो जाता है।
*आंखों की बीमारी में :-3 से 6 ग्राम ब्राह्मी के पत्तों को घी में भूनकर सेंधानमक के साथ दिन में 3 बार लेने से आंखों के रोग में लाभ होता है।
*आंखों का कमजोर होना :-3 से 6 ग्राम ब्राह्मी के पत्तों का चूर्ण भोजन के साथ लेने से आंखों की कमजोरी दूर हो जाती है।
*स्मरण शक्ति वर्द्धक :
 10 मिलीलीटर सूखी ब्राह्मी का रस, 1 बादाम की गिरी, 3 ग्राम कालीमिर्च को पानी से पीसकर 3-3 ग्राम की टिकिया बना लें। इस टिकिया को रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ रोगी को देने से दिमाग को ताकत मिलती है।
*3 ग्राम ब्राह्मी, 3 ग्राम शंखपुष्पी, 6 ग्राम बादाम गिरी, 3 ग्राम छोटी इलायची के बीज को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को थोड़े-से पानी में पीसकर, छानकर मिश्री मिलाकर पीने से खांसी, पित्त बुखार और पुराने पागलपन में लाभ मिलता है।



*ब्राह्मी के ताजे रस और बराबर घी को मिलाकर शुद्ध घी में 5 ग्राम की खुराक में सेवन करने से दिमाग को ताकत प्रदान होती है।”
*
नींद को कम करने के लिए :-*ब्राह्मी के 3 ग्राम चूर्ण को गाय के आधा किलो कच्चे दूध में घोंटकर छान लें। इसे 1 सप्ताह तक सेवन करने से लाभ पहुंचता है।
*5-10 मिलीलीटर ताजी ब्राह्मी के रस को 100-150 ग्राम कच्चे दूध में मिलाकर पीने से लाभ होता है।”
*
पागलपन (उन्माद) में :-*6 मिलीलीटर ब्राह्मी का रस, 2 ग्राम कूठ का चूर्ण और 6 ग्राम शहद को मिलाकर दिन में 3 बार पीने से पुराना उन्माद कम हो जाता है। 3 ग्राम ब्राह्मी, 2 पीस कालीमिर्च, 3 ग्राम बादाम की गिरी, 3-3 ग्राम मगज के बीज तथा सफेद मिश्री को25 गाम पानी में घोंटकर छान लें, इसे सुबह और शाम रोगी को पिलाने से पागलपन दूर हो जाता है।
*3 ग्राम ब्राह्मी के थोड़े से दाने कालीमिर्च के पानी के साथ पीसकर छान लें। इसे दिन में3 से 4 बार पिलाने से भूलने की बीमारी से छुटकारा मिलता है।
*ब्राह्मी के रस में कूठ के चूर्ण और शहद को मिलाकर चाटने से पागलपन का रोग ठीक हो जाता है।
*ब्राह्मी की पत्तियों का रस तथा बालवच, कूठ, शंखपुष्पी का मिश्रण बनाकर गाय के पुराने घी के साथ सेवन करने से पागलपन का रोग दूर हो जाता है।”
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बालों के लिए : –100 ग्राम ब्राह्मी की जड़, 100 ग्राम मुनक्का और 50 ग्राम शंखपुष्पी को चौगुने पानी में मिलाकर रस निकाल लें। इस रस का सेवन करने से बालों के सभी रोग दूर हो जाते हैं।
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पेशाब करने में कष्ट होना (मूत्रकृच्छ) :-ब्राह्मी के 2 चम्मच रस में, 1 चम्मच मिश्री मिलाकर सेवन करने से पेशाब करने की रुकावट दूर हो जाती है।
जलन :-
5 ग्राम ब्राह्मी के साथ धनिया मिलाकर रात को भिगो दें। इसे सुबह पीसकर,छानकर मिश्री के साथ मिलाकर पीने से जलन शांत हो जाती है।
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उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) :-ब्राह्मी के पत्तों का रस एक चम्मच की मात्रा में आधे चम्म्च शहद के साथ लेने से उच्च रक्तचाप ठीक हो जाता है।
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कब्ज (Constipation):- ब्राह्मी में पाये जाने वाले औषधीय गुण कब्ज की परेशानी को दूर करने में मदद करते हैं। नियमित रूप से ब्राह्मी का सेवन करने से पुरानी से पुरानी कब्ज की परेशानी दूर हो जाती है। इसके अलावा ब्राह्मी में कई रक्तशोधक गुण भी होते हैं, जो पेट से संबंधित समस्या से बचाव करते हैं।
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अनिद्रा (Insomnia):- जो व्यक्ति को अनिद्रा की समस्या से परेशान हैं, उन्हें ब्राह्मी इस्तेमाल करना चाहिए। रोजाना सोने से एक घंटा पहले एक गिलास दूध में एक चम्मच ब्राह्मी चूर्ण मिलाकर पीने से व्यक्ति तनावमुक्त होता है और नींद अच्छी आती है।
*इसके सेवन से शरीर की शक्ति का क्षरण तो रूकता ही है पर मस्तिष्क की क्षमता में अप्रत्याशित अभिवृद्धि होने लगती है। Brahmi के घटक स्नायुकोषों का परिपोषण तो करते ही है साथ ही स्फूर्ति प्रदान करने का प्रयोग भी पूरा होता है। विद्युतीय स्फुरणों से स्नायु कोषों की उत्तेजना कम होती और मिर्गी रोग स्वतः ही भागने लगता है।बोलने में हकलाने और अध्कि बोलने से स्वर भंग होने में ब्राह्मी का सेवन ही लाभकारी सिद्ध होता है।
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उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure):- ब्राह्मी में मौजूद औषधीय गुण रक्तचाप को संतुलित रखते हैं। यदि कोई व्यक्ति उच्च रक्तचाप की वजह से परेशान है तो उसे ब्राह्मी की ताजी पत्तियों का रस शहद में मिलाकर पीना चाहिए। ऐसा करने से रक्तचाप नियंत्रण में रहता है।
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निद्राचारित या नींद में चलना :-ब्राह्मी, बच और शंखपुष्पी इनको बराबर मात्रा में लेकर ब्राह्मी के रस को 12 घंटे छाया में सुखाकर और 12 घंटे धूप में रखकर पूरी तरह से सुखाकर इसका चूर्ण तैयार कर लें। लगभग 480 मिलीग्राम से 960 मिलीग्राम सुबह और शाम को समान मात्रा में घी और शहद के साथ मिलाकर नींद में चलने वाले रोगी को देने से उसका स्नायु तंत्र मजबूत हो जाता है। इसका सेवन करने से नींद में चलने का रोग दूर हो जाता है।
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वीर्य रोग : -ब्रह्मी, शंखपुष्पी, खरैटी, ब्रह्मदंडी तथा कालीमिर्च को पीसकर खाने से वीर्य रोग दूर होकर शुद्ध होता है।
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अवसाद उदासीनता सुस्ती :-लगभग 10 ग्राम ब्राह्मी (जलनीम) का रस या लगभग480 से 960मिलीग्राम चूर्ण को लेने से उदासीनता, अवसाद या सुस्ती दूर हो जाती है।
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बुद्धिवैकल्प, बुद्धि का विकास कम होना : -ब्राह्मी, घोरबच (बच), शंखपुष्पी को बराबर मात्रा में लेकर ब्राह्मी रस में तीन भावनायें (उबाल) देकर छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें और रोजाना 1 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम को असमान मात्रा में घी और शहदके साथ मिलाकर काफी दिनों तक चटाने से बुद्धि का विकास हो जाता है।
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मूत्ररोग :-4 मिलीलीटर ब्राह्मी के रस को शहद के साथ चाटने से मूत्ररोग में लाभ होता है।
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दिल की धड़कन :-20 मिलीलीटर ताजी ब्राह्मी का रस और 5 ग्राम शहद को मिलाकर रोजाना सेवन करने से दिल की कमजोरी दूर होकर तेज धड़कन भी सामान्य हो जाती है।
*गुल्यवायु हिस्टीरिया :-
10-10 ग्राम ब्राह्मी और वचा को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर सुबह और शाम 3-3 ग्राम की मात्रा में त्रिफला के जल से खाने पर हिस्टीरिया के रोग में बहुत लाभ होता है।
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खांसी और बुखार (Cold and Fever):- ब्राह्मी, शंखपुष्पी, बादाम, छोटी या सफ़ेद इलायची चूर्ण एक समान मात्रा में लेकर पानी में घोलकर छान लें। इस पानी में मिश्री मिलाकर रोजाना सुबह- शाम आधा- आधा गिलास पीएं। इससे खांसी, जुकाम, बुखार आदि से राहत मिलती है।
*महर्षि चरक ने Brahmi को मानसिक दुर्बलता के कारण उत्पन्न रोगों की रामबाण औषधि घोषित किया है। मनोबल की कमी से ही तो मिरगी रोग की उत्पत्ति होती है। सुश्रुत संहिता में भी कुछ इसी तरह के तथ्यों का उल्लेख है। मानसिक विकृति के कारण ही तो नाडी दौर्बल्य, उन्माद, अप्रसार एवं स्मरण शक्ति के लोप होने लगता है। इसलिए तो ब्राह्मी को एक प्रकार का नर्वटॉनिक भी माना गया है। Brahmi के सूखे चूर्ण को मानसिक तनाव और घबराहट मिटती और अवसाद की प्रवृत्ति समाप्त होती है।



बालों की समस्या (Hair Problem):- यदि आप बालों से जुड़ी किसी समस्या से परेशान है तो पंचांग चूर्ण (ब्राह्मी के पांच भागों का चूर्ण) का एक चम्मच की मात्रा में रोजाना सेवन करने से बालों का झड़ना, रूसी, कमजोर बाल आदि परेशानी दूर होती हैं।
मिर्गी (अपस्मार) : -
*ब्राह्मी का रस शहद के साथ मिलाकर खाने से मिर्गी का रोग ठीक हो जाता है।
*मिर्गी के रोग में ब्राह्मी (जलनीम) से निकाले गये घी का सेवन करने से लाभ होता है।
ब्राह्मी, कोहली, शंखपुष्पी, सांठी, तुलसी और शहद को मिलाकर मिर्गी के रोगी को पिलाने से मिर्गी से छुटकारा मिल जाता है।”
ब्राह्मी का तीन ग्राम चूर्ण गौ दुग्ध् के साथ प्रतिदिन लेने से बीस-पच्चीस पत्तों को गाय के दूध् में उबालकर हर रोज लेने से अनिद्रा रोग सदा के लिए भाग खडा होता है।
*मिरगी के दौरों में आध चम्मच ब्राह्मी स्वरस मधु के साथ लेने से रोग से राहत मिलती है। स्वरस के स्थान पर चूर्ण का भी सेवन किया जा सकता है।
कभी-कभी शरीर कुष्ट तथा अन्यान्य प्रकार के क्षय रोगों का शिकार बन दुर्बलता के शिकंजे में कसता चला जाता है। ऐसी स्थिति में तेल की तरह ब्राह्मी का लेपन भी कापफी आराम दायक होता है।
*खाँसी तथा क्षय रोग में भी ब्राह्मी का लेपन से रोगोपचार की प्रक्रिया सफल होती है।
आंत भारी तो मॉथ भारी यानी पेट की कब्ज से रक्त विकार उत्पन्न होते और हृदयघात जैसी दुर्बलता सामने आती है।
*ब्राह्मी स्वरस में काली मिर्च मिलाकर खाने से पाचन संस्थान मजबूत होता तथा *विभिन्न प्रकार के विष और ज्वर में शीघ्र लाभ पहुँचता है।
प्रारम्भ में शरीर और मन को शक्ति और स्फर्ति प्रदान करने वाला यह टॉनिक अब आत्मबल बढाने में भी बडा सहायक सिद्व हो रहा है।
*स्मरण शक्ति के कमजोर तथा मंदबुद्वि होने पर इसका स्वरस और चूर्ण जल अथवा मिश्री के साथ लेने का विधन है।
*इसकी मालिश करने से भी मस्तिष्क की खुश्की मिटती और मेध संवर्धन का सदुद्देश्य पूरा होता है।
*मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए तो उसका प्रयोग ठण्डाई में भी करते है।
*हृदय की समस्या (Heart Disease):-
ब्राह्मी में ब्राहमीन एल्केलाइड (Brahmin Alkaloid) गुण मौजूद होता है, जो हृदय यानि दिल के लिए फायदेमंद साबित होता है। यदि ब्राह्मी का नियमित रुप से सेवन किया जाए तो सारी उम्र हृदय यानि दिल से जुड़ी बीमारी नहीं हो सकती।
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मिर्गी के दौरे (Epilepsy Disease):- मिर्गी की बीमारी होने पर रोगी को ब्राह्मी की जड़ का रस या या ब्राह्मी चूर्ण का सेवन दिन में 3 दूध के साथ करवाएं। ऐसा करने से रोगी को लाभ मिलेगा और मिर्गी के दौरे आना बंद हो जाएंगे।
खसरा : -
ब्राह्मी के रस में शहद मिलाकर पिलाने से खसरा की बीमारी समाप्त होती है।
*बलगम :-
बालकों के सांस और बलगम में ब्राह्मी को थोड़ा-सा गर्म करके छाती पर लेप करने से लाभ होता है।
*पीनस :-
मण्डूकपर्णी की जड़ को नाक से लेने से पीनस (पुराना जुकाम) के रोग में लाभ होता है।
*दांतों के दर्द: -
दांतों में तेज दर्द होने पर एक कप पानी को हल्का गर्म करें। फिर उस पानी में 1 चम्मच ब्राह्मी डालकर रोजाना दो बार कुल्ला करें। इससे दांतों के दर्द में आराम मिलता है।
*हकलाना, तुतलाना :
-ब्राह्मी घी 6 से 10 ग्राम रोजाना सुबह-शाम मिश्री के साथ खाने से तुतलाना (हकलाना) ठीक हो जाता है।
*कमजोरी :-
40 मिलीलीटर केवांच की जड़ का काढ़ा सुबह-शाम सेवन करने से स्नायु की कमजोरी मिट जाती है। इसके जड़ का रस अगर 10-20 मिलीलीटर सुबह-शाम लिया जाए तो भी कमजोरी में लाभ होता है।
    


*एड्स : -ब्राह्मी नामक बूटी का रस 5 से 10 मिलीलीटर अथवा चूर्ण 2 ग्राम से 5 ग्राम सुबह शाम देने से एड्स में लाभ होता है क्योंकि यह गांठों को खत्म करता है और शरीर के अंदर गलने को रोकता है। निर्धारित मात्रा से अधिक लेने से चक्कर आदि आ सकतेहैं।
*दांत दर्द (Tooth Ache):-
ब्राह्मी का इस्तेमाल, दांत दर्द जैसी परेशानी में भी किया जाता है। आधा गिलास पानी में आधा चम्मच ब्राह्मी डालकर गर्म करके रख लें। इस पानी से रोजाना दिन में दो बार कुल्ला करें। ऐसा करने से दांतों के दर्द से छुटकारा मिलता है।
*एंटीऑक्सीडेंट (Antioxidant):-
ब्राह्मी का उपयोग बौद्धिक विकास बढ़ाने के लिए प्राचीनकाल से किया जा रहा है। ब्राह्मी में कई एंटीऑक्सीडेंट गुण मौजूद होते हैं इसलिए ब्राह्मी रस या इसके 7 पत्तों का रोजाना सेवन करना चाहिए।
*ब्राह्मी क्वाथ को पिलाने के पीछे एक ही उद्देश्य रहा कि आत्मबल अर्थात ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति होती है । हमारी दृष्टि में Brahmi का एक रासायनिक घटक हर्सेपोनिन सीधे पीनियल ग्रन्धि को प्रभावित करके सिरॉटानिन नामक स्नायु रसायन का उत्सर्जन करता है जो साध्ना की सपफलता का रहस्य भी यही है और आत्म बल सम्पन्न सपफल जीवन जीने की रीति-नीति भी। स्मृति, मेध और प्रतिभा के प्रमापन के लिए प्रयोगशाला भी बनाई थी जिसमें साध्ना काल में अनेकानेक तरह के उत्साहवर्धक परिणाम भी मिले।
*एकाग्रता बढ़ाए
(Increase Concentration):- एकाग्रता की कमी के कारण अक्सर बच्चों का ध्यान पढ़ाई से दूर भागता है। ऐसे में दूध के साथ ब्राह्मी चूर्ण का रोजाना सेवन करने से बच्चों में एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है, जिसके फलस्वरूप बच्चों का मन पढ़ाई में लगने लगता है।
*कार्यक्षमता बढ़ाए
(Increase Efficiency):- ब्राह्मी का सबसे ज्यादा प्रभाव मुख्य रूप से मस्तिष्क पर होता है। यह मस्तिष्क के लिए एक चमत्कारी औषधि है, मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करती है। लगातार काम करने से थकावट हो जाने पर कार्यक्षमता अक्सर कम हो जाती है। इससे बचने के लिए ब्राह्मी रस या ब्राह्मी चूर्ण का सेवन करना चाहिए। ऐसा करने से मानसिक तनाव, थकावट या सुस्ती कम होती है और कार्य क्षमता बढ़ती है।
ब्राह्मी की ताजा अवस्था का प्रयोग तो सर्वोत्तम है। कहीं उपलब्ध नहीं हो तो सुखाकर पाउडर के स्वरूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
मात्रा : 1 से 3 चम्मच ब्राह्मी के पत्तों का रस, ताजी हरी पत्तियां 10 तक सुखाया हुआ बारीक चूर्ण 1 से 2ग्राम तक, पंचांग (फूल, फल, तना, जड़ और पत्ती) चूर्ण 3 से 5 ग्राम तक और जड़ के चूर्ण का सेवन आधे से 2 ग्राम तक करना चाहिए।