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20.3.12

थाईरायड ग्रथि के रोग:हाईपर थायराई्डिस्म या हाईपो थाईराईडिस्म








                थायराईड  ग्रंथि के विकार और उपचार
                                                                                                     -डा.दयाराम आलोक
                                                                                                                             9926524852
                                                                                                                           

        स्वस्थ शरीर  में थाईराईड ग्रंथि टी३ और टी४ हारमोन  स्रवित करती है जो शरीर के विभिन्न  क्रिया-कलापों  को प्रभावित करते हैं। ये हारमोन शरीर की चयापचय क्रिया को प्रभावित  कर  रोगी के वजन ,रोगी को गर्मी,सर्दी कितनी लगती है और हमारे शरीर में कितनी केलरी दहन होती है इन सभी  बातों को नियंत्रित करने की क्षमता संपन्न होते हैं।

      हाईपर थायराईडिस्म रोग  में थाईराईड ग्रंथि बढ जाती है।ग्रंथि से अधिक मात्रा में हार्मोन्स का स्राव होने लगता है। ये हार्मोन्स हृदय  की गति बढा देते हैं ,इतना ही नहीं ये हार्मोन्स शरीर् के अन्य अंगों को भी प्रभावित उनकी क्रियाशीलता में अभिवृद्धि  कर देते हैं।
   पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों में यह रोग ज्यादा पाया जाता है।रजोनिवृति के समय, मानसिक तनाव,गर्भावस्था के समय और यौवनारंभ के समय यह रोग अधिक प्रभावशाली हो जाता है।

      रोग लक्षण:-
       इस रोग से पीड़ित रोगी का वजन कम होने लगता है, शरीर में अधिक कमजोरी मेहसूस होने लगती है, गर्मी सहन नहीं होती है, शरीर से अधिक पसीना आने लगता है, अंगुलियों में  कंपकपी होने लगती है तथा घबराहट होने लगती है। इस रोग के कारण रोगी का हृदय बढ़ जाता है, रोगी व्यक्ति को पेशाब बार-बार आने लगता है, याददाश्त कमजोर होने लगती है, भूख नहीं लगती है तथा उच्च रक्तचाप का रोग हो जाता है।  इस रोग के कारण रोगी के बाल भी झड़ने लगते है। इस रोग की गिरफ़्त में आने पर  स्त्रियों के मासिकधर्म में गड़बड़ी होने लगती है।अन्य लक्षण इस  प्रकार हैं-

घबराहट,बैचेनी

नींद न आना,निद्राल्पता

श्वास में कठिनाई

आंतों की अधिक क्रियाशीलता.

ज्यादा थकावट मेहसूस होना

हृदय की चाल बढ जाना.

हाथों में कंपन्न होना

स्त्रियों में मासिक धर्म की मात्रा कम होना या मासिक धर्म बंद हो जाना.

पर्याप्त खाना खाने के बावजूद  शरीर का वजन गिरते जाना।

मांसपेशियों  में कमजोरी मेहसूस होना

त्वचा का गर्म और आर्द्र रहना


हायपो थायराईडिस्म  याने थायराइड का सिकुड़ना-

इस रोग  में थायराईड ग्रन्थि के द्वारा कम हारमोन बनने लगती है।

थायराइड के सिकुड़ने का लक्षण:-

           रोगी व्यक्ति का वजन बढ़ने लगता है तथा उसे सर्दी लगने लगती है। रोगी को कब्ज  की शिकायत रहने लगती है।रोगी के बाल की चमक  खत्म होकर रुखे-सूखे हो जाते हैं।  रोगी की कमर में दर्द, नब्ज की गति धीमी हो जाना, जोड़ो में अकड़न तथा चेहरे पर सूजन हो जाना आदि लक्षण प्रकट हो जाते हैं।

थायराईड ग्रंथि  के रोगों के होने का कारण:-
     १)  थायराईड के  रोग अधिकतर शरीर में आयोडीन की कमी के कारण होते हैं।
२) यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है जो अधिकतर पका हुआ भोजन करते हैं तथा प्राकृतिक भोजन बिल्कुल नहीं करते हैं। प्राकृतिक भोजन करने से शरीर में आवश्यकतानुसार आयोडीन मिल जाता है लेकिन पके हुए खाने में आयोडीन नष्ट हो जाता है।
    ३)मानसिक, भावनात्मक तनाव, गलत तरीके से खान-पान  की वजह से भी रोग उत्पन्न होता है।

    थायराईड रोगों का प्राकृतिक और घरेलू पदार्थों से   उपचार:-
    १)  थायराईड रोगों का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक फलों का रस (नारियल पानी, पत्तागोभी, अनानास, संतरा, सेब, गाजर, चकुन्दर, तथा अंगूर का रस) पीना चाहिए तथा इसके बाद 3 दिन तक फल तथा तिल को दूध में डालकर पीना चाहिए। इसके बाद रोगी को सामान्य भोजन करना चाहिए जिसमें हरी सब्जियां, फल तथा सलाद और अंकुरित दाल अधिक मात्रा में हो। इस प्रकार से कुछ दिनों तक उपचार करने से   रोग ठीक हो जाता है।

    २)  इस रोग से पीड़ित रोगी को कम से कम एक  वर्ष तक फल, सलाद, तथा अंकुरित भोजन का सेवन करना चाहिए।

    ३)  सिंघाड़ा, मखाना तथा कमलगट्टे का सेवन करना भी लाभदायक होता है।


    ४)  घेंघा रोग को ठीक करने के लिए रोगी को 2 दिन के लिए उपवास रखना चाहिए और उपवास के समय में केवल फलों का रस पीना चाहिए। रोगी को एनिमा क्रिया करके पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद प्रतिदिन उदरस्नान तथा मेहनस्नान करना चाहिए।















      ५) थायराइड रोगों से पीड़ित रोगी को तली-भुनी चीजें, मैदा, चीनी, चाय, कॉफी, शराब, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।








      ६) एक कप पालक के रस में एक बड़ा चम्मच शहद मिलाकर फिर चुटकी भर जीरे का चूर्ण मिलाकर प्रतिदिन रात के समय में सोने से पहले सेवन करने से थायराइड रोग ठीक हो जाता है।








        ७) कंठ के पास गांठों पर भापस्नान देकर दिन में 3 बार मिट्टी की पट्टी बांधनी चाहिए और रात के समय में गांठों पर हरे रंग की बोतल का सूर्यतप्त तेल लगाना चाहिए।

          ८)  इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को उन चीजों का भोजन में अधिक प्रयोग करना चाहिए जिसमें आयोडीन की अधिक मात्रा हो।


          ९)  एक  गिलास पानी में 2 चम्मच साबुत धनिये को रात के समय में भिगोकर रख दें तथा सुबह के समय में इसे मसलकर उबाल लें। फिर जब पानी चौथाई भाग रह जाये तो खाली पेट इसे पी लें तथा गर्म पानी में नमक डालकर गरारे करें। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से थायराइड रोग ठीक हो जाता है।









            १०) थायराईड रोगों को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को अपने पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी करनी चाहिए तथा इसके बाद एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए और इसके बाद

            कटिस्नान करना चाहिए। इस प्राकृतिक चिकित्सा से रोग निवारण में आशातीत सफ़लता मिलती है।




              ११)  इस रोग से पीड़ित रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए ताकि थकावट न आ सकें और रोगी व्यक्ति को पूरी नींद लेनी चाहिए। मानसिक, शारीरिक परेशानी तथा भावनात्मक तनाव यदि रोगी व्यक्ति को है तो उसे दूर करना चाहिए और फिर प्राकृतिक चिकित्सा से अपना उपचार कराना चाहिए।

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                3.2.12

                फ़ोडे,फ़ुन्सियां,गुमडे की कुदरती पदार्थों से चिकित्सा.


                  फ़ोडे-फ़ुंसी,गुमडे- गांठ की सरल चिकित्सा.
                                                                                                                         डा.दयाराम आलोक 
                                                                                                                          9926524852
                                                                                                                          

                   फ़ोडॆ ,गुमडॆ ,गांठ होना त्वचा का रोग है।खासकर स्टेफ़िलोकोकस  जीवाणु इस रोग के लिये उत्तरदायी माना जाता है।इस रोग में त्वचा के रोम छिद्रों में संक्रमण होने से स्थानीय तौर पर पर पीडाकारक सूजन और ऊभार बन जाते हैं जिसमे पीप पड जाती है। एक या अधिक रोम छिद्र प्रभावित हो सकते हैं। स्वेद ग्रंथियों में संक्रमण होने से भी फ़ोडे-फ़ुन्सियां होती हैं। पककर फ़ूटने पर पीप स्राव होता है। साधारणतया यह रोग घरेलू ईलाज से ठीक हो जाता है। लेकिन पुराने रोग के में ईलाज कुछ लंबे समय लगता है।
                नीचे फ़ोडे-फ़ुन्सियों,घुमडे- गांठ  के घरेलू उपचार दिए गये हैं जिनसे रोग शीघ्र ही नियंत्रित होकर रोगी स्वस्थ्य हो जाता है--
                Protected by Copyscape DMCA Copyright Detector१) करेले का रस ५० मिलि में एक निंबू का रस मिलाकर रोज सुबह खाली पेट कुछ दिन तक लेते रहने से शरीर की गुमडे-गांठ की प्रवत्ति से मुक्ति मिल जाती है।









                २) जीरा पानी के साथ पीसकर पेस्ट जैसा बनाकर फ़ोडे-फ़ुंसियों पर लगाना चाहिये।






                ३) नागरवेल पान को मामूली तपायें फ़िर उस पर अरंडी का तेल चुपडकर सूजन वाले स्थान पर लगाकर पट्टी बांधें। २-३ घंटे में पान बदलते रहें। फ़ोडा फ़ूटकर पीप निकल जायेगा।












                ४) मक्का(कोर्न) का आटा का प्रयोग लाभदायक है। १००मिलि पानी उबालें उसमे मक्का का आटा घोलते जायें। जब पेस्ट जैसा गाढा हो जाये तब आंच से उतारलें। इसे फ़ोडे फ़ुंसी,गुमड गांठ पर लगाकर पट्टी बांधें। २-३ घंटे के अंतर पर यह प्रक्रिया पुन: करते रहने से फ़ोडा पक जाता है और पीप बाहर निकल जाती है।

                ५) २०० मिलि दूध ऊबालें। इसमें १५ ग्राम नमक धीरे-धीरे मिलाते जाएं। जल्दी मिलाने से दूध फ़ट जाएगा। अब इसे गाढा बनाने के लिये ब्रेड के टुकडे उसमें डालें।पेस्ट जैसा बनने पर आंच से उतारें। इसे फ़ोडे फ़ुंसी पर हर तीन घंटे बाद लगाकर पट्टी बांधते रहने से कच्चा फ़ोडा-गांठ पक कर फ़ूट निकलता है।यह ध्यान देने योग्य है कि पीप त्वचा के अन्य हिस्से पर न लगे अन्यथा संक्रमण फ़ैलने का खतरा रहता है। फ़ोडा-फ़ुंसी रोगी के टावेल,कपडे,दाढी का सामान आदि अन्य व्यक्ति उपयोग नहीं करें।

                ६) प्याज और लहसुन फ़ोडे फ़ुंसी के उत्तम उपचारों मे शुमार होते हैं।प्याज और लहसुन का रस बराबर मात्रा में मिलाकर फ़ोडे-फ़ुंसी पर लगाने से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

                ७) हल्दी का प्रयोग हितकारी उपाय है। ३-४ हल्दी की गांठें आग में जलाएं फ़िर बारीक पीसकर १००मिलि पानी में घोल लें। यह मिश्रण फ़ोडे-फ़ुंसी पर लगाते रहने से फ़ोडे पक कर फ़ूट जाते है। हल्दी में जीवाणु नाशक गुण होते हैं।




                ८) प्याज में जीवाणु नाशक गुण होते हैं। चाकू से प्याज की चीरें काट लें ।फ़ोडे फ़ुंसी पर रखकर पटी बांधें। कुछ ही बार ऐसा करने से फ़ोडा पक जाएगा। मामूली दबाकर पीप निकाल दें।






                ९) गरम पानी में कपडा डुबोकर निचोडकर ३-४ तह(लेयर) बनाकर यह पट्टी फ़ोडे पर रखने और ठंडा हो जाने पर फ़िर गरम पटी रखते रहने से भी फ़ोडा-गांठ शीघ्र फ़ूट जाता है।

                १०) चेहरे की फ़ुंसियों को दबाकर पीप नहीं निकालना चाहिये वर्ना चेहरे पर दाग बाकी रह जाएंगे और उनको ठीक करने का अतिरिक्त उपचार करना होगा।



                ११) एक गिलास जल में एक चम्मच हल्दी पावडर घोलकर रोज सुबह पीने से कुछ ही रोज में खून साफ़ होकर फ़ोडे फ़ुंसियां ठीक हो जाती हैं।









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                10.4.11

                दन्तशूल(toothache) के घरेलू उपचार

                दंत-पीडा,दांत के रोगों की सरल चिकित्सा.
                                                                          - डा.दयाराम आलोक
                                                                                                                          9926524852

                 दांत,मसूढों और जबडों में होने वाली पीडा को दंतशूल  से परिभाषित किया जाता है। हममें से कई लोगों को ऐसी पीडा अकस्मात हो जाया करती है। दांत में कभी सामान्य तो कभी असहनीय दर्द उठता है। रोगी को चेन नहीं पडता। मसूडों में सूजन आ जाती है। दांतों में सूक्छम जीवाणुओं का संक्रमण हो जाने से स्थिति और बिगड जाती है। मसूढों में घाव बन जाते हैं जो अत्यंत कष्टदायी होते हैं।दांत में सडने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है और उनमें केविटी बनने लगती है।जब सडन की वजह से दांत की नाडियां प्रभावित हो जाती हैं तो पीडा अत्यधिक बढ जाती है।

                   प्राकृतिक उपचार दंत पीडा में लाभकारी होते हैं। सदियों से हमारे बडे-बूढे दांत के दर्द में घरेलू पदार्थों का उपयोग करते आये हैं।  यहां हम ऐसे ही प्राकृतिक उपचारों की चर्चा कर रहे हैं।



                १) बाय बिडंग १० ग्राम,सफ़ेद फ़िटकरी १० ग्राम लेकर तीन लिटर जल में उबालकर जब मिश्रण एक लिटर रह जाए तो आंच से उतारकर ठंडा करके एक बोत्तल में भर लें। दवा तैयार है। इस क्वाथ से सुबह -शाम कुल्ले करते रहने से दांत की पीडा दूर होती है और दांत भी मजबूत बनते हैं।





                २) लहसुन में जीवाणुनाशक तत्व होते हैं। लहसुन की एक कली थोडे से सैंधा नमक के साथ पीसें फ़िर इसे दुखने वाले दांत पर रख कर दबाएं। तत्काल लाभ होता है। प्रतिदिन एक लहसुन कली चबाकर खाने से दांत की तकलीफ़ से छुटकारा मिलता है।






                ३) हींग दंतशूल में गुणकारी है। दांत की गुहा(केविटी) में थोडी सी हींग भरदें। कष्ट में राहत मिलेगी।

                ४)  तंबाखू और नमक महीन पीसलें। इस टूथ पावडर से रोज दंतमंजन करने से दंतशूल से मुक्ति मिल जाती है।

                ५) बर्फ़ के प्रयोग से कई लोगों को दांत के दर्द में फ़ायदा होता है। बर्फ़ का टुकडा दुखने वाले दांत के ऊपर या पास में रखें। बर्फ़ उस जगह को सुन्न करके लाभ पहुंचाता है।


                ६) कुछ रोगी गरम सेक से लाभान्वित होते हैं। गरम पानी की थैली से सेक करना प्रयोजनीय है।











                ७)  प्याज कीटाणुनाशक है। प्याज को कूटकर लुग्दी दांत पर रखना हितकर उपचार है। एक छोटा प्याज नित्य भली प्रकार चबाकर खाने की सलाह दी जाती है। इससे दांत में निवास करने वाले जीवाणु नष्ट होंगे।








                ८) लौंग के तैल का फ़ाया दांत की केविटी में रखने से तुरंत फ़ायदा होगा। दांत के दर्द के रोगी को दिन में ३-४ बार एक लौंग मुंह में रखकर चूसने की सलाह दी जाती है।






                ९) नमक मिले गरम पानी के कुल्ले करने से दंतशूल नियंत्रित होता है। करीब ३०० मिलि पानी मे एक बडा चम्मच नमक डालकर तैयार करें।दिन में तीन बार कुल्ले करना उचित है।

                १०) पुदिने की सूखी पत्तियां  पीडा वाले दांत के चारों ओर  रखें। १०-१५ मिनिट की अवधि तक रखें। ऐसा दिन में १० बार करने से लाभ मिलेगा।

                ११) दो ग्राम हींग नींबू के रस में पीसकर पेस्ट जैसा बनाले। इस पेस्ट  से दंत  मंजन करते रहने से दंतशूल का निवारण होता है।

                १२। मेरा अनुभव है कि विटामिन सी ५०० एम.जी. दिन में दो बार और केल्सियम ५००एम.जी दिन में एक बार लेते रहने से दांत के कई रोग नियंत्रित होंगे और दांत भी मजबूत बनेंगे।

                १३)  मुख्य बात ये है कि  सुबह-शाम दांतों की स्वच्छता करते रहें। दांतों के बीच की जगह में अन्न कण फ़ंसे रह जाते हैं और उनमें जीवाणु पैदा होकर दंत विकार उत्पन्न करते हैं।

                १४) शकर का उपयोग हानिकारक है। इससे दांतो में जीवाणु पैदा होते हैं। मीठी वसुएं हानिकारक हैं। लेकिन कडवे,ख्ट्टे,कसेले स्वाद के पदार्थ दांतों के लिये हितकर होते है। नींबू,आंवला,टमाटर ,नारंगी का नियमित उपयोग  लाभकारी है। इन फ़लों मे जीवाणुनाशक तत्व होते हैं। मसूढों से अत्यधिक मात्रा में खून जाता हो तो नींबू का ताजा रस पीना  लाभकारी है।



                १५) हरी सब्जियां,रसदार फ़ल भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।







                १६)  दांतों की  केविटी में दंत चिकित्सक केमिकल मसाला भरकर इलाज करते हैं। सभी प्रकार के जतन करने पर भी दांत की पीडा शांत न हो तो दांत उखडवाना ही आखिरी उपाय है।

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                31.1.11

                हृदय- रोग निवारक आसान उपचार

                हृदय-रोग : सरल उपचार
                                                                - डा.दयाराम आलोक
                                                                          9926524852                               
                                                                                  


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                       हृदय हमारे शरीर का अति महत्वपूर्ण अंग है। हृदय का कार्य  शरीर के सभी अवयवों को आक्सीजनयुक्त रुधिर पहुंचाना है और आक्सीजनरहित दूषित रक्त को वापस फ़ेफ़डों को पहुंचाना है। फ़ेफ़डे दूषित  रक्त को  आक्सीजन मिलाकर शुद्ध करते हैं। हृदय के कार्य में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होने पर हृदय के कई प्रकार के रोग जन्म लेते हैं।हृदय संबंधी अधिकांश रोग कोरोनरी धमनी से जुडे होते हैं। कोरोनरी धमनी में विकार आ जाने पर हृदय की मांसपेशियो और हृदय को आवेष्टित करने वाले  ऊतकों को आवश्यक मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता है।यह स्थिति भयावह है और तत्काल सही उपचार नहीं मिलने पर रोगी की शीघ्र ही मृत्यु हो जाती है। इसे हृदयाघात याने हार्ट अटैक कहते हैं।   दर असल हृदय को खून ले जाने वाली नलियों में खून के थक्के जम जाने की वजह से  रक्त का प्रवाह बाधित हो जाने से यह रोग पैदा होता है।
                    धमनी काठिन्य हृदय रोग में धमनियों का लचीलापन कम हो जाता है और धमनियां की भीतरी दीवारे संकुचित होने से रक्त परिसंचरण में व्यवधान आता है। इस स्थिति में शरीर के अंगों को पर्याप्त मात्रा में खून नहीं पहुंच पाता है। हृदय की मासपेशिया धीरे-धीरे कमजोर हो जाने की स्थिति को कार्डियोमायोपेथी कहा जाता है।हृदय शूल को एन्जाईना पेक्टोरिस कहा जाता है। धमनी कठोरता से पैदा होने वाले इस रोग में ्वक्ष में हृदय के आस-पास जोर का दर्द उठता है।रोगी तडप उठता है।
                   महिलाओं की तुलना में पुरुषों में हृदय संबंधी रोग ज्यादा देखने में आते है।
                   अब हम हृदय रोग के प्रमुख कारणों पर विचार प्रस्तुत करते हैं--

                   lमोटापा

                धमनी की कठोरता

                उच्च रक्त चाप

                हृदय को रक्त ले जाने वाली खून की नलियों में ब्लड क्लाट याने खून का थक्का जमना

                विटामिन  सी और बी काम्प्लेक्स की कमी होना


                 खून की नलियों में कोलेस्टरोल जमने से रक्त प्रवाह में बाधा पडने लगती है। कोलेस्टरोल मोम जैसा पदार्थ होता है जो हमारे शरीर के प्रत्येक हिस्से में पाया जाता है। वांछित मात्रा में कोलेस्टरोल का होना अच्छे स्वास्थ्य के लिये बेहद जरुरी है। लेकिन अधिक वसायुक्त्र भोजन पदार्थों का उपयोग करने से खराब कोलेस्टरोल जिसे लो डॆन्सिटी लाईपोप्रोटीन कहते हैं ,खून में बढने लगता है और अच्छी क्वालिटी का कोलेस्टरोल जिसे हाई डेन्सिटी लाईपोप्रोटीन कहते हैं ,की मात्रा कम होने लगती है। कोलेस्टरोल की बढी हुई मात्रा हृदय के रोगों  का अहम कारण माना गया है। वर्तमान समय में गलत खान-पान और टेन्शन भरी जिन्दगी की वजह से हृदय रोग से मरने वाले लोगों का आंकडा बढता ही जा रहा है।

                   माडर्न मेडीसिन में हृदय रोगों के लिये अनेकों दवाएं आविष्कृत हो चुकी हैं। लेकिन कुदरती घरेलू पदार्थों का उपयोग कर हम दिल संबधी रोगों का सरलता से समाधान कर सकते हैं।सबदे अच्छी बात  है कि  ये उपचार आधुनिक चिकित्सा के साथ लेने में भी कोई हानि नहीं है।




                १) लहसुन में एन्टिआक्सीडेन्ट तत्व होते है और हृदय रोगों में आशातीत लाभकारी घरेलू पदार्थ है।लहसुन में खून को पतला रखने का गुण होता है । इसके नियमित उपयोग से  खून की नलियों में कोलेस्टरोल नहीं जमता है। हृदय रोगों से निजात पाने में लहसुन की उपयोगिता कई वैग्यानिक शोधों में प्रमाणित हो चुकी है। लहसुन की ४ कली चाकू से बारीक काटें,इसे ७५ ग्राम दूध में उबालें। मामूली गरम हालत में पी जाएं। भोजन पदार्थों में भी लहसून प्रचुरता से इस्तेमाल करें।



                २) अंगूर हृदय रोगों में उपकारी है। जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक का दौरा पड चुका हो उसे कुछ दिनों तक केवल अंगूर के रस  के आहार पर रखने के अच्छे परिणाम आते हैं।इसका उपयोग हृदय की बढी हुई धडकन को नियंत्रित करने में सफ़लतापूर्वक किया जा सकता है। हृद्शूल में भी लाभकारी है।







                ३)  शकर कंद  भूनकर खाना हृदय को सुरक्षित रखने में उपयोगी है। इसमें हृदय को पोषण देने वाले तत्व पाये जाते हैं। जब तक बाजार में शकरकंद उपलब्ध रहें उचित मात्रा में उपयोग करते रहना चाहिये।











                ५) आंवला विटामिन सी का कुदरती स्रोत है। अत: यह सभी प्रकार के दिल के रोगों में प्रयोजनीय है।




                  







                ’६)  सेवफ़ल कमजोर हृदय वालों के लिये बेहद लाभकारी फ़ल है। सीजन में सेवफ़ल  प्रचुरता से उपयोग करें।









                ७)  प्याज हृदय रोगों में हितकारी है। रोज सुबह ५ मि लि  प्याज का रस खाली पेट सेवन करना चाहिये। इससे खून में बढे हुए कोलेस्टरोल को नियंत्रित करने भी मदद मिलती है।










                ८) हृदय रोगियों के लिये धूम्रपान बेहद नुकसानदेह साबित हुआ है। धूम्र पान करने वालों को हृदय रोग होने की दूगनी संभावना रहती है।









                ९)  जेतून का तैल हृदय रोगियों में परम हितकारी सिद्ध हुआ है। भोजन बनाने में अन्य तैलों की बजाय ओलिव आईल का ही इस्तेमाल करना चाहिये। ओलिव आईल के प्रयोग से खून में अच्छी क्वालिटी का कोलेस्टरोल(हाई डेन्सिटी लिपोप्रोटीन) बढता है।






                १०) निंबू हृदय रोगों में उपकारी फ़ल है। यह रक्तवहा नलिकाओं में कोलेस्टरोल नहीं जमने देता है। एक गिलास मामूली गरम जल में एक निंबू निचोडें,इसमें दो चम्मच शहद भी मिलाएं और पी जाएं। यह प्रयोग  सुबह के वक्त  करना चाहिये।









                ११) प्राकृतिक चिकित्सा में रात को सोने से पहिले मामूली गरम जल के टब में गले तक डूबना  हृदय रोगियों के लिये हितकारी बताया गया है। १०-१५ मिनिट टब में बैठना चाहिये। यह प्रयोग हफ़्ते मॆ दो बार करना कर्तव्य है।





                १२) कई अनुसंधानों में यह सामने आया है कि विटामिन ई हृदय रोगों में उपकारी है। यह हार्ट अटैक से बचाने वाला विटामिन है। इससे हमारे शरीर की रक्त कोषिकाओं में पर्याप्त आक्सीजन का संचार होता है।




                १३) हृदय रोग से मुक्ति के लिये  ज्यादा शराब और नमक का व्यवहार निषिद्ध माना गया है।














                १४) आयुर्वेदिक वैध्य अर्जुन पेड की छाल से बने अर्जुनारिष्ट का प्रयोग करने की सलाह देते हैं।










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                25.1.11

                मूत्राषय प्रदाह(cystitis)का कुदरती घरेलू पदार्थों से उपचार.

                मूत्राषय  प्रदाह (सिस्टाईटीज) रोग की सरल चिकित्सा.                        
                                                           - डा.दयाराम आलोक:
                                                                          9926524852

                                   मूत्राषय   में रोग-जीवाणुओं का संक्रमण होने से मूत्राषय प्रदाह रोग उत्पन्न होता है। निम्न मूत्र पथ के अन्य अंगों किडनी, यूरेटर और प्रोस्टेट ग्रंथि और योनि में भी संक्रमण का असर देखने में आता है। इस रोग  के कई कष्टदायी लक्छण होते हैं जैसे-तीव्र गंध वाला पेशाब होना,पेशाब का रंग बदल जाना, मूत्र त्यागने में जलन और दर्द  अनुभव होना, कमजोरी मेहसूस होना,पेट में पीडा और शरीर में बुखार की हरारत रहना। हर समय मूत्र त्यागने की ईच्छा बनी रहती है। मूत्र पथ में जलन  बनी रहती है। मूत्राषय में सूजन आ जाती है।

                     यह रोग पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में ज्यादा देखने में आता है। इसका कारण यह है कि स्त्रियों की पेशाब नली (दो इंच) के बजाय पुरुषों की मूत्र नलिका ७ इंच लंबाई  की होती है। छोटी नलिका से होकर संक्रमण सरलता से मूत्राषय को आक्रांत कर लेता है। गर्भवती स्त्रियां और सेक्स-सक्रिय औरतों में मूत्राषय प्रदाह रोग अधिक पाया जाता है। रितु निवृत्त महिलाओं में भी यह रोग अधिक होता है।

                     इस रोग में मूत्र खुलकर नहीं होता है और जलन की वजह से रोगी पूरा पेशाब नहीं कर पाता है और मूत्राषय में पेशाब बाकी रह जाता है। इस शेष रहे मूत्र में जीवाणुओं का संचार होकर रोगी की स्थिति ज्यादा खराब हो सकती है।

                    आधुनिक चिकित्सक एन्टीबायोटिक दवाओं से इस रोग को काबू में करते हैं लेकिन कुदरती और घरेलू पदार्थॊं  के उपचार  इस रोग में अधिक फ़लदायी होते है।

                १)  खीरा ककडी का रस इस रोग में अति लाभदायक है। २०० मिलि ककडी के रस में एक बडा चम्मच नींबू का रस  और एक चम्मच शहद मिलाकर हर तीन घंटे के फ़ासले से पीते रहें।






                २) पानी और अन्य तरल पदार्थ प्रचुर मात्रा में प्रयोग करें। प्रत्येक १० -१५ मिनिट के अंतर पर एक गिलास पानी या फ़लों का रस पीयें। सिस्टाइटिज नियंत्रण का यह रामबाण उपचार है।


                ३)  मूली के पत्तों का रस लाभदायक है। १०० मिलि रस दिन में ३ बार प्रयोग करें।



                ४)  नींबू का रस इस रोग में उपयोगी है। वैसे तो नींबू स्वाद में खट्टा होता है लेकिन गुण क्छारीय हैं। नींबू का रस मूत्राषय में उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक होता है। मूत्र में रक्त आने की स्थिति में भी लाभ होता है।









                ५)  पालक रस १२५ मिलि में नारियल का पानी मिलाकर पीयें। तुरंत फ़ायदा होगा। पेशाब में जलन मिटेगी।








                ६)  पानी में मीठा सोडा यानी सोडा बाईकार्ब मिलाकर पीने से तुरंत लाभ प्रतीत होता है लेकिन इससे रोग नष्ट नहीं होता। लगातार लेने से स्थिति ज्यादा बिगड सकती है।

                ७) गरम पानी से स्नान करना चाहिये। पेट और नीचे के हिस्से में गरम पानी की बोतल से सेक करना चाहिये। गरम पानी के टब में बैठना लाभदायक है।

                ८)  मूत्राषय प्रदाह रोग की शुरुआत में तमाम गाढे भोजन बंद कर देना चाहिये।दो दिवस का  उपवास करें। उपवास के दौरान पर्याप्त मात्रा में तरल,पानी,दूध लेते रहें।

                ९)  विटामिन सी (एस्कार्बिक एसिड) ५०० एम जी दिन में ३ बार लेते रहें। मूत्राषय प्रदाह निवारण में उपयोगी है।

                १०) ताजा भिंडी लें। बारीक काटॆं। दो गुने जल में उबालें। छानकर यह काढा दिन में दो बार पीने से मूत्राषय प्रदाह की वजह से होने वाले पेट दर्द में राहत मिल जाती है।








                ११)  आधा गिलास मट्ठा में आधा गिलास जौ का मांड मिलाएं इसमें नींबू का रस ५ मिलि मिलाएं और पी जाएं। इससे मूत्र-पथ के रोग नष्ट होते है।






                १२) आधा गिलास  गाजर का रस में इतना ही पानी मिलाकर पीने से मूत्र की जलन दूर होती है। दिन में दो बार प्रयोग कर सकते हैं।







                सूचना:- मेरे उक्त लेख को बिना अनुमति  कापी पेस्ट कर  मनोज पंवार ने  निम्न ब्लोग पर स्थापित कर लिया है-

                http://herbalhealth.manojpanwar.com



                यह सायबर अपराध है। कार्यवाही की जाएगी।
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