9.12.18

सूर्य स्नान करने की विधि और फायदे

                                                         
अग्नि तत्व जीवन का उत्पादक होता है। गर्मी के बिना कोई जीव या पौधा न तो उत्पन्न हो सकता है और न ही विकसित। चैतन्यता जहां कहीं भी दिखाई देती है, उसका मूल कारण गर्माहट ही है। गर्माहट के समाप्त होते ही क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है। अगर शरीर की गर्मी का अंत हो जाये तो जीवन का अंत ही समझा जाता है। अग्नि तत्व को सर्वोपरि समझते हुए आदि वेद ऋग्वेद में सर्वप्रथम मंत्र अक्षर 'अग्नि' ही आया है। सूर्य अग्नि तत्व का मूर्तिमान स्वरूप है, इसीलिए सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि जिन पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं को धूप पर्याप्त मात्र में मिलती है, वे स्वस्थ व निरोग रहते हैं। उसके विपरीत जहां सूर्य की जितनी कमी होती है, वहां उतनी ही अस्वस्थता रहती है। एक कहावत है-जहां धूप नहीं जाती, वहां डॉक्टर जाते हैं, अर्थात प्रकाश रहित स्थानों में बीमारियों का निवास हो जाता है। भारतीय तत्ववेत्ता अति प्राचीन काल से सूर्य के गुणों से परिचित हैं, इसीलिए उन्होंने सूर्य की उपासना की अनेक विधि-व्यवस्थायें प्रचलित कर रखी हैं। अब पाश्चात्य भौतिक विज्ञान द्वारा भी सूर्य के अद्भुत गुणों से परिचित होते जा रहे हैं।
 सूर्य की सप्त किरणों में 'अल्ट्रा वायलेट' और 'अल्फा वायलेट' किरणें उपस्थित रहती हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभप्रद होती हैं। आजकल इन किरणों को मशीनों के माध्यम से कृत्रिम रूप में भी पैदा किया जाने लगा है परंतु जितना लाभ सूर्य से आने वाली किरणों द्वारा होता है, उतना मशीन द्वारा कृत्रिम किरणों से नहीं होता। यूरोप एवं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी अब सूर्य किरणों द्वारा उपचार विधियों का चलन जोरों पर हो गया है। वहां अनेक ऐसे औषधालय हैं जो मात्र सूर्य शक्ति से बिना किसी अन्य औषधियों के प्रयोग किए जटिल रोगों की चिकित्सा सफलतापूर्वक कर रहे हैं।
'क्रोमोपैथी' नामक एक स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति का ही आविष्कार हो चुका है, जिसमें रंगीन कांच की सहायता से सूर्य की वांछित किरणों को आवश्यकता के अनुसार रोगी तक पहुंचाया जाता है। रोग के कीटाणुओं का नाश करने की जितनी क्षमता धूप में है, उतनी और किसी वस्तु में नहीं होती। क्षय के कीड़े जो बड़ी मुश्किल से नष्ट होते हैं, सूर्य के सम्मुख रखने से कुछ ही मिनटों में नष्ट हो जाते हैं। वेटिव, लुक्स, जानसन, रोलियर, लुईस, रेडोक, टाइरल आदि अनेक उच्च कोटि के सुप्रसिद्ध चिकित्सकों ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में सूर्य किरणों की सुविस्तृत महिमा का वर्णन किया है और बताया है कि 'सूर्य से बढ़कर अन्य किसी औषधि में रोग निवारक शक्ति है ही नहीं।
सूर्य किरणों से निरोग और रोगी सभी को समान रूप से फायदा होता है, इसलिए नित्य नियमित रूप से अगर 'सूर्य स्नान किया जाय तो स्वास्थ्य सुधार में आश्चर्यजनक रूप से सहायता मिल सकती है। 

सूर्य स्नान की विधि:- नियमित रूप से सूर्य स्नान करते रहने से हर अवस्था के तथा हर रोग से ग्रस्त स्त्री-पुरूष तथा बच्चे स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकते है। सूर्य की किरणें शरीर में भीतर तक प्रवेश कर जाती है और रोग के कीटाणुओं को नष्ट कर देती है। पसीने द्वारा शरीर में स्थित विकारों को बाहर निकालकर अपनी पोषक शक्ति से क्षत विक्षत एवं रूग्ण अंगों को बल प्रदान करना सूर्य-किरणों का प्रमुख कार्य होता है।
टूटी हुई हड्डियों को जोडऩे, घावों को भरने तक से सूर्य-स्नान से लाभ पहुंचता है। यूं तो सूर्य-स्नान किसी भी ऋतु में किया जा सकता है, परंतु इसके लिए शीत-ऋतु अत्यन्त लाभकारी मानी जाती है। सूर्य-स्नान के लिए प्रात: काल का समय सबसे अच्छा माना जाता है। दूसरे दर्जे का समय संध्याकाल का होता है।
इसके लिए हल्की किरणें ही उत्तम होती है। तेज धूप में बैठने से अनेक त्वचा रोग हो सकते हैं। सूर्य-स्नान को आरंभ में आधे घंटे से ही शुरू करना चाहिए। फिर धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हुए एक डेढ़ घंटे तक ले जाना चाहिए।
 सूर्य-स्नान करते समय मात्र तौलिया पहनकर ही धूप में बैठना चाहिए। समस्त शरीर नंगा रहने पर सूर्य की किरणों को शरीर सोखता है। अगर एकांत व सुरक्षित स्थान हो तो तौलिया को भी हटाया जा सकता है। सूर्य-स्नान करते समय सिर को तौलिया या हरे पत्तों से ढक लेना चाहिए।
   केला एवं कमल जैसा शीतल प्रकृति वाला पत्ता मिल जाए तो अति उत्तम होता है। नीम के पत्तों का गुच्छा बनाकर भी सिर पर रखा जा सकता है। जितनी देर सूर्य-स्नान करें, उतने समय को चार भागों में बांटकर अर्थात् पेट का भाग, पीठ का भाग, दाई करवट तथा बाईं करवट को सूर्य की किरणों के सामने बारी-बारी से रखना चाहिए जिससे हर अंग में समान रूप से धूप लग जाये। धूप सेवन करने के बाद ताजे पानी में भिगोकर निचोड़े हुए मोटे तौलिए से शरीर के हर अंग को रगडऩा चाहिए जिससे गर्मी के कारण रोमकूपों द्वारा भीतर से निकाला हुआ विकार शरीर से ही चिपका न रह जाये।
  धूप का सेवन खाली पेट ही करना चाहिए। धूप सेवन के कम से कम दो घंटे पहले और आधे घंटे बाद तक कुछ नहीं खाना चाहिए। सूर्य का स्थान ऐसा होना चाहिए जहां पर जोर से हवा के झोंके न आते हों। धूप सेवन के बाद स्वभावत: शरीर हल्का एवं फुर्तीला हो जाता है परंतु अगर ऐसा न हो तो देह और भारी मालूम पडऩे लगती है।
अगर ऐसी बात हो तो कुछ देर और धूप स्नान करना चाहिए। अगर स्थिति और ऋतु अनुकूल हो तो सूर्य स्नान के बाद ताजे जल से स्नान कर लेना चाहिए। जिस दिन बादल हों या तेज हवा चल रही हो, उस दिन सूर्य स्नान नहीं करना चाहिए।


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार





5.12.18

नाक, कान, गला के रोगों से निजात पाने के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपाय



ईएनटी (ईयर, नोज एंड थ्रोट) का संक्रमण किसी भी को हो सकता है। फिर चाहे वह बच्‍चा हो या बड़ा। आमतौर पर इस संक्रमण के लक्षण में ही दिखाई देते हैं। इस बीमारी के कुछ लक्षण हैं - गाल में दर्द के साथ नाक से गाढा बलगम निकलना, नाक बहना, सिरदर्द, बुखार और कुछ भी निगलने में परेशानी कान में इंफेक्‍शन होने से हमेशा तरल पदार्थ बाहर निकलता रहता है। सुनने में परेशानी होती है और संक्रमण की वजह से दर्द और सूजन भी हो जाती है।

ईएनटी के संक्रमण से बचने के उपाय –

इस संक्रमण की शुरूआत जुकाम से होती है। इसलिए जुकाम को शुरूआती स्‍तर पर ही पहचान लीजिए। इससे बचने के लिए जुकाम की शुरुआत में ही भाप लीजिए। जिससे संक्रमण नहीं होगा। और संक्रमित बलगम बाहर निकल जाएगा।
ईएनटी के संक्रमण से बचने के लिए तैराकी करते वक्‍त विशेष ध्‍यान देना चाहिए। तैराकी के दौरान कान को और आंख को संक्रमण से बचाने के लिए कान में ईयर प्‍लग और चश्‍मा लगाकर ही तैराकी कीजिए।


अगर गले में खराश हो तो हल्‍के गुनगुने पानी में नमक डालकर गरारा कीजिए। इससे खराश में फायदा होता है। साथ ही गले का संक्रमण नहीं। दिन में कम से कम तीन से चार बार गरारा कीजिए। गरारा करने से रक्‍त संचार भी अच्‍छा होता है।

अगर आपकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है तो लोगों के संपर्क में आने से बचने की कोशिश कीजिए। भीड़-भाड़ वाले इलाके में जाने से परहेज कीजिए। जिससे आपको संक्रमण न हो।
यदि जुकाम से ज्‍यादा परेशान हैं तो हवाई यात्रा नहीं करनी चाहिए। हवाई यात्रा करने से संक्रमण बढ कर साइनस का रूप ले सकता है और कान को भी प्रभावित कर सकता है।
मादक पदार्थों का सेवन करने से बचें। धूम्रपान और शराब पीने से साइनस का संक्रमण बढ जाता है।
फलों और सब्जियों का ज्‍यादा मात्रा में सेवन करें। डेयरी उत्‍पाद का सेवन कम कीजिए।

कान दर्द

कारण

कान के अन्दर मैल फूल जाने, घाव हो जाने, कान में सूजन होने या संक्रमण के कारण कान में दर्द होता हैं। गले या नाक में संक्रमण होने पर समय रहते चिकित्सा न की जाए, तो उससे भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

कान का सूजना, कान से मल निकलना, कानों में रूक – रूक कर दर्द होना आदि।

घरेलू चिकित्सा

तुलसी के पत्तों का रस निकलकर गुनगुना कर लें और दो – तीन बूँद सुबह – शाम डालें।

नींबू का रस गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
प्याज का रस निकालकर गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
बकरी का दूध उबाल कर ठंडा कर लें। जब गुनगुना रह जाएं, तो इसमें सेंधानमक मिलाकर 2 – 3 बूँद दोनों कानों में टपकाएं।
मूली के पत्तों को कूटकर उसका रस निकालें। रस की एक तिहाई मात्रा के बराबर तिल के तेल के साथ आग पर पकाएं। जब केवल तेल ही बचा रह जाए, तो उतार कर छान लें। कान में 2 -3 बूँद डालें।
कपूर व घी समान मात्रा में लेकर पकाएं। पकने पर उतार कर ठंडा कर लें व 2 – 3 बूँद कानों में डालें।
आक के पत्तों का रस, सरसों का या तिल का तेल तथा गोमूत्र या बकरी का मूत्र बराबर मात्रा में लेकर थोड़ा गर्म करें और कान में 2 – 3 बूँद डालें।
लहसुन की दो कलियाँ छीलकर सरसों के तेल में डाकार धीमी आंच पर पकाएं। जब लहसुन जलकर काला हो जाए, तो उसे उतार कर ठंडा करें व छान कर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
अदरक का रस, सेंधानमक, सरसों का तेल व शहद बराबर मात्रा में लेकर गर्म करें और गुनगुना होने पर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
आक की पकी हुई पीली पत्ती में घी लगाकर आग पर गर्म करें। इसे निचोड़कर रस निकालें व दो – तीन बूँद कानों में डालें।
आम की पत्तियों का रस निकालकर गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

महत्पंचमूल सिद्ध तेल, सुरसादि पक्व तेल का प्रयोग किया जा सकता हैं। रामबाण रस, लक्ष्मीविलास रस व संजीवनी वटी का प्रयोग खाने के लिए करें।




कान बहना


कारण

जुकाम, खांसी या गले के संक्रमण की चिकित्सा न की जाए, तो कान में भी संक्रमण हो जाता हैं। छोटे बच्चे जिनका गला खराब हो या खांसी हो, जब कान में मुंह लगाकर धीरे से कोई बात करते हैं, तो सांस के साथ रोग के जीवाणु कान में पहुँच जाते है। कान में फोड़ा – फुंसी हो, पानी, रूई या अन्य कोई बाहरी वस्तु कान मे रह जाए, तो भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

रोगी के कान से बदबूदार स्राव या मवाद बाहर निकलती हैं।

घरेलू चिकित्सा

लहसुन की दो कलियाँ व नीम की दस कोपलें तेल में गर्म करें। दो – दो बूँद दिन में तीन – चार बार डालें।
150 ग्राम सरसों का तेल किसी साफ़ बर्तन में डालकर गर्म करें और गर्म होने पर 10 ग्राम मोम दाल दें। जब मोम पिघल जाए तो आग पर से उतार लें और इसमें 10 ग्राम पिसी हुई फिटकरी मिला दें। 3 – 4 बूँद दवा सुबह – शाम कान में डालें।
2 पीली कौड़ी का भस्म 200 मिली ग्राम व दस ग्राम गुनगुने तेल में डालें। छानकर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
नींबू के रस में थोड़ा सा सज्जीखार मिलाकर 2 – 3 बूँद कान में टपकाएं। आग से उतार कर ठंडा करें व छानकर रख लें। 2 – 3 बूँद कान में डालें।
10 ग्राम रत्नजोत को 100 ग्राम सरसों के तेल में जलाएं। ठंडा होने पर छानकर रखें और 2 – 3 बूँद कान में डालें।
धतूरे की पत्तियों का रस निकालकर थोड़ा गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।
नीम की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
तुलसी की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
आधा चमच्च अजवायन को सरसों या तिल के तेल में गर्म करें। फिर आंच से उतार लें। गुनगुना रह जाने पर 2 – 3 बूँद डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

आरग्वधादि क्वाथ से कान को धोएं। पंचवकल क्वाथ या पंचकषाय क्वाथ का प्रयोग भी किया जा सकता हैं। समुद्रफेन चूर्ण का प्रयोग भी लाभदायक होता है।



नासास्रोत शोथ


कारण

चेहरे की हड्डियों में स्थित गुहाएं (रिक्त स्थान) जोकि नाक से सम्बद्ध हैं, साइनस कहलाती हैं। ये स्लेश्म्कला से ढकी रहती हैं एवं चार प्रकार की होती हैं और जिस हड्डी में स्थित हैं, उनके अनुसार इनका नामकरण किया गया हैं। जुकाम या इन्फ्लुएंजा के उपद्रव के रूप में या संक्रमण के कारण इनमें सूजन आ जाने को साइनुसाइटिस या नासास्रोत शोथ कहते हैं।

लक्षण

किसी साइनस में शोथ होने पर एक ओर नासिका से स्राव होता हैं, साथ ही वेदना की शिकायत भी रहती हैं। जिस साइनस में शोथ हो, उसी के अनुसार वेदना की प्रतीति भी माथे व चेहरे के विभिन्न भागों में होती हैं।

घरेलू चिकित्सा
रोगी को पसीना आने वाली दवा दें, ताकि शोथ के कारण पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद नासागुह के छिद्र खुल जाएं। इसके लिए रोगी को अदरक, लौंग, काली मिर्च, बनफशा की चाय पिलाएं।
एक ग्राम काली मिर्च को आधा चमच्च देसी घी में गर्म करें। ठंडा होने पर ह्वान लें व दो – तीन बूँद नाक के दोनों छिद्रों में तीन बार डालें।
अदरक या सफेदे के पत्ते पानी में उबालकर भाप लें।
5 ग्राम अदरक घी में भूनकर सुबह – शाम लें।
5 ग्राम अदरक को पाव भर दूध में उबालें। यह दूध नाक के नासाछिद्रों में भर कर रखें।
जलनेति – 1 लीटर पानी को नमक डाल कर उबालें। गुनगुना रहने पर टोंटीयुक्त लोटे में भरकर बाएँ नाक से पानी लेकर दाएं से निकालें।फिर दाएं से लेकर बाएँ से निकालें। अंत मैं बारी – बारी से दोनों नाकों से पानी लेकर मुंह से निकालें।

पेटेंट दवाएं




30.10.18

ईसीपी (एक्सटर्नल काउंटर पल्स) से भी हार्ट ब्लॉकेज का इलाज संभव और कारगर

                                  
हार्ट में ब्लॉकेज को हटाने की बजाय हृदय की क्षमता बढ़ाने का ट्रीटमेंट होने लगा है। इसमें ना एंजियोप्लास्टी और ना ही बायपास सर्जरी की जाती है। ईसीपी (एक्सटर्नल काउंटर पल्स) में अधिकतम 35 दिन के ट्रीटमेंट से हृदय के सारे बायपास रूट खोले जाते हैं। अब तक प्रचलित एंजियोप्लास्टी और बायपास की बजाय ईसीपी से भी इलाज होने लगा है। इसमें ब्लॉकेज 80 फीसदी होने का इंतजार नहीं किया जाता है।
साओल के संस्थापक व कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिमल छाजेड़ बताते हैं कि थोड़े ब्लॉकेज में ही हृदय की क्षमता बढ़ाने का काम शुरू किया जाता है। इसमें प्राकृतिक तरीके से रक्त सप्लाई की मात्रा घटा-बढ़ाकर हृदय की क्षमता बढ़ाई जाती है। खिलाड़ियों के हृदय जितनी हार्ट की कैपेसिटी की जाती है। इसमें अधिकतम 30-35 दिन की सिटिंग में हृदय के सारे बायपास रूट खोल दिए जाते हैं।
वो सबकुछ जो नैचुरल बायपास में होता है
छोटी धमनियां करते हैं सक्रिय :

हृदय की कोई बड़ी धमनी के ब्लॉकेज होने पर छोटी-छोटी कई धमनियां उसका काम संभालती है। बड़ी धमनी के ब्लॉकेज पर इन छोटी धमनियों को खोला जाता है। हृदय के रक्त प्रवाह को सामान्य रखा जाता है। इसे नैचुरल बायपास कहते हैं।

रक्त स्टोरेज को पहुंचाते है दिल तक : इसमें मशीन से हाथ व पैरों में के उन भागों पर पट्टे बांधें जाते हैं जहां रक्त का स्टोरेज ज्यादा है। जब-जब सामान्य प्रक्रिया से रक्त हृदय तक पहुंचता है तब मशीन से दबाव बनाकर सामान्य से अधिक रक्त हृदय तक पहुंचाया जाता हैं। इससे हृदय की धमनियों की क्षमता बढ़ने लगती है।
नार्मल हार्ट अटैक
कारण -हृदय तक रक्त पहुंचाने का काम कोराेनरी आर्टरीज करती हैं। इसकी भीतरी सतह पर वसा के छोटे-छोटे कण एक साथ जमा होने से इसे संकरी कर देते हैं। इससे हृदय तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुंचता और हार्ट अटैक की आशंका रहती है।
सलाह - कॉलेस्ट्रॉल मेंटेन रखने के लिए नियमित वर्कआउट जरूरी है। हर दिन कम से कम 30 मिनट वर्क आउट करना चाहिए। इसके लिए वॉकिंग, जॉगिंग, गार्डनिंग, स्विमिंग और साइकिलिंग कर सकते हैं।


3 तरह के कॉलेस्ट्रॉल जिनसे होता है हृदयाघात

1. एचडीएल : यह गुड कोलेस्ट्रोल है, जिसकी मात्रा 60 एमजीडीएल होनी चाहिए। शहर में इस कोलेस्ट्रोल के कम केस हैं।
2. एलडीएल : यह बेड कोलेस्ट्रोल है, जिसकी सामान्य रेंज 100 एमजीडीएल से कम होती है। पश्चिमी देशों में ज्यादा होता है।
3. ट्राईग्लिसराइड : इसकी मात्रा शरीर में 150 एमजीडीएल से कम होनी चाहिए। शहर में इसी के सबसे ज्यादा केस।
यहां है तकनीक
ईसीपी यूएसए के 200 हॉस्पिटल में है। चाइना में 10 हजार से ज्यादा सेंटरों पर इससे इलाज होता है। भारत में एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट, मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट आदि में इस मशीन से बीते दो-तीन साल से इलाज होने लगा है।
बदलती जीवनशैली से हृदय रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। गांवों में 15 तो शहरों में 30 फीसदी लोग हृदय के किसी न किसी रोग से ग्रसित हैं। पिछले एक दशक में 4 गुना हृदय रोग बढ़ा है। इसमें भी युवाओं व महिलाओं की संख्या ज्यादा है।
महिलाओं में 60 फीसदी हृ़दयाघात के मामलों में चेस्ट पैन महसूस ही नहीं होता है। महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले हृदय घात दबे पांव आता है। समय पर चिकित्सकीय सहायता लेने से 80 फीसदी मामलों में खतरा टाला जा सकता है।


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि



9.9.18

कंधे के दर्द,सूजन से मुक्ति पाने के उपाय -डॉ॰आलोक

                                                       


मनुष्य के शरीर में सभी हिस्से टीम की तरह काम करते हैं। ऐसे में किसी भी एक हिस्से में होने वाली तकलीफ पूरे शरीर को पीड़ा से भर देती है। कंधे का डिसलोकेट हो जाना भी ऐसी ही एक तकलीफ है। जब यह तकलीफ बढ़ जाती है तो गंभीर रूप ले सकती है। समय पर होने वाला इलाज इसमें काफी राहत मिल सकती है।
हमारे शरीर में कंधे सबसे ज्यादा मूव करने वाले जोड़ के रूप में उपस्थित होते हैं। ये खुद कई दिशाओं में घूमने के साथ ही बांहों को घुमा सकता है, उन्हें सिर तक ऊंचा कर सकता है और आस-पास फैलाने में मदद कर सकता है। ऐसे में कंधे के डिसलोकेट होने से कई सारी गतिविधियों पर रोक लग सकती है। साथ ही तेज दर्द भी हो सकता है। ऐसा कई कारणों से हो सकता है, लेकिन त्वरित उपचार और सही तरीकों से इसे कंट्रोल में किया जा सकता है।
हमारे कंधे तीन हड्डियों से मिलकर बने होते हैं। ऊपरी बांहों की हड्डी यानी ह्यूमरस, शोल्डर ब्लेड स्कैप्युला तथा कॉलरबोन क्लेविकल। ह्यूमरस का बॉलनुमा सिर, शोल्डर ब्लेड के एक खांचे जैसे सॉकेट 'ग्लेनॉइड' में फिट हो जाता है और इसके आस-पास मौजूद टिशूज इस बॉल को खांचे में फिट बनाए रखने में मदद करते हैं। जब किसी कारण से यह बॉल, सॉकेट से बाहर निकल आती है तो शोल्डर डिसलोकेट हो जाता है और ऐसी हालत में वह अपनी पकड़ स्थाई नहीं रख पाता और बार-बार डिसलोकेट होने लगता है।
इस स्थिति को क्रॉनिक शोल्डर इनस्टेबिलिटी कहते हैं। ज्यादातर मामलों में इसके पीछे कोई चोट या लगातार कंधों पर पड़ने वाला दबाव जिम्मेदार होता है। कुछ केसेस में मसल्स के कमजोर होने या शोल्डर सॉकेट के सही आकार में न होने पर भी यह तकलीफ पनपती है, तब इसे एट्रॉमेटिक शोल्डर इनस्टेबिलिटी कहा जाता है।
पीड़ादाई लक्षण-

शोल्डर के इस स्थिति में आ जाने से उसकी कार्यप्रणाली बाधित हो जाती है और समस्या खड़ी हो जाती है। इसके अलावा अन्य लक्षण जो क्रॉनिक शोल्डर इनस्टेबिलिटी में नजर आते हैं, वे हैं-
शोल्डर का कुछ विशेष स्थितियों में बार-बार अपनी जगह से खिसक जाना या ढीला महसूस होना। जैसे हाथों को सिर के ऊपर ले जाते हुए ऐसा महसूस होना



, चिमटी काटने जैसा अहसास

तेज दर्द
बांहों में किसी जगह पर सुन्न् होने का अहसास होना
कमजोर मूवमेंट और मसल्स में कमजोरी, आदि।
उपचार से मिलती राहत
सामान्य मामलों में कंधे का खिसक जाना कभी-कभार की घटना हो सकती है लेकिन इसका बार-बार खिसकना गंभीर समस्या का कारण बन सकता है। ऐसे में उपचार जरूरी हो जाता है। इसके लिए सर्जिकल और नॉनसर्जिकल दोनों ही तरह की उपचार पद्धतियां अपनाई जा सकती हैं। नॉनसर्जिकल तरीकों में सबसे पहले सूजन कम करने वाली दवाओं और दर्दनिवारकों के जरिए तकलीफ कम करने का लक्ष्य रखा जाता है। कई बार दर्द के काबू में आने पर कुछ विशेष इंजेक्शन भी दिए जा सकते हैं।
साथ ही फिजियोथैरेपी की भी नियमित मदद ली जा सकती है। थैरेपीज लगभग 6-8 हफ्तों तक जारी रखी जा सकती है। सर्जरी के जरिए टूटे या खिंचे हुए लिगामेंट्स को रिपेयर करने का प्रयास किया जाता है। साथ ही सॉकेट के हिस्से को भी सुधारने की कोशिश की जाती है। सर्जरी के बाद बताए गए व्यायामों को नियमित करना फायदे को बढ़ाने में मदद करता है।
कंधे का दर्द काफी समय तक बना रहने पर रोगी को आमतौर पर कंधे के कुछ प्रकार के व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। और इस काम में कुछ प्रभावी थेरेपी एक्सरसाइज बेहद मददगार होती हैं।



कंधे के थेरेपी व्यायाम-


कंधे का दर्द काफी समय तक बना रहने पर रोगी को आमतौर पर कंधे के कुछ प्रकार के व्यायाम करने की सलाह दी जाती है। इसका उद्देश्य जितना संभव हो, कंधे को जकड़न से मुक्त करना और उसकी गतिशीलता बनाये रखना है। कुछ जटिल मामलों में जब इन सबसे फायदा नहीं होता है, तो डॉक्टर सर्जरी की सलाह भी दे सकते हैं। हालांकि सर्जरी की सलाह केवल कुछ गंभीर मामलों में ही दी जाती है। आमतौर पर तो निम्न प्रभावी थेरेपी एक्सरसाइज की मदद से ही कंधे के दर्द का उपचार हो जाता है।

फ्रोजन शोल्डर है बड़ा कारण-

आमतौर पर फ्रोजन शोल्डर के तीन चरण होते हैं। पहले चरण में व्यक्ति को कंधे में दर्द होने लगता है। दूसरे में उसे कंधे को हिलाने-डुलाने या कोई काम करने में परेशानी होती है। वहीं तीसरे चरण में कंधे की मूवमेंट बिल्कुल रुक जाती है। अधिकांश वृद्ध लोगों कोतो बालों में कंघी करने या कपड़े पहनने तक में परेशानी महसूस होती है। ऐसे में कप को उठाने जैसी दैनिक गतिविधियों में भी कंधे में दर्द होता है।

आइसोमेट्रिक नेक एंड शोल्डर एक्सरसाइज-

आइसोमेट्रिक नेक एंड शोल्डर एक्सरसाइज घर पर ही दिन में 3 से 4 बार किया जा सकता है। इसे करने के लिये सिर और गर्दन को सीधा करके बैठ जाएं। हाथों को कान के ऊपर रखें और हथेली से सिर पर दबाव डालें। सिर को हिलाए बिना ही इस प्रक्रिया को कम से कम दोनों हाथों से आठ से दस बार करें। इससे अलावा कंधों को मजबूत करने के लिए दोनों हाथों को सामने की ओर दीवार पर रखकर दीवार पर दबाव डालें। पांच से दस सेकेंड के बाद हाथों को वहां से हटा दें। आठ से दस बार इस प्रक्रिया को करें, लाभ होगा।
समय रहते अगर इस पर ध्‍यान न दिया जाए तो कुछ समय बाद कंधे का दर्द नियमित होता जाता है। ऐसे में दर्द से तो जुझने के साथ ही साथ आपके काम में भी बाधा पहुंचने लगती है।
कहा जाता है कि ज्यादा नमक खाना सेहत के लिए नुकसानदायक है, लेकिन यह नमक हो सकता है आपके लिए बेहद फायदेमंद। जी हां, आयुर्वेद के अनुसार सेंधा नमक स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है, इसलिए इसे सर्वोत्तम नमक कहा गया है। सेंधा नमक में लगभग 65 प्रकार के खनिज लवण पाए जाते हैं, जो कई तरह की बीमारियों से बचाने में मददगार होते हैं।
वहीं इसका एक बढ़ि‍या फायदा यह है कि यह पाचन के लिए फायदेमंद है। चूंकि यह पाचक रसों का निर्माण करता है, इसलिए कब्ज भी दूर करने में सहायक है। यह कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक है, जिससे दिल के दौरे की संभावना को भी कम करता है। इसके अलावा हाई ब्लडप्रेशर को कंट्रोल करने में भी सेंधा नमक फायदेमंद होता है।
तनाव अधिक होने पर सेंधा नमक का सेवन करना लाभकारी होगा, यह सेरोटोनिन और मेलाटोनिन हार्मोन्स का स्तर शरीर में बनाए रखता है, जो तनाव से लड़ने में आपकी मदद करते हैं। बढ़ती उम्र में अक्सर ही लोगों को जोड़ों में दर्द की समस्या से जुझना पड़ता है। इन जोड़ों के दर्द में सबसे ज्यादा परेशानी कंधो के दर्द को लेकर होती है।
कई बार तो अचानक ही कंधे में असहनीय दर्द होने लगता है। लेकिन कुछ समय बाद आप पाते हैं कि कंधे का दर्द नियमित होता जा रहा है। ऐसे में दर्द से तो जुझने के साथ ही साथ आपके काम में भी बाधा पहुंचने लगती है। यह बात भी सही है कि हर किसी के लिए मंहगी डॉक्टरी इलाज का बोझ उठा पाना संभव नहीं होता है। इसलिए यहां पर हम आपको कुछ ऐसे ही आसान तरीके बता रहे हैं जिन्हें अपनाकर आप बढ़ती उम्र में होने वाले कंधे के दर्द से निजात पा सकते हैं।
सेंधा नमक का इस्तेमाल भी कंधे के दर्द से निपटने का एक आसान सा तरीका है। पिछले काफी समय से लोग इसे उपयोग में ला रहे हैं। लेकिन यह विधि ऊपर दी गई विधियों से काफी अलग है। इसके लिए आप एक टब में हल्का गर्म पानी लेकर उसमें एक या दो कप सेंधा नमक डालें। इसके बाद उसी पानी में पंद्रह मिनट के आस-पास के लिए बैठ जायें। ध्यान रहे कि आपका कंधा भी पानी में डुबा होना चाहिए। सेंधा नमक में मैग्नीशियम सल्फेट पाया जाता है। जो प्राकृतिक रूप से दर्द को कम करके आपकी मांसपेशियों को आराम पहुंचाता है।
कंधे में दर्द किसी भी उम्र में हो सकता है. लेकिन जो लोग लैपटॉप, टैबलेट और स्मार्टफोन पर अधिक समय बिताते हैं उन्हें कंधे में दर्द की समस्या अधिक रहती है. कुछ घरेलू नुस्खों को अपनाकर आप आसानी से कंधे के दर्द से छुटकारा पा सकते हैं.
*कंधे के दर्द से छुटकारा पाने के लिए ठंडे पानी से सिंकाई करनी चाहिए. ये दर्द से राहत देने के लिए बहुत फायदेमंद है. एक प्लास्टिक बैग में बर्फ के टुकड़े रखकर बैग को तौलिए में लपेट लो और दर्द की जगह पर 10 से 15 मिनट तक रखों. दिनभर में कई बार और कुछ दिनों तक लगातार ऐसा ही करें. आप तौलिए को ठंडे पानी में भिगोकर भी ऐसा कर सकते हैं. ध्यान रहे, बर्फ को सीधे दर्द की जगह पर ना लगाएं.
* ठंडे पानी से सिंकाई की तरह ही गर्म सिंकाई भी कंधे के दर्द और सूजन से राहत देती है. कंधे में यदि चोट लग जाए तो 48 घंटे बाद गर्म सेंक का इस्तेमाल करना चाहिए. इससे मसल्स का तनाव भी दूर होगा और मांसपेशियों के तनाव को दूर करने में भी मदद मिलेगी. एक बैग में गर्म पानी भरकर 10 से 15 मिनट दर्द की जगह पर लगाएं. दिनभर में कई बार और कुछ दिनों तक लगातार इसी प्रक्रिया को दोहराएं जब तक दर्द से राहत नहीं मिलती.


* कंधे में दर्द की जगह पर दबाव बनाएं इससे कंधे की सूजन कम होगी. इलास्टिक बैन्डेज या गर्म पट्टी से कंधे पर दबाव बनाया जा सकता है. दर्द की जगह पर बैन्डेज तब तक बांधें जब तक सूजन और दर्द कम ना हो जाएं. इसके अलावा तकिए की मदद से भी कंधे को सपोर्ट किया जा सकता है. ध्यान रहे, बैन्डेज बहुत टाइट ना बांधें.

* सेंधा नमक के पानी में नहाने से कंधे के दर्द में आराम मिलेगा. इससे मांसपेशियों का तनाव भी दूर होगा और ब्लड सरकुलेशन भी बढ़ेगा. साथ ही शरीर को भी आराम मिलेगा. बाथटब को गुनगुने पानी से भर लें. इसमें 2 चम्मच सेंधा नमक अच्छे से मिलाएं. 20 से 25 मिनट तक इस पानी में कंधे को डूबोए रखें. सप्ताह में तीन बार ऐसा करें.
* कंधे के दर्द से राहत पाने के लिए मसाज भी की जा सकती है. मसाज के जरिए कंधे की मांसपेशियों का तनाव कम किया जा सकता है. इससे ब्लड सरकुलेशन भी ठीक रहता है और सूजन भी आसानी से कम हो जाती है. आपको किसी ऐसे व्यक्ति से मसाज करवानी चाहिए जो अच्छी मसाज कर सकें. मसाज के लिए जैतून का तेल, नारियल तेल या सरसों के तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है. तेल को हल्का सा गर्म कर लें. इसके बाद हल्के दबाव के साथ मसाज शुरू करें. 10 मिनट मसाज के बाद गर्म तौलिये को दर्द की जगह पर रखें, इससे आपको बेहतर रिजल्ट मिलेगा. इस प्रक्रिया को दिन में कई बार, कई दिन तक दोहराएं.
* कई बार कंधें में दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी की वजह से होने लगता है. ऐसे में आप दर्द को दूर करने के लिए प्रोटीन, कैल्‍शियम और विटामिन का ओरली सेवन करें. इससे राहत मिलेगी.
* दर्द होने पर भी कई लोग लगातार काम करते रहते हैं, वो काम नहीं करते हैं बल्कि अपने लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं. जब भी दर्द हो, तो आराम करें. आराम करने से शरीर को राहत मिलेगी.
* कई बार गलत तकिया लगाने से भी दर्द होने लगता है. कंधे में दर्द होने पर तकिया न लगाएं या फिर सॉफ्ट तकिया लगाएं.
* अगर आप धूम्रपान करते हैं तो करना छोड़ दें. ऐसा करने से शरीर में रक्‍त का संचार अच्‍छी तरह होगा और दर्द जैसी कई समस्‍याओं से छुटकारा मिल जाएगा.
* रोजमेरी का ह फूल, कंधे के दर्द में बहुत फायदा करता है. इसे उबाल कर इसका काढ़ा पीने से काफी लाभ मिलता है.
* कंधें में दर्द होने स्‍ट्रेचिंग करें. इससे आपको दर्द में राहत महसूस होगी. लेकिन भारी वजह उठाने से बचें.


*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि 



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संधिवात,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द,  कंधे का दर्द   आदि वात     जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है|औषधि से बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त गतिशीलता हासिल करते हैं| औषधि के लिए वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं| 




    







1.9.18

पैरों के दर्द के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार -डॉ॰आलोक

                                                                    


     हम में से जादातर लोगो को कभी न कभी पैर में दर्द की शिकायत होती है कभी अचानक तो कभी रुक-रुक कर पैर में दर्द होने लगता है। पैर में दर्द के कई कारण हो सकते हैं, मसलन मांसपेशियों में सिकुड़न, मसल्स की थकान, ज्यादा वॉक करना, एक्सरसाइज, स्ट्रेस, ब्लड क्लॉटिंग की वजह से बनी गांठ, घुटनों, हिप्स व पैरों में सही ब्लड सर्कुलेशन न होना, पानी की कमी, खाने में कैल्शियम व पोटेशियम जैसे मिनरल्स और विटामिंस की कमी, किसी प्रकार की गहरी चोट होना, किसी प्रकार का संक्रमण या बीमारी होने के कारण आदि। कई बार शरीर की हड्डियां कमजोर होने से भी पैरों में दर्द की शिकायत हो जाती है।
हमारे पैर हड्डियों, लिगामेंट्स, टेंडन्स (ligament, tendons) और मांसपेशियों से बने होते हैं। इन चारो का सही से काम न करना पैर में दर्द का कारण बनता है जब भी हम खड़े होते है या चलते है तो हमारे पैरों पर दबाव पड़ता है, जिसकी वजह से पैर में दर्द होना आम बात है।



पैर के एक या एक से अधिक हिस्सों में होने वाले किसी भी दर्द या परेशानी को पैर दर्द कहा जाता है। पैर के इन हिस्सों में निम्न शामिल हो सकते हैं –
पैर की उंगलियाँ में दर्द
एड़ियां में दर्द
आर्च तलवे की एड़ी और पंजे के बीच के भाग ने दर्द
तलवे में दर्द आदि
यह दर्द कम और जादा भी हो सकता है। जादातर पैरों का दर्द जल्दी ठीक हो जाता है, परन्तु कभी-कभी यह समस्या लम्बे समय तक रह सकती है।
*अगर आपका दर्द लम्बे समय से है और किसी भी तरीके से आराम नहीं लग रहा है तो आपको डॉक्टर से पैर दर्द की जांच करनी चाहिए, खासकर जब यह किसी चोट के कारण शुरू होता है। कई बार चोट का असर बाहर नहीं दीखता है पर अंदरूनी मांशपेशियो पर इस चोट का असर होता है जो बाद में दर्द का कारण बनता है
इंसान के पैर में कुल 26 हड्डियां होती हैं। इसमें से एड़ी की हड्डी (कैलकेनियस) सबसे बड़ी होती है। इंसान की एड़ी की हड्डी को कुदरती रूप से शरीर का वजन उठाने और संतुलन के उद्देश्‍य से तैयार किया गया है। जब हम पैदल चलते या दौड़ते हैं तो यह उस दबाव को झेलती है जो पैर के जमीन पर पड़ने के बाद उत्‍पन्‍न होता है। और इसके साथ ही यह हमें अगले कदम की ओर धकेलती भी है। आइये जानते है पैर में दर्द से बचने के कुछ आसान उपायों के बारे में-



*हॉट एंड कोल्‍ड वॉटर थेरेपी पैर में दर्द के इलाज के लिए एक कारगर तरीका है। गर्म पानी ट्रीटमेंट ब्‍लड फ्लों को बढ़ावा देने और ठंडा पानी से ट्रीटमेंट सूजन को कम करने में मदद करता है। दो पानी की बाल्‍टी लें एक में ठंडा पानी और दूसरें में सहने करने योग्‍य गर्म पानी डालें। अपने पैरों को तीन मिनट गर्म पानी की बाल्‍टी में डालें और तीन मिनट के बाद अपने पैरों को 10 सेकंड के लिए ठंडे पानी की बाल्‍टी में डालें। इस प्रक्रिया को 2-3 बार दोहराये। लेकिन ध्‍यान रहें कि आप गर्म पानी से शुरूआत और ठंडे पानी पर समाप्‍त करें। आप पैरों में दर्द को कम करने के लिए 10 मिनट के लिए बारी-बारी गर्म और ठंडा पैक भी लगा सकते हैं।
*सेंधा नमक एक और प्रभावी घरेलू उपाय है, जो पैरों के दर्द से तत्‍काल राहत प्रदान करने में मदद करता है। गर्म पानी के एक टब में 2-3 बड़े चम्‍मच सेंधा नमक के मिलाकर, इसमें अपने पैरों को 10 से 15 मिनट के लिए डालें। फिर अपने पैरों को ड्राईनेस से बचाने के लिए उनपर मॉश्‍चराइजर लगाये।
लौंग का तेल सिरदर्द, जोड़ों के दर्द, एथलीट फुट, नेल फंगस और पैरों के दर्द को दूर करने वाला एक अद्भुत तेल है। तुरंत राहत पाने के लिए लौंग के तेल का इस्‍तेमाल पैरों में धीरे-धीरे मालिश करने के लिए करें। मसाज रक्‍त के प्रवाह को उत्‍तेजित करता है और मांसपेशियों को आराम देता है। पैरों में दर्द की समस्या से जल्‍द राहत पाने के लिए एक दिन में कई बार मालिश करें।
*सरसों के बीज का इस्‍तेमाल शरीर से विषाक्त पानी निकालने, रक्त परिसंचरण में सुधार करने और सूजन को कम करके पैर में दर्द के उपचार के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ सरसों के बीज लेकर, पीस लें और फिर इन्‍हें गर्म पानी की एक बाल्टी में मिलाये। अपने पैरों को इस पानी में 10 से 15 मिनट के लिए डालें।
*अगर आपको दबाव, मोच या चोट के कारण पैरों में दर्द का अनुभव हो रहा हैं, तो आप परेशानी से राहत पाने के लिए तेजपात का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा यह पैरों की दुर्गंध को दूर करने में मदद करता है। एक कप सेब के सिरके में एक मुट्ठी तेजपात मिलाकर कुछ मिनट के लिए उबाल लें। अब सूती कपड़े की मदद से दर्द वाले हिस्‍से पर लगाये। पैर में दर्द ठीक होने तक इस उपाय को दनि में कई बार दोहराये।
*अगर आपकी मांस-पेशियों में किसी तरह की तकलीफ है और वही दर्द की वजह है तो मसाज करना फायदेमंद रहेगा. आप चाहें तो मसाज करने के लिए ऑलिव ऑयल या नारियल तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं. दिन में दो से तीन बार मसाज करना फायदेमंद होगा.
*पैर के दर्द से छुटकारा पाने के लिए हल्दी का इस्तेमाल करना भी फायदेमंद होता है. हल्दी में एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेट्री गुण पाया जाता है. हल्दी में मिलने वाला करक्यूमिन नाम का यौगिक दर्द को कम करने में बहुत फायदेमंद होता है.


*अपनी एड़ी को आराम दें और उस पर ज्यादा वजन ना डालें।
किसी भी एथलीट एक्टिविटी से पहले स्‍ट्रेचिंग व्‍यायाम जरूर करें। क्योंकि आपके पैर का संतुलन बनाएं रखने के लिए जरूरी व्‍यायाम आपकी मदद कर सकते हैं।
*अच्‍छी क्‍वालिटी के जूते पहनें जो आपके खेल और पैरों के लिहाज से अनुकूल हों।
कई लोग पैर की एड़ी में दर्द होने पर भी तेजी से चलते या दौड़ते हैं। इसलिए अचानक तेज गति से न मुड़ें। अन्यथा स्थिति गंभीर भी हो सकती है।
*दौड़, साइक्लिंग और स्‍वमिंग आदि से पैरों और टांगों को मजबूती प्रदान करने वाले व्‍यायाम करें। प्रभावित हिस्से को रगड़ से बचाने के लिए फुट पैड का उपयोग करें
*जिस पैर में दर्द हो रहा है, उसे थोड़ा ऊपर उठाकर रखें
*अपने पैर को जितना संभव हो, उतना आराम दें


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31.8.18

नशा मुक्ति के उपाय:शराब,गाँजा,भांग,बीड़ी,सिगरेट की लत कैसे छोड़ें?


                                   

    किसी भी चीज़ की अधिकता हमारा नुकसान ही करती है, फिर चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक नुकसान। नशा एक ऐसी चीज है जिसे यदि जरूरत से अधिक लिया जाए तो यह हमारे शरीर को अंदर से खोखला करने लगती है। वैसे सीमित मात्रा में नशा करने के भी नुकसान हैं, किंतु जैसे ही सीमा बढ़ा दी जाए इसके नकारात्मक प्रभाव कई गुणा बढ़ जाते हैं।
जब तक लोगों को इसके बुरे होने की बात समझ आने लगती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है, शरीर विभिन्न बीमारियों की चपेट में आ जाता है। लेकिन अगर समय से इलाज कर लिया जाए तो बचाव किया जा सकता है।
आज हम आपको नशा छोड़ने से संबंधित एक अचूक उपाय बताने जा रहे हैं। यह एक प्रकार की दवा है जो हर तरह का नशा छुड़ाने में सहायक सिद्ध होती है। नशा चाहे कोई भी - शराब, गुटखा, तम्बाकू आदि, किसी भी तरह के नशे से छुटकारा पाया जा सकता है।
इस दवा को तैयार करने के लिए सबसे पहले अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े काट लें। अब इन पर सेंधा नमक डालें और साथ ही नीम्बू निचोड़ दें।
अंत में टुकड़ों को धूप में सूखने के लिए रख दें। जब टुकड़े सूख जाएं तो इन्हें एक डिब्बे में रख लें। लीजिए बन गई नशा छुड़ाने की दवा
अब जब भी किसी नशे की लत लगे तो ये टुकड़ा निकालें और चूसते रहें। ये अदरक मुंह में घुलती नहीं है और इसे आप सुबह से शाम तक मुंह में रख सकते हैं, यकीन मानिए कि किसी दूसरे नशे को करने का मन भी नहीं करेगा।



इसके पीछे एक ठोस कारण है... दरअसल नशा युक्त पदार्थों में भारी मात्रा में सल्फर पाया जाता है और अदरक से बनाई गई यह दवा सल्फर युक्त होती है। इसलिए जैसे ही शरीर को सल्फर की मात्रा मिल जाएगी, किसी अन्य नशे को करने का मन नहीं करेगा।

नशा उतारने के तरीके
नशा करने वाले व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है उसे सही गलत का होश नहीं रहता। नशे में व्यक्ति की हरकतें बर्दाश्त के बाहर हो जाती है। इस कारण से दूसरे लोग बहुत परेशान हो जाते है। ऐसे में नशा उतारना जरुरी हो जाता है।
नशा उतारने के उपाय इस प्रकार है :
शराब का नशा उतारने का तरीका – 
* एक कप पानी में एक नीम्बू का रस मिलाकर कर हर दस मिनट में पिलाएं।
*सेब ( apple ) का जूस पिलाएं।
* सिर पर ठण्डा पानी डालें।
* अमरुद खिलाएं।
* एक गिलास पानी में इमली को भिगोकर मसलकर छान लें। इसमें गुड़ मिलाकर पिलायें।
*पिसा हुआ धनिया और शक्कर मिलाकर खिलाएं।
* दो चम्मच देसी घी में दो चम्मच शक्कर मिलाकर खिलाएं।
भांग का नशा उतारने का तरीका
* एक गिलास पानी में इमली को भिगोकर मसलकर छान लें। इसमें गुड़ मिलाकर पिलायें।
* एक गिलास छाछ पिलाएं।
* एक कटोरी दही खिला दें।
* नीम्बू का अचार खिलाएं।
*अमरुद खिलाएं।
* जामुन के पेड़ की कोमल पत्ती खिलाएं।
अफीम का नशा उतारने का तरीका –
* गुनगुने पानी में या छाछ में शुद्ध हींग मिलाकर पिलाएं।
* हर एक घंटे से एक कप दूध पिलाएं।
* पानी में थोड़ी फिटकरी मिलाकर पिलाएं।


* उल्टी कराएँ और सोने मत दें।

गांजे का नशा उतारने का तरीका – 
*पोदीने का रस पिलाएं।
*एक गिलास पानी में इमली को भिगोकर मसलकर छान लें। इसमें गुड़ मिलाकर पिलायें।
*देसी घी पिलाएं।
सभी प्रकार के नशे उतारने का तरीका
*अगूर के रस में नमक , जीरा , कालीमिर्च डालकर पिलाने से हर प्रकार का नशा उतर जाता है।
* ढाक ( पलाश , केसु ) के पत्ते के दो तीन डंठल मुंह में लेकर चबाने से हर प्रकार का नशा उतर जाता है। ये डंठल पानी के साथ पीस कर छान कर पिलाने से भी नशा उतर जाता है।
*प्याज का रस पिलाने से हर प्रकार का नशा कम हो जाता है।
शराब छुड़ाने के घरेलु उपाय
चार गिलास पानी ( लगभग एक लीटर ) कांच के बर्तन में लें। इसमें 100 ग्राम नई देसी अजवायन दरदरी पीस कर भिगो दें। इसे दो दिन भीगने दें। अब इसे धीमी आंच पर उबालें। पानी एक गिलास जितना रह जाये तब उतार कर ठण्डा कर ले।
अगले दिन थोड़ा मसल कर छान लें। इसे एक शीशी में भर लें। जब भी शराब पीने की इच्छा हो तो इसमें से चार पाँच चम्मच पी लें। एक महीने तक इस तरह ये पानी पीने से शराब की लत sharab ki lat छूट जाती है। थोड़ी इच्छा शक्ति भी मजबूत रखें।
दिन में तीन चार बार उबले हुए सेव खाने से शराब के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है और शराब पीने की आदत छूट जाती है।
सेव का रस तीन चार बार पीने और सेव अधिक खाने से शराब पीने की तलब नहीं लगती और शराब छोड़ना आसान हो जाता है।
सिगरेट बीड़ी तम्बाकू छुड़ाने के उपाय – 
50 ग्राम अजवायन , 50 ग्राम सौंफ और 25 ग्राम काला नमक मिलाकर बारीक पीस लें। इसमें चार चम्मच नीम्बू का रस मिलाकर रात भर के लिए रख दें। अगले दिन सुबह इस चूर्ण को गर्म तवे पर थोड़ा सूखा लें।
इसे एक शीशी में भर लें। जब भी तम्बाकू या सिगरेट की तलब लगे तो ये चूर्ण थोड़ा सा मुँह में डाल कर चूसें। कुछ दिनों में तम्बाकू की लत tambaku ki lat छूट जाएगी। मन पर काबू रखें।
सिगरेट की तलब talab लगने पर छोटी हरड़ मुँह में रखकर चूसने से तलब शांत हो जाती है। इस तरह आदत छोड़ सकते है।
दालचीनी को बारीक पीस कर इसमें शहद मिला लें। तम्बाकू की तलब लगने पर थोड़ा सा ये शहद चाट लें। तलब मिट जाएगी।
रोजाना चार चम्मच प्याज का रस पीने से तम्बाकू की तलब लगनी बंद हो जाती है। सिगरेट गुटका छूट जाता है।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ,भारत सरकार भी नशा छुड़वाने के लिए प्रयासरत है। शराब और दूसरी नशीली चीजों से मुक्ति पाने के लिए नेशनल टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर 1800-11-0031 से भी मदद ली जा सकती है।
नशे के चंगुल से अवश्य मुक्त हो सकते है। जरुरत है थोड़े धीरज और इच्छा शक्ति की। ये तो आप भी जानते है कि यदि आपने कुछ करने का निश्चय कर लिया तो फिर आपको कोई रोक नहीं सकता। तो फिर देर किस बात की आपके सबसे बड़े दुश्मन नशे की तलब को दबाकर कुचल दीजिये और आजादी का जश्न मनाइये।

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गरम पानी मे शहद से वजन कम करें


 शहद पीने के फायदे : 
शहद एक प्राकृतिक औषधी है। इसमें विटामिन ए, बी, सी, आयरन, कैल्शियम, सोडियम, फास्फोरस और आयोडीन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। शहद शरीर को स्वस्थ, निरोग और उर्जावान रखने में मददगार साबित होता है। अगर आप रोजाना एक चम्मच शहद का सेवन करते हैं तो ऐसे में आपके शरीर को काफी फायदा मिल सकता हैं। जी हां, बिल्कुल इसके लिए आपको बस सुबह खाली पेट शहद वाला पानी पीना होगा। ऐसे में आप शरीर की कई समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं। खाली पेट गर्म नींबू पानी पीने से मिलते हैं ये बेमिसाल फायदे
1. पाचन दुरूस्त रखें
शहद में एंटी बैक्टीरियल मौजूद होते हैं जो पेट में किसी भी तरह के संक्रमण को दूर करने में मदद करते हैं और पाचन क्रिया को दुरूस्त रखते है।



2. वजन कम करें

वजन घटाने में भी शहद वाला पानी काफी मददगार साबित होता है। क्योंकि इसका सेवन करने से भूख कम लगती है जिससे कि आप अपने बढ़ते वजन को कंट्रोल में कर सकते हैं। इसके अलावा यह आपको भरपूर एनर्जी भी प्रदान करता है।
3. शरीर को डिटॉक्स करें
शहद शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में भी मदद करता है। देखा जाए तो यह एक तरफ से डिटॉक्स डायट है।
4. प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करें
इसमें ऐसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद साबित होते हैं और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं।


5. खांसी

शहद एंटीबैक्टीरियल प्रापर्टी की तरह काम करता है। इससे हानिकारक बैक्टिरिया शरीर पर आक्रमण नहीं कर पाते हैं। इसका सेवन करने से सर्दी, खांसी जैसी समस्याएं दूर ही रहती हैं।
6. त्वचा निखारे
शहद में एंटी बैक्टीरियल और एंटी फंगल तत्व मौजूद होते हैं जो त्वचा को निखारने में मदद करते हैं। इसके अलावा यह एक्ने से भी बचाता है।
पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज 

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार 

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8.8.18

नस दबने से होने वाले दर्द की सरल चिकित्सा


                                       
    रीढ़ के हड्डी व मनके हमारे शरीर का बहुत ही जरूरी अंग है और हमारा शरीर इसी के सहारे ही चलता है और कार्य करता है। रीढ़ की हड्डी अलगअलग प्रकार के मनकों से बनती है और उन मनकों के बीच में डिस्क होती है और मनकों के दोनों तरफ और बीच में नसें होती है। अगर हमारे मनकों में कोई भी तकलीफ होती है तो उसका सारा असर डिस्क और नसों पर पढ़ता है। जिसके कारण मरीज की गर्दन और कमर में दर्द रहने लगता है और नसों की वजह से यह दर्द बाजुओं और टांगों में जाने लगता है। ज्यादातर यह तकलीफ कमर के नीचे वाले हिस्से में होती है और दर्द टांग में निकलता है जिसको हम सिकाटिका का दर्द कहते हैं। जो कि नस के दबने और उसका दौरा रूकने की वजह से होती है और मरीज के पैर और टांग सुन्न भी रहने लगती है और यह तकलीफ धीरेधीरे बढऩे लगती है और मरीज का चलना, फिरना और खड़े होना भी मुश्किल हो जाता है। इस नस के दबने का पता एमआरआई से लगता है। इससे पता चलता है कि नस कितनी और कहां से दबी है, जिसके अनुसार उसका इलाज करना है अगर मरीज की नस हलकी सी दबी है तो वह दवाईयां और कुछ इंजैक्शन से ठीक हो सकती है, लेकिन अगर मरीज की नसें बहुत ज्यादा और बहुत समय से दबी है तो उसकी टांगों के कमजोरी का खतरा बना रहता है।
कमर के निचले हिस्से में दर्द की समस्या से अक्सर हमें दो चार होना पड़ता है. ऐसा दर्द जो कमर के निचले हिस्से से शुरू होकर एक या दोनों टांगों में चलता हुआ महसूस हो, सियाटिका का दर्द हो सकता है. सियाटिका में प्रभावित टांग में झुनझुनी या सुन्नपन भी हो सकता है. इस रोग में रोगी गिद्ध के सामान लड़खड़ा कर चलता है इसलिए आयुर्वेद में इस रोग को ग्रध्रसी कहा गया है.

कमर दर्द: कारण

रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से सियाटिक नर्व निकलती है जो दोनों ओर टांगों में जाती है.अधिकांशतः अनियमित जीवनशैली तथा उठने-बैठने के गलत तरीकों बढ़ती उम्र में इस सियाटिक नर्व और इसके आस पास के टिश्यू में सूजन आ जाती है जिसके कारण कमर के निचले हिस्से और टांगों में ज्‍यादा दर्द होता है खासकर कमर से लेकर पैर की नसों तक। साइटिका एक ऐसा ही दर्द है। दरअसल साइटिका खुद में बीमारी नहीं बल्कि बीमारियों के लक्षण हैं। इसका सूजन मूल कारण डिस्क प्रोलेप्स कमर के निचले हिस्से में चोट या रीढ़ की हड्डी की आर्थराइटिस आदि हो सकता है.
   आयुर्वेद शास्त्रों के अनुसार यह रोग एक वातव्याधि है. वात दोष के असंतुलन के कारण ही कटि-शूल गर्दन, पीठ, हाथ या शरीर के किसी अन्य हिस्से की नस के दबने से होने वाला दर्द थोडा पीड़ादायक होता है | इससे आपके रोज़मर्रा के कामों में भी बाधा आ सकती है | जब चारों ओर उपस्थित ऊतक जैसे हड्डियाँ, कार्टिलेज, टेंडॉन्स या मांसपेशियां, नस को असामान्य रूप से दबाती हैं या फंस जाती हैं तब नस दबने पर दर्द होता है | चाहे आप खुद इसका इलाज घर पर करें या डॉक्टर की मदद लें, लेकिन नसों में होने वाले दर्द का इलाज़ करने की जानकारी आपको पूरी तरह से ठीक होने और दर्द का सामना करने में मदद करेगी
दबी हुई नस को जितना हो सके दबाना या मोड़ना टालें। More ↓
ज्यादा से ज्यादा आराम करें।
जितना हो सके ब्रेस (brace) या स्पलिंट (splint) की मदद से नस को एक जगह पर स्थिर रखें।
सूजन कम करने के लिए बर्फ और गर्म चीज़ों से बारी बारी से मालिश करें।
आराम पाने के लिए हलकी मसाज करें लेकिन ज्यादा दबाव न डालें।
कोई एक दर्द निवारक दवा (NSAID) जैसे ब्रूफेन (ibuprofen) लें।
नस दबने की या नसों में होने वाले दर्द की पहचान करें: जब कोई नस किसी प्रकार से क्षतिग्रस्त हो जाती है और अपने पूरे सिग्नल भेजने में असमर्थ हो जाती है तब नस में दर्द होता है | यह नस के दबने के कारण होता है जो हर्नियेटेड डिस्क, आर्थराइटिस या बोन स्पर (bone spur) के कारण हो सकता है | चोट लगने, गलत तरीके के पोस्चर से, बार-बार की गतिविधियों से, खेल और मोटापे जैसी स्थितियों और गतिविधियों से भी नसों में दर्द हो सकता है | पूरे शरीर में किसी भी जगह की नस दबाने से पीड़ा हो सकती है लेकिन ये आमतौर पर रीढ़ (स्पाइन), गर्दन, कलाई और कोहनियों में पाई जाती है |
इन स्थितियों के कारण सूजन आ जाती है जो आपकी नसों को संकुचित कर देती है और इससे नस दबने से दर्द होने लगता है |
    पोषक तत्वों की कमी और कमज़ोर स्वास्थ्य नस दबने के दर्द को और बढ़ा देते हैं |
केस की गंभीरता के आधार पर यह स्थिति परिवर्तनीय (रिवर्सेबल) या अपरिवर्तनीय (इर्रेवेर्सिबल) हो सकती है
लक्षणों को नोटिस करें: नस दबने से होने वाला दर्द अनिवार्य रूप से शरीर की तार प्रणाली में होने वाली शारीरिक बाधा है | नस दबने से होने वाले लक्षणों में सुन्नपन, हल्की सूजन, तेज़ दर्द, झुनझुनी, मांसपेशीय ऐंठन और मांसपेशीय दुर्बलता शामिल हैं | आमतौर पर नस के दबने का सम्बन्ध प्रभावित स्थान पर होने वाले तीव्र दर्द से होता है |
नस में अवरोध या दबाव होने के कारण नस शरीर से प्रभावी रूप से सिग्नल नहीं भेज पाती इसीलिए ये लक्षण उत्पन्न होते हैं
प्रभावित स्थान का अत्यधिक उपयोग न करें: जब आपकी नस में होने वाले दर्द की डायग्नोसिस हो जाए तो आपको अपनी देखभाल करना शुरू कर देना चाहिए | आपको प्रभावित हिस्से से कोई काम नहीं लेना चाहिए | मांसपेशियों, जोड़ों और टेंडॉन्स के बार-बार उपयोग से नस में होने वाले दर्द की स्थिति और खराब हो जाएगी क्योंकि प्रभावित हिस्से लगातार सूजे रहते हैं और नस को दबाते रहते हैं | किसिस भी दबी हुई नस के दर्द में तुरंत थोडा आराम पाने का सबसे आसान तरीका यह है कि प्रभावित नस और उसके चारों और के हिस्सों को सूजन और दबाव पूरी तरह से शांत होने तक आराम दिया जाये |
नस में पीड़ा वाले स्थान को मोड़ना या हिलाना नहीं चाहिए अन्यथा नस में और अधिक दर्द हो सकता है | विशेष प्रकार की गतियों से आपके लक्षण तुरंत और अधिक ख़राब हो सकते हैं इसलिए यथासंभव प्रभावित स्थान को हिलाने या मोड़ने से बचना चाहिए |
अगर किसी विशेष गति या स्थिति के कारण लक्षण और दर्द और अधिक बढ़ जाए तो चोटिल स्थान को अलग रखें और उसे हिलाने से बचें |
    आयुर्वेद में स्लिप डिस्क और सियाटिका के रोगी को चिकित्सक वातशामक व दर्द निवारक औषधियां जैसे गुग्गुलु, निर्गुन्डी, शल्लकी, रासना, दशमूल, कुपीलू, पिप्पली, शुंठी, मरिच, मेथी, अश्वगंधा, त्रिफला आदि एकल अथवा विभिन्न औषधि योगों के रूप में देते हैं, जो कि गोली, कैप्सूल, पुडिया या काढ़े के रूप में हो सकती हैं. एलोपैथी दर्द निवारक दवाइयों की तुलना में आयुर्वेदिक औषधियों को लम्बे समय तक लेने पर भी किडनी और लीवर पर दुष्प्रभाव सामान्यतयः नहीं होते हैं. इसके अतिरिक्त मालिश के लिए विभिन्न औषधि सिद्ध दर्द निवारक तैल जैसे; प्रसारिणी तैल, पंचगुण तैल, महाविषगर्भ तैल, बला तैल आदि रोगी की स्थिति के अनुसार मसाज के लिए देते हैं.
एक आयुर्वेदीय प्रक्रिया जिसे कटि-वस्ति कहते हैं, इस रोग में अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुई है. इसमें आयुर्वेद चिकित्सक के निर्देशन में औषध-सिद्ध तैलों द्वारा कमर के निचले हिस्से की सिकाई की जाती है.
पंचकर्म प्रक्रियाओं में बस्ति चिकित्सा के परिणाम उत्तम हैं.
योगाभ्यास
कमर दर्द व सियाटिका में किसी कुशल योगाचार्य के निर्देशन में सावधानीपूर्वक भुजंगासन, मकरासन, मर्कटासन, धनुरासन आदि का अभ्यास करने से रीढ़ को लचीला बनाए रखने में मदद मिलती है और दर्द में भी सकारात्मक परिणाम मिलते हैं.


कमर दर्द से पीड़ित होने पर क्या करें व क्या ना करें?

· सही स्थिति में कुर्सी पर बैठें
· लम्बे समय तक एक ही स्थिति में ना बैठे, बीच बीच में टहलते रहे और पोजीशन बदलते रहें.
· हल्का सुपाच्य संतुलित भोजन करें.
· ऐसे आहार हो पचने में भारी होते हैं जैसे उड़द, छोले, राजमा, फ़ास्ट फ़ूड, मांसाहार आदि न लें.
· आगे की ओर ना झुकें
· अत्यधिक भारी वजन न उठायें.
· ऊँची एड़ी की चप्पल न पहने
· आराम करने के लिए तख़्त या सीधा बेड जिस पर हल्का गद्दा बिछा हो, प्रयोग करें
· चिकित्सक के निर्देशानुसार यदि आवश्यक हो तो लंबर बेल्ट का प्रयोग करें.
· व्यायाम या योगासन किसी कुशल व्यक्ति के निर्देशन में ही करें.कार्पल टनल (carpal tunnel) के केस में, जो कि एक आम चोट होती है जो नस के दबने के कारण होती है, सोते समय अपनी कलाई सीधी रखें और जोड़ों को मोड़ें नहीं, इससे हर प्रकार के संकुचन में बहुत आराम मिलेगा
पर्याप्त नींद लें: अपने शरीर के नुकसान की मरम्मत के लिए कुछ घंटे अतिरिक्त रूप से सोना एक प्राकृतिक तरीका है | अगर ज़रूरत हो तो दर्द के कम होने या बेहतर अनुभव होने तक हर रात कुछ अतिरिक्त घंटे सोयें | कुछ घंटे अतिरिक्त रूप से आराम करने से आपके शरीर और चोटिल हिस्से को लक्षणों को कम करने में मदद मिलेगी |
प्रभावित हिस्से का अत्यधिक उपयोग न करने से यह सीधा प्रभाव दिखाता है | अगर आप ज्यादा सोते हैं तो कम हिलते-डुलते हैं | इससे न सिर्फ आप प्रभावित हिस्से का उपयोग कम कर पाएंगे बल्कि सोने से आपके शरीर को खुद को ठीक करने के लिए अधिक समय भी मिल जाये
एक ब्रेस (brace) या स्पलिंट (splint) का उपयोग करें: कई बार आप चाह कर भी अपने काम, स्कूल या अन्य जिम्मेदारियों के कारण प्रभावित नस को पर्याप्त आराम नहीं दे पाते | अगर आपके साथ भी यही स्थिति हो तो आप प्रभावित हिस्से को स्थिर रखने के लिए ब्रेस या स्पलिंट पहन सकते हैं | इससे आप अपने बुनियादी कामों को आसानी से कर सकेंगे |
उदाहरण के लिए, अगर आपकी गर्दन की नस के पीड़ा हो तो एक नैक-ब्रेस (neck-brace) के उपयोग से पूरे दिन मांसपेशियों को स्थिर रखने में मदद मिलेगी |
    अगर आपकी नस में दर्द कार्पल टनल सिंड्रोम के कारण है तो कलाई या कोहनी के ब्रेस का उपयोग करें जिन्हें वोलर कार्पल स्पलिंट भी कहा जाता है जिससे आप अनावश्यक हिलने से बचते हैं |[६]
ब्रेसेस कई थोक दवाओं की दुकानों पर मिल जाते हैं | ब्रेस के साथ दिए गये निर्देशों का पालन करें | अगर आपको इस विषय में कोई शंका या सवाल हो तो सहयता के लिए डॉक्टर से सलाह
आइस और हीट का उपयोग करें: नस दबने से अक्सर सूजन आ जाती है और सूजन नस को और दबाती है | सूजन कम करने के लिए और प्रवाह को बढाने के लिए प्रभावित हिस्से पर आइस और हीट का उपयोग बारी-बारी से करें, इस विधि को हाइड्रोथेरेपी कहते हैं | दिन में 3-4 बार 15 मिनट के लिए आइस लगाने से सूजन को कम करने में मद मिलती है | इसके बाद, प्रभावित हिस्से पर सप्ताह में 4-5 रातों तक 1 घंटे हीट पैड लगाने पर लक्षणों में सुधार आता है |
     प्रभावित हिस्से पर या तो स्टोर से ख़रीदे हुए आइस पैक को रखें या घर पर बनाये आइस पैक का उपयोग हल्के दबाव के साथ करें | हल्का दबाव प्रभावित हिस्से को ठंडक देने में मदद करेगा | अपनी स्किन और आइस पैक के बीच एक नर्म कपडा रखें जिससे ठण्ड से स्किन को नुकसान नहीं पहुंचेगा | इसे 15 मिनट से ज्यादा देर उपयोग न करें अन्यथा रक्त प्रवाह धीमा हो जाता है जिससे दर्द देर से ठीक होता है |
आइस पैक के उपयोग के बाद रक्त प्रवाह को बढाने के लिए हॉट वाटर बोतल या एक हीट पैड का उपयोग करें जिससे नसों को जल्दी ठीक करने में मदद मिल सकती है | एक घंटे से अधिक हीट का उपयोग न करें अन्यथा सूजन और बढ़ सकती है |
     आप गर्म पानी से स्नान कर सकते हैं या फिर प्रभावित हिस्से को गर्म पानी में डुबाकर रख सकते हैं जिससे प्रभावित हिस्से की मांसपेशियों को आराम मिलता है और रक्त प्रवाह बढ़ जाता है
मालिश करें: नस के होने वाले दर्द पर दबाव डालने से तनाव को मुक्त करने और दर्द कम करने में मदद मिल सकती है | पूरे शरीर की मालिश कराने से सभी मांसपेशियों को शिथिलता को बढाने में और साथ ही प्रभावित हिस्से को आराम देने में मदद मिलती हैं | आप प्रभावित नस के नजदीकी हिस्से को टारगेट करके भी हल्की मालिश कर सकते हैं | इससे विशेषरूप से अधिक लाभ मिलेगा और नस को ठीक करने में भी मदद मिलेगी |
थोडा आराम पाने के लिए आप प्रभावित हिस्से की मालिश खुद भी कर सकते हैं | रक्त प्रवाह को बढाने और नस में दबाव या संकुचन उत्पन्न करने वाली मांसपेशियों को ढीला करने के लिए अपनी अँगुलियों से प्रभावित हिस्से को धीरे-धीरे दबाएँ |
तीव्र डीप-टिश्यू मसाज या अधिक दबाव डालने से बचें क्योंकि इससे अनावश्यक दबाव पड़ेगा और नसों का दर्द और बढ़ जायेगा
दवाएं लें: आमतौर पर पाई जाने वाली कई दर्द निवारक दवाएं नस के दबे होने से होने वाले दर्दको ठीक करने के लिए उपयुक्त होती हैं | सूजन और दर्द को कम करने के लिए नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) जैसे इबुप्रोफेन (ibuprofen) और एस्पिरिन (aspirin) लें |
अपनी दवा के साथ दिए गये निर्देशों का पालन करें और सभी चेतवानियाँ समझ लें | विशेषरूप से अगर आपको अन्य कोई मेडिकल प्रॉब्लम हो या आप अन्य दवाएं ले रहे हों और आपको डोज़ या साइड इफेक्ट्स के बारे में कोई शंका हो तो डॉक्टर से सलाह लें
कम प्रभाव डालने वाली एक्सरसाइज करें:
आप पानी दबी हुई नस को आराम दे सकते हैं और रक्त के प्रवाह को सुचारू बनाये रख सकते हैं | अच्छे रक्त और ऑक्सीजन के प्रवाह और मांसपेशियों के टोन होने से सच में दबी हुई नस से होने वाले दर्द को ठीक करने में मदद मिल सकती है | आपको दैनिक गतिविधियाँ सावधानीपूर्वक करना चाहिए और केवल तभी करना चाहिए जब ये गतिविधियाँ आपके लिए आरामदायक हों | तैरने या थोडा टहलने की कोशिश करें | इससे आपको मांसपेशियों को स्वाभाविक रूप से हिलाने में मदद मिलेगी जबकि प्रभावित नस के आस-पास के जोड़ों और टेंडन पर बहुत कम मात्रा में दबाव डाला जाता है |
असक्रियता, मांसपेशियों की शक्ति को कम कर देती है और प्रभावित नस के ठीक होने की प्रक्रिया के समय को और बढ़ा देती है |
एक्सरसाइज या आराम करते समय सही पोस्चर बनाये रखें | इससे प्रभावित नस की वास्तविक स्थिति पर तनाव को कम करने में मदद मिलेगी |
कैल्शियम अंतर्ग्रहण को बढायें: नस दबने से होने वाली परेशानी का एक मुख्य कारण कैल्शियम की कमी होता है | आपको कैल्शियम से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे दूध, पनीर, दही और हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, केल खाना शुरू कर देना चाहिए | इससे न सिर्फ आपकी नस के दर्द में लाभ मिलेगा बल्कि आपके सम्पूर्ण स्वास्थ्य में सुधार आएगा |
     आप कैल्शियम को सप्लीमेंट के रूप में भी ले सकते हैं | इन्हें आप की हेल्थ फ़ूड स्टोर्स, जनरल स्टोर्स या फार्मेसी से खरीद सकते हैं | अगर आपको कैल्शियम के डोज़ के बारे में शंका हो तो पैकेज पर लिखे निर्देशों का पालन करें या डॉक्टर से सलाह लें | सिफारिश किये गये डोज़ से अधिक मात्रा न लें |
पैकेज्ड फूड्स के लेवल चेक करें कि वे कैल्शियम फोर्टीफाइड हैं या नहीं | कई ब्रांड्स अपने सामान्य प्रोडक्ट्स के साथ ही कैल्शियम से भरपूर प्रोडक्ट्स भी प्रदान करते हैं |पोटैशियम से भरपूर खाद्य पदार्थ खाएं: पोटैशियम सेल मेटाबोलिज्म में प्रमुख भूमिका निभाते हैं | चूँकि इसकी कमी से नसों के बीच के बंधन कमज़ोर हो जाते हैं इसलिए कभी-कभी पोटैशियम की कमी नस दबने से होने वाले लक्षणों में योगदान दे सकती है | डाइट में पोटैशियम की मात्रा बढाने से नसों को सही संतुलन के साथ काम करने और लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकती है |
अखरोट, केला और नट्स पोटैशियम से भरपूर होते हैं | स्किम मिल्क और ऑरेंज जूस जैसे पेय पदार्थ पीने से पोटैशियम के अवशोषण को बढाने में मदद मिल सकती है |
एक स्वस्थ डाइट के साथ ही कैल्शियम के समान पोटैशियम सप्लीमेंट भी नियमित रूप से लिए जा सकते हैं | अगर आप कोई अन्य दवा लेते हों या आपको कोई मेडिकल प्रॉब्लम हो (विशेषरूप से किडनी से सम्बंधित) तो पोटैशियम सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लें | इन सप्लीमेंट को लेने की सिफारिश करने से पहले आपके डॉक्टर आपके रक्त में पोटैशियम के लेवल को चेक कर सकते हैं |
पोटैशियम की कमी डॉक्टर द्वारा डायग्नोज़ की जाती है | पोटैशियम की कमी को दूर करने के लिए डॉक्टर इसकी कमी के कारण का मूल्यांकन करके पोटैशियम बढाने वाली डाइट लेने की सिफारिश कर सकते हैं | अगर आपको इससे कोई परेशानी होने लगे तो डॉक्टर से सलाह लें
निरंतर आराम के लिए प्रयास करें: लक्षणों के शांत हो जाने के बाद भी सही एक्सरसाइज लगातार करते रहना, उचित शारीरिक गतिविधियाँ करते रहना और सही पोस्चर बनाये रखना और पहले के समान डिस्क की परेशानी को उत्पन्न करने वाले फैक्टर से बचकर रहना बहुत ज़रूरी होता है | नस की पीड़ा की रिकवरी नस में लगने वाली ठोकर या चोट के स्तर, उपचार नियमों के पालन और रोग को ठीक करने की प्रक्रिया पर निर्भर करती है |
आमतौर पर पीठ की दबी हुई नसों की पूरी रिकवरी हो जाती है | नस दबने के कारण होने वाला एक्यूट कमर दर्द आमतौर पर लगभग 6 सप्ताह की टार्गेटेड देखभाल से 90 प्रतिशत तक ठीक हो जाता है |


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3.8.18

मूर्छा (बेहोशी) के के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार -डॉ॰आलोक



  शरीर के किसी भी अंग में गड़बड़ी के कारण मूर्च्छा या बेहोशी आ सकती है। अर्थात इस बीमारी के होने के कई पहलू हो सकते है। वैसे दिमाग की चेतन अवस्था शून्य होने के कारण मूर्च्छा या बेहोशी आ सकती है। हालाँकि दिमागी चेतन शून्यता शरीर में होने वाली बहुत सारी दिक्कतों के वजह से होती है।
मानव शरीर का दिमाग एक ब्रम्हांड से कम नही होता है। इसमे न जाने कितनी सारी नशों का तार बिछा होता है। किसी मानसिक समस्या के चलते किसी भी एक नश में खून के बहाव के रुकने से मूर्च्छा या बेहोशी आ सकती है। तथा किसी नश के फटने के कारण ज्यादा खून बह जाने से भी बेहोशी आ जाती है।
मूर्च्छा या बेहोशी का कारण-
ज्यादा मानसिक तनाव के कारण।
असहनीय प्रबल दवाईयों के सेवन के कारण।
स्त्रियों के मासिक धर्म रुकने के कारण।
अत्यधिक नशा के सेवन के कारण।
ह्रदय कमजोरी के कारण।
शारीरिक कमज़ोरी के वज़ह से।
अकस्मात शोक के कारण।
अत्यधिक चिन्ता के कारण।
मूर्च्छा या बेहोशी के लक्षण-
चक्कर आना।

आँखों के सामने धुधुलापन महसूस होना। यानि दृष्टि विहीन होना।
ज्यादा बेचैनी महसूस होना।
काली मिर्च को बारीक पीसकर नाक में डालकर फूँक मारें। मूर्छा खत्म हो जाता है।
काली मिर्च, नमक, शहद और मैनसिल एक साथ मिलाकर बारीक पीसकर काजल की तरह आँखों में लगाने से बेहोशी दूर हो जाती है।

कपूर, चुना और नौसादर इन तीनों को बारीक़ पिसकर मूर्छित व्यक्ति को सुंघाने से बेहोशी ठीक हो जाती है।
अचानक ज्यादा थकावट लगना।
रामबाण घरेलु जड़ी-बूटी उपचार


नाक में लोबान  की धुँआ देने से मूर्च्छा ठीक हो जाता है।

आयुर्वेदिक चिकित्सा उपचार
” अश्वगंधारिष्ट ” रोजाना सुबह शाम खाना खाने के बाद 25-30 मिलीग्राम समान मात्रा में पानी के साथ लेने से, बार-बार आने वाली मूर्च्छा और बेहोशी से छूटकारा मिल जायेगा।
रोजाना ” मांस्यादि क्वाथ ” के सेवन से मूर्च्छा और बेहोशी में फायदा मिलता है।
शरीर के किसी भी अंग में गड़बड़ी के कारण मूर्च्छा या बेहोशी आ सकती है। अर्थात इस बीमारी के होने के कई पहलू हो सकते है। वैसे दिमाग की चेतन अवस्था शून्य होने के कारण मूर्च्छा या बेहोशी आ सकती है। हालाँकि दिमागी चेतन शून्यता शरीर में होने वाली बहुत सारी दिक्कतों के वजह से होती है।
मानव शरीर का दिमाग एक ब्रम्हांड से कम नही होता है। इसमे न जाने कितनी सारी नशों का तार बिछा होता है। किसी मानसिक समस्या के चलते किसी भी एक नश में खून के बहाव के रुकने से मूर्च्छा या बेहोशी आ सकती है। तथा किसी नश के फटने के कारण ज्यादा खून बह जाने से भी बेहोशी आ जाती है।
मूर्च्छा या बेहोशी का कारण
ज्यादा मानसिक तनाव के कारण।
असहनीय प्रबल दवाईयों के सेवन के कारण।
स्त्रियों के मासिक धर्म रुकने के कारण।
अत्यधिक नशा के सेवन के कारण।
ह्रदय कमजोरी के कारण।
शारीरिक कमज़ोरी के वज़ह से।
अकस्मात शोक के कारण।
अत्यधिक चिन्ता के कारण।
रामबाण घरेलु जड़ी-बूटी उपचार
नाक में लोबान (Frankincense) की धुँआ देने से मूर्च्छा ठीक हो जाता है।
काली मिर्च को बारीक पीसकर नाक में डालकर फूँक मारें। मूर्छा खत्म हो जाता है।
काली मिर्च, नमक, शहद और मैनसिल एक साथ मिलाकर बारीक पीसकर काजल की तरह आँखों में लगाने से बेहोशी दूर हो जाती है।
कपूर, चुना और नौसादर इन तीनों को बारीक़ पिसकर मूर्छित व्यक्ति को सुंघाने से बेहोशी ठीक हो जाती है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा उपचार
अश्वगंधारिष्ट ” रोजाना सुबह शाम खाना खाने के बाद 25-30 मिलीग्राम समान मात्रा में पानी के साथ लेने से, बार-बार आने वाली मूर्च्छा और
 और बेहोशी में फायदा मिलता है।बेहोशी से छूटकारा मिल जायेगा


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की अमृत औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार