21.8.16

ब्राम्ही के फायदे ,उपयोग ,उपचार Health benefits of hydrocotyle asiatica



ब्राह्मी (वानस्पतिक नाम :Bacapa monnieri) का एक औषधीय पौधा है जो भूमि पर फैलकर बड़ा होता है। इसके तने और पत्तियाँ मुलामय, गूदेदार और फूल सफेद होते है। यह पौधा नम स्‍थानों में पाया जाता है, तथा मुख्‍यत: भारत ही इसकी उपज भूमि है। इसे भारत वर्ष में विभिन्‍न नामों से जाना जाता है जैसे हिन्‍दी में सफेद चमनी, संस्‍कृत में सौम्‍यलता, मलयालम में वर्ण, नीरब्राम्‍ही, मराठी में घोल, गुजराती में जल ब्राह्मी, जल नेवरी आदि तथा इसका वैज्ञानिक नाम बाकोपा मोनिएरी है।
Brahmi का पौधा हिमालय की तराई में हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण के मार्ग में अधिक मात्रा में पाया जाता है। जो बहुत उत्तम किस्म का होता है। ब्राह्मी पौधे का तना जमीन पर फैलता जाता है। जिसकी गांठों से जड़, पत्तियां, फूल और बाद में फल भी लगते हैं। इसकी पत्तियां स्वाद में कड़वी और काले चिन्हों से मिली हुई होती है। ब्राह्मी के फूल छोटे, सफेद, नीले और गुलाबी रंग के होते हैं। ब्राह्मी के फलों का आकार गोल लम्बाई लिए हुए तथा आगे से नुकीलेदार होता है जिसमें से पीले और छोटे बीज निकलते हैं। ब्राह्मी की जड़ें छोटी और धागे की तरह पतली होती है। इसमें गर्मी के मौसम में फूल लगते हैं। जहां नदी, नाले और नहरों की बहुलता होगी, वहां इसे अध्कि मात्रा में उपलब्ध् किया जा सकता है। जडी-बूटी की पहचान न होने के कारण लोग कभी-कभी मण्डूकपर्णी को भी ब्राह्मी समझ बैठते है। जबकि उसके गुण र्ध्म बिल्कुल पृथक है। इसकी पत्तियाँ एक इंच अथवा इंच के चौथाई भाग तक चौडी गोलाकार होती है। फलों का रंग नीला अथवा हल्का गुलाबी होता है। पफलों की आकृति गोल और अग्रभाग नुकीला रहता है। गर्मी के दिनों में फल और बाद में पफलित होती है। औषध्यि दृष्टि से पूरा पंचाग ;जड, तना, पत्ती, फल और पफलद्ध ही प्रयुक्त होता है।
Brahmi के पत्ते पतले, पुष्प सफेद अथवा नीले और स्वाद में कडवापन होता है। जबकि मण्डूकपर्णी के फूल लाल तीखा स्वाद होता है और सूखने के बाद उसकी औषधीय विशेषताएँ प्रायः नष्ट हो जाती है। ब्राह्मी को सुखाकर भी पाउडर के रूप में उतना ही उपयोगी माना जाता रहा है। एक वर्ष की अवधि तक इसका पूर्ण प्रयोग किया जा सकता है।
यह पूर्ण रूपेण औषधीय पौधा है। यह औषधि नाडि़यों के लिये पौष्टिक होती है। कब्‍ज को दूर करती है। इसके पत्‍ते के रस को पेट्रोल के साथ मिलाकर लगाने से गठिया दूर करती है। ब्राह्मी में रक्‍त शुद्ध करने के गुण भी पाये जाते है। यह हृदय के लिये भी पौष्टिक होता है।
*मिर्गी (अपस्मार) होने पर :-14 से 28 मिलीलीटर ब्राह्मी की जड़ का रस या 3 से 6ग्राम चूर्ण को दिन में3 बार 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ लेने से मिर्गी का रोग ठीक हो जाता है।
*धातु क्षय (वीर्य का नष्ट होना) :-15 ब्राह्मी के पत्तों को दिन में 3 बार सेवन करने से वीर्य के रोग का नष्ट होना कम हो जाता है।
*आंखों की बीमारी में :-3 से 6 ग्राम ब्राह्मी के पत्तों को घी में भूनकर सेंधानमक के साथ दिन में 3 बार लेने से आंखों के रोग में लाभ होता है।
*आंखों का कमजोर होना :-3 से 6 ग्राम ब्राह्मी के पत्तों का चूर्ण भोजन के साथ लेने से आंखों की कमजोरी दूर हो जाती है।
*स्मरण शक्ति वर्द्धक :
 10 मिलीलीटर सूखी ब्राह्मी का रस, 1 बादाम की गिरी, 3 ग्राम कालीमिर्च को पानी से पीसकर 3-3 ग्राम की टिकिया बना लें। इस टिकिया को रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ रोगी को देने से दिमाग को ताकत मिलती है।
*3 ग्राम ब्राह्मी, 3 ग्राम शंखपुष्पी, 6 ग्राम बादाम गिरी, 3 ग्राम छोटी इलायची के बीज को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को थोड़े-से पानी में पीसकर, छानकर मिश्री मिलाकर पीने से खांसी, पित्त बुखार और पुराने पागलपन में लाभ मिलता है।



*ब्राह्मी के ताजे रस और बराबर घी को मिलाकर शुद्ध घी में 5 ग्राम की खुराक में सेवन करने से दिमाग को ताकत प्रदान होती है।”
*
नींद को कम करने के लिए :-*ब्राह्मी के 3 ग्राम चूर्ण को गाय के आधा किलो कच्चे दूध में घोंटकर छान लें। इसे 1 सप्ताह तक सेवन करने से लाभ पहुंचता है।
*5-10 मिलीलीटर ताजी ब्राह्मी के रस को 100-150 ग्राम कच्चे दूध में मिलाकर पीने से लाभ होता है।”
*
पागलपन (उन्माद) में :-*6 मिलीलीटर ब्राह्मी का रस, 2 ग्राम कूठ का चूर्ण और 6 ग्राम शहद को मिलाकर दिन में 3 बार पीने से पुराना उन्माद कम हो जाता है। 3 ग्राम ब्राह्मी, 2 पीस कालीमिर्च, 3 ग्राम बादाम की गिरी, 3-3 ग्राम मगज के बीज तथा सफेद मिश्री को25 गाम पानी में घोंटकर छान लें, इसे सुबह और शाम रोगी को पिलाने से पागलपन दूर हो जाता है।
*3 ग्राम ब्राह्मी के थोड़े से दाने कालीमिर्च के पानी के साथ पीसकर छान लें। इसे दिन में3 से 4 बार पिलाने से भूलने की बीमारी से छुटकारा मिलता है।
*ब्राह्मी के रस में कूठ के चूर्ण और शहद को मिलाकर चाटने से पागलपन का रोग ठीक हो जाता है।
*ब्राह्मी की पत्तियों का रस तथा बालवच, कूठ, शंखपुष्पी का मिश्रण बनाकर गाय के पुराने घी के साथ सेवन करने से पागलपन का रोग दूर हो जाता है।”
*
बालों के लिए : –100 ग्राम ब्राह्मी की जड़, 100 ग्राम मुनक्का और 50 ग्राम शंखपुष्पी को चौगुने पानी में मिलाकर रस निकाल लें। इस रस का सेवन करने से बालों के सभी रोग दूर हो जाते हैं।
*
पेशाब करने में कष्ट होना (मूत्रकृच्छ) :-ब्राह्मी के 2 चम्मच रस में, 1 चम्मच मिश्री मिलाकर सेवन करने से पेशाब करने की रुकावट दूर हो जाती है।
जलन :-
5 ग्राम ब्राह्मी के साथ धनिया मिलाकर रात को भिगो दें। इसे सुबह पीसकर,छानकर मिश्री के साथ मिलाकर पीने से जलन शांत हो जाती है।
*
उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) :-ब्राह्मी के पत्तों का रस एक चम्मच की मात्रा में आधे चम्म्च शहद के साथ लेने से उच्च रक्तचाप ठीक हो जाता है।
*
कब्ज (Constipation):- ब्राह्मी में पाये जाने वाले औषधीय गुण कब्ज की परेशानी को दूर करने में मदद करते हैं। नियमित रूप से ब्राह्मी का सेवन करने से पुरानी से पुरानी कब्ज की परेशानी दूर हो जाती है। इसके अलावा ब्राह्मी में कई रक्तशोधक गुण भी होते हैं, जो पेट से संबंधित समस्या से बचाव करते हैं।
*
अनिद्रा (Insomnia):- जो व्यक्ति को अनिद्रा की समस्या से परेशान हैं, उन्हें ब्राह्मी इस्तेमाल करना चाहिए। रोजाना सोने से एक घंटा पहले एक गिलास दूध में एक चम्मच ब्राह्मी चूर्ण मिलाकर पीने से व्यक्ति तनावमुक्त होता है और नींद अच्छी आती है।
*इसके सेवन से शरीर की शक्ति का क्षरण तो रूकता ही है पर मस्तिष्क की क्षमता में अप्रत्याशित अभिवृद्धि होने लगती है। Brahmi के घटक स्नायुकोषों का परिपोषण तो करते ही है साथ ही स्फूर्ति प्रदान करने का प्रयोग भी पूरा होता है। विद्युतीय स्फुरणों से स्नायु कोषों की उत्तेजना कम होती और मिर्गी रोग स्वतः ही भागने लगता है।बोलने में हकलाने और अध्कि बोलने से स्वर भंग होने में ब्राह्मी का सेवन ही लाभकारी सिद्ध होता है।
*
उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure):- ब्राह्मी में मौजूद औषधीय गुण रक्तचाप को संतुलित रखते हैं। यदि कोई व्यक्ति उच्च रक्तचाप की वजह से परेशान है तो उसे ब्राह्मी की ताजी पत्तियों का रस शहद में मिलाकर पीना चाहिए। ऐसा करने से रक्तचाप नियंत्रण में रहता है।
*
निद्राचारित या नींद में चलना :-ब्राह्मी, बच और शंखपुष्पी इनको बराबर मात्रा में लेकर ब्राह्मी के रस को 12 घंटे छाया में सुखाकर और 12 घंटे धूप में रखकर पूरी तरह से सुखाकर इसका चूर्ण तैयार कर लें। लगभग 480 मिलीग्राम से 960 मिलीग्राम सुबह और शाम को समान मात्रा में घी और शहद के साथ मिलाकर नींद में चलने वाले रोगी को देने से उसका स्नायु तंत्र मजबूत हो जाता है। इसका सेवन करने से नींद में चलने का रोग दूर हो जाता है।
*
वीर्य रोग : -ब्रह्मी, शंखपुष्पी, खरैटी, ब्रह्मदंडी तथा कालीमिर्च को पीसकर खाने से वीर्य रोग दूर होकर शुद्ध होता है।
*
अवसाद उदासीनता सुस्ती :-लगभग 10 ग्राम ब्राह्मी (जलनीम) का रस या लगभग480 से 960मिलीग्राम चूर्ण को लेने से उदासीनता, अवसाद या सुस्ती दूर हो जाती है।
*
बुद्धिवैकल्प, बुद्धि का विकास कम होना : -ब्राह्मी, घोरबच (बच), शंखपुष्पी को बराबर मात्रा में लेकर ब्राह्मी रस में तीन भावनायें (उबाल) देकर छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें और रोजाना 1 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम को असमान मात्रा में घी और शहदके साथ मिलाकर काफी दिनों तक चटाने से बुद्धि का विकास हो जाता है।
*
मूत्ररोग :-4 मिलीलीटर ब्राह्मी के रस को शहद के साथ चाटने से मूत्ररोग में लाभ होता है।
*
दिल की धड़कन :-20 मिलीलीटर ताजी ब्राह्मी का रस और 5 ग्राम शहद को मिलाकर रोजाना सेवन करने से दिल की कमजोरी दूर होकर तेज धड़कन भी सामान्य हो जाती है।
*गुल्यवायु हिस्टीरिया :-
10-10 ग्राम ब्राह्मी और वचा को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाकर सुबह और शाम 3-3 ग्राम की मात्रा में त्रिफला के जल से खाने पर हिस्टीरिया के रोग में बहुत लाभ होता है।
*
खांसी और बुखार (Cold and Fever):- ब्राह्मी, शंखपुष्पी, बादाम, छोटी या सफ़ेद इलायची चूर्ण एक समान मात्रा में लेकर पानी में घोलकर छान लें। इस पानी में मिश्री मिलाकर रोजाना सुबह- शाम आधा- आधा गिलास पीएं। इससे खांसी, जुकाम, बुखार आदि से राहत मिलती है।
*महर्षि चरक ने Brahmi को मानसिक दुर्बलता के कारण उत्पन्न रोगों की रामबाण औषधि घोषित किया है। मनोबल की कमी से ही तो मिरगी रोग की उत्पत्ति होती है। सुश्रुत संहिता में भी कुछ इसी तरह के तथ्यों का उल्लेख है। मानसिक विकृति के कारण ही तो नाडी दौर्बल्य, उन्माद, अप्रसार एवं स्मरण शक्ति के लोप होने लगता है। इसलिए तो ब्राह्मी को एक प्रकार का नर्वटॉनिक भी माना गया है। Brahmi के सूखे चूर्ण को मानसिक तनाव और घबराहट मिटती और अवसाद की प्रवृत्ति समाप्त होती है।



बालों की समस्या (Hair Problem):- यदि आप बालों से जुड़ी किसी समस्या से परेशान है तो पंचांग चूर्ण (ब्राह्मी के पांच भागों का चूर्ण) का एक चम्मच की मात्रा में रोजाना सेवन करने से बालों का झड़ना, रूसी, कमजोर बाल आदि परेशानी दूर होती हैं।
मिर्गी (अपस्मार) : -
*ब्राह्मी का रस शहद के साथ मिलाकर खाने से मिर्गी का रोग ठीक हो जाता है।
*मिर्गी के रोग में ब्राह्मी (जलनीम) से निकाले गये घी का सेवन करने से लाभ होता है।
ब्राह्मी, कोहली, शंखपुष्पी, सांठी, तुलसी और शहद को मिलाकर मिर्गी के रोगी को पिलाने से मिर्गी से छुटकारा मिल जाता है।”
ब्राह्मी का तीन ग्राम चूर्ण गौ दुग्ध् के साथ प्रतिदिन लेने से बीस-पच्चीस पत्तों को गाय के दूध् में उबालकर हर रोज लेने से अनिद्रा रोग सदा के लिए भाग खडा होता है।
*मिरगी के दौरों में आध चम्मच ब्राह्मी स्वरस मधु के साथ लेने से रोग से राहत मिलती है। स्वरस के स्थान पर चूर्ण का भी सेवन किया जा सकता है।
कभी-कभी शरीर कुष्ट तथा अन्यान्य प्रकार के क्षय रोगों का शिकार बन दुर्बलता के शिकंजे में कसता चला जाता है। ऐसी स्थिति में तेल की तरह ब्राह्मी का लेपन भी कापफी आराम दायक होता है।
*खाँसी तथा क्षय रोग में भी ब्राह्मी का लेपन से रोगोपचार की प्रक्रिया सफल होती है।
आंत भारी तो मॉथ भारी यानी पेट की कब्ज से रक्त विकार उत्पन्न होते और हृदयघात जैसी दुर्बलता सामने आती है।
*ब्राह्मी स्वरस में काली मिर्च मिलाकर खाने से पाचन संस्थान मजबूत होता तथा *विभिन्न प्रकार के विष और ज्वर में शीघ्र लाभ पहुँचता है।
प्रारम्भ में शरीर और मन को शक्ति और स्फर्ति प्रदान करने वाला यह टॉनिक अब आत्मबल बढाने में भी बडा सहायक सिद्व हो रहा है।
*स्मरण शक्ति के कमजोर तथा मंदबुद्वि होने पर इसका स्वरस और चूर्ण जल अथवा मिश्री के साथ लेने का विधन है।
*इसकी मालिश करने से भी मस्तिष्क की खुश्की मिटती और मेध संवर्धन का सदुद्देश्य पूरा होता है।
*मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए तो उसका प्रयोग ठण्डाई में भी करते है।
*हृदय की समस्या (Heart Disease):-
ब्राह्मी में ब्राहमीन एल्केलाइड (Brahmin Alkaloid) गुण मौजूद होता है, जो हृदय यानि दिल के लिए फायदेमंद साबित होता है। यदि ब्राह्मी का नियमित रुप से सेवन किया जाए तो सारी उम्र हृदय यानि दिल से जुड़ी बीमारी नहीं हो सकती।
*
मिर्गी के दौरे (Epilepsy Disease):- मिर्गी की बीमारी होने पर रोगी को ब्राह्मी की जड़ का रस या या ब्राह्मी चूर्ण का सेवन दिन में 3 दूध के साथ करवाएं। ऐसा करने से रोगी को लाभ मिलेगा और मिर्गी के दौरे आना बंद हो जाएंगे।
खसरा : -
ब्राह्मी के रस में शहद मिलाकर पिलाने से खसरा की बीमारी समाप्त होती है।
*बलगम :-
बालकों के सांस और बलगम में ब्राह्मी को थोड़ा-सा गर्म करके छाती पर लेप करने से लाभ होता है।
*पीनस :-
मण्डूकपर्णी की जड़ को नाक से लेने से पीनस (पुराना जुकाम) के रोग में लाभ होता है।
*दांतों के दर्द: -
दांतों में तेज दर्द होने पर एक कप पानी को हल्का गर्म करें। फिर उस पानी में 1 चम्मच ब्राह्मी डालकर रोजाना दो बार कुल्ला करें। इससे दांतों के दर्द में आराम मिलता है।
*हकलाना, तुतलाना :
-ब्राह्मी घी 6 से 10 ग्राम रोजाना सुबह-शाम मिश्री के साथ खाने से तुतलाना (हकलाना) ठीक हो जाता है।
*कमजोरी :-
40 मिलीलीटर केवांच की जड़ का काढ़ा सुबह-शाम सेवन करने से स्नायु की कमजोरी मिट जाती है। इसके जड़ का रस अगर 10-20 मिलीलीटर सुबह-शाम लिया जाए तो भी कमजोरी में लाभ होता है।



*एड्स : -ब्राह्मी नामक बूटी का रस 5 से 10 मिलीलीटर अथवा चूर्ण 2 ग्राम से 5 ग्राम सुबह शाम देने से एड्स में लाभ होता है क्योंकि यह गांठों को खत्म करता है और शरीर के अंदर गलने को रोकता है। निर्धारित मात्रा से अधिक लेने से चक्कर आदि आ सकतेहैं।
*दांत दर्द (Tooth Ache):-
ब्राह्मी का इस्तेमाल, दांत दर्द जैसी परेशानी में भी किया जाता है। आधा गिलास पानी में आधा चम्मच ब्राह्मी डालकर गर्म करके रख लें। इस पानी से रोजाना दिन में दो बार कुल्ला करें। ऐसा करने से दांतों के दर्द से छुटकारा मिलता है।
*एंटीऑक्सीडेंट (Antioxidant):-
ब्राह्मी का उपयोग बौद्धिक विकास बढ़ाने के लिए प्राचीनकाल से किया जा रहा है। ब्राह्मी में कई एंटीऑक्सीडेंट गुण मौजूद होते हैं इसलिए ब्राह्मी रस या इसके 7 पत्तों का रोजाना सेवन करना चाहिए।
*ब्राह्मी क्वाथ को पिलाने के पीछे एक ही उद्देश्य रहा कि आत्मबल अर्थात ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति होती है । हमारी दृष्टि में Brahmi का एक रासायनिक घटक हर्सेपोनिन सीधे पीनियल ग्रन्धि को प्रभावित करके सिरॉटानिन नामक स्नायु रसायन का उत्सर्जन करता है जो साध्ना की सपफलता का रहस्य भी यही है और आत्म बल सम्पन्न सपफल जीवन जीने की रीति-नीति भी। स्मृति, मेध और प्रतिभा के प्रमापन के लिए प्रयोगशाला भी बनाई थी जिसमें साध्ना काल में अनेकानेक तरह के उत्साहवर्धक परिणाम भी मिले।
*एकाग्रता बढ़ाए
(Increase Concentration):- एकाग्रता की कमी के कारण अक्सर बच्चों का ध्यान पढ़ाई से दूर भागता है। ऐसे में दूध के साथ ब्राह्मी चूर्ण का रोजाना सेवन करने से बच्चों में एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है, जिसके फलस्वरूप बच्चों का मन पढ़ाई में लगने लगता है।
*कार्यक्षमता बढ़ाए
(Increase Efficiency):- ब्राह्मी का सबसे ज्यादा प्रभाव मुख्य रूप से मस्तिष्क पर होता है। यह मस्तिष्क के लिए एक चमत्कारी औषधि है, मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करती है। लगातार काम करने से थकावट हो जाने पर कार्यक्षमता अक्सर कम हो जाती है। इससे बचने के लिए ब्राह्मी रस या ब्राह्मी चूर्ण का सेवन करना चाहिए। ऐसा करने से मानसिक तनाव, थकावट या सुस्ती कम होती है और कार्य क्षमता बढ़ती है।
ब्राह्मी की ताजा अवस्था का प्रयोग तो सर्वोत्तम है। कहीं उपलब्ध नहीं हो तो सुखाकर पाउडर के स्वरूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
मात्रा : 1 से 3 चम्मच ब्राह्मी के पत्तों का रस, ताजी हरी पत्तियां 10 तक सुखाया हुआ बारीक चूर्ण 1 से 2ग्राम तक, पंचांग (फूल, फल, तना, जड़ और पत्ती) चूर्ण 3 से 5 ग्राम तक और जड़ के चूर्ण का सेवन आधे से 2 ग्राम तक करना चाहिए।

16.7.16

एलोवेरा के गुण ,लाभ, उपचार Benefits of Aloe Vera




हमारे आस पास तमाम ऐसी वनस्पतियां पाई जाती हैं जिनमें औषधीय गुण मिलते हैं। समझ और सजगता का अभाव होने के कारण इनका सही प्रयोग नहीं हो पाता। इन्हीं वस्पतियों में घृतकुमारी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। आयुर्वेद में इसे ग्वारपाठा, घी कुंवारा, स्थूलदला, कुमारी आदि नामों से इसे जाना जाता है। घृतकुमारी के पत्तों का इस्तेमाल यकृत विकार, आमवात, कोष्ठबद्धता, बवासीर, स्त्रियों के अनियमित मासिक चक्र और मोटापा घटाने के साथ ही चर्म रोग में भी लाभकारी होता है। घृतकुमारी सभी स्थानों पर पूरे वर्ष सुगमता से मिलता है। इसके गूदे में लौह, कैल्शियम, पोटैशियम एवं मैग्नीशियम पाया जाता है।एलोवेरा विवेचन निम्न प्रकार है-

पीलिया रोग


1. पीलिया रोग से ग्रसित रोगी के लिए एलोवीरा एक रामबाण औषधि है। 15 ग्राम एलोवेरा का रस सुबह शाम पीयें। आपको इस रोग में फायदा मिलेगा। मूत्र संबंधी रोग हो या गुर्दों की समस्या हो तो एलोवेरा आपको फायदा पहुंचाता है। एलोवेरा का गूदा या रस का सेवन करें।

चेहरा सुंदर और चमकदार

2. एलोवेरा का गूदा चेहरे पर लगाने से चेहरा सुंदर और चमकदार बन जाता है। पुरूष हो चाहे स्त्री दोनों को एलोवेरा का पेस्ट चेहरे पर लगाना चाहिए। यह पूर्णरूप से प्राकृतिक क्रिम है। यदि सिर में दर्द हो तो आप हल्दी में 10 ग्राम एलोवेरा मिलाकर सिर पर इसका लेप लगाएं एैसा करने से सिर दर्द में राहत मिलती है। और ताजगी का अहसास होता है।

मोटापा

3. एलोवेरा मोटापा कम करने में फायदा करता है। 10 ग्राम एलोवेरा के रस में मेथी के ताजे पत्तों को पीसकर उसे मिलाकर प्रतिदिन सेवन करें या 20 ग्राम एलोवेरा के रस में 4 ग्राम गिलोय का चूर्ण मिलाकर 1 महिने तक सेवन करने से मोटापे से राहत मिलती है।

प्राकृतिक कंडीशनर

4. यह एक तरह का प्राकृतिक कंडीशनर है। एलोवेरा को बालों पर 20 मिनट तक उंगलियों के जरिए बालों पर लगाते रहें। और थोड़ी देर में पानी से बालों को धों लें। यह बालों को सुदंर, घना और आकर्षक बनाता है। चेहरे की झुर्रियों को दूर करने में आप एलोवेरा का गूदा कच्चे दूध के साथ मिलाकर चेहरे पर मलें। यह झुर्रियों को खत्म करके चेहरे कांतिमान बनाता है।

डायबिटीज की समस्या

5. डायबिटीज की समस्या से परेशान हैं तो 10 ग्राम एलोवेरा के रस में 10 ग्राम करेले का रस मिलाकर कुछ दिनों तक सेवन करने से डायबिटीज से मुक्ति मिलती है। 20 ग्राम आंवले के रस में 10 ग्राम एलोवेरा के गूदे को मिलाकर प्रतिदिन सुबह सेवन करें। यह शूगर की बीमारी को दूर करेगा।

6. आग से शरीर का कोई अंग जल या झुलस गया हो तो आप एलोवेरा का गूदा उस जगह पर लगाएं आपको जलन से राहत मिलेगी और घाव भी जल्दी ठीक होगा।
7. सर्दी, जुकाम या खांसी होने पर शहद में 5 ग्राम एलोवेरा के ताजे रस में मिलाकर सेवन करें आपको फायदा होगा। शरीर में कैल्शियम की कमी हो तो एलोवेरा के गूदे का सेवन जरूर करें ।

बवासीर
8. बवासीर में यदि खून ज्यादा बहता हो तो एलोवेरा के पत्तों का सेवन 25-25 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम करते रहें। बवासीर के मस्से खत्म करने के लिए एलोवेरा के गूदे में नीम की पत्तियों को जलाकर उसका राख मिला लें और इस पेस्ट को मलद्वार पर बांध लें।

9. खुजली, मुंहासों और फुंसी होने पर डेली 10 से 15 ग्राम एलोवेरा का रस पीना चाहिए यह खून को शु़द्ध करता है और चेहरे से मुंहासों को भी हटा देता है। दाद होने पर 10 ग्राम अनार के रस में 10 ग्राम एलोवेरा रस मिलाकर दाद वाली जगह पर लगाने से दाद ठीक हो जाते हैं।

10. पेट संबंधी कोई भी बीमारी हो तो आप 20 ग्राम एलोवेरा के रस में शहद और नींबू मिलाकर उसका सेवन करें। यह पेट की बीमारी को दूर तो करता ही है साथ ही साथ पाचन शक्ति को भी बढ़ाता है।

आजकल किडनी रोग की समस्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में एलोवीरा का सेवन करने से किडनी समस्या ठीक हो सकती है। साथ ही साथ एलोवीरा के सेवन से किडनी की संक्रमण समस्या भी दूर हो जाती है।

उर्जा बढ़ाने के लिए
एलोवेरा शरीर में उर्जा को बढ़ाता है। यदि आप नियमित एलोवेरा का जूस पीते हैं तो इससे शरीर में मिनरल और विटामिन शरीर को मिलते हैं जिससे शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है। एलोवेरा के रस से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
दांतों और छालों के लिए एलोवेरा
दांतो में कीटाणु लग जाने की वजह से दांत खराब हो जाते हैं। इससे बचने के लिए एलोवेरा का जूस पीएं। यदि मुंह में छाले पड़ गए हों और उनसे खून निकल रहा हो तो आप एलोवेरा जूस से कुल्ला करें।

कब्ज नाशक है एलोवेरा

एलोवेरा कब्ज की समस्या को खत्म करता है। रोज सुबह एक गिलास एलोवेरा जूस का सेवन करने से पुरानी से पुरानी कब्ज पल भर में ठीक हो जाती है।
एलोवेरा के गुण लाभ
* एलोवेरा में 18 धातु, 15 एमिनो एसिड और 12 विटामिन मौजूद होते हैं जो खून की कमी को दूर कर रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढाते हैं।
* एलोवेरा के कांटेदार पत्तियों को छीलकर रस निकाला जाता है। 3 से 4 चम्मच रस सुबह खाली पेट लेने से दिन-भर शरीर में चुस्ती व स्फूर्ति बनी रहती है।
* एलोवेरा का जूस पीने से कब्ज की बीमारी से फायदा मिलता है।
* एलोवेरा का जूस मेहंदी में मिलाकर बालों में लगाने से बाल चमकदार व स्वस्थ होते हैं।
कब्ज की बीमारी 

* एलोवेरा का जूस पीने से शरीर में शुगर का स्तर उचित रूप से बना रहता है।
एलोवेरा का जूस बवासीर, डायबिटीज, गर्भाशय के रोग व पेट के विकारों को दूर करता है।
* एलोवेरा का जूस पीने से त्वचा की खराबी, मुहांसे, रूखी त्वचा, धूप से झुलसी त्वचा, झुर्रियां, चेहरे के दाग धब्बों, आखों के काले घेरों को दूर किया जा सकता है।
* एलोवेरा का जूस पीने से मच्छर काटने पर फैलने वाले इन्फेक्शन को कम किया जा सकता है।
* एलोवेरा का जूस ब्लड को प्यूरीफाई करता है साथ ही हीमोग्लोबिन की कमी को पूरा करता है।
* एलोवेरा को सौंदर्य निखार के लिए हर्बल कॉस्मेटिक प्रोडक्ट जैसे एलोवेरा जैल, बॉडी लोशन, हेयर जैल, स्किन जैल, शैंपू, साबुन, फेशियल फोम आदि में प्रयोग किया जा रहा है।
एलर्जी में एलोवेरा
एलोवेरा में एमिनों एसिड की मात्रा भरपूर होती है जो एलर्जी को दूर करने का काम करता है। एलोवीरा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
जो इंसान एलोवेरा का रस रोज पीता है वह कभी बीमार नहीं पड़ता है।
एलोवेरा खून साफ करता है जिससे जोड़ों का दर्द ठीक होता है।
यदि एडि़यां फट गई हों तो रोज एलोवेरा जेल से मालिश करें।
त्वचा में नमी को बनाए रखता है एलोवेरा।
अल्सर, वायु रोग और अम्लपित्त आदि की शिकायतें दूर होती हैं एलोवेरा जूस को पीने से।
गर्मियों के समय में अक्सर त्वचा में सनबर्न की शिकायत हो जाती है। ऐसे में एलोवेरा को त्वचा पर लगाने से सनबर्न ठीक हो जाता है।

स्कैल्प का ड्राई होना

एन्टीबैक्टिरीयल गुण होने की वजह से एलोवेरा जेल ड्राई स्कैल्प की समस्या को खत्म करता है। इसके लिए आप एलोवेरा जेल को अपने सिर पर लगा लें और पंद्रह मिनट के बाद शैंपू से अपने बालों को धो लें।

एलोवेरा कोई साधारण पौधा नहीं है। इसमें समाया हुआ है प्राकृतिक तत्वों का रहस्य जिससे आप अभी तक अनजान थे। एलोवेरा में ही छिपा हुआ है कई बीमारियों का इलाज। आप भी एलोवेरा का पेड़ अपने घर आंगन में लगा सकते हो और इसके फायदे उठा सकते हो। भारत और जापान में पुराने समय से ही एलोवीरा का प्रयोग चिकित्सा के रूम में किया जाता रहा है। एलोवीरा का जरूरत से ज्यादा सेवन करना भी सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता है।

15.7.16

तेज पत्ता के फायदे Benefits of bayleaf





तेजपत्‍ता को भारतीय व्‍यंजनों में उसकी अद्वितीय खुशबु और स्‍वाद के लिए जाना जाता है। लोगों को लगता है कि इससे सब्‍जी में अच्‍छी खुशबु आती है लेकिन इस पत्‍ते के कई स्‍वास्‍थ्‍य लाभ भी होते हैं। इसमें फ्लेवोनॉड्स, एंटी-ऑक्‍सीडेंट, आवश्‍यक तेल और टैनिन भरपूर मात्रा में होते हैं जो भोजन को विशेष प्रकार की एरोमा से भर देते हैं। तेजपत्‍ता में जीवाणुरोधी, एंटी-इंफ्लामेंट्री और मूत्रवर्धक गुण होते हैं।
तेज पत्ता को हम ‘Bay Leaf’ के नाम से भी जानते है। इसके सेवन से डायबटीज से पीडित मरीज को फायदा होता है। यह पाचन क्रिया को दुरूस्‍त बनाता है और हद्य लाभ प्रदान करता है। इसके सेवन से सर्दी-जुकाम में भी आराम मिलता है। तेजपत्‍ता एक प्रकार का मसाला होता है जिसमें कॉपर, पौटेशियम, कैल्शियम, मैग्‍नीशियम, सेलेनियम और आयरन की मात्रा काफी ज्‍यादा होती है। लेकिन हममें से बहुत कम लोगों को इसके गुणों के बारे में पता होता है।
इसके अलावा, तेजपत्‍ता, बालों, दांतों और त्‍वचा में चमक प्रदान करता है। रूसी होने पर भी तेजपत्‍ता, फायदा करता है। यह स्वाद में कड़वा होता है जिसे हम कोरा नहीं खा सकते। तो आइये जानते है इसके स्वास्थवर्धक फायदों के बारे में जिनसे आप अपने आप को स्वस्थ रख सकते है।
पाचन शक्ति बढ़ाये:-
तेजपत्‍ता, पाचन में सहायक होता है और इसके सेवन से कई प्रकार के पाचन सम्‍बंधी विकार सही हो जाते हैं। अगर आपको कब्‍ज, एसिड और ऐंठन की शिकायत रहती है तो तेजपत्‍ता आपके लिए रामबाण साबित हो सकता है।
कैंसर को रोकने में लाभदायक:-
तेजपत्‍ता में कैंसर से लड़ने के गुण होते हैं। इसमें कैफीक एसिड, क्‍वेरसेटिन और इयूगिनेल नामक तत्‍व होते हैं जो मेटाबोल्जिम को कैंसर जैसी घातक बीमारी को होने से रोक लेता है। और आपको कैंसर जैसी बीमारी से दूर रखता है।तेजपत्‍ता में कैंसर से लड़ने के गुण होते हैं। इसमें कैफीक एसिड, क्‍वेरसेटिन और इयूगिनेल नामक तत्‍व होते हैं जो मेटाबोल्जिम को कैंसर जैसी घातक बीमारी को होने से रोक लेता है।
कार्डियोवस्‍कुलर लाभ:
दिल सम्‍बंधी कई समस्‍याओं में तेजपत्‍ता लाभप्रद होता है। इसके सेवन से दिल का दौरा पड़ने का खतरा कम होता है और दिल स्‍वस्‍थ रहता है।



रूसी दूर करें:-
तेजपत्‍ता की सूखी पत्तियों का पाउडर बना लें और इस पाउडर को दही में मिला लें। इस मिश्रण को सिर की त्‍वचा पर अच्‍छे से लगा लें और कुछ देर बार धो लें। इससे रूसी निकल जाएगी और खुजली की समस्‍या से भी आराम मिल जाएगा।

बालों में चमक लोटाये:-
तेजपत्‍ता के पत्‍तों को बालों की चमक बढ़ाने के लिए भी इस्‍तेमाल किया जा सकता है। इसके कुछ पत्‍तों को लें और उन्‍हें पानी में उबाल दें। इस पानी के ठंडा होने पर इससे बालों को धो लें। ये पानी बालों में कंडीशनर की तरह काम करता है और चिपचिपाहट को दूर कर देता है।
ऊपर दिए गए सभी सुझावों का नियमित रूप से सेवन करे और स्वस्थ रहिये। इन फायदों के अलावा भी तेज पत्ता आपको कई बीमारियो के होने से बचाते है, आपकी किडनी को भी स्वस्थ रखने में आपकी मदद करते है।
किडनी की समस्‍या दूर करें:
तेजपत्‍ता, किडनी में होने वाली समस्‍या को दूर करने में सहायक होता है। इसके लिए, तेजपत्‍ता डालकर पानी उबालें और उस पानी को पिएं।
फ्रेश और दमकती त्‍वचा:-
हाल ही में एक शोध से यह बात सामने आई है कि तेजपत्‍ता में ऐसे गुण होते हैं जो त्‍वचा को बेहद दमकदार बनाते हैं। तेजपत्‍ता डालकर उबाले गए पानी से चेहरा धुलने पर चेहरे में शाइन आ जाती है। साथ ही तेज पत्ता आपके चेहरे पर हो रहे मुँहासे को दूर करने में मदद करता है। इसकी मदद से आपका चेहरा बिना दाग धब्बे का हो जाता है और चमकदार बनता है।
*नींद ज्‍यादा आने पर तेजपत्‍ते को पानी में कम से कम 6 घंटे तक भिगों दें और उठने के बाद उस पानी को पी लें। इससे आपको काफी राहत मिलेगी और नींद वाला हैंगओवर उतर जाएगा।
दांतों की चमक को बनाएं रखें:-
दातों का पीला पड़ना एक प्रकार की समस्‍या है, जिसके निदान के लिए लोग बहुत प्रयास करते हैं। तेजपत्‍ते की एक पत्‍ती को लीजिए और इसे अपने दांतों पर रगड़ दीजिए, इससे दांतों का पीलापन दूर हो जाएगा।
*टाइप 2 प्रकार की डायबटीज होने पर तेजपत्‍ता आपके लिए अच्‍छा साबित हो सकता है। यह ब्‍लड सुगर को नियंत्रित रखता है और दिल को स्‍वस्‍थ बनाएं रखता है। इसलिए, अगर आप डायबटीज के शिकार हैं तो तेजपत्‍ता का इस्‍तेमाल खाने में करने लगे।
दर्द में राहत:
तेजपत्‍ते के तेल को दर्द होने वाली जगह पर लगाने से दर्द में आराम मिलती है। आप चाहें तो दर्द होने वाली जगह पर इससे मसाज करें, काफी फायदा मिलेगा।



26.6.16

सर्प दंश के उपचार How to tackle snake bite






एक समय था जब साँप के काटने से ज्यादातर लोग बिना सही इलाज के ही मर जाते थे। लोगों को यह पता ही नहीं था कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। बहुत कम लोगों को मालूम है कि सारे साँप जहरीले नहीं होते हैं। भारत में लगभग पाँच से छह सौ किस्म के साँप मिलते हैं जिनमें बहुत कम साँप ही जहरीले होते हैं। लेकिन आम तौर पर लोग साँप के काटने पर वह जहरीला है कि नहीं इसके बारे में बिना जाने ही डर से मर जाते हैं, शायद डर के मारे उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता है।
सर्पदंश का प्राथमिक उपचार शीघ्र से शीध्र करना चाहिए। दंशस्थान के कुछ ऊपर और नीचे रस्सी, रबर या कपड़े से ऐसे कसकर बाँध देना चाहिए कि धमनी का रुधिर प्रवाह भी रुक जाए। लाल गरम चाकू से दंशस्थान को 1/2 इंच लंबा और 1/4 इंच चौड़ा चीरकर वहाँ का रक्त निकाल देना चाहिए। तत्पश्चात् दंशस्थान साबुन, या नमक के पानी, या 1 प्रतिशत पोटाश परमैंगनेट के विलयन से धोना चाहिए। यदि ये प्राप्य न हों तो पुरानी दीवार के चूने को खुरचकर घाव में भर देना चाहिए। कभी कभी पोटाश परमैंगनेट के कणों को भी घाव में भर देते हैं, पर कुछ लोगों की राय में इससे विशेष लाभ नहीं होता। यदि घाव में साँप के दाँत रह गए हों, तो उन्हें चिमटी से पकड़कर निकाल लेना चाहिए। प्रथम उपचार के बाद व्यक्ति को शीघ्र निकटतम अस्पताल या चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। वहाँ प्रतिदंश विष (antivenom) की सूई देनी चाहिए। दंशस्थान को पूरा विश्राम देना चाहिए। किसी दशा में भी गरम सेंक नहीं करना चाहिए। बर्फ का उपयोग कर सकते हैं। ठंडे पदार्थो का सेवन किया जा सकता है। घबराहट दूर करने के लिए रोगी को अवसादक औषधियाँ दी जा सकती हैं। श्वासावरोध में कृत्रिम श्वसन का सहारा लिया जा सकता है। चाय, काफी तथा दूध का सेवन कराया जा सकता है, पर भूलकर भी मद्य का सेवन नहीं कराना।किसी  जहरीले साँप के काटे जाने पर संयम रखना चािहये ताकि  ह्रदय गति तेज न हाे। साँप के काटे जाने पर जहर सीधे खून में पहुँच कर रक्त कणिकाआे काे नष्ट करना प्रारम्भ कर देते है, ह्रदय गति तेज हाेने पर पर जहर तुरन्त ही रक्त के माध्यम से ह्रदय में पहुँच कर उसे नुक़सान पहुँचा सकते हैं। काटे जाने के बाद तुरन्त बाद काटे गये स्थान काे पानी से धाेते रहना चाहिये। साँप के काटे जाने पर बिना घबराये तुरन्त ही नजदीकी प्रतिविष केन्द्र में जाना चाहिये।





कोबरा के काट लेने के लक्षण क्या हैं- काटा हुआ स्थान पन्द्रह मिनट के भीतर सूजने लगता है. यह कोबरा के काटे जाने का सबसे प्रमुख पहचान है. ध्यान से देखें तो दो मोटी सूई के धसने से बने निशान-विषदंत के निशान दिखेंगे. प्राथमिक उपचार में नयी ब्लेड से धन के निशान का चीरा सूई के धसने वाले दोनों निशान पर लगा कर दबा दबा कर खून निकालें और किसी के मुहँ में यदि छाला घाव आदि न हो तो वह खून चूस कर उगल भी सकता है.

विष का असर केवल खून में जाने पर ही होता है यदि किसी के मुंह में छाला, पेट में अल्सर आदि न हो तो वह सर्पविष बिना नुकसान के पचा भी सकता है. करैत जयादा खतरनाक है मगर इसके लक्षण बहुत उभर कर सामने नही आते यद्यपि थोड़ी सूजन इसमें भी होती है. करैत और कोबरा दोनों के विष स्नायुतंत्र पर घातक प्रभाव डालते हैं.अक्सर यह कहा जाता है कि साँप का जहर दिल और मस्तिष्क तक पहुँचने या पूरे शरीर तक फैलने में लगभग तीन से चार घंटे का समय लेता है, उसके बाद धीरे-धीरे विष का असर पूरे शरीर में होने लगता है। लेकिन इन घंटों में अगर आप अपने दिमाग का सही प्रयोग करके डॉक्टर के पास ले जाने की तैयारी करने के बीच कुछ घरेलू इलाजों के मदद से विष के खतरे को कुछ हद तक कम कर सकते हैं-
घी -पहले मरीज को 100 एम.एल. (लगभग आधा कप) घी खिलाकर उल्टी करवाने की कोशिश करें, अगर उल्टी न हो तो दस-पंद्रह के बाद गुनगुना पानी पिलाकर उल्टी करवायें, इससे विष के निकल जाने या असर के कम होने की संभावना होती है।
तुअर दाल-
तुअर दाल का जड़ पीसकर रोगी को खिलाने से भी इन्फेक्शन या विष का असर कम होता है।
कंटोला-
कंटोला दो तरह का होता है, एक में फूल और फल दोनों होता है और दूसरे में सिर्फ फूल आता है उसको ‘बांझ कंटोला’ कहते हैं, उसका कंद (bulb) घिसकर सर्पदंश वाले जगह पर लगाने से विष का असर या इन्फेक्शन की संभावना कम होती है।
लहसुन-
लहसुन तो हर किचन में मिल जाता है,उसको पीसकर पेस्ट बना लें और सर्पदंश वाले जगह पर लगायें या लहसुन के पेस्ट में शहद मिलाकर खिलाने या चटवाने से इन्फेक्शन कम हो जाता है।


सर्प दंश का विष नष्ट करने हेतु सरल उपाय
पहला प्रयोगः तपाये हुए लोहे से डंकवाले भाग को जला देने से नाग का प्राणघातक जहर भी उतर जाता है।
दूसरा प्रयोगः सर्पदंश की जगह पर तुरंत चीरा करके विषयुक्त रक्त निकालकर पोटेशियम परमैंगनेट भर देने से जहर फैलना एवं चढ़ना बंद हो जाता है।
साथ में मदनफल (मिंडल) का 1 तोला चूर्ण गरम या ठण्डे पानी में पिला देने से वमन होकर सर्पविष निकल जाता है। मिचाईकंद का टुकड़ा दो ग्राम मात्रा में घिसकर पिलाना तथा दंशस्थल पर लेप करना सर्पविष की अक्सीर दवा है।
तीसरा प्रयोगः मेष राशि का सूर्य होने पर नीम के दो पत्तों के साथ एक मसूर का दाना चबाकर खा जाने से उस दिन से लेकर एक वर्ष तक साँप काटे तो उसका जहर नहीं चढ़ता।
साँप के काटने पर शीघ्र ही तुलसी का सेवन करने से जहर उतर जाता है एवं प्राणों की रक्षा होती है।
अनुभूत प्रयोगः जिस व्यक्ति को सर्प ने काटा हो उसे कड़वे नीम के पत्ते खिलायें। यदि पत्ते कड़वे न लगें तो समझें कि सर्प विष चढ़ा है। छः सशक्त व्यक्तियों को बुलाकर दो व्यक्ति मरीज के दो हाथ, दो व्यक्ति दो पैर एवं एक व्यक्ति पीछे बैठकर उसके सिर को पकड़े रखे। उसे सीधा सुला दें एवं इस प्रकार पकड़ें कि वह जरा भी हिल न सके।
इसके बाद पीपल के हरे चमकदार 20-25 पत्तों की डाली मँगवाकर उसके दो पत्ते लें। फ़िर ‘सुपर्णा पक्षपातेन भूमिं गच्छ महाविष।’ मंत्र जपते हुए पत्तों के डंठल को दूध निकलनेवाले सिरे से धीरे-धीरे मरीज के कानों में इस प्रकार डालें कि डंठल का उँगली के तीसरे हिस्से जितना भाग ही अंदर जाय अन्यथा कान के परदे को हानि पहुँच सकती है। जैसे ही डंठल का सिरा कान में डालेंगे, वह अंदर खिंचने लगेगा व मरीज पीडा से खूब चिल्लाने लगेगा, उठकर पत्तों को निकालने की कोशिश करेगा। सशक्त व्यक्ति उसे कसकर पकड़े रहें एवं हिलने न दें। डंठल को भी कसकर पकड़े रहें, खिंचने पर ज्यादा अंदर न जानें दे।
जब तक मरीज चिल्लाना बंद न कर दे तब तक दो-दो मिनट के अंतर से पत्ते बदलकर इसी प्रकार कान में डालते रहें। सारा जहर पत्तें खिंच लेंगे। धीरे-धीरे पूरा जहर उतर जायेगा तब मरीज शांत हो जायेगा। यदि डंठल डालने पर भी मरीज शांत रहे तो जहर उतर गया है ऐसा समझें।
जहर उतर जाने पर नमक खिलाने से खारा लगे तो समझें कि पूरा जहर उतर गया है। मरीज को राहत होने पर सौ से डेढ़ सौ ग्राम शुद्ध घी में 10-12 काली मिर्च पीसकर वह मिश्रण पिला दें एवं कानों में बिल्वादि तेल की बूँदे डाल दें ताकि कान न पकें। कम से कम 12 घण्टे तक मरीज को सोने न दें। उपयोग में आये पत्तों को या तो जला दें या जमीन में गाड़ दें क्यों कि उन्हें कोई जानवर खाये तो मर जायेगा।
इस प्रयोग के द्वारा बहुत मनुष्यों को मौत को मुख में से वापस लाया गया है। भले ही व्यक्ति बेहोश हो गया हो या नाक बैठ गयी हो, फिर भी जब तक जीवित हो तब तक यह प्रयोग चमत्कारिक रूप से काम करता है।

जहर पी लेने परः कितना भी खतरनाक विषपान किया हो, नीम का रस अधिक मात्रा में पिलाकर या घोड़ावज (वच) का चूर्ण या मदनफल का चूर्ण या मुलहठी का चूर्ण या कड़वी तुम्बी के गर्भ का चूर्ण एक तोला मात्रा में पिलाकर वमन (उलटी) कराने से लाभ होगा। जब तक नीला-नीला पित्त बाहर न निकले तब तक वमन कराते रहें।
साँप -दंश  के मंत्र तंत्र  मे कितने सच्चाई है ?
गांवों में एक प्रथा सी है कि जब भी किसी व्यक्ति को कोई सर्प या बिच्छु काट लेता है तो तुरंत ही किसी तांत्रिक या ओझा को बुलाकर झाड़फुंक कराया जाता है, कई लोग झाड़फुंक से बिल्कुल स्वस्थ्य हो जाते हैं |, तब उन तांत्रिक ओझाओं की वाह-वाही होने लगती है। लोगों को लगता है कि वह बहुत बड़ा तांत्रिक है। दिन प्रतिदिन ऐसे तांत्रिक ओझाओं की ख्याती बढ़ने लगती है, और दूर-दूर से लोग सर्पदंश का ईलाज कराने आने लगते है। मगर कभी-कभी उन्ही प्रसिद्ध तांत्रिकों के झाड़फुंक करने के बावजूद भी सर्पदंश के ग्रसित व्यक्ति बच नहीं पाता तब ऐसे तांत्रिकों पर सवालिया निशान लग जाता है,| आखिर ऐसा क्यों होता है कि जिस तांत्रिक ने कई लोगों को झाड़फुंक कर पूर्णतः स्वस्थ्य कर दिया हो वही तांत्रिक किसी व्यक्ति को झाड़फुंक करते हुये उसके मृत्यु का कारण बन जाता है। आईये इसे मै आपको विस्तार पूर्वक समझाता हूँ।



यह नहीं कहा जा सकता की मंत्र में शक्ति नहीं होती ,क्योकि मन्त्रों की शक्ति अकाट्य रूप से प्रमाणित है |अतः सर्पदंश में भी मन्त्रों से प्रभाव पड़ सकता है ,किन्तु इसके लिए ऐसे मान्त्रिक साधक की जरुरत होती है जो अपने मंत्र बल से शरीर में रासायनिक परिवर्तन ला सके ,,क्योकि सर्पदंश में मंत्र से सर्प विष को कहने को तो कहते हैं उतारा जा रहा है किन्तु उसका अर्थ होता है की उसे निष्प्रभावी किया जा रहा है ,क्योकि वह बाहर नहीं निकलता अपितु रक्त में मिलता जाता है |अर्थात उसे निष्प्रभावी करने पर ही इलाज संभव है और यह एक शारीरिक रासायनिक परिवर्तन होगा ,विष के गुणों को बदल देना |अच्छे से अच्छे साधकों में यह क्षमता नहीं पायी जाती की वह किसी व्यक्ति के शरीर में रासायनिक परिवर्तन कर दें |इसके लिए बेहद उच्च शक्ति की साधना और कम से कम कुंडलिनी के किसी एक चक्र की विशेष क्रियाशीलता होनी चाहिए |जबकि सर्पदंश का इलाज आपको गावों में आपको ऐसे ओझा -मान्त्रिक करते मिलेंगे जो कुंडलिनी तो क्या उसका नाम तक नहीं जानते |उन्होंने कभी किसी उच्च शक्ति की साधना नहीं की |झाडफूंक ही किये और सामान्य पूजा आदि किये |यह लोग शाबर मन्त्रों का प्रयोग करते मिलेंगे |यद्यपि शाबर मंत्र कुछ मामलों में बेहद प्रभावी होते हैं किन्तु कम से कम रासायनिक परिवर्तन तो नहीं कर सकते ,सामान्य साधकों द्वारा उच्चारित होने पर | शाबर मन्त्रों के उच्च प्रभाव के लिए भी बेहद उत्कृष्ट साधक की जरूरत होगी जो सामान्य जन मानस में उस स्थिति में आने पर नहीं मिलेगा |यद्यपि शाबर मंत्र से कुंडलिनी साधना नहीं होती हाँ शक्तियों की साधना होती है और विरला साधक उच्च स्तर पर भी पहुँच जाता है |
जीव वैज्ञानिकों के द्वारा निरंतर अध्ययन एवं शोध करने पर वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को प्रमाणित किया है कि भारत वर्ष में पाये जाने वाले सर्पो में से लगभग 90 प्रतिशत सर्प जहरीले नही होते या फिर कम जहरीले होते हैं , जिनके काटने पर व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती मात्र हल्का सा नशा होता है और चक्कर आने लगता है। परंतु कुछ समय बाद ही सर्प विष का प्रभाव समाप्त हो जाता है और पीडि़त व्यक्ति पूर्णतः स्वस्थ्य हो जाता है। लेकिन सर्प द्वारा अचानक काटे जाने पर व्यक्ति भयभीत हो जाता है, और लगता है शरीर में जहर फैल रहा है, तथा डर से व्यक्ति के हाथ-पांव थर-थराने लगते हैं। कई व्यक्ति तो डर से बेहोश तक हो जाते हैं। इस दौरान गांवों में तांत्रिको के द्वारा झाड़फुंक चालू हो जाता है, और कुछ समय बाद जब जहर का असर समाप्त होता है तो व्यक्ति होश में आने लगता है, तथा वह व्यक्ति स्वस्थ्य होने लगता है।
इस प्राकृतिक प्रक्रिया के द्वारा स्वयं ठीक हुये व्यक्ति को तथा देखने वाले को लगता है कि झाड़फुंक के माध्यम से ही सर्प का विष उतरा वरना व्यक्ति मर जाता। इसी अंधविश्वास के कारण लोगों की श्रद्धा और बढ़ जाती है। तब किसी जहरीले सांपों के द्वारा काटे जाने पर भी अन्ध श्रद्धा और अन्धविश्वास में आकर जो व्यक्ति झाड़फुंक करवाने में विश्वास रखता है उसे अपने जान से हाथ धोना पड़ जाता है, और पछताने के लिए अपने परिजनो को छोड़ जाता है।
यहि बात बिच्छु के काटने पर भी लागु होती है, मगर बिच्छु के काटने पर किसी की जान नहीं जाती मगर कष्ट बहुत होता है। इसका विष भी धीरे-धीरे स्वयं ही उतर जाता है तथा किसी बिच्छु का विष विलम्ब से उतरता है, मगर उतरता स्वयं ही है, लेकिन जिसे बिच्छु ने काटा हो वह कहाँ मानने वाला वह तो झाड़फुंक करायेगा ही भले ही वह झाड़फुंक घंटों तक ही क्यों न चले। आखिरकार जहर तो उतारना ही है सो उतरेगा ही अन्ततः व्यक्ति स्वस्थ्य हो जाता है और तांत्रिक वाह-वाही बटोर लेता है।
कई प्रकार के तांत्रिक ग्रंथों तथा शाबर मंत्र के ग्रंथों में भी सर्प विष झाड़ने के मंत्र तथा प्रयोग उल्लेखित है, मेरे पास भी ऐसे कई प्रकार के शाबर मंत्र तथा प्रयोग है, मगर मै यहां पर उन मंत्रो का उल्लेख कर आपको भ्रमित नहीं करना चाहता बल्कि उस वास्तविक्ता से परिचित कराना चाहता हूँ, जिसके माध्यम से सर्पदंश द्वारा पीडि़त व्यक्ति को उचित ईलाज के द्वारा बचाया जा सके। वैसे तो कई प्रकार के सर्प झाड़़ने के मंत्र तथा प्रयोग है जो देखने और सुनने में अटपटे भी लग सकते हैं, और उन पर यकीन करना भी संभव नही।
एक प्रयोग तो ऐसा है कि जो व्यक्ति तांत्रिक को बुलाने जाता है और कहता है कि अमुक व्यक्ति को सर्प ने काटा है। चलिए उसे ठीक कर दीजिए मै आपको लेने आया हूँ। तांत्रिक द्वारा वहीं पर मंत्र पढ़कर बुलाने गये हुये व्यक्ति के गालों पर जोरदार थप्पड़ मारा जाता है और इसके प्रभाव से सर्प द्वारा काटे गये व्यक्ति पर असर होता है तथा उसका जहर धीरे-धीरे उतरने लगता है।
कई लोग चित्ती कौड़ी उड़ाने की बात भी करते हैं, जिसमें एक सादे कागज पर एक विशेष प्रकार का यंत्र बनाया जाता है, जिसके चारो कोनो पर कौड़ी तथा बीच में चित्ती कोड़ी रखकर विशेष मंत्रो द्वारा नाग देवता का आह्वान किया जाता है। कुछ ही क्षणों में मंत्रशक्ति के माध्यम से बीच में रखा हुआ चित्ती कौड़ी उड़ जाता है तथा उड़कर उसी सर्प के मस्तक पर चिपक जाता है जिसने व्यक्ति को काटा हो फिर वह सर्प मंत्रशक्ति से आकर्षित होकर दंशित व्यक्ति के पास आकर उसका जहर खींच लेता है। मगर ऐसी कहानी एक कोरी कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नहीं लगती क्योंकि आज तक मैंने ऐसा कहीं देखा नहीं। फिर भी इससे में इनकार नहीं कर सकता की ऐसा हो ही नहीं सकता ,क्योकि में मन्त्रों की शक्ति से खुद अच्छे से परिचित और tantra के क्षेत्र में हूँ ,पर ऐसी क्षमता के लिए साधक को बहुत उच्च स्तर का होना चाहिए ,सभी साधक ऐसा नहीं कर सकते ,जबकि आपको ऐसे ऐसे साधक झाड फूंक करते मिलेंगे जो साल में एक दिन इसका शाबर मंत्र जगाते हैं |
कई तांत्रिक सर्प दंशित व्यक्ति के पीठ पर कांसे की थाली चिपका कर ईलाज करते हैं, जब तक विष नहीं उतरता तब तक कांसे की थाली पीठ पर चिपका रहता है, तथा मंत्र पढ़कर राई के दाने थाली पर फेंके जाते हैं। विष समाप्त होते ही थाली पीठ से गिर जाती है और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। ऐसा ही एक पत्थर सपेरों के पास भी रहता है। जिसे सर्प के काटे हुए स्थान पर रखने से वह पत्थर चिपक जाता है तथा विष को खींच लेता है। मगर ऐसे पत्थरों पर भी ज्यादा यकीन नहीं करना चाहिए क्योंकि सपेरे इस पत्थर का प्रेक्टिकल करने के लिए अपने पास पाले हुए सर्प से कटवाकर वहाँ पर पत्थर को चिपका कर दिखाते है। जिसकी वास्तविक्ता यह है, कि वह सर्प विषैला नहीं होता है या फिर उसके विष के दांत तोड़े जा चुके होते हैं तथा पत्थर का उस स्थान पर चिपकना महज ही सर्प के मुंह से निकले हुये चिपचिपे पदार्थ की वजह से होता है।



यह एकदम से नहीं कहा जा सकता की सर्पदंश का इलाज इन विधियों से नहीं हो सकता ,क्योकि अगर शास्त्रों में इनका उल्लेख है तो कुछ सच्चाई तो जरुर होगी |किन्तु जिस समय यह शास्त्र लिखे गए उस समय के साधकों और आज के साधकों में जमीन आसमान का फर्क हो सकता है |तब के साधकों का काम केवल साधना था ,ईष्ट प्रबलता और आत्मबल इतना हो सकता है की व्यक्तियों में वह रासायनिक परिवर्तन कर सकें ,पदार्थों के गुण बदल सकें ,मंत्र शक्ति से सर्प को खींच सके ,किन्तु क्या आज भी वाही स्थिति है |आज तो एक दो दिन शाबर मंत्र करके खुद को सिद्ध मान लेते हैं ,ऐसे ही लोग इलाज करते हैं और तुक्के लग जाते हैं क्योकि ९० प्रतिशत सांप जहरीले नहीं होते और यह मात्र भय का इलाज करते हैं ,इनमे जो जहरीले साँपों से दंशित हो जाते हैं उनको भाग्य का लिखा कहकर यह मुक्त हो लेते हैं |अतः सर्पदंश पर ओझा-मान्त्रिक के पास जाकर समय बर्बाद कर पीड़ित की जान जोखिम में डालना मूर्खता हो सकता है ,क्योकि कोई यह नहीं जानता की जिसके पास वह लेकर जा रहा है उसमे इतनी शक्ति है की नहीं की वह विष को प्रभावहीन कर सके ,पदार्थ के गुण बदल सके ,शरीर में रासायनिक परिवर्तन ला सके |जिस साधक में इतनी क्षमता आ जायेगी वह इस तरह आराम से नहीं मिल सकता |उसका लक्ष्य बदल जाता है |इससे बेहतर तो सामान्य जड़ीबूटियों का उपयोग करते हुए यथा शीघ्र पीड़ित को डाक्टर के पास ले जाना ही होता है |
आयुर्वेद में है सर्पदंश का ईलाज
भारत के प्राचीनतम् आयुर्वेदिक ग्रंथों में ऐसे सैकड़ों प्रकार के आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का उल्लेख मिलता है। जिसके माध्यम से सर्पविष का निवारण किया जा सकता है। ऐसे ही कुछ विशेष विशिष्ट जड़ी-बूटियों का उल्लेख नीचे किया जा रहा है।
निर्विषी:- निर्विषी नामक जड़ी का चूर्ण बनाकर एक-एक चम्मच एक-एक घंटे के अंतर में पानी में घोलकर पीलाये तो कुछ ही देर में विष से बेहोश व्यक्ति को भी होश आ जाता है तथा कुछ ही देर में रोगी पूर्णतः स्वस्थ्य हो जाता है।
कुचला:- दोला यंत्र द्वारा एक प्रहर तक शुद्ध किया हुआ कुचला को चूर्ण बनाकर सर्प दंशित व्यक्ति को 2 रत्ती चूर्ण पानी के साथ पिलावे साथ ही 1 तोला चूर्ण को पानी में लेप बनाकर सर्प दंश के स्थान पर लगायें तथा शरीर पर भी लेप करें ऐसा करने से सर्पविष से मुर्छित मनुष्य को आधे घंटे में होश में आ जायेगा। यदि वह इतना बेहोश हो कि मृत्यु के समीप हो तो 5 से 6 रत्ती चूर्ण को नीबू के रस के साथ बूंद बूंद गले में टपकाये तथा शरीर पर पारे का मर्दन करें ऐसा करने पर रोगी विषमुक्त होकर स्वस्थ हो जाता है।
अंकोल:- अंकोल के जड़ का चूर्ण बनाकर 1-1 तोला सर्पदंश से पीडि़त व्यक्ति को दिया जाय तो उल्टी तथा वमन के माध्यम से सारा विष बाहर निकल जाता है तथा पीडि़त रोगी पूर्णतः स्वस्थ्य हो जाता है।
आक (मदार):- जहाँ पर सर्प ने काटा हो उस स्थान पर मदार की पत्ती को तोड़ कर उसका दूध उस स्थान पर टपकाये कुछ ही देर में वह दूध विष के जगह में काला हो जाता है, फिर उसे पोछकर फिर से ताजा दूध टपकाये फिर काला होने पर पोछे इस प्रकार यह क्रिया तबतक करते रहें जबतक की दूध सफेद न रह जाये जब मदार का दूध सफेद का सफेद ही रहे तो समझ ले कि सर्प का विष समाप्त हो गया है।
द्रोण पुष्पी:- द्रोण पुष्पी के पंचांग का स्वरस काली र्मिच मिलाकर दो-दो तोला थोड़ी -थोड़ी देर में पिलाते रहें तथा नाक, कान, आंख में भी टपकाते रहें ऐसा करने से व्यक्ति बेहोश नहीं होता तथा सर्पदंश से बेहोश व्यक्ति भी होश में आ जाता है।
ऐसे सैकड़ो प्रकार की जड़ी बूटीयाँ हैं जिनके माध्यम से सर्पदंशित व्यक्ति का इलाज कर पूर्णतः विष मुक्त किया जा सकता है। फिर भी आज के आधुनिक वैज्ञानिक युग में मात्र किसी एक औषधी अथवा झाड़ फूंक के चक्कर में पड़ कर अपना तथा अपने परिवार का जान संकट में डालना मूर्खता ही होगा।



परामर्श
यदि दुर्भाग्यवश आपको या आपके परिवार या पड़ोस में किसी को भी सर्प काट ले तो यथाशीघ्र किसी अच्छे अस्पताल में जाकर ईलाज कराएं तब तक उपर बताये हुए आयुर्वेदिक जड़ी - बूटियों में से जो भी मिल जाए उसका उपयोग करना चाहिए। सर्व प्रथम जहाँ पर सर्प ने काटा हो उसके उपर तथा नीचे रस्सी से कस कर बांध दे जिससे जहर न फैले, फिर किसी धारदार हथियार या ब्लेड से चिरा लगाकर वहाँ का खून निकाल दें तथा बिना बुझा चूना उस पर रखें चूना विषैले रक्त को अवशोषित कर लेती है चूना नहीं मिलने पर मदार का दूध उपयोग करना चाहिए। तथा सर्पदंशित व्यक्ति को 12 घन्टे तक सोने नहीं देना चाहिए नींद आने पर द्रोणपुष्पी का रस आखों में डाले तथा तत्काल किसी योग्य चिकित्सक से ईलाज कराना चाहिए। ...



एंटीवेनम सूई है एकमात्र इलाज (Antivenom Injection):




यह सूई अगर आसपास किसी बाजार हाट के मेडिकल स्टोर पर मिल जाय तो पहले इंट्रामस्कुलर (Intramuscular Injection) देकर अस्पताल तक पहुंचा जा सकता है, जहाँ आवश्यकता जैसी होगी चिकित्सक फिर इंट्रा वेनस दे सकता है. अगर आप के क्षेत्र में साँप काटने की घटनाएँ अक्सर होती है तो पी एच सी के चिकित्सक से तत्काल मिल कर एंटी वेनम की एडवांस व्यवस्था सुनिशचित करें- मेडिकल दूकानों पर भी इसे पहले से रखवाया जा सकता है. एंटीवेनम 10 हज़ार लोगों में एकाध को रिएक्शन करता है-कुशल चिकित्सक एंटीवेनम के साथ डेकाड्रान(Decadron)/कोरामिन(Coramin) की भी सूई साथ साथ देता है-बल्कि ऐसा अनिवार्य रूप से करना भी चाहिए। याद रखें जहरीले सांप के काटने पर कई वायल एंटीवेनम के लग सकते हैं. इसलिए इनका पहले से ही प्रयाप्त इंतजाम जरुरी है.

साँप काटने पर क्या न करें?

साँप के काटने पर झाड़-फूँक और जड़ी-बूटी आदि के द्वारा इलाज के चक्कर में समय न गंवाएँ। क्योंकि सर्पदंश के मामले में एक क्षण की भी देरी पीड़ित के लिए मौत का सबब बन सकती है।

किसी व्यक्ति को साँप काटने पर काटने वाले साँप की खोजबीन करके उसे पकड़ने की कोशिश कत्तई न करें, इससे साँप भड़क सकता है और वह अन्य लोगों को भी अपना शिकार बना सकता है।

पीड़ित व्यक्ति को दर्द से तड़पता देखकर उसे अपने मन से कोई दवा विशेष एस्प्रिन वगैरह कदापि न दें न ही कोई दादी-नानी का नुस्खा उसपर आजमाएँ।

यदि आप उपरोक्त सावधानियों को ध्यान में रखें और यथासमय पीड़ित को अस्पताल पहुँचाकर एन्टीवेनम दिलवा सकें, तो बहुत सम्भव है कि साँप के ज़हर के दुष्प्रभाव को कम किया जा सके और पीड़ित की जान बचाई जा सके।

--------------------

21.6.16

याददाश्त तेज करने के उपाय : Home remedies to boost memory power.

स्मरण शक्ति बढाने के सरल उपचार. how to enhance memory power?



                                                   
                                                                                                   

   स्मरण शक्ति की कमजोरी या विकृति से विद्यार्थी  और दिमागी काम करने वालों को असुविधाजनक स्थिति से रुबरु होना पडता है। यह कोई रोग नहीं है और न किसी रोग का लक्छण है। इसकी मुख्य वजह एकाग्रता(कन्संट्रेशन) की कमी होना है।







        स्मरण शक्ति बढाने के लिये दिमाग को सक्रिय रखना आवश्यक है।  शरीर और मस्तिष्क की कसरतें अत्यंत लाभदायक होती हैं। किसी बात को बार-बार रटने से भी स्मरण शक्ति में इजाफ़ा होता है और वह मस्तिष्क में द्रडता से अंकित हो जाती है। आजकल कई तरह के विडियो गेम्स प्रचलन में हैं । ये खेल भी मस्तिष्क को ताकतवर बनाने में सहायक हो सकते हैं|पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित पहेलियां हल करने से भी मस्तिष्क की शक्ति बढती है।

    मैं नीचे कुछ ऐसे सरल उपचार प्रस्तुत कर रहा हूं जो मेमोरी पावर बढाने मे अत्यंत उपकारी सिद्ध होते हैं--


१)  बादाम ९ नग रात को पानी में गलाएं।सुबह छिलके उतारकर बारीक पीस कर पेस्ट बनालें। अब एक गिलास दूध गरम करें और उसमें बादाम का पेस्ट घोलें।  इसमें ३ चम्मच शहद भी डालें।भली प्रकार उबल जाने पर उतारकर मामूली गरम हालत में पीयें। यह मिश्रण पीने के बाद दो घंटे तक कुछ न लें। यह स्मरण शक्ति वृद्दि करने का जबर्दस्त उपचार है। दो महीने तक करें।


२)   ब्रह्मी दिमागी शक्ति बढाने की मशहूर जडी-बूटी है। इसका एक चम्मच रस नित्य पीना हितकर है। इसके ७ पत्ते चबाकर खाने से भी वही लाभ मिलता है। ब्राह्मी मे एन्टी ओक्सीडेंट तत्व होते हैं जिससे दिमाग की शक्ति घटने पर रोक लगती है।



३)  अखरोट  जिसे अंग्रेजी में वालनट कहते हैं स्मरण शक्ति बढाने में सहायक है। नियमित उपयोग हितकर है। २० ग्राम वालनट और साथ में १० ग्राम किशमिस लेना चाहिये।












४)  एक सेवफ़ल नित्य खाने से कमजोर मेमोरी में लाभ होता है। भोजन से १० मिनिट पहिले खाएं।







५)    जिन फ़लों में फ़ास्फ़ोरस तत्व पर्यात मात्रा में पाया जाता है वे स्मरण शक्ति बढाने में विशेषतौर पर  उपयोगी होते है।  अंगूर ,खारक ,अंजीर एवं संतरा दिमागी ताकत बढाने के लिये नियमित उपयोग करना चाहिये।



६)  भोजन में कम शर्करा वाले पदार्थ उपयोगी होते हैं। पेय पदार्थों में भी कम ्चीनी का प्रयोग करना चाहिये।इन्सुलीन  हमारे दिमाग को तेज और धारदार बनाये रखने में महती भूमिका रखता है। इसके लिये मछली बहुत अच्छा भोजन है। मछली में उपलब्ध ओमेगा ३ फ़ेट्टी एसीड  स्मरण शक्ति को मजबूती प्रदान करता है।



७)  दालचीनी का पावेडर बनालें। 5 ग्राम पावडर शहद में मिलाकर चाटलें। कमजोर दिमाग की अच्छी दवा है।

८) धनिये का पावडर दो चम्मच शहद में मिलाकर लेने से स्मरण शक्ति बढतीहै।



९)  आंवला का रस एक चम्मच २ चम्मच शहद मे मिलाकर उपयोग करें। भुलक्कड पन में आशातीत लाभ होता है।






१०)  अदरक ,जीरा और मिश्री  तीनों को पीसकर लेने से कम याददाश्त की स्थिति में लाभ होता है।


११)   दूध और शहद मिलाकर पीने से भी याद दाश्त में बढोतरी होती है। विद्ध्यार्थियों के लिये फ़ायदेमंद उपचार है।२५० मिलि गाय के दूध में २ चम्मच शहद मिलाकर उपयोग करना चाहिये।








१२)  तिल में स्मरण शक्ति वृद्दि करने के तत्व हैं। २० ग्राम तिल और थोडा सा गुड का तिलकुट्टा बनाकर नित्य सेवन करना परम हितकार उपचार है।




१३)   काली मिर्च का पावडर एक चम्मच असली घी में मिलाकर उपयोग करने से याद दाश्त में इजाफ़ा होता है।













१४)   गाजर में एन्टी ओक्सीडेंट तत्व होते हैं। इससे रोग प्रतिरक्षा प्राणाली ताकतवर बनती है।  दिमाग की ताकत बढाने के उपाय के तौर पर इसकी अनदेखी नहीं करना चाहिये।








१५)   आम रस (मेंगो जूस) मेमोरी बढाने में विशेष सहायक माना गया है। आम रस में २ चम्मच शहद मिलाकर लेना उचित है।




१६) पौष्टिकता और कम वसा वाले भोजन से  अल्जाईमर्स नामक बीमारी होने का खतरा कम रहता है और दिमाग की शक्ति में इजाफ़ा होता है इसके लिये अपने भोजन में ताजा फ़ल-सब्जियां.मछलियां ,ओलिव आईल आदि प्रचुरता से शामिल करें।

१७) तुलसी के ९ पत्ते ,गुलाब की पंखुरी और काली मिर्च नग एक  खूब चबा -चबाकर खाने से दिमाग के सेल्स को ताकत मिलती है।



१७)   चित्र में प्रदर्शित योगासन करने से भी मेमोरी पावर में  इजाफ़ा  होता है। योग और प्राणायाम की अनदेखी करना ठीक नहीं।




15.6.16

मोटापा दूर करने के उपाय : Ways to overcome obesity



प्रातः एक गिलास ठंडे पानी में 2 चम्मच शहद घोलकर पीने से भी कुछ दिनों में मोटापा कम होने लगता है। दुबले होने के लिए दूध और शुद्ध घी का सेवन करना बन्द न करें। वरना शरीर में कमजोरी, रूखापन, वातविकार, जोड़ों में दर्द, गैस ट्रबल आदि होने की शिकायतें पैदा होने लगेंगी।


पेट व कमर का आकार कम करने के लिए सुबह उठने के बाद या रात को सोने से पहले नाभि के ऊपर के उदर भाग को 'बफारे की भाप' से सेंक करना चाहिए। इस हेतु एक तपेली पानी में एक मुट्ठी अजवायन और एक चम्मच नमक डालकर उबलने रख दें। जब भाप उठने लगे, तब इस पर जाली या आटा छानने की छन्नी रख दें। दो छोटे नैपकिन या कपड़े ठण्डे पानी में गीले कर निचोड़ लें और तह करके एक-एक कर जाली पर रख गरम करें और पेट पर रख कर सेंकें। प्रतिदिन 10 मिनट सेंक करना पर्याप्त है। कुछ दिनो में पेट का आकार घटने लगेगा।


सुबह उठकर शौच से निवृत्त होने के बाद निम्न लिखित आसनों का अभ्यास करें या प्रातः 2-3 किलोमीटर तक घूमने के लिए जाया करें। दोनों में से जो उपाय करने की सुविधा हो सो करें।
भोजन में गेहूं के आटे की चपाती लेना बन्द करके जौ-चने के आटे की चपाती लेना शुरू कर दें। इसका अनुपात है 10 किलो चना व 2 किलो जौ। इन्हें मिलाकर पिसवा लें और इसी आटे की चपाती खाएं। इससे सिर्फ पेट और कमर ही नहीं सारे शरीर का मोटापा कम हो जाएगा।


भुजंगासन, शलभासन, उत्तानपादासन, सर्वागासऩ, हलासन, सूर्य नमस्कार। इनमें शुरू के पाँच आसनों में 2-2 मिनट और सूर्य नमस्कार पांच बार करें तो पांच मिनट यानी कुल 15 मिनट लगेंगे।





मोटापा के उपचार का विडियो-

2.6.16

दाद और खुजली की घरेलू चिकित्सा

दाद और खुजली, यह त्वचा संबंधी रोग है जिसकी वजह से काफी परेशानी होती है। आइये आपको इन रोगों के लक्षणों और इनके कारगर घरेलू  उपायों के बारे में बताते हैं जो इन बीमारीयों को दूर करेगा। 
दाद के लक्षण
दाद यह त्वचा का रोग है जो आपकी त्वचा पर फफूंद के रूप में दिखता है और इसका आकार गोल व रंग लाल होता है जो धीरे-धीरे बढ़ने भी लगता है। दाद त्वचा, बालों और नाखूनों को प्रभावित करता है। 
  दाद के कारण

1. यह संक्रमित व्यक्ति को छूने से या उसके तौलिए का इस्तेमाल करने से भी हो सकता हैं।



2. कुत्ता, बिल्ली या अन्य पालतू जानवरों की संक्रमित त्वचा के संपर्क में आने से भी दाद फैल सकता है।

 दाद का इलाज

 तुलसी के पत्तों को पीसकर उसका पेस्ट बनाएं और इसे दाद वाले स्थान पर मलें।
 दाद होने पर आप उसकी ठंठे पानी और गरम पानी दोनों की बारी-बारी से सिंकाई करें।
 अपना बिस्तर हमेशा साफ रखें।
. साफ सुथरे कपड़े पहनें और भोजन सादा खायें।
. आप नीम के पत्तों को पीसकर उसका लेप तैयार करें और इस लेप को दाद वाले स्थान पर मलें।
नहाने के पानी में नीम की पत्तीयां डालकर स्नान करें और स्नान रोज करें।
 कपड़े साफ और सूखे पहने क्योंकि गीला कपड़ा पहने से दाद का आकार बढ़ता है।
खुजली-
खुजली यह भी त्वचा संबंधी रोग है और त्वचा को ज्यादा रगड़ने से त्वचा पर जलन भी होती है। आइये जानते है इसके कारण और इलाज-

खुजली होने की वजह-

 दवाई के गलत असर होने से।
 गलत तरह से यौन संबंध बनाने से।
 संक्रमित जानवर के संपर्क में आने से।
 सिर पर जुंओं की वजह से।
 पसीना आने की वजह से।
. तनाव की वजह से।

खुजली दूर करने के  उपचार 

 टमाटर के मिश्रण में नारियल का पानी मिला कर खुजली वाली जगह पर लगाने से खुजली दूर होती है।
 खुजली यदि पूरे शरीर में हो रही है तो आप दूध की मलाई को खुजली वाले स्थानों पर लगायें।
नीम के पत्तों का लेप लगाने से खुजली से निजात मिलता है।
 खुजली वाली जगह पर नारियल का तेल लगाने से आराम मिलता है।
चर्म रोग का तेल बनाने की विधि : नीम की छाल, चिरायता, हल्दी, लाल चन्दन, हरड़, बहेड़ा, आँवला और अड़ूसे के पत्ते, सब समान मात्रा में। तिल्ली का तेल आवश्यक मात्रा में। सब आठों द्रव्यों को 5-6 घंटे तक पानी में भिगोकर निकाल लें और पीसकर कल्क बना लें।
पीठी से चार गुनी मात्रा में तिल का तेल और तेल से चार गुनी मात्रा में पानी लेकर मिलाकर एक बड़े बरतन में डाल दें। इसे मंदी आंच पर इतनी देर तक उबालें कि पानी जल जाए सिर्फ तेल बचे। इस तेल को शीशी में भरकर रख लें।
जहाँ भी खुजली चलती हो, दाद हो वहाँ या पूरे शरीर पर इस तेल की मलिश करें। यह तेल चमत्कारी प्रभाव करता है। लाभ होने तक यह मालिश जारी रखें, मालिश स्नान से पहले या सोते समय करें और चमत्कार देखें।

23.5.16

करोंदे के लाभ और उपयोग





करौंदे का पौधा एक झाड़ की तरह होता है। इसके पेड़ कांटेदार और 6 से 7 फुट ऊंचे होते हैं। पत्तों के पास कांटे होते है जो मजबूत होते है। करौंदा के वृक्ष दो प्रकार के होते हैं। एक प्रकार के करौंदों में छोटे फल लगते हैं। दूसरी प्रकार के करौदें में बड़े करौंदे लगते हैं।

करौंदे में विटामिन C प्रचुर मात्रा में होने के साथ-साथ अत्याधिक एंटी-ऑक्सीडेंट भी पाया जाता है| जो अन्य फलों तथा सब्जियों की तुलना में कई अधिक है| करौंदा विटामिन E तथा K का भी अच्छा स्त्रोत है|
इससे हमें इन विटामिनों के अतिरिक्त कई मिनरल्स भी प्राप्त होते हैं जैसे- आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम, जिंक इत्यादि| करौंदे के नियमित सेवन से हम कुछ स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं|





करौंदे के स्वास्थ्य लाभ इस प्रकार हैं:
• करौंदे का सेवन ज़ुकाम तथा बुखार में लाभप्रद है|
• कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम कर ह्रदय संबंधी रोगों से बचाता है|
• स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली का निर्माण कर हमें रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है|
• करौंदे का रस फेफड़ों की सूजन दूर करने में लाभदायक है|
• स्त्री स्वास्थ्य सम्बन्धी रोगों में विशेष रूप से लाभप्रद है| जैसे- मूत्र संक्रमण (urine infection)

कच्चे करौंदे का अचार बहुत अच्छा होता है। इसकी लकड़ी जलाने के काम आती है।
एक विलायती करौंदा भी होता है, जो भारतीय बगीचों में पाया जाता है। इसका फल थोड़ा बड़ा होता है और देखने में सुन्दर भी। इस पर कुछ सुर्खी-सी होती है। इसी को आचार और चटनी के काम में ज्यादा लिया जाता है।
फलों के चूर्ण के सेवन से पेट दर्द में आराम मिलता है। करोंदा भूख को बढ़ाता है, पित्त को शांत करता है, प्यास रोकता है और दस्त को बंद करता है। ख़ासकर पैत्तिक दस्तों के लिये तो अत्यन्त ही लाभदायक है।
सूखी खाँसी होने पर करौंदा की पत्तियों के रस का सेवन लाभकारी होता है।
पातालकोट में आदिवासी करौंदा की जड़ों को पानी के साथ कुचलकर बुखार होने पर शरीर पर लेपित करते है और गर्मियों में लू लगने और दस्त या डायरिया होने पर इसके फ़लों का जूस तैयार कर पिलाया जाता है, तुरंत आराम मिलता है।
खट्टी डकार और अम्ल पित्त की शिकायत होने पर करौंदे के फलों का चूर्ण काफ़ी फ़ायदा करता है, आदिवासियों के अनुसार यह चूर्ण भूख को बढ़ाता है, पित्त को शांत करता है।
करोंदा के फल को खाने से मसूढ़ों से खून निकलना ठीक होता है, दाँत भी मजबूत होते हैं। फलों से सेवन रक्त अल्पता में भी फ़ायदा मिलता है।
सर्प के काटने पर करौंदे की जड़ को पानी में उबालकर क्वाथ करें। फिर इस क्वाथ को सर्प काटे रोगी को पिलाने से लाभ होता है।
घाव के कीड़ों और खुजली पर करौंदे की जड़ निकाल कर पानी में साफ़ धोकर उसे पानी के साथ महीन पीस कर फिर तेल में डालकर खूब पकायें, फिर इस तेल का प्रयोग घाव के कीड़ों और खुजली पर करने से फायदा पहुँचता है।
ज्वर आने पर करौंदे की जड़ का क्वाथ बनाकर देने से लाभ मिलता है।
खांसी में करौंदे के पत्‍तों के अर्स को निकालकर उसमें शहद मिलाकर चाटना श्रेष्ठ है।
जलंदर रोग में करौंदों का शर्बत, हर दिन एक तोला दूसरे दिन दो तोला तीसरे दिन तीन तोला इसी प्रकार एक हफ्ते तक एक तोला रोज बढ़ाते जाए। एक हफ्ते के भीतर लाभ मिलना शुरू हो जायेगा।
करौंदा का प्रयोग मूंगा व चांदी की भस्म बनाने में भी किया जाता है। मूंगा भस्म बनाने के लिये कच्चे करौंदों को लेकर बारीक पीसें फिर उसकी भली भांति लुगदी बनाकर उस लुगदी में मूगों को रखें फिर उस लुगदी के ऊपर सात कपट मिट्टी कर, उपलों की आग में रखकर फूंके। पहले मन्दाग्नि, बीच में मध्यम तीक्ष्ण अग्नि दें तो मूंगा भस्म बन जायेगी।
चांदी की भस्म करने के लिये करौंदों की लुग्दी बनाकर ऊपर की विधि द्वारा सही सम्पुट बनाकर फूकें। इस प्रकार इक्कीस बार फूंकने पर चांदी की भस्म बनेगी।
• करौंदे के रस का सेवन रक्तचाप को कम करता है|
• झुर्रियों के निर्माण की प्रक्रिया को रोक कर, झुर्रियों का आना कम करता है|
• करौंदा कैल्शियम प्रदान कर हमारी हड्डियों तथा दांतों को मज़बूत बनाता है|
• इसमें कम कैलोरी होने के कारण, यह वज़न घटाने में भी सहायक है|
• दांतों को सडन से बचने के साथ सांस की दुर्गन्ध को रोकता है|
• करौंदे के रस का प्रतिदिन सेवन करके स्तन कैंसर से बचा जा सकता है|

21.5.16

अश्वगंधा के प्रयोग और उपचार







अश्वगंधा एक शक्तिवर्धक रसायन है। अश्वगंधा एक श्रेष्ठ प्रचलित औषधि है और यह आम लोगो का टॉनिक है इसके गुणों को देखते हुए इस जड़ी को संजीवनी बूटी कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा। यह शरीर की बिगडी हूई अवस्था (प्रकृति) को सुधार कर सुसंगठित कर शरीर का बहुमुखी विकास करता है। इसका शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढाती है और बुद्धि का विकास भी करती है। अश्वगंधा में एंटी एजिड, एंटी ट्यूमर, एंटी स्ट्रेस तथा एंटीआक्सीडेंट के गुण भी पाये जाते हैं।

घोडे जैसी महक वाला अश्वगंधा इसको खाने वाला घोडे की तरह ताकतवर हो जाता है। अश्वगंधा की जड़ ,पत्तियां ,बीज, छाल और फल अलग अलग बीमारियों के इलाज मे प्रयोग किया जाता है। यह हर उम्र के बच्चे जवान बूढ़े नर नारी का टोनिक है जिससे शक्ति, चुस्ती, सफूर्ति तथा त्वचा पर कान्ति (चमक) आ जाती है। 

अश्वगंधा का सेवन सूखे शरीर का दुबलापन ख़त्म करके शरीर के माँस की पूर्ति करता है। यह चर्म रोग, खाज खुजली, गठिया, धातु, मूत्र, फेफड़ों की सूजन, पक्षाघात, अलसर, पेट के कीड़ों, तथा पेट के रोगों के लिए यह बहुत उपयोगी है, खांसी, साँस का फूलना अनिद्रा, मूर्छा, चक्कर, सिरदर्द, हृदय रोग, शोध, शूल, रक्त कोलेस्ट्रॉल कम करने में स्त्रियों को गर्भधारण में और दूध बढ़ाने में मदद करता है, श्वेत प्रदर, कमर दर्द एवं शारीरिक कमजोरी दूर हो जाती हैं।

अश्वगंधा की जड़ के चूर्ण का सेवन 1 से 3 महीने तक करने से शरीर मे ओज, स्फूर्ति, बल, शक्ति तथा चेतना आती है। वीर्य रोगो को दूर कर के शुक्राणुओं की वृद्धि करता है, कामोतेजना को बढ़ाता है तथा पाचन शक्ति को सुधारता है। सूखिया और क्षय रोगों मे लाभकारी है। शक्ति दायक और हर तरह का बदन दर्द को दूर करता है। रूकी पेशाब भी खुल कर आती है। इसके पत्तो को पिस कर त्वचा रोग, जोड़ो के सूजन, घावों को भरने तथा अस्थि क्षय के लिए किया जाता है। गैस की बीमारी, एसिडिटी, जोडों का दर्द, ल्यूकोरिया तथा उच्च रक्तचाप में सहायक और कैंसर से लड़ने की क्षमता आ जाती है। अश्वगंधा एक आश्चर्यजनक औषधि है, कैंसर की दवाओं के साथ अश्वगंधा का सेवन करने से केवल कैंसर ग्रस्त कोशिकाएँ ही नष्ट होती है जब कि स्वस्थ (जीवन रक्षक) कोशिकाओं को कोई क्षति नही पहुँचती। अश्वगंधा मनुष्य को लंबी उम्र तक जवान रखता है और त्वचा पर लगाने से झुर्रियां मिटती है।

अश्वगंधा की जड़ का चूर्ण सेवन तीन माह तक लगातार सेवन करने से कमजोर (बच्चा, बड़ा, बुजुर्ग, स्त्री ,पुरुष) सभी की कमजोरी दूर होती है, चुस्ती स्फूर्ति आती है चेहरे ,त्वचा पर कान्ति (चमक) आती है शरीर की कमियों को पूरा करते हुए धातुओं को पुष्ट करके मांशपेशियों को सुसंठित करके शरीर को गठीला बनाता है। लेकिन इससे मोटापा नहीं आता।

समय से पहले बुढ़ापा नहीं आने देती और इसके तने की सब्जी बनाकर खिलने से बच्चो का सूखा रोग बिलकुल ठीक हो जाता है।

अश्वगंधा एक शक्तिवर्धक रसायन है। इसकी जड़ का चूर्ण दूध या घी के साथ लेने से निद्रा लाता है तथा शुक्राणुओं की वृद्धि करता है।यदि कोई वृद्ध व्यक्ति शरद ऋतु में इसका एक माह तक सेवन करता है तो उसकी मांस मज्जा की वृद्धि और विकास हो कर के वह युवा जैसा हल्का व् चुस्त महसूस करने लगता है।

अश्वगंधा का चूर्ण 15 दिन तक दूध या पानी से लेने पर बच्चो का शरीर पुष्ट होता है

मोटापा दूर करने के लिए अश्वगंधा, मूसली , काली मूसली की समान मात्रा लेकर कूट छानकर रख लें, इसका सुबह 1 चम्मच की मात्रा दूध के साथ लेना चाहिए। डायबिटीज के लिए अश्वगंध और मेथी का चूर्ण पानी के साथ लेना चाहिए।

इसके नियमित सेवन से हिमोग्लोबिन में वृद्धि होती है। कैंसर रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता बढाती है।
अश्वगंधा और बहेड़ा को पीसकर चूर्ण बना लें और थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर इसका एक चम्मच( टी स्पून) गुनगुने पानी के साथ सेवन करें। इससे दिल की धड़कन नियमित और मजबूत होती है। दिल और दिमाग की कमजोरी को ठीक करने के लिए एक एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण सुबह-शाम एक कप गर्म दूध से लें।



अश्वगंधा का चूर्ण को शहद एवं घी के साथ लेने से श्वांस रोगों में फायदा होता है और दर्द निवारक होने के कारण बदन दर्द में लाभ मिलता है।
समान मात्रा में अश्वगंधा, विधारा, सौंठ और मिश्री को लेकर बारीक चूर्ण बना लें। सुबह और शाम इस एक एक चम्मच चूर्ण को दूध के साथ सेवन करने से शरीर में शक्ति, ऊर्जा वीर्य बल बढ़ता है। या सुबह-शाम एक-एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण को घी और मिश्री मिले हुए दूध के साथ लेने से शरीर में चुस्ती स्फूर्ति आ जाती है।
अश्वगंधा के चूर्ण को शहद के साथ चाटने से शरीर बलवान होता है।हाई ब्लड प्रेशर के लिए 10 ग्राम गिलोय चूर्ण, 20 ग्राम सूरजमुखी बीज का चूर्ण, 30 ग्राम अश्वगंधा जड़ का चूर्ण और 40 ग्राम मिश्री लेकर इन सब को एक साथ मिळाले और शीशे के जार में भर कर रख ले और एक एक टी स्पून दिन में 2-3 बार पानी के साथ सेवन करें हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होगा।
एक गिलास पानी में अश्वगंधा के ताजा पत्ते उबाल कर छानकर चाय की तरह तीन-चार दिन तक पीयें, इससे कफ और खांसी ठीक होती है।अश्वगंधा की जड़ से तैयार तेल से जोड़ों पर मालिश करने से गठिया जकडन को कम करता है तथा अश्वगंधा के पत्तों को पिस कर लेप करने से थायराइड ग्रंथियों के बढ़ने की समस्या दूर होती है।
अश्वगंधा पंचांग यानि जड़, पत्ती, तना, फल और फूल को कूट छानकर एक-डेढ़ चम्मच (टेबल स्पून) सुबह शाम सेवन करने से जोड़ों का दर्द ठीक होता है। आधा चम्मच अश्वगंधा के चूर्ण को सुबह-शाम गर्म दूध तथा पानी के साथ लेने से गठिया रोगों को शिकस्त मिलती है तथा समान मात्रा में अश्वगंधा चूर्ण और घी में थोडा शक्कर मिलाकर सुबह-शाम खाने से संधिवात दूर होता है।
अश्वगंधा का चूर्ण में बराबर का घी मिलाकर या एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण में आधा चम्मच सोंठ चूर्ण और इच्छानुसार चीनी मिला कर सुबह-शाम नियमित सेवन से गठिया में आराम आता है।
अश्वगंधा और मेथी की समान मात्रा और इच्छानुसार गुड़ मिलाकर रसगुल्ले के समान गोलियां बना लें। और सुबह-शाम एक एक गोली दूध के साथ खाने से वात रोग खत्म हो जाते हैं।
अश्वगंधा और विधारा चूर्ण को सामान मात्रा में मिलाकर सुबह शाम एक-एक (टी स्पून) दूध के साथ लेने से वीर्य में वृद्धि होती है और संभोग क्षमता बढ़ती है, स्नायुतंत्र ठीक होकर क्रोध नष्ट हो जाता है, बार-बार आने वाले सदमे खत्म हो जाते हैं और जोड़ो का दर्द खत्म हो जाता है।
एक चम्मच अश्वगंधा के चूर्ण के साथ एक चुटकी गिलोय का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चाटने से सभी रोगो में लाभ मिलता हैं।
गिलोय की छाल और अश्वगंधा को मिलाकर शाम को गर्म पानी से सेवन करने से जीर्णवात ज्वर ठीक हो जाता है।
जीवाणु नाशक औषधियों के साथ अश्वगंधा चूर्ण को क्षय रोग (टी. बी.) के लिए देसी गाय के घी या मिश्री के साथ देते हैं।
एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण के क्वाथ (काढा) में चार चम्मच घी मिलाकर पाक बनाकर तीन माह तक सेवन करने से गर्भवती महिलाओं की शारीरिक दुर्बलता दूर होती हैं।
अश्वगंधा, शतावरी और नागौरी तीनो को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बनायें, फिर देशी घी में मिलाकर इस चूर्ण को मिट्टी के बर्तन में रखें, इसी एक चम्मच चूर्ण को मिश्री मिले दूध के साथ सेवन करने से स्तनों का आकार बढ़ता है।
मासिक-धर्म शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले समान मात्रा में अश्वगंधा चूर्ण और चीनी मिला कर रख ले इस चूर्ण की दो चम्मच सुबह खाली पेट पानी से सेवन करे। मासिक-धर्म शुरू होते ही इसका सेवन बंद कर दे।इससे मासिक धर्म सम्बन्धी सभी रोग समाप्त होंगे।
अश्वगंधा चूर्ण का लगातार एक वर्ष तक सेवन करने से शरीर के सारे दोष बाहर निकल जाते हैं पुरे शरीर की सम्पूर्ण शुद्धी होकर कमजोरी दूर होती है।
दूध में अश्वगंधा को अच्छी तरह पका कर छानकर उसमें देशी घी मिलकर माहवारी समाप्त होने के बाद महिला को एक दिन के लिए सुबह और शाम पिलाने से गर्भाशय के रोग ठीक हो जाते हैं और बाँझपन दूर हो जाता है।
अश्वगंधा का चूर्ण, गाय के घी में मिलाकर मासिक-धर्म स्नान के पश्चात् प्रतिदिन गाय के दूध या ताजे पानी के साथ 1 चम्मच महीने भर तक नियमित सेवन करने से स्त्री निश्चित तोर पर गर्भधारण करती है।अथवा अश्वगंधा की जड़ के काढ़े और लुगदी में चौगुना घी मिलाकर पकाकर सेवन करने से भी स्त्री गर्भधारण करती है।
गर्भपात का बार-बार होने पर अश्वगंधा और सफेद कटेरी की जड़ का दो-दो चम्मच रस गर्भवती महिला 5 - 6 माह तक सेवन करने से गर्भपात नहीं होता।
गर्भधारण न कर पाने पर अश्वगंधा के काढे़ में दूध और घी मिलाकर स्त्री को एक सप्ताह तक पिलाए या अश्वगंधा का एक चम्मच चूर्ण मासिक-धर्म के शुरू होने के लगभग सप्ताह पहले से सेवन करना चाहिए।
समानं मात्रा में अश्वगंधा और नागौरी को लेकर चूर्ण बना ले। मासिक-धर्म समाप्ति के बाद स्नान शुद्धी होने के उपरांत दो चम्मच इस चूर्ण का सेवन करें तो इससे बांझपन दूर होकर महिला गर्भवती हो जाएगी।
यह औषधि काया कल्प योग की एक प्रमुख औषधि मानी जाती है एक वर्ष तक नियमित सेवन काया कल्प हो जाता है।
रक्तशोधन के लिए अश्वगंधा और चोपचीनी का बारीक चूर्ण समान मात्रा में मिला कर हर रोज सुबह-शाम शहद के साथ चाटे।
अश्वगंधा कमजोर, सूखा रोग पीड़ित बच्चों व रोगों के बाद की कमजोरी में, शारीरिक और मानसिक थकान बुढ़ापे की कमजोरी, मांसपेशियों की कमजोरी व थकान आदि में अश्वगंधा की जड़ का चूर्ण देसी गाय का घी और पाक निर्धारित मात्रा में सेवन कराते हैं । मूल चूर्ण को दूध के अनुपात के साथ देते हैं।
सामान्य चेतावनी :-गर्म प्रकृति वालों के लिए अश्वगंधा का अधिक मात्रा में उपयोग हानिकारक होता है।
साधारणत: सामान्य आदमी अश्वगंधा जड़ का आधा चम्मच चूर्ण सुबह खाली पेट पानी से ले ऊपर से एक कप गर्म दूध या चाय लें सकते है।नाश्ता 15-20 मिनट बाद ही करें। किसी भी जडी -बूटी को सवेरे खाली पेट सेवन करने से अधिक लाभ होता है।
और कोई भी और्वेदिक औषधि तीन माह तक नियमित सेवन के बाद 10-15 दिन का अंतराल देकर दोबारा फिर से शुरू कर सकते है
आपको कोई बीमारी न हो तो भी अश्वगंधा का तीन माह तक नियमित सेवन किया जा सकता है। इससे शारीरिक क्षमता बढ़ने के साथ साथ सभी उक्त बिमारियों से निजात मिल जाती है|