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7.8.19

पित्तपापड़ा (गाजर घास)के औषधीय गुण और उपयोग





पित्तपापड़ा को सर्दियों में गेंहू और चने आदि के खेतों में आसानी से देखा जा सकता है | हमारे देश में इसे अलग – अलग प्रान्तों में अलग – अलग नामो से पुकारा जाता है | संस्कृत में इसे पर्पट , पांशु एवं कवच वाचक आदि नामो से पुकारा जाता है |
राजस्थान , हरियाणा और पंजाब में इसे गजरा घास या गाजर घास आदि नामों से जाना जाता है | हिंदी में इसे पितपापड़ा , शाहतरा एवं धमगजरा आदि कहा जाता है |


गुण – धर्म एवं रोग प्रभाव

पित्तपापड़ा का रस कटु एवं तिक्त होता है | गुणों में यह लघु एवं इसका वीर्य शीत होता है | पचने के बाद इसका विपाक कटु प्राप्त होता है | यह कफ एवं पित का शमन करने में कारगर होता है | सीके साथ ही मूत्रल, रक्तशोधन, रक्तपित शामक, दाहशामक, यकृदूतेजक एवं कामला, मूत्रकृच्छ, भ्रम और मूर्च्छा जैसी समस्याओं में लाभकारी होता है |
दोषों के हरण के लिए इसके पंचाग का इस्तेमाल किया जाता है | आयुर्वेद में इसके प्रयोग से षडंगपानीय, पर्पटादी क्वाथ , पञ्चतिक्त घृत आदि औषधियां तैयार की जाती है |
रक्तशोधक एवं टोक्सिन नाशक
पित्तपापड़ा रक्तशोधक होता है | यह दूषित रक्त हो शुद्ध करता है एवं शरीर से टोक्सिन को बाहर निकालता है | अंग्रेजी दवाइयों के इस्तेमाल से होने वाले साइड इफेक्ट्स को दूर करने के लिए पापड़ा का प्रयोग करना चाहिए | इसके इस्तेमाल से दवाइयों के गंभीर साइड इफेक्ट्स को भी कम किया जा सकता है |
ताजे पित्तपापड़ा को कुचल कर इसका दो चम्मच रस निकाल ले और कुच्छ दिनों तक नियमित सेवन करे , इससे रक्त शुद्ध होता है एवं साथ ही शरीर से टोक्सिन भी बाहर निकलते है | दवाइयों के साइड इफेक्ट्स में भी इसके रस का सेवन करना चाहिए |
पेट के कीड़े
पेट के कीड़ों में भी यह चमत्कारिक लाभ देता है | अगर पेट में कीड़े पड़ गए हो तो पितपापड़ा के साथ वाय – विडंग को मिलाकर इनका काढ़ा तैयार कर ले | इस काढ़े के सेवन से जल्द ही पेट के कीड़े नष्ट होने लगते है |भारत में यह 2600 मी की ऊँचाई तक पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड आदि प्रान्तों में गेहूँ के खेतों में पाया जाता है। चरक-संहिता के तृष्णानिग्रहण दशेमानि में इसका उल्लेख है तथा ज्वर, रक्तपित्त, दाह, कुष्ठ, मदात्यय, ग्रहण, पाण्डु, अतिसार आदि रोगों के प्रयोगों में इसकी योजना की गई है। सुश्रुत में भी पित्त प्रधान अतिसार की चिकित्सा में इसका प्रयोग किया गया है। पर्पट के संदर्भ में कहा गया है कि – एक पर्पटक श्रेष्ठ पित्त ज्वर विनाशन। अर्थात् पर्पट पित्तज्वर की श्रेष्ठ औषधि है।
यह 5-25 सेमी ऊँचा, हरित वर्ण का, चमकीले, कोमल शाखाओं से युक्त, वर्षायु शाकीय पौधा होता है।
आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव
पर्पट कटु, तिक्त, शीत, लघु; कफपित्तशामक तथा वातकारक होता है।
यह संग्राही, रुचिकारक, वर्ण्य, अग्निदीपक तथा तृष्णाशामक होता है।
पर्पट रक्तपित्त, भम, तृष्णा, ज्वर, दाह, अरुचि, ग्लानि, मद, हृद्रोग, भम, अतिसार, कुष्ठ तथा कण्डूनाशक होता है।
लाल पुष्प वाला पर्पट अतिसार तथा ज्वरशामक होता है।
पर्पट का शाक संग्राही, तिक्त, कटु, शीत, वातकारक, शूल, ज्वर, तृष्णाशामक तथा कफपित्त शामक होता है।
इसमें आक्षेपरोधी प्रभाव दृष्टिगत होता है।



प्रयोग मात्रा एवं विधि

पर्पट स्वरस का नेत्रों में अंजन करने से नेत्र के विकारों का शमन होता है।
पर्पट का काढ़ा बनाकर गरारा करने से मुख दौर्गन्ध्य तथा दंतशूल आदि विकारों का शमन होता है।
गण्डमाला-पर्पट पञ्चाङ्ग को पीसकर गले में लगाने से गण्डमाला (गले की गाँठ) में लाभ होता है।
कास-10-20 मिली पर्पट क्वाथ को पीने से दोषों का पाचन होकर विबन्ध, पित्तज कास तथा प्रतिश्याय (जुकाम) में लाभ होता है।
ज्वर में पितपापड़ा का उपयोग
गर्मी के कारण बुखार हो तो पित्तपापड़ा , गिलोय एवं तुलसी को मिलाकर इसका काढा बना ले | गर्मी जन्य बुखार में लाभ मिलेगा |
पितज्र में पापड़ा, आंवला और गिलोय इन तीनो का क्वाथ तैयार कर के इस्तेमा करने से लाभ मिलेगा |
अगर बुखार सर्दी के कारण है तो पित्तपापड़ा के साथ कालीमिर्च मिलकर इसका काढ़ा तैयार करे जल्द ही सर्दी के कारण आई बुखार उतर जायेगी |


तृष्णा

बार – बार प्यास लगती अर्थात तृष्णा से पीड़ित हो तो पित्तपापड़ा, रक्त चन्दन, नागरमोथा और खस इन तीनो का चूर्ण बना ले और इसमें मिश्री मिलाकर इसकी चटनी तैयार करले | इसका इस्तेमाल करने से तृष्णा खत्म होती है |
गर्भावस्था जन्य विकार
पित्तपापड़ा, अतिस, सुगंधबाला, धनिया, गिलोय, नागरमोथा, खस, जवासा, लज्जालु, रक्तचन्दन और खिरैटी – इन सबका काढ़ा बनाकर पीने से गर्भावस्था जन्य सभी विकार दूर होते है |छर्दि (उलटी)-
10-20 मिली पर्पट क्वाथ में मधु मिलाकर सेवन करने से उल्टी बंद होती है।
अतिसार-समभाग नागरमोथा तथा पित्तपापड़ा के 50 ग्राम चूर्ण को 3 लीटर जल में, आधा शेष रहने तक पका कर शीतल कर 10-20 मिली मात्रा में पीने से तथा भोजन में प्रयोग करने से आमपाचन होता है तथा अतिसार का शमन होता है।
कृमिरोग-
पित्तपापड़ा तथा विडंग का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पिलाने से उदरकृमि नष्ट होते हैं।
यकृत्-विकार-
2-4 ग्राम पर्पट पञ्चाङ्ग चूर्ण के सेवन से यकृत् की कार्य क्षमता बढ़ती है तथा खून की कमी आदि व्याधियों का शमन होता है।
मूत्रकृच्छ्र-
10-20 मिली पञ्चाङ्ग क्वाथ का सेवन करने से मूत्र की वृद्धि होकर मूत्र मार्गगत विकृति तथा मूत्र त्याग के समय होने वाले कष्ट का शमन होता है।
फिरंग-
फिरंगजन्य व्रण पर पर्पट-स्वरस का लेप करने से घाव शीघ्र भर जाता है।
वातरक्त-
10-20 मिली पर्पट पञ्चाङ्ग क्वाथ का सेवन करने से वातरक्त (गठिया) में लाभ होता है।
इन्फेक्शन अर्थात संक्रमण
पित्तपापड़ा सभी प्रकार के इन्फेक्शन को ठीक करता है | जैसे अगर शरीर के अन्दर कोई इन्फेक्शन है या कोई घाव है तो इसका प्रयोग क्वाथ के रूप में करे | लीवर, किडनी, फेफड़े आदि के संक्रमण एवं आंतरिक घाव को भरने में भी यह चमत्कारिक परिणाम देता है | इन सभी में पित्तपापड़ा के काढ़ेका इस्तेमाल करना चाहिए |
एसिडिटी जैसी समस्याओं में ताजे धमगजरा को दांतों से कुचल कर खाने से तुरंत आराम मिलता है , साथ ही दांतों एवं मसूड़ों के सुजन में भी आराम मिलता है |हथेली की दाह-
5 मिली पर्पट पत्र-स्वरस का सेवन करने से हथेली की जलन मिटती है।
कण्डू (खुजली)-
पित्तपापड़ा का अवलेह बनाकर 5 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से कण्डू का शमन होता है।
मदात्यय-
नागरमोथा तथा पित्तपापड़ा का षडङ्गपानीयविधि से बनाए गए क्वाथ को 10-20 मिली मात्रा में पीने से मदात्यय (अधिक मात्रा में मदिरापान से उत्पन्न रोग) का शमन होता है।
अपस्मार-
10-20 मिली पर्पट-क्वाथ का सेवन करने से अपस्मार जन्य आक्षेपों, प्रमेह, पित्तज्ज्वर का शमन होता है।
ज्वर-पित्तपापड़ा के 10-20 मिली क्वाथ में 500 मिग्रा सोंठ चूर्ण मिलाकर अथवा पित्तपापड़ा तथा अगस्त पुष्प के 10-20 मिली क्वाथ में 500 मिग्रा सोंठ मिला कर सेवन करने से ज्वर का शमन होता है।
समभाग नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, लाल चंदन, सुंधबाला तथा सोंठ चूर्ण को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनायें, 10-20 मिली क्वाथ को पीने से ज्वर तथा ज्वर के कारण उत्पन्न तृष्णा, दाह तथा स्वेदाधिक्य का शमन होता है।


* समभाग गुडूची, आँवला तथा पित्तपापड़ा अथवा केवल पित्तपापड़ा से निर्मित 10-20 मिली क्वाथ का सेवन करने से दाह तथा भमयुक्त पित्तज्वर का शमन होता है।

*समभाग गुडूची, हरीतकी तथा पर्पट का क्वाथ बनाकर 20-30 मिली मात्रा में सेवन करने से पित्तज्वर में लाभ होता है।
* पित्तपापड़ा से निर्मित क्वाथ (10-20 मिली) अथवा पित्तपापड़ा, लाल चंदन, सुंधबाला तथा सोंठ का क्वाथ (10-20 मिली) अथवा चंदन, खस, सुंधबालायुक्त तथा पित्तपापड़ा से निर्मित क्वाथ (10-20 मिली) का सेवन करने से पित्तजज्वर का शमन होता है।
* समभाग द्राक्षा, पित्तपापड़ा, अमलतास, कुटकी, नागरमोथा तथा हरीतकी का क्वाथ बनाकर (10-30 मिली क्वाथ) सेवन करने से मल का भेदन होता है तथा शोष, स्वेदाधिक्य तृष्णा, रक्तपित्त, भान्ति एवं वेदनायुक्त पित्तज्वर में लाभ होता है।
* समभाग गुडूची, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, चिरायता तथा सोंठ का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से वात-पित्तज्वर का शमन होता है।
* जवासा, मेंहदी, चिरायता, कुटकी, वासा तथा पित्तपापड़ा के 10-20 मिली क्वाथ में शर्करा मिला कर पीने से तृष्णा, दाह तथा रक्तपित्त युक्त पित्तज्वर में लाभ प्राप्त होता है।
* समभाग खस, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, सोंठ तथा श्रीखण्ड चंदन से निर्मित क्वाथ का सेवन करने से पित्त ज्वर का शमन होता है।
*पर्पट, वासा, कुटकी, चिरायता, जवासा तथा प्रियंगु आदि द्रव्यों से निर्मित (10-20 मिली) क्वाथ में एक तोला शर्करा मिलाकर पान करने से अत्यधिक तृष्णा, दाह तथा रक्तपित्त युक्त ज्वर में लाभ होता है।
*पर्पट, नागरमोथा, गुडूची, शुण्ठी तथा चिरायता इन द्रव्यों का क्वाथ बनाकर (10-20 मिली क्वाथ) सेवन करने से वातपित्तजयुक्त ज्वर में लाभ होता है।
सर्वांग शूल-

1 ग्राम बीज चूर्ण अथवा 10-20 मिली क्वाथ को पीने से सर्वांङ्गशूल (वेदना) का शमन होता है।
पित्तपापड़ा के (10 मिली) स्वरस का शर्बत बनाकर पिलाने से दाह का शमन होता है।
*ताजे पर्पट के पत्र-स्वरस को बर्रे और मधुमक्खी के डंक स्थान पर लगाने से वेदना, दाह आदि का शमन होता है।
प्रयोज्याङ्ग : पञ्चाङ्ग।
मात्रा : क्वाथ-10-30 मिली, स्वरस-5-10 मिली, चूर्ण-1-3 ग्राम, कल्क-2-4 ग्राम या चिकित्सक के परामर्शानुसार।


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