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19.2.17

जामुन के औषधीय गुण , फायदे ,प्रयोग



    


   जामुन (वैज्ञानिक नाम : Syzygium cumini) एक सदाबहार वृक्ष है जिसके फल बैंगनी रंग के होते हैं (लगभग एक से दो सेमी. व्यास के) | यह वृक्ष भारत एवं दक्षिण एशिया के अन्य देशों एवं इण्डोनेशिया आदि में पाया जाता है।
   इसे विभिन्न घरेलू नामों जैसे जामुन, राजमन, काला जामुन, जमाली, ब्लैकबेरी आदि के नाम से जाना जाता है। प्रकृति में यह अम्लीय और कसैला होता है और स्वाद में मीठा होता है। अम्लीय प्रकृति के कारण सामान्यत: इसे नमक के साथ खाया जता है।
   जामुन का फल 70 प्रतिशत खाने योग्य होता है। इसमें ग्लूकोज और फ्रक्टोज दो मुख्य स्रोत होते हैं। फल में खनिजों की संख्या अधिक होती है। अन्य फलों की तुलना में यह कम कैलोरी प्रदान करता है। एक मध्यम आकार का जामुन 3-4 कैलोरी देता है। इस फल के बीज में काबरेहाइड्रेट, प्रोटीन और कैल्शियम की अधिकता होती है। यह लोह का बड़ा स्रोत है। प्रति 100 ग्राम में एक से दो मिग्रा आयरन होता है। इसमें विटामिन बी, कैरोटिन, मैग्नीशियम और फाइबर होते हैं।काले काले स्वादिष्ट और मीठे जामुन खाने का आनंद शायद सभी ने लिया है। इसका एक अलग हल्का तोरा स्वाद ( astringent flavour ) सभी को पसंद आता है। इसको खाने के बाद जीभ के रंग बैंगनी हो जाता है। जून के महीने में और बारिश का मौसम शुरू होने पर ये खूब मिलते है। जामुन पूरे भारत में बड़े चाव से खाया जाता है। और अब तो विदेशी भी इसके कायल हो गए है। जामुन के जूस का चलन विश्व भर में बढ़ता जा रहा है। ये लीवर के रोगों में बहुत फायदेमंद होता है। अपने स्वाद और औषधीय गुणों के कारण जामुन का एक अलग ही महत्त्व है।



दमा( श्वास रोग) के असरदार उपचार


*सेंधा नमक के साथ इसका सेवन भूख बढ़ाता है और पाचन क्रिया को तेज करता है बरसात के दिनों में हमारी पाचन संस्था कमजोर पड़ जाती है कारण हमारा मानना है कि बरसात यानि बस तली चीजें खाना कचौडी,पकोडे,समोसे इत्यादि जिसके कारण शूगर वालों का शूगर और बढ़ जाता है तथा पाचन क्रिया सुस्त हो जाती है।
* आयुर्वेद के अनुसार जामुन की गुठली का चूर्ण मधुमेह में हितकर माना गया है, एक बार में 200 ग्राम से अधिक मात्रा में इस फल का सेवन नहीं करना चाहिए। खाली पेट जामुन खाने से पेट में दर्द और गैस बनने की शिकायतें संभव हैं जामुन ही नहीं जामुन के पत्ते खाने से भी मधुमेह रोगियों को लाभ मिलता है। यहां तक की इसकी गुठली का चूर्ण बनाकर खाने से भी मधुमेह में लाभ होता है।

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

*यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत बनाता है। पाचन शक्ति मजबूत करता है। इसलिए अगर आप इस मौसम में मौसम की मार से बचना चाहते हैं तो रोज जामुन खाएं। जामुन के मौसम में जामुन अवश्य खायें कारण साल के बाकी के दिनों में आसानी से उपलब्ध नहीं होता,यदि होता भी है तो जो बात मौसमी फलों में होती है वह बेमौसम में नहीं होती सो जहां तक हो सके हर मौसम के फलों का लुत्फ(मज़ा)उसके मौसम में ही उठाएं तो ज्यादा अच्छा रहता है। 
*जामुन सामान्यतया अप्रैल से जुलाई माह तक सर्वत्र उपलब्ध रहते हैं। इसका न केवल फल, इसके वृक्ष की छाल, पत्ते और जामुन की गुठली अपने औषधीय गुणों के कारण विशेष महत्व रखते हैं। यह शीतल, एंटीबायोटिक, रुचिकर, पाचक, पित्त-कफ तथा रक्त विकारनाशक भी है। इसमें आयरन (लौह तत्व), विटामिन ए और सी प्रचुर मात्रा में होने से यह हृदय रोग, लीवर, अल्सर, मधुमेह,वीर्य दोष, खाँसी, कफ (दमा), रक्त विकार, वमन, पीलिया, कब्ज, उदररोग, पित्त, वायु विकार,अतिसार, दाँत और मसूढ़ों के रोगों में विशेष लाभकारी है। 
*जामुन खाने के तत्काल बाद दूध नहीं पीना चाहिए। पका जामुन खाने से पथरी रोग में आराम मिलता है। पेट भरकर नित्य जामुन खाये तो इससे यकृत के रोगों में लाभ होगा। मौसम जाने के बाद इसकी गुठली को सुखाकर पीसकर रखलें इसका पावडर इस्तेमाल करें वही फल वाला फायदा देगा. 

*प्रोस्टेट बढ़ने से मूत्र रुकावट की अचूक  औषधि*

*जामुन के औषधीय उपयोग
 पथरी जामुन का पका हुआ फल पथरी के रोगियों के लिए एक अच्छी रोग निवारक दवा है। यदि पथरी बन भी गई तो इसकी गुठली के चूर्ण का प्रयोग दही के साथ करने से लाभ मिलता है। यदि पथरी बन भी गई तो इसकी गुठली के चूर्ण का प्रयोग दही के साथ करने से लाभ मिलता है। 
लीवर 
जामुन का लगातार सेवन करने से यकृत (लीवर) की क्रिया में काफी सुधार होता कब्ज और उदर रोग में जामुन का सिरका उपयोग करें मुँह में छाले होने पर जामुन का रस लगाएँ वमन होने पर जामुन का रस सेवन करें भूख न लगती हो तो कुछ दिनों तक भूखे पेट जामुन का सेवन करें 
मुँहासे -
जामुन की गुठलियों को सुखाकर पीस लें। इस पावडर में थोड़ा-सा गाय का दूध मिलाकर मुँहासों पर रात को लगा लें, सुबह ठंडे पानी से मुँह धो लें। कुछ ही दिनों में मुँहासे मिट जाएँगे 

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

मधुमेह 
* मधुमेह के रोगियों के लिए भी जामुन अत्यधिक गुणकारी फल है मधुमेह के रोगियों को नित्य जामुन खाना चाहियें जामुन की गुठलियों को सुखाकर पीस लें। इस पावडर को फाँकने से मधुमेह में लाभ होता है 
दस्त लगने पर 
जामुन के रस में सेंधा नमक मिलाकर इसका शर्बत बना कर पीना चाहियें। इसमें दस्त बाँधने की विशेष शक्ति है खूनी दस्त बन्द हो जाते हैं।२० ग्राम जामुन की गुठली पानी में पीसकर आधा कप पानी में घोलकर सुबह-शाम दो बार पिलाने से खूनी दस्त बन्द हो जाते हैं
 मंदाग्नि(एसिडिटी) 
से बचने के लिए जामुन को काला नमक तथा भूने हुए जीरे के चूर्ण को लगाकर खाना चाहिए। जामुन के वृक्ष की छाल को घिसकर कम से कम दिन में तीन बार पानी के साथ मिलाकर पीने से अपच दूर हो जाता है जामुन के वृक्ष की छाल को घिसकर एवं पानी के साथ मिश्रित कर प्रतिदिन सेवन करने से रक्त साफ होताहै। जामुन के वृक्ष की छाल को पीसकर एवं बकरी के दूध के साथ मिलाकर देने से डायरिया(दस्त का भयंकर रूप) के रोगी को तुरंत आराम मिलता है। 

छोटे वक्ष को उन्नत और सूडोल बनाएँ

पेचिश में
जामुन की गुठली के चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में दिन में दो से तीन बार लेने से काफी लाभ होता है अच्छी आवाज बरकरार रखने के लिए जामुन की गुठली के काढ़े से कुल्ला करना चाहिए जामुन की गुठली का चूर्ण आधा-आधा चम्मच दो बार पानी के साथ लगातार कुछ दिनों तक देने से बच्चों द्वारा बिस्तर गीला करने की आदत छूट जाती है*अध्ययन दर्शाते हैं कि जामुन में एंटीकैंसर गुण होता है।
*कीमोथेरेपी और रेडिएशन में जामुन लाभकारी होता है।
*हृदय रोगों, डायबिटीज, उम्र बढ़ना और अर्थराइटिस में जामुन का उपयोग फायदेमंद होता है।
*जामुन का फल में खून को साफ करने वाले कई गुण होते हैं।

जामुन कब नहीं खाना चाहिए
* उल्टी होती हो या जी घबराता हो तो जामुन नहीं खाने चाहिए।
* शरीर में कहीं सूजन आई हुई है तो जामुन ना खाएँ।
* ऑपरेशन से पहले और बाद में कुछ समय जामुन नहीं खाने चाहिए।
* जामुन अधिक मात्रा में नहीं खाने चाहिए।
* जामुन में वातज गुण होते है अतः इसे खाली पेट नहीं खाना चाहिए।

रोग व क्‍लेश दूर करने के आसान मंत्र

* गर्भावस्था के दौरान जामुन ना खाये।
* व्रत के समय और उपवास के समय जामुन का उपयोग नहीं करना चाहिए।
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15.2.17

चम्पा के गुण,फायदे ,उपयोग




    चम्पा का वृक्ष दक्षिण- पूर्व एशिया (चीन, मलेशिया, सुमात्रा, जावा और भारत में प्राकृतिक रूप से) पाया जाता है। चम्पा का मूल उत्पत्ति स्थान भारत में पूर्वी हिमालय तथा अन्य पड़ोसी देशों में इंडोनोशिया को माना जाता है। चम्पा निकारगोवा और लाओस देशों का राष्ट्रीय फूल है। चम्पा के वृक्षों का उपयोग घर, पार्क, पार्किग स्थल और सजावटी पौधे के रूप में किया जाता है।
चम्पा (Plumeria) के गुण – यह कसैली, चरपरी, मधुर, शीतल तथा विष, क्रमी, बात, कफ, और पित्त नाशक होती है|
चम्पा की छाल और पत्तियों का उपयोग बुखार उतारने के लिए विशेषकर उन माताओं के जिनकी डिलेवरी अभी हुई है । फूलों का उपयोग कुष्ठ रोग में और पत्तियों का उपयोग पैर दर्द के लिए किया जाता है ।
चंपा का पेड़ औषधीय गुणों से भरपूर होता है। चंपा के पत्तों का ताजा रस 20 ग्राम पीने से पेट के नुकसानदायक कीड़े मर जाते हैं। चंपा के सूखे पत्तों को पीसकर कुष्ठ रोग के घावों में लगाने से कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है।
   चम्पा का वृक्ष मंदिर परिसर और आश्रम के वातावरण को शुद्ध करने के लिए लगाये जाते है । चम्पा के खूबसूरत, मन्द सुगंधित हल्के सफेद, पीले फूल पूजा में उपयोग किये जाते हैं । चम्पा का मूल उत्पत्ति स्थान भारत में पूर्वी हिमालय तथा तथा इंडोनेशिया है ।

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

चम्पा के फूल कड़वे , अग्निवर्धक और चर्म रोगों में लाभदायी होते हैं । हृदय और मस्तिष्क को शक्ति देते हैं । कुष्ठ, चोट, रक्त विकार आदि रोगों में इसका लेप लाभप्रद है 
चम्पा की कलियां पानी में पीसकर चेहरे पर लगाने से दाग-धब्बे, झाइयां दूर हो जाती हैं । सुजाक में भी चम्पा के फूल लाभदायक हैं ।
चम्पा का वृक्ष दक्षिण-पूर्व एशिया ,चीन, मलेशिया, सुमात्रा, जावा और भारत में पाया जाता है । भारतीय चम्पा के 5 प्रमुख प्रकार हैं 1. सोन चम्पा, 2. नाग चम्पा, 3. कनक चम्पा, 4. सुल्तान चम्पा, 5. कटहरी चम्पा ।
पत्ते लम्बे-लम्बे महुआ के पत्तों की भांति पीले रंग के तथा कोमल होते हैं। इसके फूल पीले 4-5 पंखुड़ियों सहित 5-7 केसरों से युक्त होते हैं। चम्पा फूल तीन रंगों में :- सफेद, लाल और पीले में पाया जाता है ।
पीले रंग की चम्पा को स्वर्ण चम्पा कहा जाता है और ये बहुत कम नजर आता है । चम्पा के वृ़क्ष पर 2 से 3 साल बाद फूल लगने शुरू हो जाते हैं ।
विभिन्न भाषाओं में नाम :-
हिन्दी-चंपा ,मराठी-सोनचम्पा, तमिल-चम्बुगम या चम्बुगा, मणिपुरी-लिहाओ, तेलगु-चम्पानजी, कन्नड-चम्पीजे, बगाली-चंपा, शिंगली -सपु, उड़िया-चोम्पो, इण्डोनेशियाई -कम्पक।

नई और पुरानी खांसी के रामबाण उपचार 

चम्पा को कामदेव के पाँच फूलों में गिना जाता है। देवी माँ ललिता अम्बिका के चरणों में भी चम्पा के फूल को अन्य फूलों जैसे- अशोक, पुन्नाग के साथ सजाया जाता है। पुन्नाग प्रजाति के फूल का सम्बन्ध भगवान विष्णु से माना जाता है। रविन्द्रनाथ टैगोर ने इसे अमर फूल कहा है। चम्पा का वृक्ष वास्तु की दृष्टि से सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। इसी कारण दक्षिणी एशिया के बौद्ध मंदिरों में ये बहुतायत से पाए जाते हैं
विदेशी संस्कृति में-
बांग्लादेश में इसके पुष्प को मृत्यु से जोड़ा जाता है। अनेक स्थानीय लोक-मान्यताओं में चम्पा का भूत-प्रेत और राक्षसों को आश्रय प्रदान करने वाला वृक्ष माना जाता है। इसकी सुगन्ध को मलय लोक कथाओं में एक पिशाच से सम्बन्धित माना गया है। फिलीपीन्स में, जहाँ इसे कालाचूची कहते हैं इसे मृत आत्माओं से संबंधित माना गया है, इसकी कुछ प्रजातियों को कब्रिस्तानों में लगाया जाता है। फीजी आदि द्वीप समूह के देशों में महिलाओं द्वारा इसके फूल को रिश्ते के संकेत के रूप में कानों में धारण किया जाता है। दाहिने कान में पहनने का मतलब रिश्ते की माँग और बाँये कान में पहनने का मतलब रिश्ता मिल गया है।

शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

औषधीय गुण :-
* दिल और दिमाग शक्ति शाली बनता है।( चम्पा के फूल सूंघने से ) ।
* जलन में आराम मिलता है। ( चम्पा फूलों को पीसकर शरीर में लेप करने से )।
*आमाशय का घाव एवं दर्द ठीक हो जाता है।( चम्पा के फूलों का काढ़ा पीने से )।
* गठिया के रोगी को चम्पा के फूलों के तेल से मालिश करने से लाभ मिलता है।
* शरीर की शक्ति को बढ़ाने के लिए। ( चम्पा के फूलों का चूर्ण , शहद मिलाकर खाने से )
* रुकी हुई माहवारी ।  चम्पा की जड़ का चूर्ण 600 मिलीग्राम से 1.80 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम देने से
*सांप के विष पर- बेल की छाल और इसकी की छाल को एक साथ पीस कर उसका रस पीना चाहिए इससे विष का असर खत्म हो जाता है.
*गैस पर- 
गैस की परेशानी में सफेद इसके के पत्तों को गरम करके सेकना चाहिए या इनका रस पीना चाहिए इससे गैस की परेशानी दूर हो जाती है.

छोटे वक्ष को उन्नत और सूडोल बनाएँ

खुजली में-
 इसके के दूध में नारियल या चन्दन का तेल और कपूर मिला कर लेप करने से खुजली दूर हो जाती है.



गांठें बिठाने के लिए- 
चम्पा का दूध लगाने से गाँठ आदि बैठ जाती है.
इसका रस इतना गरम होता है की शरीर पर लगने से छाले पड जाते हैं. इसके फूलों का शाक बनाया जाता है. चम्पा का वृक्ष कुष्ठ, खाज,शूल, कफ, वायु, और उदर का नाश करता है.

चम्पा का वृक्ष दक्षिण- पूर्व एशिया (चीन, मलेशिया, सुमात्रा, जावा और भारत में प्राकृतिक रूप से) पाया जाता है। चम्पा का मूल उत्पत्ति स्थान भारत में पूर्वी हिमालय तथा अन्य पड़ोसी देशों में इंडोनोशिया को माना जाता है। चम्पा निकारगोवा और लाओस देशों का राष्ट्रीय फूल है। चम्पा के वृक्षों का उपयोग घर, पार्क, पार्किग स्थल और सजावटी पौधे के रूप में किया जाता है।
भारतीय संस्कृति में-
चम्पा के खूबसूरत, मन्द, सुगन्धित हल्के सफेद, पीले फूल अक्सर पूजा में उपयोग किये जाते हैं। चम्पा का वृक्ष मन्दिर परिसर और आश्रम के वातावरण को शुद्ध करने के लिए लगाया जाता है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में एक कहावत है कि ’’चम्पा तुझमें तीन गुण-रंग रूप और वास, अवगुण तुझमें एक ही भँवर न आयें पास’’।
रूप तेज तो राधिके, अरु भँवर कृष्ण को दास, इस मर्यादा के लिये भँवर न आयें पास।।
चम्पा में पराग नहीं होता है। इसलिए इसके पुष्प पर मधुमक्खियाँ कभी भी नहीं बैठती हैं, लेकिन इसके बीज पक्षियों को बहुत आकर्षित करते हैं। कहा जाता है, कि चम्पा को राधिका और कृष्ण को भँवर और मधुमक्खियों को कृष्ण के दास-दासी के रूप में माना गया है। राधिका कृष्ण की सखी होने के कारण मधुमक्खियाँ चम्पा के वृक्ष पर कभी नहीं बैठती हैं। 

आँखों  का चश्मा  हटाने का अचूक  घरेलू उपाय

    चम्पा को कामदेव के पाँच फूलों में गिना जाता है। देवी माँ ललिता अम्बिका के चरणों में भी चम्पा के फूल को अन्य फूलों जैसे- अशोक, पुन्नाग के साथ सजाया जाता है। पुन्नाग प्रजाति के फूल का सम्बन्ध भगवान विष्णु से माना जाता है। रविन्द्रनाथ टैगोर ने इसे अमर फूल कहा है। चम्पा का वृक्ष वास्तु की दृष्टि से सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। इसी कारण दक्षिणी एशिया के बौद्ध मंदिरों में ये बहुतायत से पाए जाते हैं।

विदेशी संस्कृति में-
     बांग्लादेश में इसके पुष्प को मृत्यु से जोड़ा जाता है। अनेक स्थानीय लोक-मान्यताओं में चम्पा का भूत-प्रेत और राक्षसों को आश्रय प्रदान करने वाला वृक्ष माना जाता है। इसकी सुगन्ध को मलय लोक कथाओं में एक पिशाच से सम्बन्धित माना गया है। फिलीपीन्स में, जहाँ इसे कालाचूची कहते हैं इसे मृत आत्माओं से संबंधित माना गया है, इसकी कुछ प्रजातियों को कब्रिस्तानों में लगाया जाता है। फीजी आदि द्वीप समूह के देशों में महिलाओं द्वारा इसके फूल को रिश्ते के संकेत के रूप में कानों में धारण किया जाता है। दाहिने कान में पहनने का मतलब रिश्ते की माँग और बाँये कान में पहनने का मतलब रिश्ता मिल गया है।

गोमूत्र और हल्दी से केन्सर का इलाज

विभिन्न भाषाओं में चम्पा के नाम-
भारतीय भाषाओं में देखें तो चंपा को मराठी में सोनचम्पा, तमिल में चम्बुगम या चम्बुगा, मणिपुरी में लिहाओ, तेलगु में चम्पानजी, कन्नड चम्पीजे, बगाली में चंपा, शिंगली सपु, उड़िया में चोम्पो, इण्डोनेशियाई में कम्पक, कोंकणीं में पुड़चम्पो, असमिया में तितान्सोपा तथा संस्कृत चम्पकम् कहते हैं। विदेशी भाषाओं में अंग्रेजी में इसे प्लूमेरिया अल्बा या फ्रेंजीपानी, स्पैनिश में चम्पका, बर्मी में मवाक-सम-लग, चीनी में चाय-पा, थाई में चम्पा या खोओ तथा फ्रेंच इलांग- इंलग कहते हैं।



वानस्पतिक विवरण-

    चम्पा मैग्नोलिशिया परिवार का उष्ण-कटिबन्धीय झाड़ियों और छोटे पेड़, पौधे जगत में ९५ (अरब) वर्ष पहले अस्तित्व में आया। चम्पा की लगभग ४० प्रजातियाँ उष्ण-कटिबन्धीय और उपउष्ण-कटिबन्धीय क्षेत्रों में पायी जाती हैं। इसके सदाबहार वृक्ष सामान्यतः १८ से २१ मी. लम्बे होते हैं। इसकी खुशबू अत्यन्त मादक होती है। इसके पौधों को बोनसाई के रूप में बनाकर घर के भीतर के वातावरण को सुगन्धित किया जाता है। इसके वृक्ष अर्धपर्ण पाती छोटे से मध्यम आकार के होते है। पेड़ की छाल, सतह चिकनी, भूरे रंग की सफेद भीतरी छाल रेशेदार होती है। पत्तियाँ, सामान्य पूर्ण और गोले के आकार में व्यवस्थित होती हैं। पत्तियाँ डण्डलों से मुक्त होती हैं। पेड़ फूल और फल वर्ष भर देते है। फूलों का परागण कीटों (बीटल) द्वारा होता है। जो पराग (दलपुंज) से निकलता है। कीटों के लिए उपयुक्त आहार होता है।
वैज्ञानिक परिचयः-
वानस्पतिक जगत में मैग्नोलेशिया फूलों के वृक्षों का एक परिवार है। जिसमें २१० फूलों की प्रजातियों में चम्पा एक फूल है। मैग्नोलेशिया नाम फ्रेंच वानस्पतिक शास्त्री पियरे मैग्नोल’ के नाम पर रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार के फूल वाले वृक्ष मधुमक्खियों से पहले की उत्पत्ति के हैं, और इनमें परागण का कार्य भृंग कीटों द्वारा होता है। भृंग कीटों से फूलों को हानि होने से बचाने के लिए फूल बहुत मजबूत होते हैं। इस परिवार के पुष्पों में दल एवं दलपुंज में अन्तर नहीं होता। इस प्रकार के फूलों और चम्पा के वृक्ष को पहले चार्ल्स फ्लूमियर ने १७०३ में प्लूमिरेसि वानस्पतिक परिवार में वर्णित किया था। लेकिन बाद में फ्लूमेरेसि परिवार के सारे सदस्यों को मग्नोलेशिया परिवार में सम्मलित कर लिया गया है।

मोतियाबिंद के  घरेलू प्राकृतिक उपचार 

चंपा की प्रमुख प्रजातियाँ-
चंपा को पंखुरियों के आकार आधार पर दो प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है माइकेलिया जिसकी पंखुरियाँ लंबी और नुकीली होती हैं तथा प्लूमेरियि जिसकी पंखुरियाँ चौड़ी और गोल होती हैं। माइकेलिया प्रजाति की चंपा के पाँच प्रमुख प्रकार हैं।
माइकेलिया आइनिया जो गुलाबी रंग का होता है और इसका उत्पत्ति स्थान चीन और वियतनाम माना जाता है।
माइकेलिया अल्बा जो सफेद रंग का होता है, यह एशिया में सबसे अधिक पाया जाता है और सजावटी पौधे तथा महँगे इत्र के लिये प्रसिद्ध है।
माइकेलिया चम्पाका पीला, सफेद जिसका मूल स्थान दक्षिण एशिया है, इसे जोयट्री, के नाम से भी जाना जाता है।
माइकेलिया डीलटसोपा मीठा चम्पा मूल रूप से पूर्वी हिमालय का झाड़ीनुमा वृक्ष है, यह अधिकतम ३० मीटर ऊँचा होता है और इसमें बंसत में फूल निकलते हैं।
माइकोलिया किगो क्रीम, जिसके फूल हल्के बेंगनी होते हैं यह एक प्रकार की वन्य झाड़ी है जिसका दूसरा नाम पोर्टवाइन है।

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

प्लूमेरिया प्रजाति की चंपा के पाँच या छह प्रमुख प्रकार माने गए हैं, जिसमें से चार बहुतायत से मिलते हैं-
प्लूमेरिया अल्बा जो सफेद रंग का होता है और इसका भीतरी भाग हल्के और गहरे पीले रंग का होता है। यह प्रमुख रूप से एशियाई प्रजाति है तथा दक्षिण एशिया में बहुतायत से पाया जाता है। प्लूमेरिया ऑब्टूसा जो मूल रूप से अमेरिकी प्रजाति है लेकिन सुंदर और सुगंधित फूलों के कारण विश्व भर में उगाई जाती है। इसका फूल सफेद होता है लेकिन केन्द्र में हल्का पीला छोटा सा आकार देखा जा सकता है। इसकी पंखुरियाँ एक दूसरे से अलग और थोड़ी दूर दूर होती हैं।
प्लूमेरिया पुडिका पनामा, कोलम्बिया और वेनेजुएला का निवासी है। इसकी पंखुरिया नर्म और हल्की त्वचा वाली होती है। रंग सफेद और केन्द्र हल्का पीला होता है। इसकी एक विकसित प्रजाति थाईलैंड में पाई जाती है जिसका रंग गुलाबी होता है और रंग के आधार पर इसे पिंक पुडिका भी कहते हैं।
प्लूमेरिया रूब्रा लाल रंग का होता है। प्रमुख रूप से मेस्किको का निवासी यह पेड़ समशीतोष्ण या उष्ण जलवायु में सभी जगह बहुतायत से पाया जाता है। यह सात से आठ मीटर तक ऊँचा होता है और इसमें वसंत तथा गर्मियों के मौसम में सफेद से लाल तकर अनेक छवियों के सुगंधित फूल खिलते हैं।

हाथ पैर और शरीर का कांपना कारण और उपचार

भारतीय चम्पा के चार प्रमुख प्रकार हैं-



१. सोन चम्पाः-

सोन चम्पा एक लम्बा सदाबहार वृक्ष है। इसकी मूल उत्पत्ति स्थान भारतीय हिमालय या दक्षिण पूर्व एशिया एवं चीन है। इसके फूल पीले या सफेद रंग के अत्यन्त खुशबू वाले होते है। इसका अधिकतम रूप से उपयोग लकड़ी या सजावटी पौधे के रूप में किया है। इसकी प्रजातियाँ पीले से नारंगी रगों में पायी जाती है। इसके अन्य नाम देव चम्पा, गोल्डन चम्पा, ईश्वर चम्पा, आदि है। इस फूल को महिलाओं और लड़कियों द्वारा अपने बालों में सौन्दर्भ आभूषण एवं प्राकृतिक इत्र के लिए प्रयोग किया जाता है। कमरे को सुगन्धित करने के लिए इसके फूल को पानी से भरे पात्र में डालकर रखा जाता है। नयी दुल्हन के माला और विस्तर को सजाने के लिए इसके फूलों का प्रयोग किया जाता है। इस पौधो को ’जोय’ इत्र वृक्ष’’ के नाम से जाना जाता है।
इसका तेल चन्दन के तेल की तुलना में एक अलग तरह से बनाया जाता है। इसे एक शान्त और अँधेरे कमरे में चमड़े की बोतल में संग्रहीत किया जाता है। इसका तेल शरीर की गर्मी को दूर कर देता है। यह चन्दन के तेल की तुलना में ज्यादा असरदार और ठण्डा होता है। सोन चम्पा के फूलों का औषधीय और कास्मेटिक दोनों रूपों में उपयोग किया जाता है। वस्त्रों को रँगने में पीले फूलों का उपयोग होता है। अपच और ज्वार में फूलों का अर्क लेते हैं। सिर,आँख,नाक, कान की बीमारी, सुजाक गुर्दे की बीमारी गढ़िया, चक्कर आना सिरदर्द, में तेल बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है गुलदस्ता सजाने में इसकी पत्तियों का प्रयोग किया जाता है। ताजा नरम पत्तियों को पानी में कुचल कर ऐन्टीसेप्टिक लोशन बनाया जाता है। पत्तियों का रस भी पेट दर्द में प्रयोग होता है।

मोतियाबिंद  और कमजोर नजर के आयुर्वेदिक उपचार

फूल और पत्ती के अलावा इसकी छाल भी उपयोगी है। इसे उत्तेजक और ज्वर हटाने वाली औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। आन्तरिक ज्वार को दूर करने के लिए इसके छाल को काढ़े के रूप में प्रयोग करते हैं। छाल को दालचीनी के साथ प्रयोग करके मिलावट के रूप में प्रयोग किया जाता है। पैरों की दरारों में बीज और फल का प्रयोग होता है। पेट फूलना और पेट के कीड़ों में चम्पा के फूल उपयोगी हैं।
२. नाग चम्पा:-
नाग चम्पा के फूल पीले या गुलाबी रंग के होते हैं। नाग चम्पा का एक परंपरागत इतिहास है। भारत और नेपाल के हिन्दू और बौद्ध मठों में नाग चम्पा की खुशबू को बनाने की विधि को गुप्त रखा जाता था। तथा प्रत्येक मठ की एक अलग अपनी सुगन्ध बनाई जाती थी। अध्यात्मिक ज्ञान में पश्चिमी देशों की रुचि बढ़ने से नाग चम्पा के पुष्प के बारे में रुचि अन्य देशों में फैलने लगी। जिससे सुगंध के कारण चम्पा वर्षों बाद भी दूसरे देशों में भी सबसे लोकप्रिय जाना जाता है। अध्यात्मिक ध्यान प्रयोजनों में नाग चम्पा की खुशबू ध्यान की गहराई को और बढ़ा देती है।

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

नाग चम्पा भारत में सदाबहार पवित्र वृक्ष के रूप में मन्दिरों और आश्रमों में लगाया जाता है। यह हिन्दू देवता विष्णु का प्रतीक माना जाता है। यह फूल अति सुन्दर मादक खुशबू से भरे होते हैं। फूल की पखुड़ियाँ सॉप के फन के सामान होती हैं इसलिए इसे नाग चम्पा कहते हैं। नाग चम्पा की धूप संगीत प्रेमियों के संगीत का हिस्सा है। इसमें रासायनिक रूप से बेन्जीन, एसीटेट, लैक्टोन, लोवान,बेन्जीऐट मिथाइल आदि तत्व मौजूद होते हैं। नाग चम्पा के विभिन्न धूप ब्राण्ड भी हैं। जैसे- धूनी नाग चम्पा, गोलोक नाग चम्पा, सत्यसाईं बाबा नाग चम्पा, शान्ति नाग चम्पा, तुलसी नाग चम्पा, हेम चम्पा आदि।
३. कनक चम्पाः-
कनक चम्पा के वृक्ष को खुशबू के साथ-साथ खाने की थाली के पेड़ के रूप में जाना जाता है। इसके पत्ते ४० से.मी. तक लम्बे होते हैं। तथा दुगनी चौड़ाई के होते हैं। यह वृक्ष ५० से ७० फिट की ऊँचाई तक बढ़ सकता है। भारत के कुछ भागों में इसके पत्ती का प्रयोग बर्तन की जगह किया जाता है। फूल कलियों के अन्दर बन्द होते हैं। कलियाँ पाँच खण्डों में बटी होती हैं। छिले केले की तरह दिखाई देती हैं।

बिदारीकन्द के औषधीय उपयोग 

प्रत्येक फूल केवल एक रात तक रहता है। मधुर और सुगन्धित होने के कारण चमगादड़ इन फूलों की तरफ आकर्षित होते हैं। पत्ते, छाल चेचक और खुजली की दवा बनाने में इस्तेमाल होते हैं। इसके वृक्ष की लकड़ी से तख्त बनाये जाते हैं। यह वृक्ष पश्चिमी घाट और भारत के पर्णपाती जगलों में पाया जाता है। समुद्री खारा पानी इसके लिए अत्यन्त उपयुक्त होता है।



४. सुल्तान चम्पाः-

सुल्तान चम्पा दक्षिणी भारत, पूर्वी अफ्रीका,मलेशिया और आस्टेªलिया में समुद्र तटीय क्षेत्रों में सालों साल से पाये जाते हैं। इनकी ऊँचाई ८ से २० मी. तक होती है। यह वृक्ष घना और चमकदार अण्डाकार पत्रों से युक्त होता है। इसके सफेद सुगन्धित पुष्प धीमी गति से बढ़ते हैं जो मई से जून तक आते हैं। इसके केन्द्र में पीले पुंकेसर की मोटी पर्त होती है। यह वृक्ष तराई जंगलों में अच्छी तरह बढ़ता है। इसकी अन्दरूनी क्षेत्रों में मध्यम ऊँचाई पर खेती की जाती है।
इसको अलेकजेन्द्रिया लारेल वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है। पेड़ चक्रवात के लिए प्रतिरोधी होते हैं। इसके फल हल्के हरे रंग के गेंदे के आकार के होते हैं। इस वृक्ष को लोक कथाओं में भगवान शिव से सम्बन्ध माना जाता है। यह शिव के पसन्द आठ फूलों में से एक है। जिसे पूजा में शिव को अर्जित किया जाता है।
इस वृक्ष के चारों ओर महिलायें नृत्य करते हुये इसे पैर से ठोकर मारें तो यह खिल जाता है। एक कहावत है कि, इस तरह के वृक्ष में दिव्य आत्मायें रहती हैं। इसके वृक्ष का उपयोग तेल, साबुन,जहाज और नाव,रेल्वे स्लीपर, प्लाई जंगले अलमारियाँ, सजावटी समान आदि बनाया जाता है। यह एक अच्छा छायादार वृक्ष होता है। जो वनीकरण में प्रयोग होता है। इसको वात, पित, डायरिया, मूत्र रोगों आदि में प्रयोग किया जाता है।

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५ कटहरी चंपा
'कटहरी चम्पा को हरी चंपा भी कहते हैं। इसका पौधा चंपा की अन्य जातियों से भिन्न होता है लेकिन इसका फूल चंपा की कुछ प्रजातियों से मिलता जुलता है।
इसका पेड़ झाड़ी जैसा, तीन से लेकर पाँच मीटर तक ऊँचा होता है। पत्तियाँ सरल तथा चमकीली हरी होती हैं।
फूल अर्धवृत्ताकार डंठल पर लगते हैं। ये डंठल अन्य वृक्षों की डालियों के ऊपर चढ़ने में उपयोगी होते हैं। शुरू में फूल हरे होते हैं, परंतु बाद में इनका रंग हलका पीला हो जाता है। इन फूलों से पर्याप्त सुगंध निकलती है, जो पके कटहल के गंध जैसी होती है। इससे इनका पता पेड़ पर आसानी से लग जाता है।
उपयोगिता-
१. कृषि में उपयोगः-
चम्पा के वृक्ष को पुनः- जंगल को हरा भरा करने के लिये लगाया जाता है। वृक्ष में भूमि में नत्रजन इक्ट्ठा करने की क्षमता होती है। वृक्ष की जड़ों में कृषि के लिये उपयोगी फफूँद पाई जाती है। वृक्ष मृदा सुधार के लिऐ उपयोगी है। वृक्ष के आस-पास के पी.एच. मान में बढोत्तरी, मृदा कार्बन तथा उपलब्ध फास्फोरस बढ़ाने में सहायक होता है। पत्तियों को रेशम के कीटों के भोजन के लिये उपयोग किया जाता है। पत्तियों का रस धान में रोग पैदा करने वाली फफूँद (पाईरिकोलेरिया ओराइजी) केयों का उपयोग पैर दर्द के लिये किया जाता है। पुरूषों की ताकत और ऊर्जा के लिए इसके फूलों से औषधि बनाई जाती है। पीले चम्पा के फूल कुष्ठ रोग में उपयोग होते हैं। इसकी बूदें रक्त में मौजूद कीटाणुओं को नष्ट कर देती हैं।
प्रति विषाक्त तथा अन्य जीवाणुओं के प्रति -जैविक होता है।

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२. औषधि में उपयोगः-
छाल और पत्तियों का उपयोग बच्चा पैदा होने के बाद होने वाले ज्वर को दूर करने वाली औषधि के रूप में किया जाता है।
* चेहरा दाग धब्बे रहित और चमकदार हो जाता है। चम्पा फूलों को पीसकर पानी या निम्बू के रस के साथ लगाने से ।
* दूषित रक्त (खून की खराबी) साफ हो जाता है। 3 ग्राम चम्पा की छाल के चूर्ण को दिन में 2 बार पानी के साथ खाने से ।

सावधानियां
* चम्पा के फूल कड़वे और ठण्डी प्रकृति की होती है।
* चिकित्‍सा के लिए उपयोग करने से पहले अपने चिकित्‍सक से परामर्श अवश्‍य ले लें।
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8.2.17

चमेली के गुण,फायदे,उपयोग //Benefits of Jasmine





   चमेली का फूल काफी सुंदर और सफेद रंग का होता है। इसकी सुगंध काफी अच्छी होती है। अपनी महक से यह पूरे माहौल को सुगंधित कर देता है। इसी वजह से इसका उपयोग विभिन्न तरह के परफ्यूम बनाने में भी होता है। वैसे तो यह फूल अपनी मनमोहक सुगंध के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके सौंदर्य से संबंधित भी कई लाभ हैं। शरीर की सुंदरता को बढ़ाने के लिए इस फूल का उपयोग कई तरह से किया जा सकता है। चमेली की खुशबू मन को जितनी आकर्षित करती है उससे कहीं ज्‍यादा स्‍वास्‍थ्‍य के लिए फायदेमंद भी है। चमेली के फूल सफेद और पीले रंग के होते हैं। इसका स्‍वाद तीखा और प्रकृति ठंडी होती है।
   चमेली के फूल के अलावा इसकी पत्तियों में भी कई प्रकार के औषधीय गुण विद्यमान हैं। यह दांत, मुख, त्‍वचा और आंख के रोगों में फायदा करती है। आइए जानें चमेली हमारे लिए कितनी फायदेमंद है।
पैरों में बिवाई होने पर चमेली के पत्‍तों का रस फटी एडि़यों में लगाने से बिवाई ठीक हो जाती है।
पेट में अगर कीड़े हों तो चमेली के पत्‍तों को पीसकर पीने से कीड़े निकल जाते हैं। 


पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

   
माहवारी की समस्‍या के लिए-
चमेली के 10 ग्राम पत्‍तों को पीसकर पीने से समस्‍या दूर होती है।
भगंदर होने पर-
 चमेली के पत्‍ते, बरगद के पत्‍ते, गिलोय, सोंठ और सेंधानमक को मिलाकर छाछ के साथ पीजिए। 
   उल्‍टी होने पर -
10 ग्राम सफेद चमेली के पत्‍तों के रस को 2 ग्राम कालीमिर्च के चूर्ण में मिलाकर चाटने से उल्‍टी आना बंद हो जाता है। 
*इसके अलावा चमेली चेहरे के दाग, हांथी-पांव, ट्यूमर, पक्षाघात, मूत्ररोग आदि में फायदेमंद है। इन नुस्‍खों को आजमाने से पहले किसी चिकित्‍सक से सलाह अवश्‍य लीजिए।

सोरायसिस(छाल रोग) के आयुर्वेदिक उपचार 

*मसूड़ों में दर्द होने पर चमेली के पत्‍तों का काढ़ा बनाकर गरारा करने से दर्द समाप्‍त हो जाता है।

*आंखों में दर्द होने पर आंखों को बंद करके चमेली के फूलों का लेप लगाने से दर्द समाप्‍त होता है।
*नियमित रूप से चमेली के फूलों को चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ जाती है।
*मुंह में छाले होने पर इसकी पत्तियां धीरे-धीरे चबाइए, इससे छाले समाप्‍त हो जाएंगे।
*चर्म रोग होने पर चमेली के पत्‍तों का तेल लगाने से फायदा होता है।
*सिर दर्द होने पर चमेली के फूलों का लेप सिर पर लगाने से सिरदर्द समाप्‍त हो जाता है।
*इसके अलावा चमेली चेहरे के दाग, हांथी-पांव, ट्यूमर, पक्षाघात, मूत्ररोग आदि में फायदेमंद है।
शरीर को रिलैक्‍स करने में सहायक-
चमेली के फूल से मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को रिलैक्स रखने में काफी मदद मिलती है, जिसके कारण दिमाग को आराम महसूस होता है। नारियल के तेल में चमेली का तेल मिलाकर अगर शरीर की मालिश की जाए तो इससे बॉडी को काफी रिलैक्स मिलता है। अरोमाथेरेपी में इस तरीके का इस्तेमाल कई स्पा करते हैं।

वात रोग (जोड़ों का दर्द ,कमर दर्द,गठिया,सूजन,लकवा) को दूर करने के उपाय* 

स्किन को टाइट करता है-
चमेली में ऐसे गुण होते हैं जो स्किन को पूरे दिन-भर मॉइस्चराइ-ज रखने में सहायता करते हैं। लेकिन चमेली के फूल को सीधे ही स्किन पर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसकी बजाय चमेली के अर्क से बने लोशन या फिर क्रीम का उपयोग करना चाहिए।
बेहतरीन स्प्रे
यदि आपके शरीर से बहुत दुर्गंध आती है, तो लोग आपसे दूर भागते है| शरीर की दुर्गन्ध भगाने के लिए चमेली के फूल आपकी मदद कर सकते है| आप घर पर भी जैस्मिन स्‍प्रे बना सकते हैं। इसे बनाना बहुत ही आसान है| इसे बनाने के लिए सबसे पहले एक स्‍प्रे बोतल लेकर उसमें पानी डालें। फिर इस पानी में चमेली के तेल का एक चम्म्च डाले| अब बोतल को अच्‍छे से हिला लें ताकि मिश्रण मिल जाये। और इन आसान स्टेप्स में ही आपका स्प्रे इस्तेमाल करने के लिए तैयार है|
इसके अलावा चमेली चेहरे के दाग, हांथी-पांव, ट्यूमर, पक्षाघात, मूत्ररोग आदि में फायदेमंद है।

 स्वप्न दोष के  अचूक उपचार

स्‍कैल्‍प को स्वस्थ रखने में मददगार है-
चमेली के फूल में कई एंटीसेप्टिक और एंटीमाइक्रोबियल गुण पाए जाते हैं। इस वजह से अगर चमेली का तेल स्कैल्प पर लगाया जाए तो से यह सर की त्वचा के संक्रमण को दूर करता है। नारियल तेल में, चमेली के तेल की कुछ बूंदे मिलाकर स्कैल्प की धीरे-धीरे मसाज करें। कुछ घंटों तक तेल को बालों में ऐसे ही लगा रहने दें उसके बाद बालों को अच्छे से वॉश कर लें। अच्छे नतीजों के लिए हफ्ते में एक बार ऐसा जरूर करें, कम से कम 1 या 2 महीनों तक ।
शरीर को रिलैक्‍स करने में सहायक-
चमेली के फूल से मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को रिलैक्स रखने में काफी मदद मिलती है, जिसके कारण दिमाग को आराम महसूस होता है। नारियल के तेल में चमेली का तेल मिलाकर अगर शरीर की मालिश की जाए तो इससे बॉडी को काफी रिलैक्स मिलता है। अरोमाथेरेपी में इस तरीके का इस्तेमाल कई स्पा करते हैं।
    चमेली के फूल का इस्‍तेमाल बालों की कंडीशनिंग के लिए भी होता है। हो सकता है आपको यह जानकर आश्‍चर्य हो रहा हो, लेकिन यह बिल्कुल सच है। चमेली के फूलों से बालें की कंडीशनिंग करने के लिए चमेली के कुछ फूल लें और उन्हें कुछ घंटों तक गर्म पानी में भिगों कर रख दें। अगर आपके घुंघराले बाल हैं तो इस पानी में चमेली के तेल की कुछ बूंदे भी मिला लें। अब पानी को कमरे के तापमान पर ठंडा होने दें। अब इस पानी से अपने बाल धोएं। इसके बाद नॉर्मल पानी से बाल वॉश कर लें।

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