14.6.10

मोतियाबिंद और कमजोर नजर के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार.


                                                                                                             
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      नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज करना फ़ायदेमंद रहता है। कम उम्र में चश्मा लगना आजकल आम बात होती जा रही है| लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी कारण से एक बार चश्मा लग गया तो वह उतर नहीं सकता | ऐनक लगने के प्रमुख कारण आँखों की भली प्रकार देख रेख नहीं करना,पोषक तत्वों की कमी, या आनुवांशिक हो सकता है| इनमें से आनुवांशिक को छोडकर अन्य कारण से लगा चश्मा सही देख भाल ,व् खान पान का ध्यान रखने के आलावा देशी उपचार के द्वारा उतारा जा सकता है|
      मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है। आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे-


१) सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है। मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय करें।



२) विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बेटा केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० मिलि.रस दिन में दो बार लेना हितकर माना गया है। इससे आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद वालों को गाजर का उपयोग अनुकूल परिणाम देता है।






३) आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज १० ग्राम लेकर ३०० मिलि. पानी में उबालें। उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस होता है





४) आंवला नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया है। ताजे आंवले का रस ५ मिलि. इतने ही शहद में मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने के तत्व भी इस उपचार में मौजूद हैं।

५) भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी का चलन है।इसका अंग्रेजी नाम Indian red sorrel है| खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने का भी यह एक बेहतरीन उपाय है।
६) अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के फ़ूल का रस दिन में दो बार आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस मिनिट आंख में लगा रहने दें।



७) घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का कहना है कि शहद आंखों में दो बार लगाने से मोतियाबिंद नियंत्रित होता है।

८) लहसुन की २-३ कुली रोज चबाकर खाना आंखों के लिये हितकर है। यह हमारे नेत्रों के लेंस को स्वच्छ करती है।
९) पालक का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद में लाभकारी पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं। पालक में पाया जाने वाला बेटा केरोटीन नेत्रों के लिये परम हितकारी सिद्ध होता है। ब्रिटीश मेडीकल रिसर्च में पालक का मोतियाबिंद नाशक गुण प्रमाणित हो चुका है
१०) एक और सरल उपाय बताते हैं| अपनी दोनों हथेलियां आपस में रगडें कि कुछ गर्म हो जाएं| फिर आंखों पर ऐसे रखें कि ज्यादा दबाव मेहसूस न हो। हां, हल्का सा दवाब लगावे। दिन में चार-पांच बार और हर बार आधा मिनिट के लिये करें। आंखों की रोशनी बढाने का नायाब तरीका है|
११) किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद और ज्योति बढाने की अच्छी घरेलू दवा है।
१२) भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल भी डालें। इसमें प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के गुण हैं जो नेत्रों के लिये भी हितकर है।

१३) पाठकों , अब मैं वो उपचार बता रहा हूँ जिससे कई लोगों के चश्मे उतर गए हैं| नेत्र ज्योति वर्धक इस उपचार की जितनी भी प्रशंसा की जाय थोड़ी है| इसमें तीन पदार्थ जरूरी हैं| बड़ी सौंफ,मिश्री और बादाम | तीनों बराबर मात्रा में १००-१०० ग्राम लेकर महीन पीस लें | कांच के बर्तन में भर कर रखें| रात को सोते वक्त दस ग्राम चूर्ण एक गिलास गरम दूध के साथ लें| यह प्रयोग ४०-५० दिन तक निरंतर करना है|
१४) सूरज मुखी के बीजों का सेवन करना आंखों के लिए सेहतमंद रहता है| इसमें विटामिन सी,विटामिन ई,बीता केरोटीन और एंटीआक्सीडेंटस होते है जो आंखों की कमजोरी दूर करते हैं|
१५) दूध व् अन्य डेयरी उत्पाद का पर्याप्त मात्रा में उपयोग करना नेत्र विकारों में फायदेमंद रहता है| इन चीजों से आखों को उचित पोषण मिलता है|



१६) केवल बादाम का सेवन भी आँखों के लिए बहुत फायदेमंद होता है| रोजाना चलते फिरते ८-१० बादाम खाने से जरूरी मात्रा में विटामिन ई प्राप्त होने से आँखें स्वस्थ रहती हैं| बादाम में रेशा,वसा,विटामिन और मिनरल पर्याप्त मात्रा में होते हैं| आयुर्वेद में उल्लेख है कि बादाम को भिगोकर खाने के बजाय अंकुरित करके खाना ज्यादा लाभप्रद होता है| अंकुरित करने के लिये बादाम १२ घंटे पानी में भिगोएँ | छानकर बादाम सुखालें| कांच के जार में रखें और अंकुरित होने के लिये ३- ४ दिन फ्रीज में रखें|
रात को नो बादाम भिगोएँ ,सुबह पीसकर पानी में घोलकर पी जाएँ| इससे आँखे स्वस्थ रहती हैं| और निरंतर उपयोग से आँखों का चश्मा भी उतर जाएगा|
१७) आँखों को स्वस्थ रखने के लिए सोया मिल्क ,दही,मूंगफली,खुबानी का उचित मात्रा में सेवन करना लाभ दायक है|
१८) एक शौध के अनुसार हरे पतेदार सब्जियों में केरोटिन नामक पिगमेंट की ऐसी मात्रा मौजूद रहती है जिसमें आँखों की रोशनी तेज करने की क्षमता होती है| विशेषज्ञों के अनुसार यह कुदरती केरोटीनाईड आँख की पुतली पर सकारात्मक प्रभाव डालता है और आँखों की रोशनी सुरक्षित रखने के अलावा अनेक नेत्र रोगों से भी बचाव करता है|
१९) एक चने के दाने बराबर फिटकरी को सेककर इसे १०० ग्राम गुलाब जल में डालें और रोजाना सोते वक्त २-बूँदें आँख में डालने से चश्मे का नंबर कम हो जाता है|
२०) बिल्व पत्र का ३० मिली रस पीने और २-४ बूँद रस आँखों में काजल की तरह लगाने से रतौंधी रोग में लाभ होता है| अंगूर का रस भी आँखों के लिए वरदान तुल्य माना गया है|
२१) इलायची आँखों के लिये बहुत लाभदायक होती है\ रात को सोने से पहले २ इलायची पीसकर दूध में डालें| अच्छी तरह उबालकर फिर मामूली गरम हालत में पी जायें| इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है|
२२) अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते रहने से नेत्र ज्योति बढ़ती है|
२३) हल्दी की गांठ को तुवर की दाल में उबालकर फिर छाया में सुखाकर रखलें| इसे पानी में घिसकर सूर्यास्त से पूर्व आँखों में काजल की तरह लगाएं | आँखे स्वस्थ रहती हैं और आँखों की लालिमा भी दूर होती है|


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आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार






4.6.10

संधिवात (आर्थराईटिज) की आयुर्वेदिक घरेलू चिकित्सा // Ayurvedic Home Medicine of Arthritis




संधिवात रोग में शरीर के जोडों और अन्य भागों में सूजन आ जाती है और रोगी दर्द से परेशान रहता है। चलने फ़िरने में तकलीफ़ होती है।यह रोग शरीर के तंतुओं में विकार पैदा करता है,प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है,जोड शोथ युक्त हो जाते हैं,हिलने डुलने में कष्ट होता है।कलाई,घुटनों और ऊंगली ,अंगूठे में संधिवात का रोग ज्यादा देखने में आता है। कभी-कभी बुखार आ जाता है।भूख नहीं लगना भी इस रोग का लक्षण है। समय पर ईलाज नहीं करने पर आंखों,फ़ेफ़डों,हृदय व अन्य अंग दुष्प्रभावित होने लगते हैं।
संधिवात के कारण-
१)आनुवांशिक कारण
२)खान-पान की असावधानियां
३) जोडों पर ज्यादा शारीरिक दवाब पडना
४) जोडों का कम या जरूरत से अधिक उपयोग करना
५) स्नायविक तंतुओं में विकार आ जाना और मेटाबोलिस्म में व्यवधान पड जाना।
६) सर्द वातावरण में शरीर रखने का कुप्रभाव
७)बुढापा और हार्मोन का असुंतुलन


संधिवात रोगी क्या करें और क्या न करें-
१) सबसे महत्वपूर्ण सलाह यह है कि रोगी २४ घंटे में मौसम के अनुसार ४ से ६ लिटर पानी पीने की आदत डालें। शरीर के जोडों में यूरिक एसीड जमा हो जाता है और इसी से संधिवात रोग जन्म लेता है। ज्यादा पानी पीने से ज्यादा पेशाब होगा और यूरिक एसीड बाहर निकलता रहेगा
२) फ़ल और हरी सब्जीयां अपने आहार में प्रचुरता से शामिल करें।इनमें भरपूर एन्टीओक्सीडेन्ट तत्व होते हैं जो हमारे इम्युन सिस्टम को ताकतवर बनाते हैं।रोजाना ७५० ग्राम फ़ल या सब्जियां या दोनों मिलाकर उपयोग करते रहें।इनका रस निकालकर पियेंगे तो भी वही लाभ प्राप्त होगा।
३)ताजा गाजर का रस और नींबू का रस बराबर मात्रा में मिश्रण कर १५ मिलि प्रतिदिन लें।
४) ककडी का रस पीना भी संधिवात में लाभकारी है।
५) संधिवात रोगी को चाहिये कि सर्दी के मौसम में धूप में बैठे।

६) शकर का उपयोग हानिकारक होता है।
७) चाय,काफ़ी,मांस से संधिवात रोग उग्र होता है इसलिये जल्दी ठीक होना हो तो इन चीजों का इस्तेमाल न करें।
८)तेज मसाले,शराब ,तला हुआ भोजन,नमक,शकर ,मिर्च- छोडेंगे तो जल्दी ठीक होने के आसार बनेगे।९) संधिवात रोगी के लिये यह जरूरी है कि हफ़्ते में दो दिन का उपवास करें।
१०) काड लिवर आईल ५ मिलि की मात्रा में सुबह शाम लेने से संधिवात में फ़ोरन लाभ मिलता है।
११) पर्याप्त मात्रा में केल्शियम और विटामिन डी की खुराकें लेते रहें। ये विटामिन भोजन के माध्यम से लेंगे तो ज्यादा बेहतर रहेगा।

१२) तीन नींबू का रस और ४० ग्राम एप्सम साल्ट आधा लिटर गरम पानी में मिश्रित कर बोतल में भर लें। दवा तैयार है। ५ मिलि दवा सुबह शाम पीयें। यह नुस्खा बेहद कारगर है।
१३) मैने साईटिका रोग में आलू का रस पीने का ईलाज बताया है। संधिवात में भी आलू का रस अशातीत लाभकारी है। २०० मिलि रस रोज पीना चाहिये।
१४) ज्यादा सीढियां चढना हानिकारक है।
१५)अपने काम और विश्राम के बीच संतुलन बनाये रखना जरूरी है।
१६) अदरक का रस पीना संधिवात के दर्द में शीघ्र राहत पहुंचाता है।
१७) अलसी के बीज मिक्सर में चलाकर पावडर बनालें। २० ग्राम सुबह और २० ग्राम शाम को पानीके साथ लें। इसमे ओमेगा फ़ेट्टी एसीड होता है जो इस रोग में अत्यंत हितकर माना गया है।इससे कब्ज का भी निवारण हो जाता है।
१८) सभी प्रकार के वातरोगों में लहसुन का उपयोग करना चाहिए। इससे रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है तथा उसके शरीर की वृद्धि होती है।'
कश्यप ऋषि के अनुसार लहसुन सेवन का उत्तम समय पौष व माघ महीना (दिनांक 22 दिसम्बर से 18 फरवरी 2011 तक) है।
प्रयोग विधिः 

200 ग्राम लहसुन छीलकर पीस लें। 4 लीटर दूध में ये लहसुन व 50 ग्राम गाय का घी मिलाकर दूध गाढ़ा होने तक उबालें। फिर इसमें 400 ग्राम मिश्री, 400ग्राम गाय का घी तथा सोंठ, कालीमिर्च, पीपर, दालचीनी, इलायची,तमालपात्र, नागकेशर,पीपरामूल, वायविडंग, अजवायन, लौंग, च्यवक, चित्रक, हल्दी,दारूहल्दी, पुष्करमूल, रास्ना,देवदार, पुनर्नवा, गोखरू, अश्वगंधा, शतावरी, विधारा,नीम, सोआ व कौंचा के बीज का चूर्ण प्रत्येक 3-3 ग्राम मिलाकर धीमी आँच पर हिलाते रहें। मिश्रण में से घी छूटने लग जाय,गाढ़ा मावा बन जाय तब ठंडा करके इसे काँच की बरनी में भरकर रखें।
10 से 20 ग्राम यह मिश्रण सुबह गाय के दूध के साथ लें (पाचन शक्ति उत्तम हो तो शाम को पुनः ले सकते हैं।
भोजन में मूली, अधिक तेल व घी तथा खट्टे पदार्थों का सेवन न करें। स्नान व पीने के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करें।
 


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