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18.2.17

अर्जुन की छाल के औषधीय गुण




परिचय :
 इसका वृक्ष 60 से 80 फीट तक ऊंचा होता है। इसके पत्ते अमरूद के पत्तों जैसे होते हैं। यह विशेषकर हिमालय की तराई, बंगाल, बिहार और मध्यप्रदेश के जंगलों में और नदी-नालों के किनारे पंक्तिबद्ध लगा हुआ पाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में फल पकते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
संस्कृत- ककुभ। हिन्दी- अर्जुन, कोह। मराठी- अर्जुन सादड़ा। गुजराती- सादड़ो । तेलुगू- तेल्लमद्दि। कन्नड़- मद्दि। तमिल मरुतै, बेल्म। इंग्लिश- अर्जुना। लैटिन- टरमिनेलिया अर्जुन।
अर्जुन वृक्ष भारत में होने वाला एक औषधीय और सदाबहार वृक्ष है भारतीय पहाड़ी क्षेत्रों में नदी-नाले के किनारे, सड़क के किनारे ओर जंगलों में यह महा औषधिये वर्क्ष बहुतायत में पाया जाता है। इसका उपयोग रक्तपित्त (खून की उल्टी), प्रमेह, मूत्राघात, शुक्रमेह, खूनी प्रदर, श्वेतप्रदर, पेट दर्द, कान का दर्द, मुंह की झांइयां,कोढ बुखार, क्षय और खांसी में भी लाभप्रद रहता है। हृदय रोग के लिए तो इसे रामबाण औषधि माना जाता है। यह नाडी की क्षीणता को सक्रिय करता है, पुराणी खांसी, श्वास दमा, मधुमेह, सूजन,जलने पर, मुंह के छाले पर और हिस्टीरिया आदि रोगों में लाभदायक है। हृदय की रक्तवाही नलिकाओं में थक्का बनने से रोकता है। यह शक्तिवर्धक, चोट से निकलते खून को रोकने वाला (रक्त स्तम्भक) एवं प्रमेह नाशक भी है। इसे मोटापे को रोकने, हड्डियों को जोड़ने में, खूनी पेचिश में, बवासीर में, खून की कलाटिंग रोकने में मदद करता है और केलोस्ट्राल को भी घटाता है। यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है, पत्थरी को निकलता है, लीवर को मजबूत करता है, बवासीर को ठीक करता है। ताकत को बढ़ाने के लिए और यह एंटीसेप्टिक का भी काम करता है।
     यह एक औषधीय वृक्ष है और आयुर्वेद में हृदय रोगों में प्रयुक्त औषधियों में प्रमुख है। अर्जुन का वृक्ष आयुर्वेद में प्राचीन समय से हृदय रोगों के उपचार के लिए प्रयोग किया जा रहा है। औषधि की तरह, पेड़ की छाल को चूर्ण, काढा, क्षीर पाक, अरिष्ट आदि की तरह लिया जाता है।



आयुर्वेद ने तो सदियों पहले इसे हृदय रोग की महान औषधि घोषित कर दिया था। आयुर्वेद के प्राचीन विद्वानों में वाग्भट, चक्रदत्त और भावमिश्र ने इसे हृदय रोग की महौषधि स्वीकार किया है।


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हृदय रोग :
 हृदय रोग के रोगी के लिए अर्जुनारिष्ट का सेवन बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ है। दोनों वक्त भोजन के बाद 2-2 चम्मच (बड़ा चम्मच) यानी 20-20 मि.ली. मात्रा में अर्जुनारिष्ट आधा कप पानी में डालकर 2-3 माह तक निरंतर पीना चाहिए। इसके साथ ही इसकी छाल का महीन चूर्ण कपड़े से छानकर 3-3 ग्राम (आधा छोटा चम्मच) मात्रा में ताजे पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करना चाहिए।
रक्तपित्त :
 चरक के अनुसार, इसकी छाल रातभर पानी में भिगोकर रखें, सुबह इसे मसल-छानकर या काढ़ा बनाकर पीने से रक्तपित्त नामक व्याधि दूर हो जाती है।
मूत्राघात : 
पेशाब की रुकावट होने पर इसकी अंतरछाल को कूट-पीसकर 2 कप पानी में डालकर उबालें। जब आधा कप पानी शेष बचे, तब उतारकर छान लें और रोगी को पिला दें। इससे पेशाब की रुकावट दूर हो जाती है। लाभ होने.तक दिन में एक बार पिलाएं।
खांसी : 



अर्जुन की छाल को सुखा लें और कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। ताजे हरे अडूसे के पत्तों का रस निकालकर इस चूर्ण में डाल दें और चूर्ण सुखा लें, फिर से इसमें अडूसे के पत्तों का रस डालकर सुखा लें। ऐसा सात बार करके चूर्ण को खूब सुखाकर पैक बंद शीशी में भर लें। इस चूर्ण को 3 ग्राम (छोटा आधा चम्मच) मात्रा में शहद में मिलाकर चटाने से रोगी को खांसी में आराम हो जाता है।

*हड्डी टूट जाने और चोट लगने पर भी अर्जुन की छाल शीघ्र लाभ करती है। अर्जुन की छाल के चूर्ण की फंकी दूध के साथ लेने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है। और अर्जुन की छाल को पानी के साथ पीसकर लेप करने से दर्द में भी आराम मिलता है। टूटी हड्डी के स्थान पर अर्जुन की छाल को घी में पीसकर लेप करेंके पट्टी बांध ले हड्डी शीघ्र जुड़ जाती है।
*आग से जलने पर होने वाला घाव पर अर्जुन की छाल के चूर्ण को लगाने से घाव शीघ्र ही भर जाता है। अर्जुन छाल को कूट कर काढ़ा बनाकर घावों और जख्मों को धोने से लाभ होता है।
बवासीर में अर्जुन की छाल, बकायन के फल और हारसिंगार के फूल तीनो को पीसकर बारीक चूर्ण बनाले इसे दिन में दो-तिन बार नियमित सेवन करने से खूनी बवासीर ठीक हो जाता है तथा बवासीर के मस्से ठीक हो जाते है।



*अर्जुन और जामुन के सूखे पत्तों का चूर्ण शारीर पर उबटन की तरह लगाकर कुछ देर बाद नहाने से अधिक पसीने से पैदा दुर्गंध दूर होती है ।
*नारियल के तेल में अर्जुन की छाल के चूर्ण को मिलाकर मुंह के छालों पर लगायें। मुंह के छाले ठीक हो जायेंगे।
*एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण एक कप (मलाई रहित) दूध के साथ सुबह-शाम नियमित सेवन करने से हृदय के सभी रोगों में लाभ मिलता है, दिल की धड़कन सामान्य होती है।

*अर्जुन की छाल के चूर्ण को चाय के साथ एक चम्मच इस चूर्ण को उबालकर ले सकते हैं। उच्च रक्तचाप भी सामान्य हो जाता है। चायपत्ती की बजाये अर्जुन की छाल का चूर्ण डालकर ही चाय बनायें, यह और भी प्रभावी होगी। अर्जुन की छाल और गुड़ को दूध में उबाल कर रोगी को पिलाने से दिल मजबूत होता है और सूजन मिटता है।
*एक गिलास टमाटर के रस में एक चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण मिलाकर नियमित सेवन करने से दिल की धड़कन सामान्य हो जाती है।
*अर्जुन की छाल और मिश्री मिला कर हलुवा बना ले, इसका नित्य सेवन करने से हृदय की पीड़ा, दिल की घबराहट, अनियमित धड़कन आदि से निजात मिलती हैं।
*अर्जुन की छाल का दूध के साथ काढ़ा बना ले यह काढ़ा हार्ट अटैक हो चुकने पर सुबह शाम सेवन करें। इस से हृदय की तेज धड़कन, हृदय शूल, घबराहट में निश्चित तोर से कमी आती हैं।


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18.6.15

हृदय निरोग रखने के उपचार // Ayurvedic tips to Keep Heart Healthy










अनियमित और अत्यधिक व्यस्त जीवन तथा खानपान के प्रति लापरवाही से हृदय रोगियों की संख्या मेन तीव्र ईजाफ़ा किया है| फास्टफूड़ हमारे पारंपरिक भोजन पर भारी पड़ रहा है\| , अधिक चिकनाई और मांसाहार के बढ़ते चलन से हालात और भी बिगड़ गए हैं||







हर पांचवा व्यक्ति है दिल का मरीज:

अनुसंधान के आंकड़ों पर यकीन करें तो भारत में हर पांचवां व्यक्ति दिल का मरीज है। दिल के रोगियों को हमेशा यह उलझन रहती है कि वे किस प्रकार का भोजन करें या किस प्रकार का भोजन न करें।


कोलेस्ट्रॉल का माया जाल -

माना जाता है कि सबसे पहले परहेज है तेल व घी का मगर चूंकि शरीर को वसा की हमेशा जरूरत रहती है, इसलिए इसे पूरी तरह भोजन से हटाया नहीं जा सकता। एक मिथक हे कि कोलेस्ट्रॉल दिल के रोगों का सबसे बड़ा कारण है । पर सच क्या है , मिथक नहीं बताते । आइए एक नजऱ डालते हैं अच्छे और बुरे दोनों ही तरह के कोलेस्ट्रॉल पर -

कोलेस्ट्रॉल दोस्त भी दुश्मन भी:

कोलेस्ट्रॅाल एक पीला, चिकना और वसायुक्त पदार्थ है जो रक्त में रहता है। यह धमनियों में बायोलोजिकल प्लेक के एकत्रित होने का मुख्य कारण है। इससे हृदय रोग की संभावना बढ़ जाती है।

लेकिन कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए केवल हानिकारक ही नहीं है बल्कि शरीर में नये सेल्स और हार्मोन्स बनाने में मददगार भी है। कोलेस्ट्रॉल केवल तब नुकसान पहुंचाता है जब शरीर में इसकी मात्रा बढ़ जाती है। यह रक्त प्रवाह में फैल जाता है तो आर्टरी वाल्स पर इसकी मात्रा अधिक हो जाने से धमनियों और रक्त प्रवाह में बाधा उत्पन्न करता है और हार्ट-अटैक, आघात और एंजाइना पेन होने की संभावना बढ़ जाती है।

कई तरह के कोलेस्ट्रॉल-

डायटरी कोलेस्ट्रॉल, सीरम, एचडीएल और एलडीएल , कोलेस्ट्रॉल से मिलते-जुलते हैं।डायटरी कोलेस्ट्रॉल जानवरों से प्राप्त खाद्य पदार्थो में और सीरम कोलेस्ट्रॉल हमारी रक्तधारा में पाया जाता है, । एचडीएल कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर सेहत के लिए अच्छा होता है लेकिन एलडीएल कोलेस्ट्रॉल एचडीएल की धमनी में बाधा उत्पन्न कर सकता है इसका उच्च स्तर सेहत के लिए अच्छा नहीं है।

खान-पान पर रखें नियंत्रण:-

अगर प्रतिदिन संतुलित आहार लें तो रक्त में कोलेस्ट्रॉल के बढऩे की संभावना कम रहती है। आहार का संतुलन इस बात पर निर्भर है कि वह किस स्त्रोत से प्राप्त हुआ है और किस प्रकार तैयार किया गया है। भोजन में 20 से 30 प्रतिशत कैलोरी फैट , 90 फीसदी पॉलीअनसेचुरेटेड और 10 फीसदी सेचुरेटेड फैट होना चाहिए। रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढऩे न पाए इसलिए कुछ सावधानियां बरतें।

बचें चिकनाई से:-

बुद्धिमानी यही होगी कि मीट, मक्खन, पनीर और हाइड्रोजेनेटिक ऑयल जैसे सेचुरेटेड फैट वाले खाद्य कम कर दें। इनकी जगह मछली, चिकन, अंडा, कम वसायुक्त डेरी उत्पाद और मक्का, सनफ्लावर या सोयाबीन के तेल का सेवन करे। ऑलिव ऑयल, एवकाडोस ऑयल, केनोला और पीनट ऑयल में मोनोअनसेचुरेटेड फैट पाया जाता है। यह कोलेस्ट्रॉल को कम करता है।
हृदय रोगी नमक, मिर्च तथा तले-भुने भोजन का प्रयोग कम से कम करें या हो सके तो न ही करें । हरी पत्तेदार सब्जियों एवं फल का सेवन अधिक से अधिक मात्रा में करना चाहिए।
यदि रोगी धूम्रपान, शराब या अन्य किसी नशीली वस्तु का सेवन करता है तो उसे इन पदार्थों का सेवन बंद कर देना चाहिए। तेल ,घी, मक्खन मावा व क्रीम इत्यादि का सेवन कम से कम करना चाहिए।
आंवला ,गाजर अया लहसुन का सेवन प्रतिदिन करने से राहत मिलती है । सेब के मुरब्बे का सेवन हृदय रोगियों को विशेषकर करना चाहिए। हल्के-फुल्के व्यायाम तथा सुबह की सैर को अपनी दिनचर्या में अवश्य शामिल करें
फलियों व अन्य दालों में पानी में, घुलनशील रेशा होता है, जिसे पेक्टिन कहते है। यह कोलेस्ट्रॉल के चारों ओर एक संरक्षक की भांति फैल जाता है और शरीर को हानि पहुंचाने से पहले ही उसे शरीर से बाहर कर देता है। हर रोज एक कप पकी फलियां आपके लिए पर्याप्त होंगी।

खूब फल-सब्जियां खाएं

फलों में भी पेक्टिन के कारण कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करने की क्षमता होती जई भी फायदेमंद पेक्टिन रिचफ्रूट की तरह ही जई का आटा भी सीरम कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक होता है। एक अध्ययन के मुताबिक मेडिकल छात्रों को चार सप्ताह तक प्रतिदिन जई के आटे से बनी दो रोटी खाने को दी गई, तो उनके सीरम कोलेस्ट्रॉल में 5.3 फीसदी की कमी पाई गई।

मकई को भोजन में शामिल करे

एक अध्ययन के मुताबिक जिन लोगों का कोलेस्ट्रॉल काफी बढ़ा हुआ था, उन्होंने कम कोलेस्ट्रॉल वाले आहार के साथ एक टेबल स्पून मकई का चोकर प्रतिदिन नाश्ते और खाने से पहले सूप या टमाटर के जूस में मिलाकर लिया तो 12 सप्ताह के बाद उनके कोलेस्ट्रॉल लेवल में 20 फीसदी की कमी देखी गई।

अंडा खाएं पर ध्यान से-

अंडों में 275 एम.जी. कोलेस्ट्रॉल होता है। अगर आप अंडा पसंद करते है तो सप्ताह में आप तीन अंडे ले सकते है। अंडे के पीले भाग में कोलेस्ट्रॉल होता है इसलिए इसका अधिक सेवन आपकी सेहत के लिए सुरक्षित नहीं है। परंतु अंडे के सफेद हिस्से को आप अधिक मात्रा में ले सकते हैं।

बदलें जीवन शैली: -

खान-पान और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन करके दिल का बचाव किया जा सकता है। जेगिंग व व्यायाम तथा एरोबिक धमनियों के अंदर कोलेस्ट्रॉल के जमाव को कम करने में सहायक होते हैं। यें खाने के बाद खून में फैली वसा को साफ करते हैं। विषषेज्ञों का मानना है कि जो लोग व्यायाम नहीं करते है उनकी तुलना में एक धावक अपने शरीर से वसा को हटाने में 70 फीसदी आगे होता है। सप्ताह में तीन बार 20 मिनट तक टहलना हृदय के लिए लाभकारी होता है। लेकिन किसी भी प्रकार का व्यायाम शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना अच्छा है।

वजन न बढऩे दें-

वजन बढऩे से शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी बढऩे लगती है। नीदरलैंड में 20 वर्षो तक चले एक अध्ययन से पता चला है कि शरीर का वजन सीरम कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने के लिए अकेला जिम्मेदार है। शरीर के वजन में प्रत्येक 2.2 पौंड बढऩे से कोलेस्ट्रॉल लेवल 2 प्वाइंट बढ़ जाता है।

लहसुन गाजर लाभप्रद -

प्रतिदिन आंवला या दो गाजर खाने के अलावा फूलगोभी, ब्रॉक्ली और प्याज भी अच्छे परिणाम देते है। कच्चा लहसुन भी हानिकारक रक्त वसा को कम कर सकता है। एक अध्ययन के अनुसार प्रतिदिन कच्चे लहसुन की एक कली खाने से ट्राईग्लिसराइड 13 फीसदी कम हो जाता है। हो सकता है आपको इसकी गंध पसंद न हो लेकिन अब एक ऐसे लहसुन द्रव्य का पता चला है जिसमें गंध नहीं होती।

कॉफी, धूम्रपान से दूर रहे-

एक अध्ययन में पाया गया कि प्रतिदिन दो से ज्यादा कप कॉफी पीने वालों का कोलेस्ट्राल तीव्र गति से बढ़ा। एक स्वीडिश अध्ययन दर्शाता है कि धूम्रपान करने वाले लाभकारी एचडीएल कोलेस्ट्रॉल लेवल की कमी से ग्रस्त होते है।

ट्राइग्लिसराइडस कम करें-

एक अन्य प्रकार का ब्लड फैट ट्राईग्लिसराइड ज्यादा खतरनाक हो सकता है । 50 वर्ष से ऊपर की महिलाओं व एलडीएल या एचडीएल के असंतुलित अनुपात वाले पुरुषों में यह हार्ट अटैक के कारणों को एक चौथाई बढ़ा सकता है।

डाईट थेरेपी-

जिनका एलडीएल कोलेस्ट्रॉल हाई है और एचडीएल कोलेस्ट्राल कम है उनके लिए डायट थेरेपी फायदेमंद है। यह थेरेपी प्रत्येक व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों से कोलेस्ट्रॉल कम करने का कार्य करती है। इसके लिए सबसे पहलेे आप इस बात का परीक्षण कीजिए कि किस प्रकार का आहार आपके लिए सही है। लेकिन यह परीक्षण एक ही प्रकार के या कुछ प्रकार के खाद्य पदार्थो पर न करें क्योंकि विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थो में कोलेस्ट्रॉल से लडऩे की अपनी अलग क्षमता होती है ।

आपके दिल को मजबूत रखने के लिए आपका डाइट चार्ट ऐसा होना चाहिए :

*सुबह सात बजे- दूध मलाई रहित एक गिलास दो चम्मच शक्कर के साथ। बादाम 7 नग

*सुबह नौ बजे- अंकुरित अनाज एक प्लेट मिक्स या वेजीटेबल उपमा।

*दोपहर 12 बजे- दो चपाती चौकर सहित, छिलके वाली दाल एक कटोरी, चावल आधा कटोरी, हरी सब्जी एक कटोरी, दही एक कटोरी, सलाद एक प्लेट।

*तीन या चार बजे- चाय एक कप, भेल एक प्लेट या बिस्किट दो, फल एक (सेव, संतरा, कच्चा जाम, अनार, नाशपती आदि।)

*रात सात या आठ बजे- दोपहर जैसा खाना।

*रात नौ बजे- फल एक या दूध आधा गिलास।

दिनभर में दो-तीन चम्मच घी व चार-पांच चम्मच तेल का उपयोग भोजन में करना चाहिए। हृदय रोगी को नमक, मिर्च तथा तले-भुने भोजन का प्रयोग कम से कम करना चाहिए या हो सके तो नहीं करना चाहिए। हरी पत्तेदार सब्जियों एवं फल का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए। यदि रोगी धूम्रपान, शराब या अन्य किसी नशीली वस्तु का सेवन करता है तो उसे शीघ्र ही इन पदार्थों का सेवन बंद कर देना चाहिए। घी, मक्खन इत्यादि का सेवन कम से कम करना चाहिए।

आंवला या लहसुन का सेवन प्रतिदिन करना चाहिए। सेब के मुरब्बे का सेवन हृदय रोगियों को विशेषकर करना चाहिए। हल्के-फुल्के व्यायाम तथा सुबह की सैर को अपनी दिनचर्या में अवश्य शामिल करना चाहिए।

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