29.7.17

मिर्गी के दौरे की आयुर्वेदिक और घरेलु चिकत्सा /Ayurvedic and Home Remedies for Epilepsy


   मिर्गी के दौरे पड़ने के कई कारण हो सकते है जैसे जेनेटिक, सिर में चोट लगना, इन्फेक्शन, ब्रेन ट्यूमर, किसी भी बात का सदमा लग जाना, मानसिक तनाव आदि। अगर पुरे विश्व की बात करे तो इसके मरीजों की संख्या करोडो में है| लेकिन आजकल इसका इलाज संभव है। मिर्गी एक नाडीमंडल संबंधित रोग है जिसमें मस्तिष्क की विद्युतीय प्रक्रिया में व्यवधान पडने से शरीर के अंगों में आक्षेप आने लगते हैं। दौरा पडने के दौरान ज्यादातर रोगी बेहोंश हो जाते हैं और आंखों की पुतलियां उलट जाती हैं। रोगी चेतना विहीन हो जाता है और शरीर के अंगों में झटके आने शुरू हो जाते हैं। ये बीमारी मस्तिष्क के विकार के कारण होती है। यानि मिर्गी का दौरा पड़ने पर शरीर अकड़ जाता है जिसको अंग्रेजी में सीज़र डिसॉर्डर ( seizure disorder) भी कहते हैं।मुंह में झाग आना मिर्गी का प्रमुख लक्षण है।
   मिर्गी दो प्रकार की होती है। पहली तो आंशिक मिर्गी जो दिमाग के एक भाग को प्रभावित करती है। और दूसरी व्यापक मिर्गी, जो मस्तिक्ष के दोनों भागो को प्रभावित करती है। यदि किसी की बेहोशी दो-तीन मिनट से ज्यादा है, तो यह जानलेवा भी हो सकती है। उसे तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए । कुछ लोग मिर्गी आने पर रोगी को जूता, प्याज आदि सुंघाते हैं, इसका मिर्गी के इलाज से कोई संबंध नहीं है।
   

यदि किसी बच्चे को मिर्गी  की शिकायत है, तो कोई मानसिक कमी भी इसका कारण हो सकती है। आमतौर पर
मिर्गी  आने पर रोगी बेहोश हो जाता है। यह बेहोशी चंद सेकेंड, मिनट या घंटों तक हो सकती है। दौरा समाप्त होते ही मरीज सामान्य हो जाता है। वैसे तो इस बीमारी का पता 3000 साल पहले लग चुका था लेकिन इस बीमारी को लेकर लोगों के मन में जो गलत धारणाएं हैं उसके कारण इसका सही तरह से इलाज की बात करने की बात लोग सोचते बहुत कम हैं। ग्रामीण इलाकों में लोग इस बीमारी को भूत-प्रेत का साया समझते हैं और उसका सही तरह से इलाज करवाने के जगह पर झाड़-फूंक करवाने ले जाते हैं। यहां कि तक लोग मिर्गी के मरीज़ को पागल ही समझ लेते हैं। जिन महिलाओं को मिर्गी का रोग होता है उनकी शादी होनी मुश्किल होती है क्योंकि लोग मानते हैं कि मिर्गी के मरीज़ को बच्चा नहीं हो सकता है या बच्चे भी माँ के कारण इस बीमारी का शिकार हो जाते हैं। मिर्गी का मरीज़ पागल नहीं होता है वह आम लोगों के तरह ही होता है। उसकी शारीरिक प्रक्रिया भी सामान्य होती है। मिर्गी का मरीज़ शादी करने के योग्य होता/होती है और वे बच्चे को जन्म देने की भी पूर्ण क्षमता रखते हैं सिर्फ उनको डॉक्टर के तत्वाधान में रहना पड़ता है।
आज हम आपको इस बीमारी से बचने के लिए सही प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली बता रहे है| इन घरेलु उपचार से रोग की गंभीरता में राहत पायी जा सकती है|

 मिर्गी के लक्षण-

वैसे तो मिर्गी का दौरा पड़ने पर बहुत तरह के शारीरिक लक्षण नजर आते हैं।मिर्गी का दौरा पड़ने पर मरीज़ के अलग-अलग लक्षण हो सकते हैं। लेकिन कुछ आम लक्षण मिर्गी के दौरा पड़ने पर नजर आते हैं, वे हैं-
चक्कर खाकर जमीन पर गिर जाना।
शरीर में अचानक कमजोरी आजाना।
चिड़चिड़ाहट महसूस होना|
आँखे ऊपर हो जाना और चेहरे का नीला पड़ जाना।
अचानक हाथ, पैर और चेहरे के मांसपेशियों में खिंचाव उत्पन्न होने लगता है।
सर और आंख की पुतलियों में लगातार मूवमेंट होने लगता है।
मरीज़ या तो पूर्ण रूप से बेहोश हो जाता है या आंशिक रूप से मुर्छित होता है।
पेट में गड़बड़ी।
जीभ काटने और असंयम की प्रवृत्ति।
मिर्गी के दौरे के बाद मरीज़ उलझन में होता है, नींद से बोझिल और थका हुआ महसूस करता है।

मिर्गी के मुख्य कारण-

मस्तिष्क का काम न्यूरॉन्स के सही तरह से सिग्नल देने पर निर्भर करता है। लेकिन जब इस काम में बाधा उत्पन्न होने लगता है तब मस्तिष्क के काम में प्रॉबल्म आना शुरू हो जाता है। इसके कारण मिर्गी के मरीज़ को जब दौरा पड़ता है तब उसका शरीर अकड़ जाता है, बेहोश हो जाते हैं, कुछ वक्त के लिए शरीर के विशेष अंग निष्क्रिय हो जाता है आदि। वैसे तो इसके रोग के होने के सही कारण के बारे में बताना कुछ मुश्किल है। कुछ कारणों के मस्तिष्क पर पड़ सकता है असर, जैसे-
तम्बाकू, शराब या अन्य नशीली चीजों का सेवन करने पर|
बिजली का झटका लगना या ज़रूरत से ज़्यादा तनाव।
ब्रेन ट्यूम, ब्रेन स्ट्रोक या जेनेटिक कंडिशन
जन्म के समय मस्तिष्क में पूर्ण रूप से ऑक्सिजन का आवागमन न होने पर|
नींद पूरी न होना और शारीरिक क्षमता से अधिक मानसिक व शारीरिक काम करना।
जन्म के समय मस्तिष्क में पूर्ण रूप से ऑक्सिजन का आवागमन न होने पर।
दिमागी बुखार (meningitis) और इन्सेफेलाइटिस (encephalitis) के इंफेक्शन से मस्तिष्क पर पड़ता है प्रभाव।
कार्बन मोनोऑक्साइड के विषाक्तता के कारण भी मिर्गी का रोग होता है।
ड्रग एडिक्शन और एन्टीडिप्रेसेन्ट के ज्यादा इस्तेमाल होने पर भी मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ सकता है।
न्यूरोलॉजिकल डिज़ीज जैसे अल्जाइमर रोग।

मिर्गी से बचने के घरेलु उपचार-


*पेठा मिर्गी की सर्वश्रेष्ठ घरेलू चिकित्सा में से एक है। इसमें पाये जाने वाले पौषक तत्वों से मस्तिष्क के नाडी-रसायन संतुलित हो जाते हैं जिससे मिर्गी रोग की गंभीरता में गिरावट आ जाती है। पेठे की सब्जी बनाई जाती है लेकिन इसका जूस नियमित पीने से ज्यादा लाभ मिलता है। स्वाद सुधारने के लिये रस में शकर और मुलहटी का पावडर भी मिलाया जा सकता है।
*शहतूत का रस लाभदायक होता है।
*तनाव से दूर रहे और संतुलित आहार ले।
*जितना हो सके उतना आराम करे|
*व्यायाम करने से भी मिर्गी में फायदा पहुँचता है।
*पानी में गीली मिटटी मिलाकर पुरे शरीर पे लेप की तरह लगाने से भी रोगी स्वस्थ अनुभव करता है।
स्वाद सुधारने के लिये रस में शकर और मुलहटी का पावडर भी मिलाया जा सकता है।
*पीसी हुई राई का चूर्ण रोगी को दौरा पड़ते वक्त सुंघा दें इससे रोगी की बेहोशी दूर हो जायगी।
*अंगूर का रस मिर्गी रोगी के लिये अत्यंत उपादेय उपचार माना गया है। आधा किलो अंगूर का रस निकालकर *प्रात:काल खाली पेट लेना चाहिये। यह उपचार करीब ६ माह करने से आश्चर्यकारी सुखद परिणाम मिलते हैं।
एप्सम साल्ट (मेग्नेशियम सल्फ़ेट) मिश्रित पानी से मिर्गी रोगी स्नान करे। इस उपाय से दौरों में कमी आ जाती है और दौरे भी ज्यादा भयंकर किस्म के नहीं आते है।
*सेब का जूस भी मिर्गी के रोगी को लाभ पहुंचता है।
*मिर्गी के रोगियों के लिए शहतूत का रस लाभदायक होता है।
*अंगूर का रस मिर्गी के रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है।
*डॉक्टर्स द्वारा दी गई दवा का सही तरीके से सेवन करना प्रभावी मिर्गी का इलाज  है।
*नियमित रूप से चैक-अप करवाते रहें।
*मिर्गी के मरीज को उसके अनुसार पर्याप्त नींद लेने दे।
गाय के दूध से बनाया हुआ मक्खन मिर्गी में फ़ायदा पहुंचाने वाला उपाय है।
*रोजाना तुलसी के 20 पत्ते चबाकर खाने से मिर्गी जल्द ही ठीक हो जाती है।
-*मिर्गी के रोगी को ज्यादा फैट वाला और कम कार्बोहाइड्रेड वाला डायट लेना चाहिए।
*मिर्गी के रोगी को सप्ताह में एक बार फलो का सेवन अवश्य करना चाहिए।
*मिर्गी के रोगी को ज़रा सी हींग को निम्बू के साथ चूसने से लाभ मिलता है।
*दूध में पानी मिलाकर उबालें और लहसुन की 4 कली काटकर उसमे डाल से। यह मिश्रण रात को सोते वक्त पीयें। जल्द ही फ़ायदा नजर आने लगेगा।
*मानसिक तनाव और शारिरिक अति श्रम रोगी के लिये नुकसान देह है। इनसे बचना जरूरी है।
*मिर्गी रोगी को २५० ग्राम बकरी के दूध में ५० ग्राम मेंहदी के पत्तों का रस मिलाकर नित्य प्रात: दो सप्ताह तक पीने से दौरे बंद हो जाते हैं। जरूर आजमाएं।
*मिर्गी का दौरा दोबारा पड़ने की संभावना को कम करने के लिए-

रोकथाम


मिर्गी 
रोग होने का कारण सही तरह से पता नहीं होने के वजह से रोकथाम का भी पता सही तरह से चल नहीं पाया है। प्रेगनेंसी के दौरान सही तरह से देखभाल करने पर शिशुओं में होने की संभावना को कम किया जा सकता है। जेनेटिक स्क्रीनिंग होने से माँ को बच्चे में इसके होने का पता चल जाता है। सिर में चोट लगने की संभावना को कम करने से कुछ हद तक इस रोग के होने की खतरे को कम किया जा सकता है।
मिर्गी का दौरा बार-बार पड़ने की संभावना को कम करने के लिए-
• डॉक्टर द्वारा दिए गए दवा का सही तरह सेवन करनाः
• पर्याप्त नींद और एक ही समय में सोने की आदत का पालन करना।
तनाव से दूर रहें।
• संतुलित आहार।
• नियमित रूप से चेक-अप करवाते रहें।

मृगी मुद्रा :-

इस मुद्रा में हाथ की आकृति मृग के सिर के समान हो जाती है इसीलिए इसे मृगी मुद्रा कहा जाता है।
विधि :
हाथ की अनामिका और मध्यमा अंगुली (बीच की दोनों अंगुली) को अंगूठे के आगे के भाग से स्पर्श कराएँ |बाकी बची दोनों अंगुलियाँ कनिष्ठा एवं तर्जनी अंगुली को सीधा रखें।
लाभ :
मृगी मुद्रा मिर्गी के रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
इसके नियमित अभ्यास से सिरदर्द और दिमागी परेशानी में लाभ मिलता है।
मृगी मुद्रा से दन्त रोग एवं सायिनस रोग में भी लाभ मिलता है।

मुद्रा करने का समय व अवधि :

मृगी मुद्रा को प्रातः,दोपहर एवं सायं 10-10 मिनट करना उपयुक्त है।





28.7.17

मानसिक रोग के होम्योपैथिक इलाज /Homeopathic treatment of mental illness



• मनोरोगों का एक मुख्य कारण तनाव है। आज के इस भाग-दौड़ और चकाचौंध वाले समाज में तनाव एक तरह से रच-बस गया है और अनेकानेक रोगों की उत्पत्ति का कारण है।
• बचपन में मां-बाप का प्यार न मिलना किसी विकलांगता की वजह से तिरस्कार का पात्र बनना, इम्तहान में फेल हो जाना, अकारण पिटाई होना, पैदाइशी दिमागी कमजोरी अथवा किसी दुर्घटनावश कोई व्यक्ति किसी भी उम्र में मनोरोग का शिकार हो सकता है

प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र समस्या का 100% अचूक ईलाज 

मानसिक रोग के लक्षण
* शरीर में शर्करा की कमी, दिमाग में ट्यूमर बन जाना। कार्बन मोनोक्साइड गैस के विष की वजह से, थायराइड ग्रंथि की निष्क्रियता की वजह से, जिससे होंठ सूज जाते हैं और नाक मोटी हो जाती है आदि की वजह से मनोरोग परिलक्षित होते हैं। इसमें याददाश्त लगभग समाप्त हो जाती है, समय और दिन का ध्यान नहीं रहता। भावनात्मक अंकुश नहीं रह पाता एवं चिड़चिड़ा और मारपीट करने वाला बन जाता है, नंगा हो जाता है। चित अशांत रहता है। अभी तक मरीज ठीक है और फिर अचानक चीखने लगता है। फिर रोने लगता है और फिर गहन उदासी में डूब जाता है।
पागलपन के अन्य लक्षणों के अलावा रोगियों में निम्न लक्षण परिलक्षित होते हैं

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

*आवाज में हकलाहट। आंखें जल्दी-जल्दी झपकना। एक ही वस्तु के दो चित्र दिखाई देना, नींद न आना, बेचैनी रहना, मतिभ्रम, सुस्ती, व्यग्रता (गड़बड़ी), भय, अविश्वास आदि रहना। शरीर का अपना संतुलन गड़बड़ा जाने से, विटामिनों की कमी होने से, शारीरिक बीमारी जैसे व्यापक होने, दिमागी बीमारी होने, दिल अथवा सांस की न्यूनता की स्थिति में अथवा मादक दवाओं के अधिक सेवन के बाद परिलक्षित होते हैं।
*मतिभ्रम रहने लगता है। अपनी सफाई का ध्यान नहीं रखता, खाना खाने में परेशानी होती है। गले में दर्द होने लगता है। बाद की अवस्था में शरीर के मूवमेंट्स (चलने-फिरने की प्रक्रिया) भी बाधित होने लगती है। इन्द्रियों के कार्य क्षीण होने लगते हैं एवं शरीर के एक हिस्से में पक्षपात भी हो सकता है। सोचने-समझने में अस्त-व्यस्तता रहती है।

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

*. अकेलापन, उदासी में डूबे रहना, बोलचाल बंद या निरंतर बिना बात बोलते रहना।
*. कई बार पागलपन वंशानुगत भी हो सकता है।
* समाज-विरोधी कार्य करने लगते हैं। सेक्स संबंधी अश्लील हरकतें करने लगते हैं। व्यवहार रूखा , कठोर व भावनाविहीन हो जाता है।
मानसिक रोग का होम्योपैथिक उपचार
होमियोपैथिक दवाएं तो मानसिक लक्षणों पर सर्वोतम कार्य करती हैं। यदि कोई भी परेशानी रोगी को हो और कोई विशेष मानसिक लक्षण किसी दवा विशेष का उस रोगी में परिलक्षित हो जाए, तो उसी लक्षण के आधार पर दवा अत्यंत कारगर साबित होती है। होमियोपैथी के आविष्कारक एवं मूर्धन्य विद्वान डॉ. हैनीमैन ने तो अपने समय में जर्मनी में होमियोपैथिक औषधियों से मनोरोगियों का इलाज करने के लिए अलग से एसाइलम (पागलखाने) खोले हुए थे। प्रमुख होमियोपैथिक औषधियां निम्न प्रकार हैं –

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

‘बेलाडोना’, ‘हायोसाइमस’, ‘स्ट्रामोनियम’, ‘लेकेसिस’, ‘वेरेट्रम एल्बम’, ‘नेट्रमम्यूर’, ‘इग्नेशिया’ एवं ‘कॉस्टिकम’ आदि।
स्ट्रामोनियमः 
बिना रुके धार्मिकता पर बयान देना, अत्यधिक पूजा-पाठ करने वाला गंभीर रोगी, कभी हँसना, कभी गाना, कभी प्रार्थना करना (लक्षण जल्दी-जल्दी बदलते रहते हैं), भूत-प्रेत देखना, डरावनी आवाजें सुनाई पड़ना, हवा से बातें करना। हँसी-खुशी से अचानक दुखी हो जाना, मारने-पीटने पर उतारू, अपने बारे में मतिभ्रम सोचता है, जैसे मैं बहुत लम्बा हूं, दोहरा हो गया हूं या मेरे शरीर का कोई हिस्सा खो गया है। आध्यात्मिक, धार्मिक पागलपन, अकेलापन और अंधकार बर्दाश्त नहीं कर सकता। उजाले में सभी के साथ रहना चाहता है अथवा चमकदार वस्तु को देखने पर शरीर ऐंठने लगता है, भय लगता है, चित्त भ्रम और भागने की इच्छा रहती है, छोटी वस्तुएं भी बहुत बड़ी दिखाई देती हैं, हाथ हमेशा जननांगों पर ही रहते हैं। ऐसी स्थिति में 200 एवं 1000 तक की शक्ति में दवा अत्यंत फायदेमंद रहती है। इसमें रोगी कपड़े वगैरह फाड़ने लगता है।

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

बेलाडोनाः
 मरीज अपनी काल्पनिक दुनिया में रहता है, मतिभ्रम हो जाता है, भूत-प्रेत और डरावने चेहरे दिखाई देने लगते हैं। अचेतन अवस्था में सब कुछ छोड़कर भाग जाना चाहता है। बातचीत नहीं करना चाहता। आंखों में आंसू भरेरहते हैं। सभी इन्द्रियों (चेतना) की तीक्ष्णता व चित्त की परिवर्तनीयता बनी रहती है। बेचैनी और भय बना रहता है, सिरदर्द भयंकर, चेहरा लाल, सूजा हुआ, श्लेष्मा झिल्लियां सूखी हुई आदि लक्षण मिलने पर 200 एवं 1000 शक्ति की दवा जल्दी-जल्दी देनी चाहिए।
हायोसाइमस: 
लड़ाई-झगड़ा करने वाला, शक्कीस्वभाव, अत्यधिक बोलना, अश्लील बातें और कार्य, ईष्र्यालु, मंदबुद्धि, हर बात पर हँसने की आदत, धीमी, हकलाती हुई आवाज, पेशाब निकल जाना। अत्यधिक कमजोरी, रात में और खाना खाने के बाद परेशानी बढ़ जाती है,तो उक्त दवा 200 एवं 1000 शक्ति में देने से रोगी को फायदा होता है। रोगी को सेक्सुअल पागलपन होता है।
यदि लगातार दुखी रहने, किसी संताप अथवा शोक की वजह से पागलपन हो, तो ‘इग्नेशिया‘ एवं ‘कॉस्टिकम‘ उपयोगी है।

मोतियाबिंद  और कमजोर नजर के आयुर्वेदिक उपचार

यदि रोगी उदास रहे और हमेशा निराशावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए किसी भी चीज के बुरे पक्ष के बारे में ही सोचे, तो ‘कॉस्टिकम’ दवा उत्तम औषधि है।
यदि चेहरा पीला, आंखें धसी हई और चेहरा भद्दा दिखाई दे, रोगी अश्लील एवं धार्मिक बातें और कामुक बातें करे, तो ‘वैरैट्रम एल्बम‘ दवा देनी चाहिए।
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25.7.17

सोरायसिस रोग के एलोपैथ ,आयुर्वेदिक,घरेलु उपचार psoriasis, Ayurvedic, home remedies/


   कई ऐसे त्वचा रोग हैं, जो लंबे समय तक रोगी को परेशान करते हैं. कई बार लंबे समय तक इलाज के बावजूद ये ठीक नहीं होते हैं. ऐसे में रोगी निराश भी हो जाते हैं. सोरायसिस एक ऐसा ही रोग है, जो आॅटो इम्यून डिसआॅर्डर है. अगर सही तरीके से धैर्य रख कर इलाज कराया जाये, तो इस रोग से भी छुटकारा पाया जा सकता है. 
   सोरायसिस क्रॉनिक यानी बार बार होनेवाला आॅटोइम्यून डिजीज है, जो शरीर के अनेक अंगो को प्रभावित करता है. यह मुख्य रूप से त्वचा पर दिखाई देता है, इसलिए इसे चर्म रोग ही समझा जाता है. यह किसी भी उम्र में हो सकता है. एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया भर में लगभग एक प्रतिशत लोग इस रोग से पीड़ित हैं. यह रोग किसी भी उम्र में शुरू हो सकता है पर अकसर 20-30 वर्ष की आयु में अधिक आरंभ होता है. 60 वर्ष की आयु के बाद इसके होने की आशंका अत्यंत कम होती है. 5-10 प्रतिशत रोगियों में माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य को भी इस रोग से पीड़ित देखा गया है. आयुर्वेद में सोरायसिस को एक कुष्ठ, मंडल कुष्ठ या किटिभ कुष्ठ जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. बोलचाल की भाषा में कुछ लोग इसे छाल रोग भी कहते हैं.


सोरायसिस रोग के कारण

शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक प्रणाली की गड़बड़ी को इसका कारण माना जाता है. आयुर्वेद में विरुद्ध आहार या असंतुलित खान-पान के कारण पित्त और कफ दोषों में होनेवाली विकृति को इसका कारण बताया गया है. त्वचा की सबसे बाहरी परत (एपिडर्मिस) की अरबों कोशिकाएं प्रतिदिन झड़ कर नयी कोशिकाएं बनती हैं और एक महीने में पूरी नयी त्वचा का निर्माण हो जाता है. सोरायसिस में कोशिकाओं का निर्माण असामान्य रूप से तेज हो जाता है और नयी कोशिकाएं एक माह की जगह चार-पांच दिनों में बन कर मोटी चमकीली परत के रूप में दिखाई पड़ती हैं और आसानी से झड़ने लगती है. चोट लगने, संक्रामक रोग के बाद या अन्य दवाओं के कुप्रभाव के कारण भी सोरायसिस की शुरुआत होती है.
सोरायसिस रोग के लक्षण
   सोरायसिस कोहनी, घुटनों, खोपड़ी, पीठ, पेट, हाथ, पांव की त्वचा पर अधिक होता है. शुरुआत में त्वचा पर रूखापन आ जाता है, लालिमा लिये छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं. ये दाने मिल कर छोटे या फिर काफी बड़े चकत्तों का रूप ले लेते है. चकत्तों की त्वचा मोटी हो जाती है.

किडनी फेल्योर(गुर्दे खराब) रोगी घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार

    हल्की या तेज खुजली होती है. खुजलाने से त्वचा से चमकीली पतली परत निकलती है. परत निकलने के बाद नीचे की त्वचा लाल दिखाई पड़ती है और खून की छोटी बूंदे दिखाई पड़ सकती हैं. खोपड़ी की त्वचा प्रभावित होने पर यह कभी रूसी की तरह या अत्यधिक मोटी परत के रूप में दिखाई पड़ती है. नाखूनों के प्रभावित होने पर उनमें छोटे-छोटे गड्ढे हो सकते हैं. विकृत हो कर मोटे या टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं. नाखून पूरी तरह नष्ट भी हो सकते हैं.
    लगभग 20% सोरायसिस के पुराने रोगियों के जोड़ों में दर्द और सूजन भी हो जाती है, जिसे सोरायटिक आर्थराइटिस के नाम से जाना जाता है. अधिकांश रोगियों में रोग के लक्षण ठंड के समय में बढ़ जाते हैं. पर कुछ रोगियों को गरमी के महीने में अधिक परेशानी होती है. तनाव, शराब के सेवन या धूम्रपान से भी लक्षण बढ़ जाते हैं. अधिक प्रोटीन युक्त भोजन जैसे-मांस, सोयाबीन, दालों के सेवन से भी रोग के लक्षणों में वृद्धि हो सकती है. यह छूत की बीमारी नहीं है.
जिद्दी त्वचा रोग है सोरायसिस
सोरायसिस एक आॅटो इम्यून डिजीज है, जिसमें त्वचा पर चकत्ते पड़ जाते हैं और उनमें खुजली होती है. यह रोग काफी जिद्दी है और लंबे समय तक परेशान करता है. अगर धैर्य रख कर इसका उपचार सही तरीके से कराया जाये, तो इससे छुटकारा मिल सकता है. आयुर्वेद से इसके ठीक होने की संभावना अधिक होती है.



रोग के अनेक प्रकार

प्लाक सोरायसिस : 
लगभग 70-80 % रोगी प्लाक सोरायसिस से ही ग्रस्त होते हैं. इसमें कोहनियों, घुटनों, पीठ, कमर, पेट और खोपड़ी की त्वचा पर रक्तिम, छिलकेदार मोटे धब्बे या चकत्ते निकल आते हैं. इनका आकार दो-चार मिमी से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है.
गट्टेट सोरायसिस : 
यह अकसर कम उम्र के बच्चों के हाथ पांव, गले, पेट या पीठ पर छोटे -छोटे लाल दानों के रूप में दिखाई पड़ता है. प्रभावित त्वचा प्लाक सोरायसिस की तरह मोटी परतदार नहीं होती है. अनेक रोगी स्वत: या इलाज से चार-छह हफ्तों में ठीक हो जाते हैं. पर कभी-कभी ये प्लाक सोरायसिस में परिवर्तित हो सकते हैं
पामोप्लांटर सोरायसिस : 
यह मुख्य रूप से हथेलियों और तलवों को प्रभावित करता है.
पुस्चुलर सोरायसिस: इस प्रकार में अकसर हथेलियों, तलवों या कभी-कभी पूरे शरीर में लालिमा से घिरे दानों में मवाद हो जाता है.
एरिथ्रोडार्मिक सोरायसिस : 
इस प्रकार के सोरायसिस में चेहरे समेत शरीर की 80 प्रतिशत से अधिक त्वचा पर जलन के साथ लालिमा लिये चकत्ते हो जाते हैं. शरीर का तापमान असामान्य हो जाता है, हृदय गति बढ़ जाती है और समय पर उचित चिकित्सा नहीं होने पर रोगी के प्राण जा सकते हैं.
इन्वर्स सोरायसिस : 
इसमे स्तनों के नीचे, बगल, कांख या जांघों के उपरी हिस्से में लाल बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं.


होमियोपैथी में उपचार


सोरायसिस इम्युनिटी में गड़बड़ी के कारण होता है, इसलिए इसका उपचार करने का सबसे अच्छा तरीका इम्युनिटी में सुधार करना ही है. अत: इम्युनिटी को सुधारने के लिए सोरिनम सीएम शक्ति की दवा चार बूंद महीने में एक बार लें.
काली आर्च : अगर त्वचा से रूसी निकले, नोचने पर और अधिक निकले, रोग जोड़ों पर अधिक हो, तो काली आर्च 200 शक्ति की दवा चार बूंद रोज सुबह में दें.
पामर या प्लांटर सोरायसिस : अगर सोरायसिस हथेली या तलवों तक ही सीमित हो, तो इसके लिए सबसे अच्छी दवा फॉस्फोरस है. इसकी 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें.
काली सल्फ : सोरायसिस सिर में भी होता है. सिर की त्वचा से सफेद रंग की रूसी निकले और गोल-गोल चकत्ते जैसे हों, तो काली सल्फ 200 शक्ति की दवा चार बूंद सप्ताह में एक बार लें.
रोग को ठीक होने में लंबा समय लग सकता है. अत: धैर्य रख कर उपचार कराना जरूरी है.
सोरायसिस की चिकित्सा
यह एक हठीला रोग है, जो अकसर पूरी तरह से ठीक नहीं होता है. यदि एक बार हो गया, तो जीवन भर चल सकता है. अर्थात् रोग होता है, फिर ठीक भी होता है, लेकिन बाद में फिर हो जाता है. कुछ रोगियों में यह लगातार भी रह सकता है. हालांकि इसके कुछ रोगी अपने आप ठीक भी हो जाते हैं.
क्यों ठीक होते हैं अभी तक कारण अज्ञात है. कुछ नये रोगी धैर्य से खान-पान परहेज के साथ जीवनशैली में आवश्यक परिवर्तन और सावधानियों के साथ दवाओं से पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं अथवा रोग के लक्षणों से लंबी अवधि के लिए मुक्ति मिल जाती है. रोग के प्रारंभ में ही यदि आयुर्वेद विज्ञान से उपचार कराया जाता है, तो उपचार से रोग के ठीक होने की अधिक संभावना है. पुराने रोगियों को भी तुलनात्मक दृष्टि से कम खर्च में काफी राहत मिल जाती है. और रोगी बगैर परेशानी के सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है. एलोपैथ चिकित्सा प्रणाली में कुछ वर्षों पहले तक इसकी संतोषजनक चिकित्सा नहीं थी. विगत एक दशक में कई प्रभावकारी दवाएं विकसित हुई हैं, जिनके प्रयोग से लंबे समय तक रोग के लक्षणों से राहत मिल जाती है.
एलोपैथ चिकित्सा
साधारणतया सोरायसिस के लक्षण मॉश्च्यूराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे-वैसलीन, ग्लिसरीन या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रित हो सकते हैं. यदि यह सिर पर होता है, तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम में लाये जाते हैं. मॉश्च्यूराइजर्स या अन्य क्रीम सिर और प्रभावित त्वचा को मुलायम रखते हैं. सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो, तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है. इसके अलावा कोलटार (क्रीम, लोशन, शैंपू) आदि दवाइयां उपयोगी होती हैं.
पुवा (पीयूवीए) थेरेपी : अल्ट्रावायलेट प्रकाश किरणों के साथ सोरलेन के प्रयोग से भी आंशिक रूप से लाभ मिलता है पर रोग ठीक नहीं होता.
बीमारी ज्यादा गंभीर हो, तब मीथोट्रीक्सेट और साइक्लोस्पोरिन नामक दवाओं से सामयिक और आंशिक लाभ होता है, पर हानिकारक प्रभावों के कारण लंबे समय तक इनके प्रयोग में अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता है.
इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है. पर ये महंगी होने के कारण सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं.
सेकुकीनुमाब नाम की बयोलॉजिकल मेडिसिन से बेहतर परिणाम मिले हैं. इस दवा से काफी लाभ होता है. पर इसका खर्च प्रतिवर्ष लाखों में होने के बावजूद रोग से पूरी तरह छुटकारे की गारंटी नहीं है. ये सब दवाएं किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख में ही लेनी चाहिए. रोग के लक्षणों को दूर होने में लंबा समय लग सकता है. इस कारण रोगी को धैर्य रख कर इलाज कराना चाहिए. बीच में इलाज छोड़ने से समस्या और बढ़ सकती है और समस्या दूर होने में भी परेशानी हो सकता है.
आयुर्वेद स्वास्थ्य विज्ञान में सोरायसिस की चिकित्सा के लिए अनेक औषधियों के विकल्प के साथ-साथ आहार-विहार, परहेज का विशेष ध्यान रखा जाता है. कभी-कभी शरीर में व्याप्त हानिकारक तत्वों को निकालने के लिए पंचकर्म नामक विशिष्ट चिकित्सा का प्रयोग काफी लाभ दायक होता है. उपयोगी जड़ी-बूटियां तथा आयुर्वेदिक दवाएं जैसे-घृतकुमारी, श्वेत कुटज, अमृता (गुडिच), नीम, करंज, मजीठ, सारिवा, खदिर, मंडुकपर्णी, कुटकी, नीम, हल्दी, कैशोर गुगलू, रस माणिक्य, महामंजिष्ठादी, पंचतिक्त घृत
प्रतिदिन 20-30 ग्राम तीसी (अलसी) के सेवन के साथ इसके स्थानीय लेप से कई रोगियों को 70-80 प्रतिशत लाभ होने के अनुभव आये हैं.
अनुभूत उपयोगी घरेलू चिकित्सा-नीम की पत्तियां या गुडिच के तने को पीस कर या उबाल कर सोरायसिस से प्रभावित अंग धोएं.
-घृतकुमारी (एलोवेरा) का ताजा गूदा त्वचा पर लगाएं या इस गूदे का प्रतिदिन दो-तीन चम्मच दिन में दो बार 
-प्रतिदिन 20-30 ग्राम तीसी (अलसी) का सेवन करने से भी लाभ होता है.
-मांस, मुर्गा, अंडा, उड़द, मटर, सोयाबीन जैसे अधिक प्रोटीन युक्त भोजन न करें.
-कपालभाति और अनुलोम-विलोम का नियमित अभ्यास भी रोग से राहत देने में उपयोगी है|
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24.7.17

सिरदर्द के आयुर्वेदिक घरेलु उपचार /Ayurvedic Home Remedies For Headache



* पेट में गैस के कारण अगर सिर दर्द हो तो 1 ग्लास हलके गरम पानी में नींबू रस मिला कर पिये। इससे पेट की गैस और सिर के दर्द दोनों से रहत मिलेगी।
* सिरदर्द होने पर थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहना चाहिएँ। इससे सिरदर्द में आराम मिलता हैं।
* सिर की मांसपेशियों में तनाव की वजह से दर्द होने लगता है। इस तनाव को कम करने के लिए गर्दन, सिर और कंधो की मालिश करे। रोजाना योगा, एक्सरसाइज और मेडिटेशन करने वालों को सिर दर्द की शिकायत कम होती है।
*रूमाल में लौंग की कलियो को बांधकर सूंघने से भी सिरदर्द में आराम मिलता हैं।
*अगर आपको ये परेशानी बार बार होती है तो सुबह सुबह सेब पर नमक लगा कर खली पेट खाये और साथ में गुनगुना दूध पिये। कुछ दिन लगातार ये उपाय करने पर बार बार होने वाले सिर दर्द से छुटकारा मिलेगा।
* सर दर्द से तुरंत राहत पाने के लिए लौंग के पाउडर में नमक मिला कर पेस्ट बनाये और दूध के साथ पियें, कुछ मिनटों में ही सिर का दर्द कम हो जायेगा। इसके इलावा लौंग को हल्का सा गरम करे और पीस कर इसका लेप सिर पर लगाने से भी head pain दूर होता है।
* लहसुन एक प्राकृतिक दर्द निवारक औषधी है, लहसुन की कुछ कलियों को पीस कर निचोड़ ले और उसका रस पियें। इससे सिर दर्द से जल्दी आराम मिलेगा।
*गर्म पानी में नींबू निचोड़कर पीने से भी सिरदर्द ठीक होता हैं।


* सर्दी और जुकाम के कारण सर में दर्द हो तो चीनी और धनिया को पानी में घोल ले और पिए। इससे जुकाम, सर्दी और सिर दर्द से आराम मिलेगा।
*तुलसी की पत्तियों को पानी में पकाकर खाने से सिरदर्द ठीक होता हैं।
* अगर अधिक गर्मी की वजह से सिर दर्द हो तो नारियल के तेल से सर की मालिश करे। इससे सिर को ठंडक मिलेगी और दर्द से छुटकारा मिलेगा।
5. सर दर्द से छुटकारा पाना हो तो एक साफ़ कपडे में बर्फ के टुकड़े डालें और ice pack बना ले। 10 मिनट के लिए इसे सिर पर रखने और हटाने से थोड़ी देर में सर दर्द ठीक होने लगेगा।
6. थोड़ा सा केसर बादाम के तेल में मिला कर इसे सूंघने पर सिर का दर्द कम होने लगेगा। जल्दी राहत पाने के लिए इस उपाय को 2 से 3 बार करे।
*सेब पर नमक ड़ालकार खाने से सिरदर्द ठीक हो जाता हैं।
* कई बार नींद पूरी ना होने की वजह से भी सर में दर्द होने लगता है ऐसे में लौंग, इलायची और अदरक डाल कर चाय बनाये और पिये। इससे सिर का दर्द तुरंत गायब हो जाएगा। अदरक वाली चाय पीना तनाव कम करने और माइंड फ्रेश करने का अच्छा उपाय है।



सिर दर्द  के आयुर्वेदिक नुस्खे

*सिर के जिस तरफ दर्द हो उसकी दूसरी तरफ की नाक में 1 से 2 बूंदे शहद की डाले, इस उपाय से सिर दर्द जल्दी दूर होता है। अगर माइग्रेन की वजह से सिर में दर्द हो रहा है तो शहद की जगह देसी गाय के घी की कुछ बूंदे डाले।
*पानी में दालचीनी पाउडर मिला कर पेस्ट बनाये और सिर पर लगाये, इस आयुर्वेदिक नुस्खे के प्रयोग से आपको तुरंत आराम मिलेगा।
*जायफल को चावल के पानी में अच्छे से घीस कर पेस्ट बनाये और सिर पर लगाए, इससे सिर दर्द काम होने लगेगा। .
*सर दर्द ठीक करने के लिए गाय का गरम दूध पीना भी फायदेमंद है। .
*खीरा काट कर सिर पर रगड़ने और सूंघने से शिरोवेदना कम होती है।
*सरसों के तेल को कटोरी में डाल कर 2 से 3 बार सूँघे।
*बाबा रामदेव के योगा से सिर दर्द का इलाज

रोजाना 10 मिनट योगा कर के आप सर दर्द से छुटकारा पा सकते है। सिर दर्द का उपचार करने के लिए बाबा रामदेव  द्वारा बताये हुए कुछ योगा आसान निचे लिखे है।
पवनमुकतासना
भ्रामरी प्राणायाम
सूर्य नमस्कार

नाड़ी शोधन
स्वरगासन
सिर दर्द में परहेज क्या करे
ऐसे भोजन से परहेज करे जिस से क़ब्ज़ होने की आशंका हो।
बिना मसाले वाला सादा भोजन करे.
धूम्रपान और शराब से दूर रहे।
अधिक तनाव लेने से बचे।
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23.7.17

स्वास्थ्य दोहावली //Health couplets


पानी में गुड डालिए,बीत जाए जब रात|
सुबह छानकर पीजिए,अच्छे हों हालात||

धनिया की पत्ती मसल,बूंद नैन में डार|
दुखती अँखियां ठीक हों,पल लागे दो-चार||

ऊर्जा मिलती है बहुत,पिएं गुनगुना नीर|
कब्ज खतम हो पेट की,मिट जाए हर पीर||

प्रातः काल पानी पिएं,घूंट-घूंट कर आप|
बस दो-तीन गिलास है,हर औषधि का बाप||

ठंडा पानी पियो मत,करता क्रूर प्रहार|
करे हाजमे का सदा,ये तो बंटाढार||




भोजन करें धरती पर,अल्थी पल्थी मार|
चबा-चबा कर खाइए,वैद्य न झांकें द्वार||

प्रातः काल फल रस लो,दुपहर लस्सी-छांस|
सदा रात में दूध पी,सभी रोग का नाश||

दही उडद की दाल सँग,पपीता दूध के संग|
जो खाएं इक साथ में,जीवन हो बदरंग||

प्रातः- दोपहर लीजिये,जब नियमित आहार|
तीस मिनट की नींद लो,रोग न आवें द्वार||


किडनी फेल्योर(गुर्दे खराब) रोगी घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार


भोजन करके रात में,घूमें कदम हजार|
डाक्टर, ओझा, वैद्य का ,लुट जाए व्यापार ||

देश,भेष,मौसम यथा,हो जैसा परिवेश|
वैसा भोजन कीजिये,कहते सखा सुरेश||

इन बातों को मान कर,जो करता उत्कर्ष|
जीवन में पग-पग मिले,उस प्राणी को हर्ष||

घूट-घूट पानी पियो,रह तनाव से दूर|
एसिडिटी, या मोटापा,होवें चकनाचूर||

अर्थराइज या हार्निया,अपेंडिक्स का त्रास|
पानी पीजै बैठकर,कभी न आवें पास||

रक्तचाप बढने लगे,तब मत सोचो भाय|
सौगंध राम की खाइ के,तुरत छोड दो चाय||





सुबह खाइये कुवंर-सा,दुपहर यथा नरेश|
भोजन लीजै रात में,जैसे रंक सुरेश|

देर रात तक जागना,रोगों का जंजाल|
अपच,आंख के रोग सँग,तन भी रहे निढाल||

टूथपेस्ट-ब्रश छोडकर,हर दिन दोनो जून|
दांत करें मजबूत यदि,करिएगा दातून||

हल्दी तुरत लगाइए,अगर काट ले श्वान|
खतम करे ये जहर को,कह गए कवि सुजान||

मिश्री, गुड, खांड,ये हैं गुण की खान|
पर सफेद शक्कर सखा,समझो जहर समान||

चुंबक का उपयोग कर,ये है दवा सटीक|
हड्डी टूटी हो अगर,अल्प समय में ठीक||

दर्द, घाव, फोडा, चुभन,सूजन, चोट पिराइ|
बीस मिनट चुंबक धरौ,पिरवा जाइ हेराइ||

हँसना, रोना, छींकना,भूख, प्यास या प्यार|
क्रोध, जम्हाई रोकना,समझो बंटाढार||

सत्तर रोगों कोे करे,चूना हमसे दूर|
दूर करे ये बाझपन,सुस्ती अपच हुजूर||

यदि सरसों के तेल में,पग नाखून डुबाय|
खुजली, लाली, जलन सब,नैनों से गुमि जाय||


भोजन करके जोहिए,केवल घंटा डेढ!
पानी इसके बाद पी,ये औषधि का पेड!!

जो भोजन के साथ ही,पीता रहता नीर!
रोग एक सौ तीन हों,फुट जाए तकदीर!!

पानी करके गुनगुना,मेथी देव भिगाय
सुबह चबाकर नीर पी,रक्तचाप सुधराय

अलसी, तिल, नारियल,घी सरसों का तेल
यही खाइए नहीं तो,हार्ट समझिए फेल

पहला स्थान सेंधा नमक,पहाड़ी नमक सु जान
श्वेत नमक है सागरी,ये है जहर समान

तेल वनस्पति खाइके,चर्बी लियो बढाइ
घेरा कोलेस्टरॉल तो,आज रहे चिल्लाइ

अल्यूमिन के पात्र का,करता है जो उपयोग
आमंत्रित करता सदा ,वह अडतालीस रोग

फल या मीठा खाइके,तुरत न पीजै नीर
ये सब छोटी आंत में,बनते विषधर तीर

चोकर खाने से सदा,बढती तन की शक्ति
गेहूँ मोटा पीसिए,दिल में बढे विरक्ति

नींबू पानी का सदा,करता जो उपयोग!
पास नहीं आते कभी,यकृति-आंत के रोग|

दूषित पानी जो पिए,बिगडे उसका पेट!
ऐसे जल को समझिए,सौ रोगों का गेट||

रोज मुलहठी चूसिए,कफ बाहर आ जाय!
बने सुरीला कंठ भी,सबको लगत सुहाय||

भोजन करके खाइए,सौंफ, गुड, अजवान|
पत्थर भी पच जायगा,जानै सकल जहान||

लौकी का रस पीजिए,चोकर युक्त पिसान|
तुलसी, गुड, सेंधा नमक,हृदय रोग निदान||

हृदय रोग, खांसी औरआंव करें बदनाम|
दो अनार खाएं सदा,बनते बिगडे काम||

चैत्र माह में नीम की,पत्ती हर दिन खावे |
ज्वर, डेंगू या मलेरिया,बारह मील भगावे ||

सौ वर्षों तक वह जिए,लेत नाक से सांस!
अल्पकाल जीवें, करें,मुंह से श्वासोच्छ्वास||

सितम, गर्म जल से कभी,करिये मत स्नान|
घट जाता है आत्मबल,नैनन को नुकसान||

हृदय रोग से आपको,बचना है श्रीमान|
सुरा, चाय या कोल्ड्रिंक,का मत करिए पान||

अगर नहावें गरम जल,तन-मन हो कमजोर|
नयन ज्योति कमजोर हो,शक्ति घटे चहुंओर||

तुलसी का पत्ता करें,यदि हरदम उपयोग|
मिट जाते हर उम्र में,तन के सारे रोग||


 किडनी फेल (गुर्दे खराब) की अमृत औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार








22.7.17

काकरोच भगाने के उपाय /Ways to get rid of cockroaches


     

बरसात के मौसम में घरों में सीलन बढ़ जाती है और कॉकरोचों के पनपने के लिए ये सबसे अनुकूल समय होता है. इनके सबसे अधि‍क पनपने की जगहें किचन और स्टोर रूम होती है.
बाजार में ऐसे कई उत्पाद मौजूद हैं जो ये दावा करते हैं कि उनके इस्तेमाल से कॉकरोच हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे लेकिन इस रासायनिक चीजों का इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए खतरा भी साबित हो सकता है. खासतौर पर तब जब आपके घर में छोटे बच्चों हो. ऐसे में बेहतर होगा कि आप घरेलू उपाय अपनाएं :

* केरोसिन ऑयल के इस्तेमाल से
केरोसिन ऑयल के इस्तेमाल से भी कॉकरोच भाग जाते हैं लेकिन इसकी बदबू से निपटने के लिए आपको तैयार रहना पड़ेगा.
* तेजपत्ते का इस्तेमाल
तेजपत्ते की गंध से कॉकरोच भागते हैं. घर के जिस कोने में कॉकरोच हों वहां तेजपत्ते की कुछ पत्ति‍यों को मसलकर रख दें. कॉकरोच उस जगह से भाग जाएंगे. दरअसल, तेजपत्ते को मसलने पर आपको हाथों में हल्का तेल नजर आएगा. इसी की गंध से कॉकरोच भागते हैं. समय-समय पर पत्ति‍यां बदलते रहें.
*बेकिंग पाउडर और चीनी मिलाकर रखने से
एक कटोरे में बराबर मात्रा में बेकिंग पाउडर और चीनी  मिलाएं और इस मिश्रण को प्रभावित जगह पर छिड़क दें. चीनी का मीठा स्वाद कॉकरोचों को आकर्षि‍त करता है और बेकिंग सोडा उन्हें मारने का. समय-समय पर इसे बदलती रहें.



*. लौंग की गंध

तेज गंध वाला लौंग भी कॉकरोचों को भगाने के लिए एक अच्छा उपाय है. किचन की दराजों और स्टोर रूम की अलमारियों में लौंग की कुछ कलियों को रख दीजिए. इस उपाय से कॉकरोच भाग जाएंगे.
* बोरेक्स के इस्तेमाल से
प्रभावित जगहों पर बोरेक्स पाउडर का छिड़काव कर दें. इससे कॉकरोच भाग जाते हैं लेकिन ये खतरनाक साबित भी हो सकता है. बोरेक्स पाउडर का छिड़काव करने के समय ये ध्यान रखें कि वो बच्चें की पहुंच से दूर हो.



कुछ अन्य टिप्स:

-कॉकरोचों की संख्या बढ़ने से पहले ही हरकत में आ जाएं.
-स्प्रे करने के दौरान अपनी त्वचा को ढककर रखें.
- पानी के निकास वाली सभी जगहों पर जाली लगी होनी चाहिए.
-फल-सब्जी के छिलकों को ज्यादा समय तक घर में न रहने दें|

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19.7.17

धात रोग के कारण और उपचार



  जब भी पुरुष के मन में काम या सेक्स की भावना बढ जाती है! तो लिंग अपने आप ही कठोर हो जाता है और उत्तेजना की अवस्था में आ जाता है! इस अवस्था में व्यक्ति के लिंग से पानी के रंग के जैसी पतली लेस के रूप में निकलने लगती है! लेस बहूत कम होने के कारण ये लिंग से बाहर नहीं आ पाती है, लेकिन जब व्यक्ति काफी अधिक देर तक उत्तेजित रहता है तो ये लेस लिंग के मुहँ के आगे आ जाती है!
   आज के युग में अनैतिक सोच और अश्लीलता के बढ़ने के कारण आजकल युवक और युवती अक्सर अश्लील फिल्मे देखते और पढते है तथा गलत तरीके से अपने वीर्य और रज को बर्बाद करते है! अधिकतर लड़के-लड़कीयां अपने ख्यालों में ही शारीरिक संबंध बनाना भी शुरू कर देते है!
     जिसके कारण उनका लिंग अधिक देर तक उत्तेजना की अवस्था में बना रहता है, और लेस ज्यादा मात्रा में बहनी शुरू हो जाती है! और ऐसा अधिकतर होते रहने पर एक वक़्त ऐसा भी आता है! जब स्थिति अधिक खराब हो जाती है और किसी लड़की का ख्याल मन में आते ही उनका लेस (वीर्य) बाहर निकल जाता है, और उनकी उत्तेजना शांत हो जाती है! ये एक प्रकार का रोग है जिसे शुक्रमेह कहते है!
वैसे इस लेस में वीर्य का कोई भी अंश देखने को नहीं मिलता है! लेकिन इसका काम पुरुष यौन-अंग की नाली को चिकना और गीला करने का होता है जो सम्बन्ध बनाते वक़्त वीर्य की गति से होने वाले नुकसान से लिंग को बचाता है!


किडनी फेल्योर(गुर्दे खराब) रोगी घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार

धात रोग का प्रमुख कारण -

अधिक कामुक और अश्लील विचार रखना!
मन का अशांत रहना!
व्यक्ति का शरीर कमजोर होना और उसकी प्रतिरोधक श्रमता की कमी होना!
अक्सर किसी बात का चिंता करना
पौरुष द्रव का पतला होना
यौन अंगो के नसों में कमजोरी आना
अपने पौरुष पदार्थ को व्यर्थ में निकालना व नष्ट करना (हस्तमैथुन अधिक करना)
अक्सर किसी बात या किसी तरह का दुःख मन में होना!
दिमागी कमजोरी होना!
व्यक्ति के शरीर में पौषक पदार्थो और तत्वों व विटामिन्स की कमी हो जाने पर!
किसी बीमारी के चलते अधिक दवाई लेने पर



धात रोग के लक्षण क्या है?

मल मूत्र त्याग में दबाव की इच्छा महसूस होना! धात रोग का इशारा करती है!
पेट रोग से परेशान रहना या साफ़ न होना, कब्ज होना!
सांस से सम्बंधित परेशानी, श्वास रोग या खांसी होना!
शरीर की पिंडलियों में दर्द होना!
कम या अधिक चक्कर आना!
शरीर में हर समय थकान महसूस करना!
चुस्ती फुर्ती का खत्म होना!
मन का अप्रसन्न रहना और किसी भी काम में मन ना लगना इसके लक्षणों को दर्शाता है!
लिंग के मुख से लार का टपकना!
पौरुष वीर्य का पानी जैसा पतला होना!
शरीर में कमजोरी आना!
छोटी सी बात पर तनाव में आ जाना!
हाथ पैर या शरीर के अन्य हिस्सों में कंपन या कपकपी होना!
;धात रोग में फायदेमंद आयुर्वेदिक उपाय
कौंच के बीज - 
अगर आपका वीर्य पतला है तो 100 – 100 ग्राम की मात्रा में मखाने (Dryfruit) और कौंच के बीज लेकर उन्हें पीस कर उनका चूर्ण बना लें और फिर उसमे 200 ग्राम पीसी हुई मिश्री मिला लें!
अब इस मिश्रण के रोज (आधा) ½ चम्मच को गुनगुने दूध में मिलाकर पियें! इससे आपका जल्द ही बहूत अधिक लाभ मिलेगा!
शतावरी मुलहठी-: 
 50 ग्राम शतावरी, 50 ग्राम मुलहठी, 25 ग्राम छोटी इलायची के बीज, 25 ग्राम बंशलोचन, 25 ग्राम शीतलचीनी और 4 ग्राम बंगभस्म, 50 ग्राम सालब मिसरी लेकर इन सभी सामग्रियो को सुखाकर बारीक पिस लें! पीसने के बाद इसमे 60 ग्राम चाँदी का वर्क मिलाएं और प्राप्त चूर्ण को (60 ग्राम ) सुबह-शाम गाय के दूध के साथ लें!



गिलोय : धात रोग से मुक्ति प्राप्त करने के लिए 2 चम्मच गिलोय के रस में 1 चम्मच शहद मिलकर लेना चाहिए!

सफ़ेद मुसली -: 
 अगर 10 ग्राम सफ़ेद मुसली का चूर्ण में मिश्री मिलाकर खाया जाए और उसके बाद ऊपर से लगभग 500 ग्राम गाय का दूध पी लें तो अत्यंत लाभ करी होता है! इस उपाय से शरीर को अंदरूनी शक्ति मिलती है और व्यक्ति के शरीर को रोगों से लड़ने के लिए शक्ति मिलती है!
उड़द की दाल - : 
अगर उड़द की दाल को पीसकर उसे खांड में भुन लिया जाए और खांड में मिलाकर खाएं तो भी जबरदस्त लाभ जल्दी ही मिलता है!
आंवले-
 प्रतिदिन सुबह के वक़्त खाली पेट दो चम्मच आंवले के रस को शहद के साथ लें! इससे जल्द ही धात पुष्ट होने लगती है! सुबह शाम आंवले के चूर्ण को दूध में मिला कर लेने से भी धात रोग में बहूत लाभ मिलता है!
तुलसी ( Basil ): 3 से 4 ग्राम तुलसी के बीज और थोड़ी सी मिश्री दोनों को मिलाकर दोपहर का खाना खाने के बाद खाने से जल्दी ही लाभ होता है!
जामुन की गुठली -: 
जामुन की गुठलियों को धुप में सुखाकर उसका पाउडर बना लें और उसे रोज दूध के साथ खाएं! कुछ हफ़्तों में करने पर ही आपका धात गिरना बंद हो जायेगा|
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18.7.17

पित्त दोष जनित रोगों के आयुर्वेदिक घरेलु उपचार


आयुर्वेद के अनुसार रोगों का मूल कारण वात, पित्त व कफ का असंतुलन है. यह तीन धातुएं जब तक संतुलित हैं शरीर निरोग एवं स्वस्थ रहता है. इनमे असमानता आते ही शरीर में रोग का प्रभाव आ जाता है. यदि हम यह जान जाए कि हमारे शरीर में कौन सी धातु असंतुलित हो रही है, तो बहुत सी बिमारियों को बिलकुल प्रारंभिक स्तर पर रोका जा सकता है,और यदि हम बिमार हो भी जाए तो इस ज्ञान के द्वारा उचित पथ्यापथ्य वा औषधि का सेवन करके हम जल्दी स्वस्थ हो सकते हैं.

पित्त :

सूर्य की शक्ति समस्त संसार में व्याप्त है और यही सूर्य शक्ति मानव देह में पित्त रूप में विराजमान है पित्त स्पर्श और गुण में उष्ण होता है, अर्थात् अग्नि रूप होता है एवं द्रव (तरल) रूप में रहता है। इसका रंग पीला एवं नीला होता है। यह सत्त्वगुण प्रधान होता है, रस में कटु (चरपरा) और तिक्त (कड़वा) होता है तथा दूषित होने पर खट्टा हो जाता है।

पित्त प्रकृति के लक्षण :

जिनकी पित्त प्रकृति होती है ऐसे पुरुषों स्त्रियों के बाल स्त्रियों के बाल समय से पहले ही श्वेत हो जाते हैं, परन्तु ऐसे व्यक्ति बुद्धिमान् होते है। उन्हें पसीना अधिक आता है। स्वभाव क्रोधी उग्र होता है. और ऐसे व्यक्ति स्वप्न में बहुधा चमकीली चीजें देखते है।>पित्त के स्थान एवं कार्य :
(1) अग्नाशय में स्थित अग्नि रूप पित्त जो चतुर्दिक आहार को पचाता है। इसको पाचक पित्त कहते हैं।
(2) त्वचा में स्थित पित्त त्वचा में कांति और प्रभा की उत्पत्ति करता है और शरीर की वाह्य त्वचा पर लगाये हुये लेप और अभ्यंग को पचाता है। यह शरीर के तापमान को स्थिर रखता है। इसको श्राजक पित्त कहते हैं।
(3) नेत्रों में स्थित पित्त जो कृष्ण पीट आदि रूपों को दिखाता है आलोचक पित्त कहलाता है

किडनी फेल्योर(गुर्दे खराब) रोगी घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार

(4) जो पित्त हृदय में रहकर मेधा (धारणाशक्ति) और प्रज्ञा (बुद्धि) को देता है, वह ‘साधक’ पित्त होता है।
इस प्रकार नाम और कर्म भेद से पित्त पाँच प्रकार का होता है। और यही पित्त समग्र शरीर को उत्तम रखने का कारण है।

पित्त रोग वर्णन :

पित्त से होने वाले 40 प्रकार के रोग इस प्रकार हैं :
1. धूमोद्वार – डकार से निकलने वाली वायु
2. विदाह – आँख हाथ पैर में बिना प्रत्यक्ष कारण के जलन में जलन
3. उष्णाड्डत्व – शरीर का गर्म बना रहना
4. मतिभ्रम – अधिकता होने पर विवेक शुन्यता
5. कांति हानि – शरीर का रंग पीला दिखाई देना
6. कंठ शोष – गले का सूखना
7. मुख शोष – मुख का सूखना
8. अल्प शुक्रता – वीर्य का अल्प होना
9. तिक्तास्यता – मुख का स्वाद कड़वा रहना
10. अम्लवक्त्रता – मुख का स्वाद खट्टा रहना
11. स्वेदस्त्राव – पसीने का अधिक आना
12. अंग पाक – शरीर में पस पड़ना
13. क्मल – परिश्रम के बिना ही थकावट का होना
14. हरितवर्णत्व – पित्त के मलयुक्त होने पर हरा सा वर्ण होता है
15. अतृप्ति – भोजनादि में तृप्ति नहीं होती
16. पीत गात्रता – अंगों का पीला होना
17. रक्त स्त्राव – रुधिर प्रवृत्ति
18. अंग दरण – अंगों में दरण्वत पीड़ा
19. लोह गन्धास्यता- निःश्वसित श्वास में लोहे की गन्ध का होना
20. दौर्गान्ध्य – पसीने में दुर्गन्ध का आना
21. पीतमूत्रता – मूत्र का पीत वर्ण होना
22. अरति – बेचैनी का होना
23. पीत विट्कता – पुरीष का पीला होना
24. पीतावलोकन – पीला ही पीला दिखना
25. पीत नेत्रता – नेत्रों का पीला होना
26. पीत दन्तता – दांतों का पीला होना



27. शीतेच्छा – शीतल पदार्थ और शीतल वायु की अभिलाषा सर्वदा होना

28. पीतनखता – नाखूनों का पीला होना
29. तेजो द्वेष – अत्यंत चमकीली वस्तुओं से द्वेष ( सूर्य का प्रकाश )
30. अल्पनिद्रा – थोड़ी निद्रा का आना
31. कोप – क्रोधी स्वभाव का होना
32. गात्साद – अंगों में द्रढता का अभाव
33. भिलविट्कता – पुरीष का द्रव रूप में आना
34. अन्धता – आँखों की ज्योति का कम होना
35. उष्णोच्छवास – वायु का गरम होकर आना
36. उष्ण मूत्रता – मूत्र का गरम होना
37. उष्ण मानता – मल का स्पशौषणा होना
38. तमसोदर्शन – अन्धकार का दिखना
39. पीतमण्डल दर्शन – पीले मण्डलों का दिखना
40. निःसहत्व – सहन शक्ति का अभाव होना
इस प्रकार पित्त जनित ये 40 रोग हैः
पित्त प्रकोप एवं शमन :
विदाहि (पित्त प्रकोपक ), कटु ( कडुआ,तीक्ष्ण), अम्ल (खट्टे) एवं अत्युष्ण (अत्यधिक गर्म ) भोजन से, अत्यधिक धूप अथवा अग्नि सेवन से, भूख और प्यास के रोकने से, अन्न के पाचन काल में, मध्याह्न में और आधी रात के समय उपरोक्त कारणों से पित्त का प्रकोप ( पित्त का विकृत होना ) होता है। इन कारणों के विपरीत आचरण विपरीत समयों में करने से पित्त का शमन होता है।



पित्तजनित दोषों को दूर करने हेतु औषधि :

1- शतावरी का रस दो तोला में मधु पांच ग्राम मिलाकर पीने से पित्त जनित शूल दूर होता है।
2- हरड, बहेड़ा, आंवला, ( सामान मात्रा ) में अमलतास की फली का गूदा (पीछे बतायी गयी सामग्रीके बराबर ) , इन चारों औषधियों के काढे़ में खांड़ और शहद मिलाकर पीने से रक्तपित्त, और पित्तजनित शूल (नाभिस्थान अथवा पित्त वाहिनियों में पित्त संचित और अवरुद्ध होने से उत्पन्न होने वाले शूल को ) अवश्य दूर करता है।
नोट- काढ़ा बनाने हेतु दवा के मिश्रण से 16 गुना पानी डालकर मंद आंच में पकायें। जब पानी एक चौथाई रह जाये, तो उसे ठंडा करके पीना चाहिये। इस काढ़ा की मात्रा चार तोला के आसपास रखनी चाहिए।
3- पिप्पल (गीली) पित्त को शान्त करती है।
4- खट्टा आंवला, लवण रस और सेंधा नमक भी पित्त को शान्त करती है।
5- गिलोय का रस पित्त को शान्त करता है।(10 ml )
6- हरीतकी (पीली हरड़) 25 ग्राम, मुनक्का 50 ग्राम, दोनों को सिल पर बारीक पीसकर उसमें 75 ग्राम बहेड़े का चूर्ण मिला लें। चने के बराबर गोलियां बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल ताजा जल से दो या तीन गोली सेवन करें। इसके सेवन से समस्त पित्त रोगों का शमन होता है। हृदय रोग, रक्त के रोग, विषम ज्वर, पाण्डु-कामला, अरुचि, उबकाई, कष्ट, प्रमेह, अपरा, गुल्म आदि अनेक परेशानियाँ नष्ट होती हैं।
7- 10 ग्राम आंवला रात्रि में पानी में भिगो दें। प्रातःकाल आंवले को मसलकर छान लें। इस पानी में थोड़ी मिश्री और जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करें। तमाम पित्त रोगों की रामबाण औषधि है। इसका प्रयोग 15-20 दिन करना चाहिए।
8- शंखभस्म 1ग्राम, सोंठ का चूर्ण आधा ग्राम, आँवला का चूर्ण आधा ग्राम, इन तीनों औषधियों को शहद में मिलाकर सुबह खाली पेट एवं शाम को खाने के एक घण्टे बाद लेने से अम्लपित्त दूर होता है।
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स्मरण शक्ति याददाश्त बढ़ाने के उपाय/ Remedial measures to increase memory/




कमजोर स्मरण शक्ति कारण व लक्षण: जिन व्यक्तियों के मस्तिष्क और स्नायु दुर्बलता हो जाते हैं उनकी स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है। उन्हे कुछ याद नहीं रहता तथा स्वभाव से भुलक्कड़ हो जाते हैं। विद्यार्थियों को भी यह आम समस्या हो सकती है। उन्हें पढ़ा हुआ याद नहीं रहता और याद रहता है तो कुछ समय तक।
कमजोर स्मरण शक्ति बढ़ाने के उपाय :

बादाम :

बादाम को दिमाग के लिए अमृत के समान माना जाता है। स्मरण शक्ति के विकास के लिए 10 बादाम रात को भिगो दें और सुबह छिलका उतारकर लगभग 10-12 ग्राम मक्खन और मिश्री के साथ खाए। बादाम के नियमित सेवन से दिमाग तेज होकर स्मरणशक्ति बढ़ने लगती है।

सेव :

सेव के सेवन से स्मरण शक्ति बढ़ जाती है। इसके लिए एक या दो सेव बिना छिलके उतारे चबा-चबाकर भोजन से 15 मिनट पहले खाना चाहिए। यह मस्तिष्क को शक्ति देने के साथ-साथ रक्त की कमी भी दूर करता है।

आंवला :

स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए हर रोज आंवले का मुरब्बा खाएं।



बेल :


एक पका हुआ बेल फल का गूदा मिट्टी के सकोरे में डालकर पानी भर दे। ऊपर पतला कपड़ा या छलनी रख दें। सुबह पानी निकालकर मीठा मिलाकर पिए। दिमाग तरोताजा हो जाएगा। सर्दियों के दिनों में बेल का गूदा मिट्टी के पात्र के बजाय कलीदार बर्तन या स्टील के पात्र में रखें। और उसी समय मसलकर गर्म पानी में शहद के साथ घोल कर पी लें। इसके नियमित प्रयोग से दिमागी शक्ति अवश्य बढ़ेगी।

गाजर :

गाजर के रस को गाय के दूध के साथ समान मात्रा में मिलाकर पीने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

लीची :


लीची का प्रयोग करने से मस्तिष्क को बल मिलता है और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

चकुंदर :

चुकंदर का रस हर रोज पीने से भी स्मरण शक्ति बढ़ती है।

आम :

दिमाग की कमजोरी से होने वाली स्मरण शक्ति की कमी के लिए एक कप आम का रस थोड़ा सा दूध और एक चम्मच अदरक का रस और चीनी मिलाकर पीने से दिमाग में ताजगी का संचार होता है। दूध में आम का रस मिलाकर पीने से भी दिमाग में तरावट आती है और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
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गुर्दे के रोग और उपचार// Kidney Diseases and Treatments/




    हम गुर्दे या वृक्क (Kidney) के बारे में बहुत ही कम जानते हैं। जिस प्रकार नगरपालिका शहर को स्वच्छ रखती     है वैसे ही गुर्दे शरीर को स्वच्छ रखते हैं। रक्त में से मूत्र बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य गुर्दे करते हैं। शरीर में रक्त में उपस्थित विजातीय व अनावश्यक बच्चों एवं कचरे को मूत्रमार्ग द्वारा शरीर से बाहर निकालने का कार्य गुर्दों का ही है।
गुर्दा वास्तव में रक्त का शुद्धिकरण करने वाली एक प्रकार की 11 सैं.मी. लम्बी काजू के आकार की छननी है जो पेट के पृष्ठभाग में मेरुदण्ड के दोनों ओर स्थित होती हैं। प्राकृतिक रूप से स्वस्थ गुर्दे में रोज 60 लीटर जितना पानी छानने की क्षमता होती है। सामान्य रूप से वह 24 घंटे में से 1 से 2 लीटर जितना मूत्र बनाकर शरीर को निरोग रखती है। किसी कारणवशात् यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर दे अथवा दुर्घटना में खो देना पड़े तो उस व्यक्ति का दूसरा गुर्दा पूरा कार्य सँभालता है एवं शरीर को विषाक्त होने से बचाकर स्वस्थ रखता है। जैसे नगरपालिका की लापरवाही अथवा आलस्य से शहर में गंदगी फैल जाती है एवं धीरे-धीरे महामारियाँ फैलने लगती हैं, वैसे ही गुर्दों के खराब होने पर शरीर अस्वस्थ हो जाता है।

*वात रोगों के प्राकृतिक ,आयुर्वेदिक घरेलू उपचार*

अपने शरीर में गुर्दे चतुर यंत्रविदों (Technicians) की भाँति कार्य करते हैं। गुर्दा शरीर का अनिवार्य एवं क्रियाशील भाग है, जो अपने तन एवं मन के स्वास्थ्य पर नियंत्रण रखता है। उसके बिगड़ने का असर रक्त, हृदय, त्वचा एवं यकृत पर पड़ता है। वह रक्त में स्थित शर्करा (Sugar), रक्तकण एवं उपयोगी आहार-द्रव्यों को छोड़कर केवल अनावश्यक पानी एवं द्रव्यों को मूत्र के रूप में बाहर फेंकता है। यदि रक्त में शर्करा का प्रमाण बढ़ गया हो तो गुर्दा मात्र बढ़ी हुई शर्करा के तत्त्व को छानकर मूत्र में भेज देता है।



गुर्दों का विशेष सम्बन्ध हृदय, फेफड़ों, यकृत एवं प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। ज्यादातर हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी बिगड़ते हैं और जब गुर्दे बिगड़ते हैं तब उस व्यक्ति का रक्तचाप उच्च हो जाता है और धीरे-धीरे दुर्बल भी हो जाता है।

आयुर्वेद के निष्णात वैद्य कहते हैं कि गुर्दे के रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसका मुख्य कारण आजकल के समाज में हृदयरोग, दमा, श्वास, क्षयरोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोगों में किया जा रहा अंग्रेजी दवाओं का दीर्घकाल तक अथवा आजीवन सेवन है।
इन अंग्रेजी दवाओं के जहरी प्रभाव के कारण ही गुर्दे एवं मूत्र सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी किसी आधुनिक दवा के अल्पकालीन सेवन की विनाशकारी प्रतिक्रिया (Reaction) के रूप में भी किडनी फेल्युअर (Kidney Failure) जैसे गम्भीर रोग होते हुए दिखाई देते हैं। अतः मरीजों को हमारी सलाह है कि उनकी किसी भी बीमारी में, जहाँ तक हो सके, वे निर्दोष वनस्पतियों से निर्मित एवं विपरीत तथा परवर्ती असर (Side Effect and After Effect) से रहित आयुर्वेदिक दवाओं के सेवन का ही आग्रह रखें। एलोपैथी के डॉक्टर स्वयं भी अपने अथवा अपने सम्बन्धियों के इलाज के लिए आयुर्वेदिक दवाओं का ही आग्रह रखते हैं।
आधुनिक विज्ञान कहता है कि गुर्दे अस्थि मज्जा () बनाने का कार्य भी करते हैं। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आज रक्त कैंसर की व्यापकता का कारण भी आधुनिक दवाओं का विपरीत एवं परवर्ती प्रभाव ही हैं।

हाथ पैर और शरीर का कांपना कारण और उपचार

किडनी विकृति के कारणः
आधुनिक समय में मटर, सेम आदि द्विदलो जैसे प्रोटीनयुक्त आहार का अधिक सेवन, मैदा, शक्कर एवं बेकरी की चीजों का अधिक प्रयोग चाय कॉफी जैसे उत्तेजक पेय, शराब एवं ठंडे पेय, जहरीली आधुनिक दवाइयाँ जैसे – ब्रुफेन, मेगाडाल, आइबुजेसीक, वोवीरॉन जैसी एनालजेसिक दवाएँ, एन्टीबायोटिक्स, सल्फा ड्रग्स, एस्प्रीन, फेनासेटीन, केफीन, ए.पी.सी., एनासीन आदि का ज्यादा उपयोग, अशुद्ध आहार अथवा मादक पदार्थों का ज्यादा सेवन, सूजाक (गोनोरिया), उपदंश (सिफलिस) जैसे लैंगिक रोग, त्वचा की अस्वच्छता या उसके रोग, जीवनशक्ति एवं रोगप्रतिकारक शक्ति का अभाव, आँतों में संचित मल, शारीरिक परिश्रम को अभाव, अत्यधिक शारीरिक या मानसिक श्रम, अशुद्ध दवा एवं अयोग्य जीवन, उच्च रक्तचाप तथा हृदयरोगों में लम्बे समय तक किया जाने वाला दवाओँ का सेवन, आयुर्वेदिक परंतु अशुद्ध पारे से बनी दवाओं का सेवन, आधुनिक मूत्रल (Diuretic) औषधियों का सेवन, तम्बाकू या ड्रग्स के सेवन की आदत, दही, तिल, नया गुड़, मिठाई, वनस्पति घी, श्रीखंड, मांसाहार, फ्रूट जूस, इमली, टोमेटो केचअप, अचार, केरी, खटाई आदि सब गुर्दा-विकृति के कारण है।
सामान्य लक्षणः



गुर्दे खराब होने पर निम्नांकित लक्षण दिखाई देते हैं-


हर प्रकार की खांसी और कफ की समस्या के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

आधुनिक विज्ञान के अनुसारः
आँख के नीचे की पलकें फूली हुई, पानी से भरी एवं भारी दिखती हैं। जीवन में चेतनता, स्फूर्ति तथा उत्साह कम हो जाता है। सुबह बिस्तर से उठते वक्त स्फूर्ति के बदले उबान, आलस्य एवं बेचैनी रहती है। थोड़े श्रम से ही थकान लगने लगती है। श्वास लेने में कभी-कभी तकलीफ होने लगती है। कमजोरी महसूस होती है। भूख कम होती जाती है। सिर दुखने लगता है अथवा चक्कर आने लगते हैं। कइयों का वजन घट जाता है। कइयों को पैरों अथवा शरीर के दूसरे भागों पर सूजन आ जाती है, कभी जलोदर हो जाता है तो कभी उलटी-उबकाई जैसा लगता है। रक्तचाप उच्च हो जाता है। पेशाब में एल्ब्यमिन पाया जाता है।
आयुर्वेद के अनुसारः
सामान्य रूप से शरीर के किसी अंग में अचानक सूजन होना, सर्वांग वेदना, बुखार, सिरदर्द, वमन, रक्ताल्पता, पाण्डुता, मंदाग्नि, पसीने का अभाव, त्वचा का रूखापन, नाड़ी का तीव्र गति से चलना, रक्त का उच्च दबाव, पेट में किडनी के स्थान का दबाने पर पीड़ा होना, प्रायः बूँद-बूँद करके अल्प मात्रा में जलन व पीड़ा के साथ गर्म पेशाब आना, हाथ पैर ठंडे रहना, अनिद्रा, यकृत-प्लीहा के दर्द, कर्णनाद, आँखों में विकृति आना, कभी मूर्च्छा और कभी उलटी होना, अम्लपित्त, ध्वजभंग (नपुंसकता), सिर तथा गर्दन में पीड़ा, भूख नष्ट होना, खूब प्यास लगना, कब्जियत होना – जैसे लक्षण होते हैं। ये सभी लक्षण सभी मरीजों में विद्यमान हों यह जरूरी नहीं।


मूत्राषय प्रदाह(cystitis)के सरल उपचार


गुर्दा रोग से होने वाले अन्य उपद्रवः
गुर्दे की विकृति का दर्द ज्यादा समय तक रहे तो उसके कारण मरीज को श्वास (दमा), हृदयकंप, न्यूमोनिया, प्लुरसी, जलोदर, खाँसी, हृदयरोग, यकृत एवं प्लीहा के रोग, मूर्च्छा एवं अंत में मृत्यु तक हो सकती है। ऐसे मरीजों में ये उपद्रव विशेषकर रात्रि के समय बढ़ जाते हैं।
आज की एलोपैथी में गुर्दो रोग का सरल व सुलभ उपचार उपलब्ध नहीं है, जबकि आयुर्वेद के पास इसका सचोट, सरल व सुलभ इलाज है।



आहारः

प्रारंभ में रोगी को 3-4 दिन का उपवास करायें अथवा मूँग या जौ के पानी पर रखकर लघु आहार करायें। आहार में नमक बिल्कुल न दें या कम दें। नींबू के शर्बत में शहद या ग्लूकोज डालकर 15 दिन तक दिया जा सकता है। चावल की पतली घेंस या राब दी जा सकती है। लौकी का जूस आधा गिलास देना शुरू करे। फिर जैसे-जैसे यूरिया की मात्रा क्रमशः घटती जाय वैसे-वैसे, रोटी, सब्जी, दलिया आदि दिया जा सकता है। मरीज को मूँग का पानी, सहजने का सूप, धमासा या गोक्षुर का पानी चाहे जितना दे सकते हैं। किंतु जब फेफड़ों में पानी का संचय होने लगे तो उसे ज्यादा पानी न दें, पानी की मात्रा घटा दें।
विहारः गुर्दे के मरीज को आराम जरूर करायें। सूजन ज्यादा हो अथवा यूरेमिया या मूत्रविष के लक्षण दिखें तो मरीज को पूर्ण शय्या आराम (Complete Bed Rest) करायें। मरीज को थोड़े परम एवं सूखे वातावरण में रखें। हो सके तो पंखे की हवा न खिलायें। तीव्र दर्द में गरम कपड़े पहनायें। गर्म पानी से ही स्नान करायें। थोड़ा गुनगुना पानी पिलायें।
औषध-उपचारः
गुर्दे के रोगी के लिए कफ एवं वायु का नाश करने वाली चिकित्सा लाभप्रद है। जैसे कि स्वेदन, वाष्पस्नान (Steam Bath), गर्म पानी से कटिस्नान (Tub Bath)।
रोगी को आधुनिक तीव्र मूत्रल औषधि न दें क्योंकि लम्बे समय के बाद उससे गुर्दे खराब होते हैं। उसकी अपेक्षा यदि पेशाब में शक्कर हो या पेशाब कम होता हो तो नींबू का रस, सोडा बायकार्ब, श्वेत पर्पटी, चन्द्रप्रभा, शिलाजीत आदि निर्दोष औषधियों या उपयोग करना चाहिए। गंभीर स्थिति में रक्त मोक्षण (शिरा मोक्षण) खूब लाभदायी है किंतु यह चिकित्सा मरीज को अस्पताल में रखकर ही दी जानी चाहिए।
सरलता से सर्वत्र उपलब्ध पुनर्नवा नामक वनस्पति का रस, काली मिर्च अथवा त्रिकटु चूर्ण डालकर पीना चाहिए। कुलथी का काढ़ा या सूप पियें। रोज 100 से 200 ग्राम की मात्रा में गोमूत्र पियें। पुनर्नवादि मंडूर, दशमूल, क्वाथ, पुनर्नवारिष्ट, दशमूलारिष्ट, गोक्षुरादि क्वाथ, गोक्षुरादि गूगल, जीवित प्रदावटी आदि का उपयोग दोषों एवं मरीज की स्थिति को देखकर बनना चाहिए।
   इस लेख के माध्यम से दी गयी जानकारी आपको अच्छी और लाभकारी लगी हो तो कृपया लाईक और शेयर जरूर कीजियेगा । आपके एक शेयर से किसी जरूरतमंद तक सही जानकारी पहुँच सकती है और हमको भी आपके लिये और बेहतर लेख लिखने की प्रेरणा मिलती है|
विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता बढ़ाने में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी एक केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -










इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-


रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl






हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl








जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 


सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 




 केस रिपोर्ट 2-

रोगी का नाम - Awdhesh 

निवासी - कानपुर 

ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट







दिनांक - 26/4/2016

Urea- 55.14   mg/dl

creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -




creatinine 1.34 
mg/dl

urea 22  mg/dl