19.1.17

मोच, चोट और सूजन के उपाय

   


   कई बार काम करते समय, खेलते कूदते सीढ़ी चढ़ते हमें यह मालूम ही नहीं हो पाता कि हमारे हाथ-पाँव या कमर में मोच लग गई है, लेकिन कुछ समय बाद उस जगह दुःखने पर हमें यह पता लगता है। मोच आने पर उस अंग पर सूजन आ जाती है और काफी दर्द होने लगता है , अगर आपको असहनीय दर्द या ज्यादा परेशानी है तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ ,लेकिन यदि मोच छोटी है तो आप उस का घरेलू उपचार भी कर सकते है ।चोट कभी भी लग सकती है और मोच कभी भी आ सकती है और यह ऐसे समय पर
आती है जब आप या तो अपने घर पर होतें हैं या एैसी जगह जो अस्पताल से काफी
दूर होता है एैसे समय पर आप कुछ घरेलू  नुस्खे अपना सकते हैं जो प्राचीन काल
में इस्तेमाल किये जाते रहे हैं और जिनसे मोच, चोट और सूजन में राहत मिल सकती
है।
मोच, चोट और सूजन के लिए घरेलू उपाय

*आक के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है। सूजन दूर हो जाती है।
*चोट के कारण कटे हुए स्थान पर पिसी हुई हल्दी भर देने से खून का बहना बंद
हो जाता है तथा हल्दी कीटाणुनाशक भी होती है।



* 2 कली लहसुन, 10 ग्राम शहद, 1 ग्राम लाख एवं 2 ग्राम मिश्री इन सबको चटनी जैसा पीसकर, घी डालकर देने से टूटी हुई अथवा उतरी हुई हड्डी जल्दी जुड़ जाती है।

*लकड़ी-पत्थर आदि लगने से आयी सूजन पर हल्दी एवं खाने का चूना एक साथ पीसकर गर्म लेप करने से अथवा इमली के पत्तों को उबालकर बाँधने से सूजन उतर जाती है।
* यदि आप के पैर में मोच आ गई है तो आप तेजपात को पीसकर मोच वाले स्थान
पर लगायें ।
*मोच अथवा चोट के कारण खून जम जाने एवं गाँठ पड़ जाने पर बड़ के कोमल पत्तों पर शहद लगाकर बाँधने से लाभ होता है।
*अगर आपके पैर या हाथ में मोच आ गई है तो बिना देर किए थोडा सा बर्फ एक कपड़े में रखकर सूजन वाले जगह पर लगायें इससे सूजन कम हो जाता है। बर्फ लगाने से सूजन वाले जगह पर रक्त का संचालन अच्छी तरह से होने लगता है जिससे दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है।
* हल्दी और सरसों के तेल को मिला लें और इसे हल्की आंच में गर्म करके फिर इसे
मोच वाली जगह पर लगाएं और किसी कपड़े से इसे ढक दें।
*अरनी के उबाले हुए पत्तों को किसी भी प्रकार की सूजन पर बाँधने से तथा 1 ग्राम हाथ की पीसी हुई हल्दी को सुबह पानी के साथ लेने से सूजन दूर होती 



* पका हुआ लहसुन और अजवायन को सरसों के तेल में मिलाकर गर्म करें। और फिर इस तेल की मालिश मोच वाले हिस्से पर करें। आपको राहत मिलेगी।

* महुआ और तिल को कपड़े में बांध कर लगाने से हड्डी की मोच ठीक हो सकती
है।
* 1 से 3 ग्राम हल्दी और शक्कर फाँकने और नारियल का पानी पीने से तथा खाने का चूना एवं पुराना गुड़ पीसकर एकरस करके लगाने से भीतरी चोट में तुरंत लाभ होता है|
* एलोवेरा के गूदे को सूजन और मोच वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।
* इमली की पत्तियों को पीसें और इसे आग में थोड़ा गुनगुना करें। और इसे मोच
वाली जगह पर लगाने से दर्द से तुरंत राहत मिलती है।
* ढ़ाक के गोंद को पानी में मिलाकर उसका लेप करने से चोट में सूजन सही हो
जाती है ।
*मोच को ठीक करने का एक और कारगर उपाय यह है कि आप अनार के पत्ते पीसकर मोच वाली जगह पर मलें।
* चोट किसी भी स्थान पर लगी हो तो आप कपूर और घी की बराबर मात्रा में मिलाकर चोट वाले स्थान पर कपडे से बांधे एैसा करने से चोट का दर्द कम हो जाता
है तथा रक्त बहना भी बंद हो जाता है।



* सरसों के तेल में नमक को मिला लें और इसे गर्म करके मोच वाली जगह पर लगाएं। एैसा करने मोच में राहत मिलती है।
* हाथ पैरों की ऐठन और पैर की मोच पर अखरोट का तेल लगाने से दर्द से राहत
मिलती है।
* चूने को शहद के साथ मिला लें और इससे मोच वाली जगह पर आराम से मालिश
करें। इस उपाय से भी मोच में बहुत राहत मिलती है।

मोच, चोट और सूजन मे लेने योग्य आहार

*विटामिन डी आपकी हड्डियों के निर्माण और मरम्मत के लिए, आपके शरीर को कैल्शियम और फॉस्फोरस के अवशोषण में मदद करता है। अंडे, दूध और कुछ प्रकार की मछलियाँ विटामिन डी प्रदान करती हैं; सूर्य के सम्मुख होने पर आपका शरीर भी इसका निर्माण करता है।
*जिंक घाव और ऊतकों की मरम्मत में सहायता करता है और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। जिंक के उत्तम स्रोत में जौ, गेहूँ, चिकन और पालक आते हैं।



*ओमेगा 3 फैटी एसिड सूजन कम करने में सहायक होते हैं, इन एसिड्स के उत्तम स्रोत में मीठे पानी की मछली, अखरोट, अलसी के बीज और पत्तागोभी आते हैं।
*माँसपेशियों और जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है। प्रोटीन के अच्छे स्रोतों में अंडा, चिकन, मछली, मेवे दूध आदि हैं।
*कैल्शियम हड्डियों को पोषण देने वाला खनिज है। कैल्शियमयुक्त भोज्य पदार्थों में ब्रोकोली, दूध, केल, फलियाँ, पनीर, सोयाबीन, दही, मछली आदि हैं।
*बीटा कैरोटीन कोलेजन का, जो कि मोच के दौरान क्षतिग्रस्त स्नायुओं का निर्माण करता है, मुख्य कारक तत्व है। प्राकृतिक बीटा कैरोटीन के अच्छे स्रोतों में गहरे हरे रंग की पत्तेदार सब्जियाँ जैसे पालक या केल, ब्रोकोली, और गाजर आदि हैं।
*विटामिन सी शरीर की सूजन घटाने में सहायक होता है। विटामिन सी के बढ़िया स्रोतों में पत्तागोभी, शिमला मिर्च, कीवी, खट्टे फल जैसे संतरे, नीबू और ग्रेपफ्रूट आदि हैं।


18.1.17

पानी से चिकित्सा :जल के औषधीय गुण

   

    जल प्रकृति का अनुपम और अनमोल उपहार है। यदि धरती पर जल नहीं होता तो आज जीवन संभव नहीं होता। जल केवल प्यास बुझाने की वस्तु मात्र नहीं है। अपितु यह जीवनदाता है यानि इंसान की मूल जरूरत है। इसके बगैर एक सप्ताह भी जिंदा रहना मुश्किल है। हमारे शरीर में 70 प्रतिशत जल का भाग है। यही कारण है कि इसकी कमी जहां अनेक रोगों का कारण बनती है, वहीं इसकी समुचित मात्रा रोगों से निजात दिलाती है।
  संसार में जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां हैं उनमें जल चिकित्सा सबसे प्राचीन है। प्राकृतिक, आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में इसका काफी महत्ता बताई गई है। अब तो इसे एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में भी अपनाया जा रहा है। जापान में तो जल चिकित्सा पद्धति काफी लोकप्रिय है। तथा अनेक रोगों का उपचार इससे किया जा रहा है। यह किसी औषधि से कम नहीं है।
  जल को आप साधारण वस्तु न समझें। क्या आप जानते हैं कि यह हमारे शरीर को किस तरह से स्वस्थ और निरोगी रखकर दीर्घायु बनाता है। आइए, डालते हैं जल के औषधीय गुणों पर एक नजर-

* जल के सेवन से शरीर की नाड़ियां उत्तेजित होती हैं तथा मांसपेशियां संकुचित।
*जल की कमी से जोड़ों को आधार प्रदान करने वाली गद्दियों में लचीलापन समाप्त हो जाता है थथा वे सिकुड़ जाती हैं।
* जल का सेवन नए ऊतकों के निर्माण में सहायक होता है तथा उन्हें सुरक्षात्मक कुशन प्रदान करता है।
* शरीर में लगातार मेटाबोलिक क्रिया चलती रहती है जिसमें पानी की लगातार जरूरत होती है। इन्हीं क्रियाओं के फलस्वरूप हमें एनर्जी मिलती है। प्रातःकाल पिया गया पानी उषापान कहलाता है। इससे मनुष्य के यौवन और आयु में वृद्धि होती है।
* जो लोग पानी कम पीते हैं उनकी याददाश्त कमजोर होती है।
40. पानी पीने से मुंह में लार और थूक बनता है। लार पाचन क्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
1. पानी पीने से थकान दूर होती है। तथा राहत मिलती है। इसलिए जब भी थके-मांदे घर लौंटे तो एक गिलास पानी अवश्य पिएं।
* यदि बुखार बहुत तेज हो तो रोगी को हर आधे घंटे में ठंडा पानी पिलाते रहना चाहिए।
* यदि कोई व्यक्ति मूर्छित हो गया हो तो उसके चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारें या उसे शीतल जल से भरे टब में लिटा देना चाहिए।
* बच्चों के सूखा रोग में प्रतिदिन ठंडे जल से स्नान कराने से लाभ होता है।
* यदि टॉसिल्स बनने की शिकायत हो तो गर्म पानी में एक चुटकी नमक डालकर गरारे करने से लाभ होता है।
* यदि कब्ज की शिकायत हो तो रात को सोते समय तथा सुबह उठने के बाद गर्म जल का सेवन करना चाहिए।
* सर्दियों में कफ की शिकायत हो तो सूर्य तापित जल का सेवन करना चाहिए।
* काली खांसी होने पर भी प्रतिदिन शीतल जल से ही स्नान करने से राहत मिलती है।
* हिस्टीरिया में रोजाना शीतल जल से स्नान करने से दौरे की आकृति और तीव्रता कम हो जाती है।
* आग से शरीर का कोई अंग जल या झुलस जाए तो तुरंत प्रभावित अंग पर ठंडा पानी का छिड़काव करें। यह छिड़काव तब तक करें जब तक कि जलन पूर्णतः बंद नहीं हो जाती।



* अस्थमा या दमा रोग मे रोगी को रोजाना सुबह उठते ही एक गिलास ठंडा पानी पीना चाहिए।
* जल हमारे शरीर शुद्धिकरण के लिए आवश्यक है। इसके अभाव में विजातीय तत्व शरीर से बाहर नहीं निकल पाते। पसीना और मूत्र तभी बनेगा जब आप पानी पिएंगे।
*पानी का समुचित मात्रा में सेवन करने से खाए गए पोषक तत्वों का अवशोषण होता है।
* रक्त बनाने में आंतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि छोटी एवं बड़ी आंत सक्रिय बनी रहे तो रक्त निर्माण निर्बाध गति से होता है।
* जो लोग पानी पीने में कंजूसी बरतते हैं उन्हें कब्ज की शिकायत सदैव बनी रहती है। पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करने से आंतों की सक्रियता बढ़ती है तथा मल निष्कासन में परेशानी नहीं होती। बवासीर, फिशर तथा फ्रिश्चुला जैसी बीमारियां भी उन्हें घेरती हैं, जो पानी कम पीते हैं।
* मोटापे से परेशान हो तो पानी डटकर पिएं। इससे पेट भरा-भरा लगता है और शरीर को खाद्य सामग्री की जरूरत कम पड़ती है।
* गुर्दे शरीर का महत्वपूर्ण अंग हैं। यदि आप पानी कम पीते हैं तो इससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है जबकि पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से वे भलीभांति कार्य करते हैं।
* पीलिया रोग में भी जल का सेवन बहुत लाभदायक है। इससे रक्त में व्याप्त अशुद्धियां बाहर निकल जाती हैं।
*जी घबराना, हृदय की धड़कन बढ़ने आदि पर घूंट-घूंट कर ठंडा जल पीने से तुरंत राहत मिलती है।
*बुखार होने पर रोगी के माथे व पेट पर ठंडे पानी की पट्टी रखनी चाहिए। इससे बुखार उतरने में मदद मिलती है।
* तांबे के बर्तन में रात भर रखा पानी सुबह पीने से पेट संबंधी रोगों का नाश होता है।
* जो लोग पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करते हैं उन्हें बुढ़ापा देर से आता है। उनके चेहरे पर समय से पूर्व झुर्रियां भी नहीं पड़तीं।
*प्रातः शीतल जल के छींटे आंखों पर मारने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
*महिलाओं को अपने स्तन पुष्ट करने के लिए स्नान करते समय ठंडा एवं गर्म जल बारी-बारी से स्तनों पर डालना चाहिए। इससे उनमें कसाव पैदा होता है।
27. आईफ्लू यानि कंजेक्टिवाइटिस होने पर दिन में कई बार साफ, शीतल जल से आंखें धोने से राहत मिलती है।
* जल ही शरीर के तापक्रम को नियमित करके शरीर की गर्मी को समान रूप से बनाए रखता है।



* गर्मियों में घर से बाहर निकलने पर लू लगने का अंदेशा रहता है। ऐसे में घर से निकलने से पूर्व एक गिलास ठंडा पानी पी लिया जाए तो लू से बचाव हो सकता है।
* स्तनपान कराने वाली माताओं को पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिए। इससे उनमें दूध की मात्रा बढ़ती है।
* आंखों में छोटा-मोटा कीड़ा, कचरा आदि घुस गया हो तो साफ शीतल जल से आंख धोने से अवांछित वस्तु निकल जाएगी तथा आपको राहत मिलेगी।
*नकसीर फूटने पर रोगी के सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखें। इससे नाक से होने वाला रक्तस्राव बंद हो जाएगा।
* रक्त को तरल व गतिशील बनाए रखने में जल विशेष उपयोगी है।
* पर्याप्त मात्रा में जल पीने से ही शरीर की हड्डियां और जोड़ क्रियाशील रहते हैं।
* डिहाइड्रेशन में तो जल का सेवन किस संजीवनी बूटी से कम नहीं उल्टी, दस्त, लू आदि की वजह से हुए डिहाइड्रेशन से जान भी जा सकती है। उल्टी-दस्त होने पर पानी में ‘ओआरएस’ का घोल बनाकर लेना चाहिए।
* शरीर को जल की आवश्यकता प्राकृतिक बात है। यदि आप पानी नहीं पिएंगे तो जल की पूर्ति आपके रक्त, मांसपेशियों और विभिन्न कोशिकाओं से होती हैं। इससे अन्य शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
* जल में प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की शक्ति होती है। जो लोग समुचित मात्रा में जल का सेवन करते हैं वे रोगाणुओं के हमले से बचे रहते हैं।
* शीतल जल से स्नान करने से न केवल शरीर में व्याप्त मैल, गंदगी ही दूर होती है अपितु ताजगी एवं स्फूर्ति का एहसास भी होता है।
*पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बड़ी आंत के कैंसर से बचाता है।



*समुचित मात्रा में पानी का सेवन स्तन कैंसर की आशंका कम करता है। पानी अधिक पीने से ब्लड कैंसर का खतरा 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है।
*पथरी होने पर रात्रि भोजन के पश्चात् एक गिलास गर्म पानी पीना चाहिए।
*यदि पैरों में सूजन आ गई हो तो गर्म पानी में थोड़ा सा नमक डालकर उसमें पैर डुबोकर रखें
*यदि कमर या पीठ दर्द सताए तो गर्म पानी की थैली से सिकाई करने से लाभ होता है।
*नमकीन पानी में नहाने से गठिया के दर्द में राहत मिल सकती है।हाल में हुए शोध से पता चलता है कि उच्च सांद्रता वाले नमक के घोल के सूजन के कारण फैली कोशिकाओं को राहत मिलती है और इससे किसी तरह का साइड इफेक्ट भी नहीं होता है।
आप जो भी जल का सेवन करें, वह शुद्ध और कीटाणु रहित होना चाहिए। प्रदूषण जल बीमारियों का कारण बन सकता है। वैसे तो जब प्यास लगे, पानी पीना चाहिए लेकिन व्यायाम या संभोग के तुरंत पश्चात् नहीं पीना चाहिए। इसी प्रकार भोजन के तुरंत बाद, चाय, दूध पीने के तुरंत बाद, शौच के तुरंत बाद, तेज धूप से लौटने के तुरंत बाद तथा पके फल और मेवे खाने के तुरंत बाद पानी का सेवन नहीं करना चाहिए।

17.1.17

हाथ-पैर सुन्‍न पड़ जाएं तो अपनाएं ये घरेलू उपचार

  

अक्सर जब आप कभी एक ही अवस्था में बैठे रह जाते हैं तो आपके हाथ और पैर सुन्नं पड़ जाते हैं, जिसके कारण आपको कभी कोई भी चीज़ को छूने का एहसास मालूम नहीं पड़ता है। यही नहीं, इसके अलावा आपको प्रभावित स्थान पर दर्द, कमजोरी या ऐठन भी महसूस होती होगी। 
   इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे लगातार हाथों और पैरों पर प्रेशर, किसी ठंडी चीज को बहुत देर तक छूते रहना, तंत्रिका चोट, बहुत अधिक थकान, धूम्रपान, मधुमेह, विटामिन या मैग्नीशियम की कमी आदि। अगर यह समस्या कुछ मिनटों तक रहती है तो परेशानी की बात नहीं है, लेकिन अगर यही कई- कई घंटों तक बनी रहे तो आपको डाक्टर के पास जाने की आवश्यकता है।  हाथ -पैर का सुन्न हो जाना बड़ा ही कष्टदायक होता है क्योंकि ऐसे में फिर आपका कहीं मन नहीं लगता। पर आप चाहें तो इस समस्या को घरेलू उपचार से ठीक कर सकते हैं।
गर्म पानी का सेंक-



सबसे पहले प्रभावित जगह पर गर्म पानी की बोतल से सेंक रखें। इससे वहां की ब्लड सप्लाई बढ़ जाएगी। इससे मासपेशियां और नसें रिलेक्स होंगी। एक साफ कपड़े को गर्म पानी में 5 मिनट के लिए भिगोएं और फिर उससे प्रभावित जगह को सेंकें। आप चाहें तो गर्म पानी से स्नान भी कर सकती हैं।

मसाज सबसे अच्छा ऑप्शन-
हाथ या पैर में सुन्‍नपन आने पर मसाज इस समस्‍या से निपटने का सबसे आसान और सरल तरीका है। यह ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, जिससे सुन्नता में कमी आती है। इसके अलावा यह मसल्‍स और नसों को प्रोत्‍साहित कर, समग्र कामकाज में सुधार करता है। अपने हाथों में गर्म जैतून, नारियल या सरसों के तेल लेकर इसे सुन्न हिस्‍से में लगाकर 5 मिनट के लिए सर्कुलर मोशन में अपनी उंगालियों से मसाज करें। जरूरत पड़ने पर इस उपाय को दोहराये।
ऑक्सीजन में सुधार करें एक्सरसाइज-
व्यायाम करने से शरीर में ब्लड र्स्कुलेशन होता है और वहां पर आक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। रोजाना हाथ और पैरों का 15 मिनट व्यायाम करना चाहिए। इसके अलावा हफ्ते में 5 दिन के लिए 30 मिनट एरोबिक्स करें, जिससे आप हमेशा स्वस्थ बने रहें।एक्सरसाइज शरीर के विभिन्न अंगों में ब्लड सर्कुलेशन और ऑक्सीजन में सुधार करता है, जिससे हाथ और पैर सहित शरीर के किसी भी अंग में सुन्नपन, झनझनाहट को रोकने में मदद मिलती है। इसके अलावा नियमित रूप एक्सरसाइज गतिशीलता में सुधार और कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचाता है। 
मैग्नी शियम का सेवन जरूर करें
हरी पत्तेीदार सब्जिेयां, मेवे, बीज, ओटमील, पीनट बटर, ठंडे पानी की मछलियां, सोया बीन, अवाकाडो, केला, डार्क चॉकलेट और लो फैट दही आदि जरूर खाएं। आप रोजाना मैग्नीlशियम 350 एम जी की सपलीमेंट भी ले सकते हैं। 
हल्दी-



हल्दी में मौजूद कुरकुर्मीन नाम का तत्व पूरे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन में सुधार करने में मदद करता है। इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेंटरी गुण प्रभावित हिस्से में दर्द और परेशानी कम करने में मदद करता है। समस्या होने पर एक गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी मिक्स करके हल्की आंच पर पकाएं। फिर इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में एक बार पीने से ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है। आप हल्दी और पानी से बने पेस्ट से प्रभावित हिस्से पर मसाज भी कर सकते हैं।
खूब खाएं Vitamin B फूड-
अगर हाथ-पैरों में जन्न-जन्नाशहट सी होती है तो अपने आहार में ढेर सारे विटामिन बी, बी6 और बी12 को शामिल करें। इनके कमी से भी हाथ, पैरों, बाजुओं और उंगलियों में सुन्न पैदा हो जाती है। आपको अपने आहार में अंडे, अवाकाडो, मीट, केला, बींस, मछली, ओटमील, दूध, चीज़, दही, मेवे, बीज और फल शामिल करने चाहिये।
दालचीनी का उपयोग करें-
दालचीनी में केमिकल और न्यूट्रिएंट्स होते हैं जो हाथ और पैरों में ब्लड फ्लो को बढ़ाते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं रोजाना 2-4 ग्राम दालचीनी पाउडर को लेने से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। इसको लेने का अच्छा तरीका है कि एक गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाएं और दिन में एक बार पिएं। दूसरा तरीका है कि 1 चम्मच दालचीनी और शहद मिला कर सुबह कुछ दिनों तक सेवन करें। 
प्रभावित हिस्‍से को ऊपर उठाएं-
हाथ और पैरों के खराब ब्लड सर्कुलेशन से ऐसा होता है। इसलिए उस प्रभावित हिस्से को ऊपर की ओर उठाइए जिससे वह नॉर्मल हो सके। इससे सुन्न वाला हिस्सा ठीक हो जाएगा। आप अपने प्रभावित हिस्से को तकिए पर ऊंचा कर के भी लेट सकते हैं।

सावधान,बासी खाना खाने से होते हैं ये नुकसान

   

व्यस्त दिनचर्या के चलते अधिकांश कामकाजी लोगों के लिए सुबह-शाम ताजा भोजन बनाना संभव नहीं होता इसलिए वह बासी भोजन खाने लगते हैं, जिसके कारण कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं, इसलिए बासी भोजन से बचना जरूरी है। आज कल लोगों में बासी खाना खाने का प्रचलन काफी ज्‍यादा बढ़ गया है। ऐसा ज्‍यादातर ऑफिस जाने वाले लोगों के साथ ही होता है जिनके बार बार-बार खाना बनाने का समय नहीं होता। पर दोस्‍तों, खाना चाहे कितना भी सादा या बेस्‍वाद क्‍यूं ना हो, अगर वह ताजा और गरम है तो वह फ्रिज में रखे खाने से लाख गुना अच्‍छा ही होता है।
बासी भोजन खाने से कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं, इसलिए बासी भोजन से बचना जरूरी है। इसके काराण मोटापा, हृदयरोग, कोलेस्ट्रोल जैसी समस्याओं में बढ़ोतरी हो रही है।
पनपते हैं बैक्टीरिया
जब हम ताजा बना खाना खाते है तो बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों का समावेश होने का खतरा कम रहता है। खाने को बनाने के तुरंत बाद फ्रिज में नहीं रखना चाहिए बल्कि कमरे के तापमान के अनुसार होने तक इंतजार करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से सूक्ष्मजीव कई गुणा होकर आपके भोजन खराब होने का कारण बनते हैं।
दूसरे आहार भी हो जाते हैं दूषित
फ्रिज में रखा अधिक पुराना भोजन प्रयोग न करें। यह आपके स्वास्थ्य हेतु हानिकारक हो सकता है। बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों के साथ आहार फ्रिज में रखने से वह फ्रिज में रखें अन्य आहार को भी दूषित कर सकते हैं। जो आहार आपको लगता है कि आपने सुरक्षित रूप से जमा किया है वह खाद्य पदार्थ खराब होकर बीमारी के विकास की आंशका को बढ़ा सकते हैं।
बचा हुआ खाना कब तक करें प्रयोग
तीन से अधिक दिनों के लिए कभी फ्रिज में न रखें। अगर मीट को फ्रिज में रखना है तो इन्हें फ्रिज में कवर करके दूसरे खाने से अलग रखें। अगर आप बचा हुआ खाना खा भी रहें हैं तो इसे पहले लगभग 70 डिग्री सेल्सियम पर ठीक से गर्म कर लें। यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के अनुसार, बचे हुए खाने को 3 से 4 दिनों के लिए और फ्रोजन फूड को 3 महीने तक रखा जा सकता है। हालांकि वह उपभोग के लिए सुरक्षित होते हैं लेकिन लंबे समय तक रखने से वह नमी और स्वाद खो देते हैं।
समाप्त हो जाती है पौष्टिकता
लंबे समय तक भोजन को फ्रिज में रखने से इनमें पोषक तत्वों की कमी होने लगती है। पोषक तत्वों की हानि के साथ, खाद्य पदार्थ बेकार हो जाते है। इसलिए, बचे हुए खाने को लंबे समय तक स्टोर नहीं किया जाना चाहिए।
बासी खाना खाने से आपको फूड पाइजनिंग की समस्या हो सकती है। अधिक समय तक रखा हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिये फायदेमंद नहीं होता क्योंकि इसमें स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाले बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते है।
डेयरी प्रोडक्ट
बासी भोजन में तो बैक्टीरिया पनपते ही हैं, साथ ही साथ डेयरी प्रोडक्ट्स में भी बैक्टीरिया बहुत तेजी से बढ़ते हैं। इसलिए डेयरी प्रोडक्ट्स पाश्चरीकृत होने चाहिये ताकि उनमें बैक्टीरिया न पनप सकें। पाश्चरीकृत दूध और पाश्चरीकृत दूध से ही बने दूध के अन्य उत्पादों का सेवन करना चाहिये। ये आपको नुकसान नहीं पहुंचाएंगे और शरीर के लिये भी पौष्टिक होंगे।
डायरिया
फ्रिज में रखा खाना बार बार-बार गरम व ठंडा करने की इस प्रक्रिया के दौरान भोजन में विद्यमान आवश्यक पोषक पदार्थ तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही इनमें हानिकारक जीवाणुओं का समावेश भी हो जाता है। और इस खाने को खाने से आपको डायरिया की समस्या भी हो सकती है।

15.1.17

मुंह की बदबू से परेशान है तो अपनाएं ये उपाय

   

 भले ही आपने महंगे और अच्छे कपड़े पहन हुए हों और मेकअप भी परफेक्ट हो लेकिन मुंह की दुर्गंध आपकी इस अच्छी-खासी इमेज को मिनटों में बर्बाद कर सकती है.
अगर आपके मुंह से बदबू आ रही है तो न कोई आपके साथ बैठना पसंद करेगा और न ही बात करना. ऐसी स्थिति में आपका आत्मविश्वास भी डगमगा जाता है. कई बार ये खाने-पीने की वजह से होता है तो कई बार मुंह से जुड़ी कुछ बीमारियों की वजह से. पर अच्छी बात ये है कि इसे दूर करने के कुछ घरेलू और असरदार उपाय हैं. इनके इस्तेमाल से आप मुंह की बदबू को दूर कर सकती हैं और अपने दोस्तों संग एकबार फिर से हंस-बोल सकती हैं:
मुंह की दुर्गन्ध की बदबू एक ऐसी स्वास्थ समस्या है जो कई लोगों में पाई जाती है कई बार तो लोग इस समस्या से अंजान होते हैं। साँस की दुर्गंध उन बैक्टीरिया से पैदा होती है, जो मुँह में पैदा होते हैं और दुर्गंध पैदा करते हैं। नियमित रूप से ब्रश नहीं करने से मुँह और दांतों के बीच फंसा भोजन बैक्टीरिया पैदा करता है। इस बदबू के कई कारण होते हैं, जैसे-गंदे दांत, पाचन की समस्या आदि
मुंह की दुर्गन्ध के कारण- 
*भोजन है मुंह की दुर्गन्ध का कारण – 
आपके दांतों में और इसके आसपास भोजन के टुकड़ो के फसने कारण मुंह में बैक्टीरिया पनपने लगते है जिस कारण हमारे मुंह से बदबू आने लगती है इसीलिए भोजन करने के बाद अपने मुंह की अच्छी तरह से सफाई करना आवस्यक है|
ग्रीन टी के इस्तेमाल से
ग्रीन टी के इस्तेमाल से मुंह की बदबू को कम किया जा सकता है. इसमें एंटीबैक्ट‍िरियल कंपोनेंट होते हैं जिससे दुर्गंध दूर होती है.*निम्बू का रस मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा दिलाए –
नींबू रस का प्रयोग मुंह से बदबू को खत्म करने में किया जा रहा है। नींबू के रस में एक चुटकी काला नमक मिलाकर मुंह की सफाई करने से मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा मिलता है|
अनार की छाल




अनार के छिलके को पानी में उबालकर उस पानी से कुल्ला करने से मुंह की बदबू दूर हो जाती है.
*कच्चा अमरुद मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा दिलाए –
यह मसूढ़े और दातों के स्वास्थ्य को बढ़ाने में सहायता करता है। यह न केवल मुंह की दुर्गंध को रोकता है बल्कि मसूढ़ों से आने वाले खून को भी रोकता है।
*इलायची के दाने चबायें पाए मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा –
अगर आप दुर्गंध सासों से छुटकारा पाना चाहते हैं तो आपको कुछ इलायची बीजों को चबाना चाहिये|.
*लौंग मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा पाने के लिए – 
 हर भोजन के बाद, आप कुछ लौंग निश्चित रूप से खायें। यह दुर्गंध सासों को रोकने का सबसे प्राकृतिक तरीका है।और असरदार भी.
. तुलसी की पत्त‍ियां
तुलसी की पत्ती चबाने से भी मुंह की बदबू दूर हो जाती है. साथ ही मुंह में अगर कोई घाव है तो तुलसी उसके लिए भी फायदेमंद है.
*भोजन के बाद ब्रश जरूर करे 

हमेशा भोजन करने के बाद अपने दांतों को टूथ ब्रश से अवस्य करे हमें दिन में दो बार ब्रश करना चाहिए एस करने से मुंह की दुर्गन्ध में रहत मिलती है
इन सभी उपायो को अपनाकर आप भी अपने मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा प सकते है इसके अलावा आप इन समस्याओं से बचने के लिए कुछ अन्य उपायो को अपना सकते है जैसे भोजन करने के बाद अपने मुंह की अच्छी तरह से सफाई करे दिन में दो बार ब्रश करे आदि|
सरसों के तेल और नमक से मसाज




हर रोज दिन में एकबार सरसों के तेल में चुटकीभर नमक मिलाकर मसूड़ों की मसाज करने से मसूड़े स्वस्थ रहते हैं और बदबू पनपने का खतरा भी कम हो जाता है.*दांतों की समस्या के कारण आती है मुँह से दुर्गन्ध –
यदि आप हर दिन ब्रश और कुल्ला नहीं करते हैं, तो भोजन के टुकड़े आपके मुँह में रह जाते हैं और बैक्टीरिया पैदा करते है जिस कारण मुंह में सड़न होने लगती है यह मुंह की बदबू का एक विषेश कारण है
*मुँह सूखने के कारण आती है मुँह से दुर्गन्ध – 
 लार से मुँह में नमी रहने और मुँह को साफ रखने में मदद मिलती है। सूखे मुँह में मृत कोशिकाओं का आपकी जीभ, मसूड़े और गालों के नीचे जमाव होता रहता है। ये कोशिकाएं क्षरित होकर दुर्गंध पैदा कर सकती हैं।
*मुंह की दुर्गन्ध को दूर करे पानी – 
पानी सांसों को ताज़ा बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। खाना खाने के बाद, आपको अपने मुँह को साफ करना चाहिए , यह आपके दांतों में अटके भोजन के कणों को सफाई करने पर बाहर निकाल देता है। मुँह की दुर्गंध, भोजन के दौरान पानी पीना भी कई मायनों में सहायता कर सकता है। पानी एक अच्छा उपाय है जो आसानी से बुरी सांसों को निकालता है। खूब पानी पीने मुंह से दुर्गन्ध नहीं आती है.|
*मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा दिलाए मैथी – 
एक कप पानी को लेकर इसमें एक चम्मच मेंथी के बीज़ को मिला दें। इस पानी को छानकर दिन में एक बार अवश्य पियें जब तक कि इस समस्या से छुटकारा नहीं मिल जाता है।




*मुंह की दुर्गन्ध के लिए सौंफ 
एक छोटी चम्मच सौंफ लेकर इसे धीरे-धीरे चबाये सौंफ में ताज़ा सांस देने का गुण होता है यह मुंह को ताज़गी प्रदान करता है और मुंह की दुर्गंद को दूर करता है
अमरूद की पत्तियां
अमरूद की कोमल पत्त‍ियों को चबाने से भी मुंह की दुर्गंध पलभर में दूर हो जाती है.
*दालचीनी करे मुंह की दुर्गन्ध को दूर – 
एक चम्मच दालचीनी पाउडर को लेकर एक कप पानी में उबालें। इसमें कुछ इलायची और तेजपत्ते की पत्तियों को भी मिला सकते हैं। इस मिश्रण को छान लें और इससे अपने मुंह को साफ करें जिससे कि आपकी सांसे ताजा रहेंगी।

14.1.17

हरी सब्जियों के गुण,स्वास्थ लाभ HEALTH BENEFITS OF GREEN VEGETABLES

   शरीर को फिट रखने के लिए हरी सब्जियां बहुत ही फायदेमंद होती है. हरी पत्तीदार सब्जियों में कैल्शियम, बीटा कैरोटिन एवं विटामिन सी भी काफी मात्रा में पाये जाते हैं. हरी सब्जियों के सेवन से शरीर का उचित विकास होता है साथ ही त्वचा जवां और खूब सूरत बनी रहती है| अधिकतर लोगो को हरी सब्जी खाना पसंद नहीं होता |हरी सब्जी को देखते ही कुछ लोग खाना तक नहीं खाते लेकिन हरी सब्जी हमारे स्वास्थ के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है| पत्तेदार हरी साग सब्जियां हमारे शरीर को स्वस्थ बनाए रखती हैं साथ ही इनके सेवन से शरीर ऊर्जावान बना रहता है| हरी सब्जियों में बहुत से न्‍यूट्रीशंस पाए जाते हैं जिनकी हमारे शरीर को बहुत ही आवश्यकता होती है| भारत में कई प्रकार की हरी सब्जियों को प्रयोग में लाया जाता है| इनमे से कुछ हैं पालक, तोटाकुरा, गोंगुरा, मेथी, सहजन की पत्तियाँ और पुदिना आदि. हरी सब्जियों को अधिक देर तक पकाने से उनके पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं इसलिए हरी सब्जियों को अधिक नहीं पकाना चाहिए| पत्तेवाली सब्जियां लौहयुक्त होती हैं| आयरन की कमी से एनीमिया जैसी बीमारी हो सकती है|इसके अलावा हरी सब्जियों के सेवन से हम कई अन्य रोगी से भी अपने शरीर को मुक्त कर सकते हैं| हरी सब्जियों के लाभदायक गुण -





हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाने में सहायक है हरी सब्जियां-
शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ाने के लिए हरी सब्जियों बहुत ही लाभदायक होती हैं. इनमे अनेक प्रकार के विटामिन पाए जाते हैं जो हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाने में सहायक होते हैं. इसलिए रोजाना हरी सब्जियों का करना चाहिए| 
आँखों की रौशनी बढ़ने में सहायक है हरी सब्जियां 
 हरी सब्जियों में भरपूर मात्रा में विटामिन ए व् अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं जो हमारी आँखों के लिए बहुत ही फयदेमंद होते हैं. रोजाना हरी सब्जियों को अपने आहार में शामिल करें. इससे हमारे शरीर के साथ-साथ हमारी आँखे भी स्वस्थ रहती हैं|
हड्डियों को मजबूत करने में सहायक हरी सब्जियां  –





हरी सब्जियों में लोह तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं जो हड्डियों तथा दांतों को स्वस्थ रखने में काफी सहायक होते इसलिए रोजाना अपने आहार में हरी सब्जियों को शामिल करें. इनसे शरीर तो स्वस्थ रहेगा साथ ही हड्डिया भी मजबूत बनी रहेंगी.
गुर्दे की पथरी समाप्त  करने के लिए हरी सब्जियों का प्रयोग –
 हरी सब्जियों के सेवन से गुर्दे की पथरी का भी उपचार आसानी से किया जा सकता है. रोजाना हरी सब्जी के सेवन से गुर्दे में यूरिक एसिड एकत्रित नहीं होता और पथरी का भय नहीं रहता |
एनीमिया की समस्या से राहत पाने के लिए हरी सब्जी –
 शरीर में आयरन की कमी से एनीमिया रोग होने की सम्भावना रहती है. रोजाना हरी सब्जियों के सेवन से शरीर में भरपूर मात्रा में आयरन पहुंच जाता है. जिससे एनीमिया की समस्या का खतरा नहीं रहता|
रक्तचाप नियत्रित रखने में सहायक है हरी सब्जियां  –
 हरी सब्जी का सेवन हमारे स्वास्थ के लिए बहुत ही लाभदायक होता है. रोजाना हरी सब्जियों के सेवन से रक्तचाप नियत्रित रहता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है|

13.1.17

वसंत ऋतु में आहार-विहार

    

   मित्रों,आप हर मौसम में हरकुछ नहीं खा सकते। मौसम के हिसाब से खानेपीने के कुछ कायदे होते हैं। आर्युवेद के इन कायदों को तोड़ने वालों को रोगों की शक्‍ल में सजा मिलती है। हिन्‍दू कैलेंडर के हिसाब से15 मार्च से 15 मई का वक्‍त वसंत ऋतु का होता है। 
वसंत ऋतु का शरीर  पर क्‍या असर पड़ता है?
   यह वक्‍त गर्मी और सर्दी के बीच का होता है इसलिए ठंड और गर्मी दोनों का इफेक्‍ट होता है। दिन में गर्मी और रात को ठंडक होती है। इस मौसम में कफ दोष बॉडी पर और हावी होने लगता है। वजह ये है कि इससे पहले वाले मौसम यानी शिशिर ऋतु में बॉडी में जमा कफ अब गर्मी होने पर पिघल जाता है। इससे खासतौर पर पचाने की ताकत पर असर पड़ता है। साफ तौर पर कहें तो खाने को पचाने वाली आग जिसे जठराग्‍नि कहते हैं, कमजोर पड़ जाती है। एक तो वैसे ही इस मौसम में कफ का असर ज्‍यादा होता है उसमें अगर आपने कफ बढ़ाने वाली चीजें थोड़ी बहुत भी खा लीं तो समझें टांसिल्‍स, खांसी, गले में खराश, जुकाम, सर्दी और कफ व बुखार का हमला हो सकता है।
   वसंत ऋतु में कफ की समस्या अधिक रहती है। अतः इस मौसम में जौ, चना, ज्वार, गेहूं, चावल, मूंग, अरहर, मसूर की दाल, बैंगन, मूली, बथुआ, परवल, करेला, तोरई, अदरक, सब्जियां, केला खीरा, संतरा, शहतूत, हींग, मेथी, जीरा, हल्दी, आंवला आदि कफनाशक पदार्थों का सेवन करें|
   



वसंत ऋतु में आयुर्वेद ने खान-पान में संयम की बात कहकर व्यक्ति एवं समाज की निरोगता का ध्यान रखा है। वसंत ऋतु दरअसल शीत और ग्रीष्म का संधिकाल होती है। संधि का समय होने से वसंत ऋतु में थोड़ा-थोड़ा असर दोनों ऋतुओं का होता है। प्रकृति ने यह व्यवस्था इसलिए की है ताकि प्राणीजगत शीतकाल को छोड़ने और वसंत ऋतु में कफ की समस्या अधिक रहती है। अतः इस मौसम में जौ, चना, ज्वार, गेहूं, चावल, मूंग, अरहर, मसूर की दाल, बैंगन, मूली, बथुआ, परवल, करेला, तोरई, अदरक, सब्जियां, केला खीरा, संतरा, शहतूत, हींग, मेथी, जीरा, हल्दी, आंवला आदि कफनाशक पदार्थों का सेवन करें। इसके अलावा मूंग बनाकर खाना भी उत्तम है।
    नागरमोथा अथवा सोंठ डालकर उबाला हुआ पानी पीने से कफ का नाश होता है। मन प्रसन्न रखें एवं जो हृदय के लिए हितकारी हों ऐसे आसव अरिष्ट जैसे कि मध्वारिष्ट, द्राक्षारिष्ट, गन्ने का रस, सिरका आदि पीना लाभदायक है।
   इस ऋतु में कड़वे नीम में नई कोंपलें फूटती हैं। नीम की 15-20 कोंपलें, 2-3 काली मिर्च के साथ चबा-चबाकर खानी चाहिए। 15-20 दिन यह प्रयोग करने से वर्ष भर चर्म रोग, रक्त विकार और ज्वर आदि रोगों से रक्षा करने की प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती है एवं आरोग्यता की रक्षा होती है। इसके अलावा कड़वे नीम के फूलों का रस 7 से 15 दिन तक पीने से त्वचा के रोग एवं मलेरिया जैसे ज्वर से भी बचाव होता है।
   धार्मिक ग्रंथों के वर्णनानुसार चैत्र मास के दौरान अलौने व्रत याने बिना नमक के व्रत करने से रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है एवं त्वचा के रोग, हृदय के रोग, उच्च रक्तचाप( हाई बीपी), गुर्दा, किडनी आदि के रोग नहीं होते।
   वसंत ऋतु में दही का सेवन न करें क्योंकि वसंत ऋतु में कफ का स्वाभाविक प्रकोप होता है एवं दही कफ को बढ़ाता है। अतः कफ रोग से व्यक्ति ग्रसित हो जाते हैं।




वसंत के मौसम में क्‍या नहीं खाना चाहिए
   वसंत में फैटी, खट्टे, मीठे और पेट के लिए भारी चीजें नहीं खानी चाहिए। तली और मसालेदार चीजें कम से कम खाएं। दिन में सोना बंद कर दें ऐसा करने से कफ दोष भड़क जाएगा। रात को ज्‍यादा देर तक नहीं जागना चाहिए इससे वायु दोष बढ़ जाता है।
सुबह देर तक सोने से मल सूख जाता है, भूख्‍ देर से लगती है और चेहरे व आंखों की चमक कम हो जाती है। इसलिए इस मौसम में जल्‍दी सोएं और जल्‍दी उठें।
   शीत एवं वसंत ऋतु में श्वास, जुकाम, खांसी आदि जैसे कफजन्य रोग उत्पन्न होते हैं। उन रोगों में हल्दी का प्रयोग उत्तम होता है। हल्दी शरीर की व्याधि रोधक क्षमता को बढ़ाती है जिससे शरीर रोगों से लड़ने में सक्षम होता है।
  चौथाई चम्मच हरड़ का चूर्ण शहद में मिलाकर चाटें तो वसंत ऋतु में होने वाले बलगम, ज्वर, खांसी आदि नष्ट हो जाते हैं। मौसम के अनुसार भोजन हमारे शरीर और मन दोनों के लिए हितकारी होता है। मौसम के अनुसार भोजन में परिवर्तन करके आहार लेने वाले लोग हर समय स्वस्थ और प्रसन्नचित रहते हैं।
   इस मौसम में स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए रोज एक्‍सरसाइज करें। टहलें, मालिश करें और अगर मौसम में ठंडक है तो गुनगुने पानी से नहा सकते हैं। गर्म पानी से मूत्राशय और मलाशय की अच्‍छे से सफाई करनी चाहिए। नहाने के बाद बदन पर कपूर, चंदन, अगरू, कुमकुम जैसी खुश्‍बू वाली चीजों का लेप लगा सकते हैं। चाहें तो शाम के वक्‍त दोबारा नहा सकते हैं। ढीले और सूती कपड़े पहनें। 

8.1.17

कद की लंबाई बढ़ाने के लिए घरेलू उपचार :How To Increase Your Height:



व्यक्तित्व को निखारने में हाइट का महत्वपूर्ण योगदान होता हैं जिनकी हाइट कम होती है वे अपनी हाइट को थोडा और बढ़ाना चाहते हैं। हाइट की कमी से आत्मविश्वास में भी कमी देखी जाती है। पुलिस, मॉडलिंग तथा सैन्य जैसी सेवाओं में अच्छी हाइट का होना जरुरी हैं। कई बार यह माना जाता है की लम्बाई एक निश्चित उम्र तक ही बढ़ सकती हैं या माता-पिता की हाइट के अनुसार ही बच्चों की लम्बाई होगी किन्तु यदि संतुलित एवं पौष्टिक आहार,व्यायाम एवं योग का नियमित अभ्यास तथा जीवन शैली में सही आदतें अपनाई जायें तो हम अधिकतम संभव हाइट को प्राप्त कर सकते हैं।
सूखी नागौरी अश्वगंधा की जड़ को कूटकर चूर्ण बना लें और इसमें उतनी ही मात्रा में खांड मिलाकर कांच की शीशी में रखें। इसे रात को सोने से पहले गाय के दूध (दो चम्मच) के साथ लें। ये लम्बाई और मोटापा बढ़ाने में फायदेमंद होता है साथ ही इससे नया नाखून भी बनना शुरू होता है। इस चूर्ण को लगातार 40 दिन खाएं। सर्दियों में ये ज्यादा फायदेमंद होता है।



नोट- इस चूर्ण का सेवन करते समय खटाई, तली चीजें न खायें और जिन्हें आंव की शिकायत हो, तो अश्वगंधा न लें। अगर आप ये चूर्ण नहीं खा पा रहे हैं, तो सुबह सुबह ताड़ासन करें।
ताड़ासन करने के लिए दोनों हाथ उपर करके सीधे खड़े हो जायें, लम्बी श्वास लें, हाथ ऊपर धीरे-धीरे उठाते जायें, ध्यान रहे कि साथ-साथ पैर की एड़ियां भी उठती रहें। पूरी एड़ी उठाने के बाद शरीर को पूरी तरह से तान दें और लम्बी श्वास लें। ऐसा करने से स्नायु सक्रिय होकर विस्तृत होते हैं और यह कद बढ़ाने में सहायक साबित होता है।
1- 2 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण, 1- 2 ग्राम काले तिल, 3 से 5 खजूर को 5 से 20 ग्राम गाय के घी में एक महीने तक खाने से शरीर बढ़ने में लाभ होता है। साथ में पादपश्चिमोत्तानासन, पुल्ल-अप्स करने से एवं हाथ से शरीर झुलाने से ऊँचाई बढ़ती है। व्यायाम के अलावा भोजन में प्रोटीन, कैल्शियम तथा विटामिनों की जरूरत बहुत आवश्यक है तथा पौष्टिक भोजन करने से लम्बाई बढ़ने में फायदा मिलता है।
शरीर की सही ग्रोथ एवं लम्बाई के लिए संतुलित एवंम पौष्टिक भोजन बहुत जरुरी हैं। लम्बाई बढ़ाने के लिए आहार के इन नियमो का पालन करें
*हाइट बढाने के लिए कैल्शियम, जिंक, फोस्फोरस, मैग्नीशियम जैसे खनिज लवणों का नियमित सेवन जरुरी है। खनिज लवण हरी सब्जियों, ड्राई फ्रूट्स, फल, दही, छाछ आदि में भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
*नित्य व्यायाम एवं भ्रमण की आदत डालें
नियमित रूप से सुबह 15–20 मिनट walk पर जाना तथा व्यायाम करना मधुमेह, उच्च रक्त चाप, ह्रदय रोग, कोलेस्ट्रोल जैसी अनेक बीमारियों से बचाव रखने में उपयोगी साबित होता है। साथ ही शरीर की ग्रोथ तथा हाइट बढ़ाने में भी लाभदायक है।रपूर प्रोटीन लें
*लम्बाई बढाने के लिए प्रोटीन से भरपूर भोजन लेना जरुरी हैं। प्रोटीन मांस, मछली, सोयाबीन, मूंगफली, दालों आदि में प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है।
नित्य व्यायाम एवं भ्रमण की आदत डालें
*नियमित रूप से सुबह 15–20 मिनट walk पर जाना तथा व्यायाम करना मधुमेह, उच्च *रक्त चाप, ह्रदय रोग, कोलेस्ट्रोल जैसी अनेक बीमारियों से बचाव रखने में उपयोगी साबित होता है। साथ ही शरीर की ग्रोथ तथा हाइट बढ़ाने में भी लाभदायक है।



भरपूर विटामिन लें
*शरीर के सही विकास एवं अच्छी हाइट के लिए आहार में संतुलित मात्रा में विटामिन ए, बी, सी, डी तथा अन्य विटामिन का होना बहुत जरुरी है। इसके लिए दूध, दही, अंकुरित अनाज, फल, सब्जियाँ आदि का नियमित सेवन करें।
*रस्सी कूदें
रस्सी कूदना न सिर्फ वजन को नियंत्रित करता हैं। बल्कि हाइट को बढ़ाने हेतु भी बहुत उपयोगी व्यायाम माना जाता है। पाँव,कमर तथा पीठ की मांसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। मेरुदंड में खिचाव होता है जिससे लम्बाई बढ़ने में सहायता मिलती है।
*तैराकी करें
तैराकी ना सिर्फ मनोरंजन का साधन है बल्कि सम्पूर्ण शरीर का बेहतरीन व्यायाम है। इससे पूरे शरीर का रक्त संचार बढ़ता है। सम्पूर्ण शरीर की मांशपेशियों में खिचाव होता है। तनाव का स्तर कम होता है। भूख बढती है खाया पीया सही से हजम हो जाता है। लम्बाई बढ़ने में स्विमिंग से काफी सहायता मिलती
 *लटकने की एक्सरसाइज करें
इसके लिए लोहे का पाइप या लकड़ी का डंडा जमीन से लगभग 7 फिट ऊपर बांधा जाता है।आप पेड़ की मोटी डाल या घर में मौजूद कोई लटकने लायक हिस्सा भी काम में ले सकते हैं। नियमित रूप से लटकने की एक्सरसाइज करने से रीड की हड्डी, पेट, छाती, पाँव की मांशपेशियों की अच्छी एक्सरसाइज होती हैं। हाइट बढ़ाने हेतु यह बहुत उपयोगी एक्सरसाइज है। इसका नित्य अभ्यास करना चाहिए।



3.1.17

मधुमेह (डायबीटीज़) रोगी का आहार और उपचार

डायबिटीज ब्‍लड में शुगर का स्‍तर बढ़ने से होने वाली बीमारी है, भारत ही नहीं पूरी दुनिया में इसके मामले लगातार बढ़ रहे हैं, इसके लिए सबसे अधिक जिम्‍मेदार अस्‍वस्‍थ लाइफस्‍टाइल है, इसलिए डायबिटीज को समझना बहुत जरूरी है, डायबिटीज को समझकर आप इसका पता जल्‍दी चल सकता है। मधुमेह के शुरुआती लक्षण, डायबिटीज और लाइफस्‍टाइल, डायबिटीज के प्रकार, टाइप1 और टाइप2 डायबिटीज, बच्‍चों में डायबिटीज, बच्‍चों में डायबिटीज के लक्षण, ब्लड शुगर और सावधानियां, मधुमेह में ब्‍लड शुगर पर नियंत्रण, डायबिटीज से नींद पर प्रभाव, टाइप1 डायबिटीज़ और टाइप 2 डायबिटीज़ में अंतर, डायबिटीज़ के अतिरिक्त प्रभाव, डायबिटीज में खान-पान, किशोरावस्‍था और मधुमेह, मधुमेह से थकान, इंसुलिन का प्रयोग, इंसुलिन का कार्य, आदि के बारे में समझकर आप असानी से मधुमेह की स्थिति को का अंदाजा लगा सकते हैं। 
  मधुमेह के रोगियों के लिए अपने भोजन पर नियंत्रण रखना अत्यंत आश्यक है। कई बार इन्सुलिन लेने वाले मधुमेह के रोगियों को जो भोजन तालिका चिकित्सा द्वारा बतायी जाती है उसमें चाय एवं काफी का भी उल्लेख होता है। उन्हें सिर्फ क्रीम और शर्करा न लेने के लिए कहा जाता है। चाय और काफी का प्रयोग मधुमेह से ग्रस्त किसी भी व्यक्ति के लिए न करना ही श्रेयस्कर है, चाहे वह इन्सुलिन पर निर्भर हो अथवा नहीं। ये पदार्थ अच्छे स्वास्थ के निर्माण में सहायक नहीं होते हैं। ऐसे रोगियों को कई बार चिकित्सकों द्वारा डबलरोटी, अचार, अंडे आदि लेने की सलाह भी दी जाती है पर हमें यह ध्यान रखना चाहिए की ये पदार्थ मधुमेह के रोगी के लिए आवश्यक खाद्य पदार्थों की श्रेणी में नहीं आते हैं।
मधुमेह से ग्रस्त रोगियों को किसी भी वस्तु से अधिक ताजी, हरी सब्जियों की आवश्यकता होती है । प्रत्येक भोजन के साथ सलाद प्रचुर मात्रा में लिया जाना चाहिए । जब हम आधिक मात्रा में फल एवं सब्जियां लेते हैं तो शरीर में अधिक पानी पहूंचता है । यह गुर्दों एवं मूत्र उत्सर्जन तंत्र के लिए आवश्यक है । मधुमेह की स्थिति में हमें अपने गुर्दों एवं मूत्र उत्सर्जन तंत्र को अच्छी हालत में रखना चाहिए क्योंकी यह रोग गुर्दों पर एक प्रकार का तनाव डालता है । मधुमेह के रोगियों को मिठाई, चाय. काफी, मादक द्रव्यों तथा ध्रूमपान आदि को तुरंत बंद कर देने का प्रयास करना चाहिए । चर्बी और शर्करा दोनों में कमी आने से आश्चर्य और उत्साहवर्धक परिणाम सामने आते हैं ।
आहार संतुलित हो जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा आदि प्रदान करने वाले तत्व आवश्यक मात्रा में हों ।शरीर के लिए आवश्यक विटामिन, खनिज लवण तथा फाइबर आदि पर्याप्त मात्रा में होना
मधुमेह की जटिलताएँ उत्पन्न होने पर उनका नियमन किया जाना जरूरी है|
रोगी का आहार विविधता पूर्ण हो ताकि वह अच्छी तरह से ग्रहण किया जा सके । आहार नियंत्रण के नाम पर कड़वी चीजें खाते- खाते कई बार रोगियों को इससे अरूचि हो जाती है  , अत: आहार निर्धारण में रोगियों की रुचि का ध्यान रखना भी अत्यंत आवश्यक हैं ।
मधुमेह समृद्धता का रोग है । अति भोजन तथा मोटापे के कारण मधुमेह के प्रत्येक चार में से तीन रोगियों का वजन अधिक होता है । इसलिए ऐसे रोगियों को केवल चीनी एवं परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट ही नहीं बल्कि अति प्रोटीन एवं चिकनाई से भी बचना चाहिए ।
मधुमेह के रोगी का सर्वोत्तम आहार प्राकृतिक खाद्य, अंकुरित, अन्नकण, फल एवं हरी सब्जी है । यह क्षारीय आहार है । पूर्ण अन्न, कूटू एवं हरी सोया, मेथी अत्यंत लाभप्रद हैं । फलों में संतरा जामुन, अनानास, आवंला, सेब तथा पपीता आदि लिए जा सकते हैं । मट्ठा विशेष रूप से उपयोगी है ।
आहार में कम से कम 90 प्रतिशत अपक्वाहार होना ही चाहिए । अपक्वाहार से अग्नाशय ग्रन्थि उद्दीप्त होकर इन्सुलिन उत्पन्न करती है ।  एक बार में अधिक भोजन करने की अपेक्षा चार बार थोड़ा-थोड़ा खाना उचित  है । मधुमेह में प्रोटीन एवं चिकनाई का चयापचय मंद होने से अम्लता बढती है । अत: क्षारीय भोजन उपयुर्क्त है । लहसून से रक्त शर्करा घटती है । 
मधुमेह के रोगियों को अजवाइन, सोया, मेथी तथा गाजर की पत्ती का रस दिया जा सकता है । खट्टे फल, लौकी, खीरा, एवं ककड़ी अग्नाशय ग्रंथि को उन्नत करते हैं । प्याज एवं लहसून का रस उपयोगी है अत: इनका रस अन्य सब्जीयों के रस में मिलाना चाहिए ।




फ्रेंचबीन, मकोय की पत्ती, बेल की पत्ती, करेला, चौलाई, सोया, मेथी, जामुन की पत्ती आदि लेना चाहिए। संतरे का छ्लिका बहूत ही उपयोगी है। सुबह, दोपहर एवं शाम को दिन में तीन बार इसका काढ़ा बनाकर पीना चाहिए ।
रोजाना बेल की पत्तीयों का रस 25 से 50 मि. ली. लेना चाहिए । करेला एवं कूंदरू की पत्ती का रस भी 20 मि. ली. लिया जा सकता है। मधुमेह में नेत्र ज्योति घटती है अत: विटामिन ए, बी काम्प्लेक्स तथा विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में लेना चाहिए ।
शहद एवं कई फल जैसे अंजीर आदि तथा कुछ सब्जियाँ जैसे गाजर एवं चुकन्दर आदि में फ्रक्टोज शर्करा होती है जिसे फल शर्करा का नाम से भी जाना जाता है। फ्रक्टोज शर्करा मधुमेह से ग्रस्त लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती है ।
दैनिक आहार का नमूना चार्ट
लगभग 1500 कैलोरी उपलब्ध कराने वाले आहार की नमूना तालिका इस प्रकार बनाया जा सकता है :-
प्रात: काल- एक गिलास गूनगूने पानी में आधा निम्बू निचोड़ कर लें या मेथी आथवा आंवले का पानी लें ।
नाश्ता (8 बजे ) – एक कटोरी दही या अंकुरित मूंग एवं मेथी या एक गिलास छाछ ।
भोजन (11 से 12 बजे) – गेहूं, जौ, चना एवं मेथी को मिला कर उस आटे की रोटियाँ2, उबली हुई सब्जी, सलाद, अंकुरित मूंग की दाल या एक कटोरी दही, आंवले की चटनी ।
सांयकाल (4 बजे) – (प्रात: काल की तरह) – सब्जी का सूप या भुने हुए चने या नींबू एवं पानी
भोजन (7 बजे) – रोटी. सब्जी एवं सलाद (दोपहर की तरह) यह एक नमूना चार्ट है । रोगी के रक्त में शर्करा की स्थिति को देखते हुए तथा चिकित्सक के निर्देशानुसार इसमें आवश्यक परिवर्तन किये जा सकते है ।
धनिया, जीरा, काली मिर्च, नींबू तथा आँवला जैसे पदार्थों का उपयोग भोजन को स्वादिष्ट एवं रूचिकर बनाने में किया जा सकता है ।
आहार में ‘फाइबर’ की उपयोगिता
फाइबर का अर्थ है – मोटे रेशेदार पदार्थ । मधुमेह के रोगी के आहार में ‘फाइबर’ की मात्रा अधिक होनी चाहिए । ये भोजन के बाद रक्त में शर्करा के स्तर को बढ़ने नहीं देते । ये कब्ज को दूर करते हैं तथा रक्त में ट्राईग्लिसराइड्स तथा कोलेस्ट्रोल के स्तर को भी कम करते हैं । ये वजन कम करने में भी सहायता पहुंचाते हैं । हरी पत्ती वाली सब्जियाँ, मेथी तथा चोकर आदि से फाइबर की पूर्ति की जा सकती है । आधुनिक अध्ययनों ने भी इस बात को प्रादर्शित किया है ।




हर व्यक्ति को कम से कम रोजाना 37 ग्राम फाइबर जरूर अपने भोजन में शामिल करना चाहिए। वैसे आम आदमी के भोजन में 15 से 20 ग्राम फाइबर शामिल रहता है। इसे 10 ग्राम और बढ़ा दें तो दिल की बीमारी से बचा जा सकता है ।
स्टार्च युक्त चीजें रक्त में पहुँच कर धीरे-धीरे चीनी बनाती हैं । अत: आलू, शकरकंद आदि कम खानी चाहिए। अगर आप आलू खाना ही चाहते हैं तो आप मटर आलू कभी न खाएँ, क्योंकी ये स्टार्च पैदा करेंगे । आलू खाना हो तो आलू मेथी, आलू पालक आदि खाये जा सकते हैं। स्टार्च मानव शरीर में प्रवेश करके पहले मेटबालिक सिंड्रोम पैदा कराता है जो दिल को सेहत मंद रखने के लिए जरूरी है की आप रोजाना तीन फल खाएँ।
मेथी मधुमेह को नियंत्रित करती है
नवीन अनुसंधानों ने मधुमेह के नियंत्रण में मेथी की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है । प्राचीन समय से ही हमारे रसोईघरों में मेथी का प्रयोग कई रूपों में होता रहा हैं । मेथी के बीजों में काफी मात्रा में फाइबर होता है । इसमें ट्राईगोनेलीन नामक एक एल्केलाएंड भी पाया गया है । जिसका कार्य रक्त में शर्करा के स्तर को कम करना है । मेथी का प्रयोग मधुमेह के दोनों वर्गो, इंसुलिन पर निर्भर एवं इंसुलिन पर अनिर्भर में किया जा सकता है । यह रक्त में कोलेस्ट्रोल एवं ट्राईग्लिसराईडस के स्तर को भी कम करने में मदद करती है ।
औषधीय गुणों से भरपूर मेथी की पत्तियों में ट्राईगोथीन होता है । इसके सब्जी यकृत, हृदय और मस्तिष्क संबंधी विकारों के लिए एक उत्तम औषधि माना जाता है । मधुमेह की प्रारंभिक आवस्था में मेथी की ताज़ी पत्तियों का रस प्रात: काल नियमित रूप से तीन महीने तक लिया जाय |





मधुमेह के रोगी दाना मेथी को कई प्रकार का सेवन किस प्रकार से करना चाहिए ?
दाना मेथी को अंकुरित करके
दाना मेथी को पीसकर उसका पाउडर बनाकर
दाना मेथी को उबालकर उसका क्वाथ बनाकर

दाना मेथी को भिगोकर उसका पानी पीकर
प्रकृतिक चिकित्सा केन्द्रों में मेथी को अंकुरित करके प्रयोग में लाया जाता है । यह अत्यंत सुगम एवं सुविधाजनक है । मेथी के अंकुर अत्यंत पुष्ट एवं आकर्षक होते हैं । इतना ही नहीं अंकुरित होने के पश्चात् मेथी की कडुवाहट भी काफी हद तक कम हो जाती है । सकता है ।
मधुमेह के रोगियों को जामुन, करेला, नीम तथा बेलपत्र आदि के प्रयोग की सलाह भी दी जाती है । ये मधुमेह के नियंत्रण में मदद करती हैं।
नींबू का रस ताजे पानी में निचोड़कर दिन में एक दो बार पीना चाहिए । ताजे आंवले का रस रोज लेना इस रोग इस रोग में अत्यंत लाभकारी पाया गया है । जामुन का थोड़ा-थोड़ा रस दिन में चार बार पीना भी इस रोग में हितकारी माना जाता है । ताजे बेल पत्रों को पीसकर उनका 10 मिली रस या करेले का आधा कप रस प्रात: उठने पर लेना चाहिए ।
औषिधीय गुणों से भरपूर करेले का प्रयोग मधुमेह के रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक माना जाता है । ‘ रस पीओ कायाकल्प करो’ पुस्तक के लेखक कांति भट्ट और मनहर डी.शाह ने मधुमेह के रोगियों को गाजर, पालक, गोभी, नारियल, सेलेरी तथा करेले का रस लेने का परामर्श दिया है ।
मेथी – मेथी के बीज रक्त में चीनी की मात्रा कम करते हैं, इन्सुलिन का स्तर भी घटाते खराब कोलेस्ट्रोल कम करते हैं और अच्छा बढ़ाते हैं ।
एलोवेरा – एलोवेरा की पत्तियों के अंदर का रस प्रभावशाली है ।
ग्रीन टी – इसमें कुछ तत्व बुनियादी और इन्सुलिन आधारित ग्लूकोज का उपयोग बढ़ा देता हैं ।
लहसुन – ग्लूकोज का स्तर कम करता है, फ्री इन्सुलिन की मात्रा बढ़ाता है ।
दालचीनी- इन्सुलिन के प्रभाव को तिगुना कर देती है ।
कोको – इसमें फ्लेवेनाएडस होते हैं जो शरीर में चीनी का उपापचय बढ़ा देते हैं ।
करेला – शरीर में ग्लूकोज का उपयोग बढ़ा देता हैं, रक्त में ग्लूकोज का बनना कम करता है, करेले का रस या इसके बीज उपयोगी है ।


2.1.17

आलू के नायाब फायदे


    आलू पौष्टिक तत्वों से भरपूर होता है। इसका मुख्य पौष्टिक तत्व स्टार्च होता है। इसमें कुछ मात्रा उच्च जैविक मान वाले प्रोटीन की भी होती है। आलू क्षारीय होता है, इसलिए यह शरीर में क्षारों की मात्रा बढ़ाने या उसे बरकरार रखने में बहुत सहायक होता है। यह शरीर में ऐसीडोसिस भी नहीं होने देता। आलू में सोडा, पोटाश और विटामिन 'ए' तथा 'डी' भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।   आलू का सबसे अधिक महत्वपूर्ण पौष्टिक तत्व विटामिन सी है। योरप में जब से आलू का प्रयोग व्यापक होता गया है, तब से स्कर्वी नामक रोग की घटनाएँ बहुत कम देखने में आती हैं।

आलू के पौष्टिक तत्वों का लाभ लेने के लिए इसे हमेशा छिलके समेत पकाना चाहिए क्योंकि आलू का सबसे अधिक पौष्टिक भाग छिलके के एकदम नीचे होता है, जो प्रोटीन और खनिज से भरपूर होता है। आलू को उबाला, भूना या अन्य सब्जियों के साथ पकाया जाता है, इसलिए इसके पौष्टिक तत्व आसानी से हजम हो जाते हैं।




शरीर उन्हें दो से तीन घंटों में आसानी से सोख लेता है। आलू का रस निकालने के लिए जूसर का प्रयोग किया जा सकता है|
* उच्च रक्तचाप के रोगी आलू खाएँ तो रक्तचाप को सामान्य बनाने में लाभ करता है।
* आलू को पीसकर त्वचा पर मलें। रंग गोरा हो जाएगा।
* कच्चा आलू पत्थर पर घिसकर सुबह-शाम काजल की तरह लगाने से 5 से 6 वर्ष पुराना जाला और 4 वर्ष तक का फूला 3 मास में साफ हो जाता है।
* आलू का रस दूध पीते बच्चों और बड़े बच्चों को पिलाने से वे मोटे-ताजे हो जाते हैं। आलू के रस में मधु मिलाकर भी पिला सकते हैं।
रक्तपित्त बीमारी में कच्चा आलू बहुत फायदा करता है।
* कभी-कभी चोट लगने पर नील पड़ जाती है। नील पड़ी जगह पर कच्चा आलू पीसकर लगाएँ ।
* शरीर पर कहीं जल गया हो, तेज धूप से त्वचा झुलस गई हो, त्वचा पर झुर्रियां हों या कोई त्वचा रोग हो तो कच्चे आलू का रस निकालकर लगाने से फायदा होता है।




* भुना हुआ आलू पुरानी कब्ज और अंतड़ियों की सड़ांध दूर करता है। आलू में पोटेशियम साल्ट होता है जो अम्लपित्त को रोकता है।
* चार आलू सेंक लें और फिर उनका छिलका उतार कर नमक, मिर्च डालकर नित्य खाएँ। इससे गठिया ठीक हो जाता है।
* गठिया में केवल आलू खाते रहने पर बहुत लाभ होता है। पथरी के रोगी को केवल आलू खिलाकर और बार-बार अधिक पानी पिलाते रहने से गुर्दे की पथरियाँ और रेत आसानी से निकल जाती हैं।
* आलुओं में मुर्गी के चूजों जितना प्रोटीन होता है, सूखे आलू में 8.5 प्रतिशत प्रोटीन होता है। आलू का प्रोटीन बूढ़ों के लिए बहुत ही शक्ति देने वाला और बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने वाला होता है।

30.12.16

वायरल बुखार के घरेलू उपचार : Home Remedies For Viral Fever

    

 तापमान में अचानक परिवर्तन होने या संक्रमण का दौर होने पर अधिकतर लोग बुखार से पीड़ित होते हैं। ऐसा ही एक मौसमी संक्रमण वाला बुखार होता है वायरल बुखार (Viral Fever)। इस बुखार से निपटने के लिए कुछ एंटीबायोटिक दवाओं या कुछ ओटीसी (ओवर-द-काउंटर) का सहारा लिया जाता है। आप चिकित्सक के पास जाएं उससे पहले कुछ घरेलू नुस्खे आजमाकर भी बुखार को कम या इससे पूरी तरह आराम पाया जा सका है।तेज बुखार अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, यह किसी छुपी हुई परिस्थिति का संकेत हो सकता है। आमतौर पर यह बुखार या तबीयत खराब का संकेत हो सकता है। हालांकि, बुखार के कई गैर-संक्रामक कारण भी हो सकते हैं, लेकिन वायरल संक्रमण बुखार का एक सामान्‍य लक्षण हो सकता है। वायरल संक्रमण कई प्रकार के वायरस से हो सकता है। इनमें इंफ्लूएंजा यानी फ्लू सबसे ज्‍यादा प्रचलित है। वायरल शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकता है जैसे आंत, फेफड़े, वायु मार्ग और अन्‍य कई हिस्‍से। इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि आपके शरीर का कौन सा हिस्‍सा इससे प्रभावित हुआ है, आपको सामान्‍य तौर पर बुखार की शिकायत होती है। इसके अलावा सिरदर्द, बहती नाक, गले में सूजन, आवाज बैठना, खांसी, मांसपेशियों में दर्द, पेट में दर्द, डायरिया और/अथवा उल्‍टी जैसी शिकायतें हो सकती हैं।  


जब आपको बुखार होता है, तो इसका अर्थ है कि बीमारी या संक्रमण की प्रतिक्रिया के रूप में आपके शरीर का तापमान बढ़ गया है। विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि बुखार संक्रमण के प्रति शरीर की कुदरती प्रतिरक्षा का हिस्‍सा है। गर्मी से शरीर संक्रमण को नष्‍ट करने का काम करता है। और यह बात समझ लें कि एंटी बायोटिक्‍स का संक्रमण पर कोई असर नहीं होगा। 
 आइए आपको बताते वायरल बुखार के इलाज के लिए कुछ आसान घरेलू उपचार, जो कि निम्नलिखित हैं-
मेथी का पानी (Fenugreek Water)
रसोई घर में आसानी से उपलब्ध, मेथी के बीज में डायेसजेनिन, सपोनिन्स और एल्कलॉइड जैसे औषधीय गुण शामिल है। मेथी के बीजों का प्रयोग अन्य बहुत सी बीमारियों के इलाज में भी किया जाता है और यह वायरल बुखार के लिए बेहतरीन औषधि है।कैसे तैयार करें- आधा कप पानी में में एक बड़ा चमचा मेथी के बीच भिगोएँ। सुबह में, वायरल बुखार के इलाज के लिए नियमित अंतराल पर इस पेय को पिएं। कुछ और राहत के लिए मेथी के बीज, नींबू और शहद का एक मिश्रण तैयार कर उसका प्रयोग भी किया जा सकता है।
स्‍नान करें
गुनगुने या ठंडे पानी के टब में बैठने से आपको बेहतर महसूस होगा।
सूखी अदरक मिश्रण (Dry ginger mixture)
अदरक स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी है। इसमें एंटी फ्लेमेबल, एंटीऑक्सिडेंट और वायरल बुखार के लक्षणों को कम करने के लिए Analgesic गुण होते हैं। इसलिए, वायरल बुखार से पीड़ित लोगों को परेशानी को दूर करने के लिए शहद के साथ सूखी अदरक का उपयोग करना चाहिए।कैसे करें तैयार- एक कप पानी में दो मध्यम आकार के सूखे टुकड़े अदरक या सौंठ पाउडर को डालकर उबालें। दूसरे उबाल में अदरक के साथ थोड़ी हल्दी, काली मिर्च, चीनी आदि को उबालें। इसे दिन में चार बार थोड़ा थोड़ा पिएं। इससे वायरल बुखार में आराम मिलता है।
गर्मी को नियंत्रित रखें
कमरे के तापमान को कम करें इसके लिए आप खिड़की खोल सकते हैं। और अगर ठंड हो तो अपने पास एक गर्म कंबल रखें। अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करने के लिए उन कपड़ों का इस्‍तेमाल करने के बजाय जिन्‍हें उतारना मुश्किल हो, कंबल का इस्‍तेमाल बेहतर रहता है। ठंडा भोजन करने से भी आपको मदद मिल सकती है।
चावल स्टार्च (Rice starch)
वायरल बुखार के इलाज के लिए प्राचीन काल से आम घर उपाय है चावल स्टार्च (हिंदी में कांजी के रूप में जाना जाता है)। यह पारंपरिक उपाय प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ा देता है। यह विशेष रूप से वायरल बुखार से पीड़ित बच्चों और बड़े लोगों के लिए, एक प्राकृतिक पौष्टिक पेय के रूप में कार्य करता है।
कैसे तैयार करें- एक भाग चावल और आधा भाग पानी डालकर चावल के आधा पकने तक पकाएं। इसके बाद पानी को निथार कर अलग कर लें और इसमें स्वादानुसार नमक मिलाकर, गर्म गर्म ही पिएं। इससे वायरल बुखार में बहुत आराम मिलता है।
खूब पानी पियें
वायरल की हालत में आपको खूब पानी पीना चाहिये। इसके अलावा जूस और कैफीन रहित चाय का सेवन करें। ज्‍यादातर फलों में एंटी-ऑक्‍सीडेंट्स पाये जाते हैं जिनका सेवन करने से आपके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं। अगर आपको डायरिया या उल्‍टी की शिकायत है तो इलेक्‍ट्रॉल का सेवन आपके लिए फायदेमंद होगा। इसके अलावा, नींबू, लैमनग्रास, पुदीना, साग, शहद आदि भी आपके लिए फायदेमंद हो सकते हैं।





धनिया चाय (Coriander Tea)

धनिया के बीज में phytonutrients होते हैं जो कि शरीर को विटामिन देते हैं और अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी बढ़ाते हैं। धनिया में मौजूद एंटीबायोटिक यौगिक वायरल संक्रमण से लड़ने की शक्ति देते हैं।
कैसे तैयार करें- एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्म्च धनिया के बीच डालकर उबाल लें। इसके बाद इसमें थोड़ा दूध और चीनी मिलाएं। धनिया की चाय तैयार है, इसे पीने से वायरल बुखार में बहुत आराम मिलता है।
नींबू के पानी की जुराब
एक कप गर्म पानी में एक नींबू का रस निचोड़ लें। इस पानी में रूई के पतले फोहे डुबो लें। अतिरिक्‍त पानी को निचोड़ लें और इसे जुराबों के जोड़े में डालकर रात भर पहनकर सो जाएं।
तुलसी के पत्ते का काढ़ा (Brew of Basil leaves)
वायरल बुखार के लक्षण होने पर प्राकृतिक उपचार के लिए सबसे प्रभावी और व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली औषधि है तुलसी के पत्ते। बैक्टीरियल विरोधी, कीटाणुनाशक, जैविक विरोधी और कवकनाशी गुण तुलसी को वायरल बुखार के लिए सबसे उत्तम बनाते हैं।
कैसे तैयार करें- आधे से एक चम्मच लौंग पाउडर को करीब 20 ताजा और साफ तुलसी के पत्तों के साथ एक लीटर पानी में डालकर उबाल लें। पानी को तब तक उबालें जब तक कि पानी घट कर आधा न रह जाए। इस काढ़े का हर दो घंटे में सेवन करें।
लहसुन
कच्‍चे लहसुन के टुकड़े खायें। आप इस पर शहर लगाकर भी खा सकते हें। इसके अलावा लहसुन की दो कलियों को दो चम्‍मच ऑलिव ऑयल में मिलाकर इसे गर्म कर लें और इससे अपने पैरों के तलों में मसाज करें। अपने पैरों को सारी रात के लिए लपेटकर रखें।
नींबू
नींबू को बीच में से काट लें और फिर इस टुकड़े से पैरों के तलों पर मसाज करें। आप चाहें तो नींबू के इस कटे हुए टुकड़े को जुराबों में डालकर सारी रात पहनकर रख सकते हैं।

28.12.16

पार्किंसन रोग :लक्षण एवम उपचार


पार्किंसंस दिमाग से जुड़ी बीमारी है। इसमें दिमाग की कोशिकाएं बनना बंद हो जाती हैं। शुरुआती सालों में इसके लक्षण काफी धीमे होते हैं जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। विशेषज्ञ आम लक्षणों से इस बीमारी की पहचान करते हैं जिसमें कांपना, शारीरिक गतिविधियों का धीरे होना (ब्राडिकिनेसिया), मांसपेशियों में अकडऩ, पलकें न झपका पाना, बोलने व लिखने में दिक्कत होना शामिल हैं। यह बीमारी कुछ साल पहले तक बुजुर्गों में देखने को मिलती थी, आजकल युवाओं में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं।यह एक दिमागी बीमारी है इसमें व्यक्ति को कंपकंपी महसूस होती है साथ ही मांसपेशियों में कठोरता और धीमापन होने की शिकायत होती है | जानकारों कहते है कि यह दिमाग के हिस्से बेंसल गेंगिला में विकृति के चलते पैदा होती है और न्यूरोट्रांसमीटर डोपामीन में कमी के चलते पैदा होती है और आंकड़े बताते है कि दुनियाभर में 6.3 मिलियन लोग इस बीमारी से पीडित है और आपको बता दें वैसे तो यह बीमारी अमूमन 60 साल के बाद की उम्र में ही होती है और महिलाओं के मुकाबले पुरुषो को यह निशाना अधिक बनाती है
प्रमुख लक्षण-

 हाथ-पैरों में कंपन
पार्किंसंस बीमारी का प्रमुख लक्षण हाथ-पैरों में कंपन होना है। लेकिन बीस प्रतिशत रोगियों में ये दिखाई नहीं देते। फोर्टीस अस्पताल की कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुषमा शर्मा के अनुसार, यह बीमारी शारीरिक व मानसिक रूप से रोगी को प्रभावित करती है। अक्सर डिप्रेशन, दिमागी रूप से ठीक न होना, चिंता व मानसिकता को इस बीमारी से जोड़कर देखा जाता है। इसके कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हुए हैं लेकिन इसका कारण आनुवांशिक हो सकता है।
कीटनाशकों (Insecticide) के सम्पर्क में आने के कारण भी यह हो सकती है – एक पत्रिका में छपे लेख के अनुसार कई रोगी जो पार्किंसन बीमारी (parkinson disease )से ग्रस्त मिले उनमे से ज्यादा संख्या उन लोगो की थी जो कभी न कभी कीटनाशकों के साथ लम्बे समय तक सम्पर्क में रहे थे और अमेरिका की एक अकादमी ने इस बात का समर्थन भी किया है इसलिए तो हर जगह सलाह दी जाती है कि जब भी आप बाजार से कभी भी सब्जी या फल लेकर आते है तो उन्हें अच्छे से पानी में धो लेना आवश्यक है क्योंकि न धोने पर हम कीटनाशकों के सम्पर्क में आते है और हो सकता है हम भी आगे जाकर पार्किंसन बीमारी (parkinson disease ) का शिकार हो जाएँ हाँ ऐसा अगर संभव हो तो बेहतर है कि हम आर्गेनिक फल और सब्जियों का उपयोग करना शुरू कर दें जो कि समय और मांग के अनुसार अभी तो हमारे लिए महंगा होता है अगर हम एक मिडिल क्लास फॅमिली से बिलोंग करते है तो क्योंकि आमतौर पर आर्गेनिक फल सब्जियां बाजार भाव से महंगी मिलती है क्योंकि वो कंही अधिक शुद्ध और प्राकृतिक तरीके से पैदा की गयी होती है इसलिए उनकी पैदावार कम होती है फलस्वरूप वो तुलनात्मक रूप से महंगी भी होती है |



पार्किन्संस बीमारी को अक्सर डिप्रेशन या दिमागी रूप से ठीक न होने की स्थिति से जोड़ा जाता है, लेकिन इस संदर्भ में यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि इस बीमारी से पीडि़त रोगी मानसिक रूप से विकलांग नहीं होते हंै। उन्हें समाज से अलग नहीं देखना चाहिए।
शुरुआती स्टेज पर डॉक्टर लक्षणों को मैनेज करने के लिए दवाओं का सहारा लेते है, लेकिन दवाओं के प्रभावी न होने और इनके साइड इफेक्ट के सामने आने पर अंत में डीप ब्रेन स्टीमुलेशन (डीबीएस) थेरेपी काफी कारगर साबित हुई है।
पार्किंसंस के लिए आयुर्वेदिक उपचार
पार्किंसन रोग केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का एक ऐसा रोग है जिसमें रोगी के शरीर के अंग कंपन करते रहते हैं। पार्किंसन का आरम्भ आहिस्ता-आहिस्ता होता है। पता भी नहीं पड़ता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ़ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गड़बड़ है। लेकिन घबराइए नहीं क्‍योंकि आयुर्वेदिक की मदद से पार्किंसंस के प्राकृतिक उपचार में मदद मिलती है, जिससे बीमारी से छुटकारा पाकर आपका शरीर पूरी तरह स्‍वस्‍थ हो जाता है। यह एक ऐसा इलाज है जिसमें पूरे शरीर का इलाज किया जा सकता है। आयुर्वेदिक उपचार तथ्‍य पर आधारित होता है, जिसमें अधिकतर समस्‍याएं त्रिदोष में असंतुलन यानी कफ, वात और पित्त के कारण उत्‍पन्‍न होती है।
दिमाग का टॉनिक ब्राह्मी
पार्किसन के लिए ब्राह्मी को वरदान माना जाता है। यह दिमाग के टॉनिक की तरह काम करती है। भारत में सदियों से कुछ चिकित्‍सक इसका उपयोग स्‍मृति वृद्धि के रूप में करते आ रहे हैं। मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर के अध्‍ययन के अनुसार, ब्राह्मी मस्तिष्‍क में ब्‍लड सर्कुलेशन में सुधार करने के साथ मस्तिष्‍क को‍शिकाओं की रक्षा करती है। पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन के द्वारा किए एक अन्य अध्ययन के अनुसार, ब्राह्मी के बीज का पाउडर पार्किंसंस के लिए बहुत बढि़या इलाज है। यह रोग को दूर करने और मस्तिष्क की नुकसान से रक्षा करने करने का दावा करती है।
लोकप्रिय जड़ी-बूटी काऊहेग (Cowhage)
भारत में लोकप्रिय जड़ी बूटी काऊहेग या कपिकछु देश भर में तराई के जंगलों की झाड़ि‍यों में पाया जाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड मेडिकल सेंटर ने काऊहेग के बारे में बताते हुए कहा कि इसमें लेवोडोपा या एल-डोपा, दवा में मौजूद एल-डोपा की तुलना में पार्किसंस रोग के उपचार में बेहतर तरीके से काम करता है।
पार्किंसन रोग केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का एक ऐसा रोग है जिसमें रोगी के शरीर के अंग कंपन करते रहते हैं। पार्किंसन का आरम्भ आहिस्ता-आहिस्ता होता है। पता भी नहीं पड़ता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ़ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गड़बड़ है। लेकिन घबराइए नहीं क्‍योंकि आयुर्वेदिक की मदद से पार्किंसंस के प्राकृतिक उपचार में मदद मिलती है, जिससे बीमारी से छुटकारा पाकर आपका शरीर पूरी तरह स्‍वस्‍थ हो जाता है। यह एक ऐसा इलाज है जिसमें पूरे शरीर का इलाज किया जा सकता है। आयुर्वेदिक उपचार तथ्‍य पर आधारित होता है, जिसमें अधिकतर समस्‍याएं त्रिदोष में असंतुलन यानी कफ, वात और पित्त के कारण उत्‍पन्‍न होती है।
हल्दी का प्रयोग 
हल्‍दी एक ऐसा हर्ब है, जिसमें मौजूद स्‍वास्‍थ्‍य गुणों के कारण हम इसे कभी अनदेखा नहीं कर पाते। मिशिगन स्‍टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता बसीर अहमद भी इसके बहुत बड़े प्रशंसक है। उन्‍होंने एक ऐसी शोधकर्ताओं की टीम का नेत्तृव भी किया, जिन्‍होंने पाया कि हल्‍दी में मौजूद करक्यूमिन नामक तत्‍व पार्किंसंस रोग को दूर करने में मदद करता है। ऐसा वह इस रोग के लिए जिम्‍मेदार प्रोटीन को तोड़कर और इस प्रोटीन को एकत्र होने से रोकने के द्वारा करता है।



जिन्कगो बिलोबा
जिन्‍कगो बिलोबा को पार्किंसंस से ग्रस्‍त मरीजों के लिए एक लाभकारी जड़ी-बूटी माना जाता है। मेक्सिको में न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी के राष्ट्रीय संस्थान में 2012 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, जिन्कगो पत्तियों के सत्‍त पार्किंसंस के रोगी के लिए फायदेमंद होता है।
दालचीनी से ईलाज
एक नए अध्ययन से पता चला है कि भोजन बनाने में इस्तेमाल होने वाली दालचीनी
पार्किंसन के रोग को बढ़ने से रोकने में मददगार हो सकती है।
अमेरिका में रश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अध्ययन कर यह पता लगाया है कि दालचीनी का इस्तेमाल इस बीमारी के दौरान बायोकेमिकल, कोशिकीय और संरचनात्मक परिवर्तनों को बदल सकता है। इस अध्ययन के दौरान दालचीनी के इस्तेमाल से चूहे के दिमाग में इस तरह के परिवर्तन हुए।
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता कलिपदा पहन और रश में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर डेविस ने कहा, सदियों से दालचीनी का इस्तेमाल व्यापक रूप से एक मसाले के रूप में दुनिया भर में होता रहा है। उन्होंने कहा, पार्किंसन से ग्रस्त रोगियों में इस बीमारी को बढ़ने से रोकने के लिए संभवत यह सबसे सुरक्षित तरीकों में से एक हो सकता है।11 अप्रैल को हम वर्ल्ड पार्किंसंस डिज़ीज़ डे के तौर पर भी जानते हैं। आँकड़े बताते हैं कि भारत में पार्किंसन के क़रीब 25 फीसदी मरीज़ 40 साल से कम उम्र के हैं, इसलिए इस रोग के प्रति सचेत रहना बहुत जरूरी है।
आमतौर पर पार्किंसन की बीमारी 50 की उम्र से अधिक के लोगों में ही होती है, लेकिन एम्स के मुताबिक, भारत में 25% मामलों में यह 40 से कम उम्र के लोगों में देखी गई है।
अगर रास्ता चलते हुए आपको झटका-सा लगता है और आप अपना बैलेंस नहीं बना पाते। आप आराम से बैठे हैं और हाथों में स्टिफनेस महसूस करने लगते हैं या फिर अचानक ही आपकी आवाज भी धीमी होने लगती है, तो आपको फिक्रमंद होना चाहिए। ये लक्षण पार्किंसन के हो सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों की मानें तो, पार्किंसन में आदमी थोड़ा स्लो हो जाता है, लेकिन कोई भारी खतरा नहीं होता है। सही इलाज और नियमित व्यायाम काफ़ी कारगर साबित होते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि यह अजीब किस्म की बीमारी हजार में से किसी एक को ही हो सकती है। दरअसल, इसमें शरीर को जितनी डोपामिन की जरूरत है, उससे कम बनने लगता है। इसकी वजह से 80% सेल्स का जब लॉस हो जाता है, तब जाकर बीमारी का पहला सिंपटम दिखाई देता है। जाहिर है कि जब लक्षण ही देर से पता लगेंगे, तो समस्या स्वाभाविक है।




न्यूरोलोजिस्ट्स की मानें तो इस रोग के लिए सबसे बड़ी समस्या, लोगों में जागरूकता की कमी है। मरीज़ जब किसी फिजिशियन के पास स्पीड के स्लो होने जैसी प्रॉब्लम लेकर जाते हैं, तो उन्हें विटामिंस लेने का सुझाव दे दिया जाता है जबकि विटामिन और प्रोटीन की डोज इस बीमारी में दवाइयों के प्रभाव को कम करता है। इसलिए जो न्यूरॉलॉजिस्ट पार्किंसन के इलाज का विशेषज्ञ हो, वही सही ट्रीटमेंट दे सकता है।
डॉक्टर्स के मुताबिक अगर आप शारीरिक और मानसिक रूप से फिट हैं, तो पार्किंसन का सामना अच्छी तरह से कर सकते हैं। ऐसा देखा गया है कि, डिप्रेशन और एंग्जाइटी का भी इसमें निगेटिव रोल होता है। कई रोगियों में पार्किंसन के अटैक से पहले सूंघने की क्षमता खत्म हो जाती है। ऐसा भी देखा गया है कि यह रोग होने से 5-10 साल पहले लोगों को नींद में अधिक बड़बड़ाने या हाथ-पैर चलाने की शिकायत होती है।
पार्किंसन की जाँच हर जगह नहीं हो सकती। इसे आप न्यूरोलॉजिस्ट से ही करा सकते हैं। जितनी जल्दी मरीज़ का इलाज शुरू हो जाए, असर भी उसी के अनुसार जल्दी होता है। ज़रूरी है कि इलाज के दौरान दवाइयों में लापरवाही बिल्कुल न की जाए । पार्किंसन के रोगी को योग और व्यायाम किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए।



24.12.16

ज्यादा पसीना होना:कारण और उपचार


   गर्मियों के मौसम में पसीना आना स्वाभाविक है। और पसीना आना शरीर के लिए सेहतमंद भी है। लेकिन जिन लोगों को बहुत अधिक पसीना आता है उन्हें डीहाइड्रेशन या नमक की कमी जैसी दिक्कतें हो सकती है। जी हां बहुत ज्यादा पसीना आना वैसे तो कोई बीमारी नहीं, लेकिन कभी-कभी इसके पीछे स्वेट ग्लैंड में गड़बड़ी, स्ट्रेस, हार्मोनल बदलाव, मसालेदार डाइट, अधिक दवाएं, मौसम और मोटापे जैसे कारण हो सकते हैं। बहुत अधिक पसीना आने की स्थिति को हाइपरहाइड्रोसिस भी कहा जाता है।
हायपरहाइड्रोसिस से हमारी आबादी का दो से तीन प्रतिशत हिस्सा प्रभावित है
क्यों आता है पसीना
हमें पसीना इसलिए आता है ताकि हमारे शरीर का तापमान नियंत्रित रहे। क्योंकि हमारे शरीर का तापमान 98.6 डिग्री फैरनहाइट के आसपास ही रहना चाहिए। इसे नियंत्रण में रखने के लिए हमारे शरीर में कोई 25 लाख पसीने की ग्रंथियां हैं। ये ग्रंथियां एयर कंडीशनिंग का काम करती हैं। जब गर्मी बहुत बढ़ जाती है (चाहे वह बाहरी कारणों से हो या खान-पान की वजह से), तो शरीर को ठंडा करने के लिए इन ग्रंथियों से पसीने की बूंदें निकलना शुरू हो जाती हैं। जब पसीना हवा में सूखता है तो ठंडक पैदा होती है और हमारे शरीर का तापमान कम हो जाता है।
पसीना ज्यादा आने पर बचने के घरेलु उपाय-
*साफ-सफाई का ध्यान रखें
पसीना अधिक आने की समस्या होने पर साफ सफाई का खास खयाल रखें। इससे पसीने को रोकने में बहुत मदद मिलती है। इससे पर्सनल हाइजीन होती है और आपकी त्‍वचा भी संक्रमण और बीमारी से बचती है। जब भी कोई कपड़ा पहने तो उससे पहले अपने अंडरआर्म को सुखा लें। इससे कम पसीना आएगा। ठीक प्रकार से नहाएं और गर्मियों के मौसम में रोजाना दो बार नहाएं।

    *जैतून का तेल
    अन्य तेलों से ज्यादा गुणकारी होता है, यह पसीने को कम करता है। यह पाचन तंत्र को ठीक करता है जिससे शरीर सही काम करता है। इसमें एंटी-ओक्सीडेंट्स होते हैं जो कि पसीना पैदा करने वाले बैक्टीरिया को नियंत्रित रखते हैं। इसलिए जैतून के तेल को अपने रोजाना के खाने में शामिल करें। साथ ही सब्जियों को भी जैतून के तेल में पकाए।
    .* विटामिन बी
    आपके शरीर में विटामिन बी और प्रोटीन का संतुलन सही हो तो शरीर सही कार्य करता है। विटामिन बी शरीर के लिए ईंधन की तरह काम करता है जिससे आवश्यक मेटाबोलिक क्रियाएँ और शरीर का नर्वस तंत्र ठीक तरह काम करता है। यदि बिना ज्यादा वर्कआउट के ही आपको पसीने ज्यादा आते है तो अपने आहार में विटामिन बी की चीजें शामिल करें। आप रोजाना इसकी एक टेबलेट भी ले सकते हैं। विटामिन बी की ज़रूरत को पूरा करने के लिए सब्जियाँ, प्रोटीन और अनाज ले।




    सब्जियाँ
    संतुलित आहार पसीने को नियंत्रित करने में कारगर हैं। सब्जियों में पानी और कैल्शियम होने के कारण यह पसीने जैसी शर्म की स्थिति को पैदा नहीं होने देती। सब्जियों के सेवन से ना केवल पसीना नियंत्रित होता है बल्कि ये आपको स्लिम रखती हैं, पाचन बढ़ता है और शरीर में नमी रहती है।
    *केले
    केले में पोटेशियम की अधिकता होती है। यह आपके शरीर को हाइड्रेट रखता है और पोटेशियम की कमी को पूरी करता है। केला आपके पाचन को ठीक रखता है, आपको खुश रखता है और अधिक पसीने को दूर रखता है।
    * ग्रीन टी
    ग्रीन टी वजन कम करने में मददगार है और साथ ही यह शरीर के नर्वस सिस्टम को शांत रखती है जिससे पसीना कम आता है। पसीने की परेशानी को दूर रखने के लिए वर्कआउट से पहले ग्रीन टी का सेवन करें।
    .*दही
    दही में कैल्शियम की अधिकता होती है और यह पसीने को कम करता है। यह आपके शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है जिससे पसीना कम आता है। यदि आप दही नहीं लेते हैं तो ऐसे खादय पदार्थ ले सकते हैं जिनमें पोटेशियम और कैल्शियम की अधिकता होती है।
    डाइट का खयाल रखें-
    टमाटर का जूस लें। प्रतिदिन एक बार एक कप टमाटर का जूस लेने से अधिक पसीने आने की समस्या से राहत मिलती है। इसके अलावा ग्रीन टी पियें, इससे न सिर्फ आपकी सेहत बेहतर रहहती है बल्कि यह पसीने को नियंत्रित करने में भी मददगार साबित होती है। हां पानी अधिक से अधिक पिएं। ताकि पसीने की दुर्गंध से आपको छुटकारा मिल सके और शरीर भी हाइड्रेट रहे। ध्यार रहे कि स्ट्राबेरी, अंगूर और बादाम आदि में सिलिकॉन अधिक मात्रा में होता है जिससे पसीना अधिक बनता है। कोशिश करें कि डाइट में इन्हें कम ही लें।
    *पसीने के साथ शरीर के अंदर मौजूद बहुत सारी नुकसानदायक चीजें भी बाहर निकलती रहती हैं। इसलिए पसीना निकलना भी बहुत जरूरी है लेकिन परेशानी तब बढ़ जाती है जब ये बहुत ही ज्यादा मात्रा में निकलने लगता है।
    *रोजाना के कामकाज में पसीने के साथ डिहाइड्रेशन की भी शिकायत होने लगती है।हाथ, पैरों में बहुत ज्यादा पसीने की प्रॉब्लम हो रही हो, तो ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि ये प्राइमरी या फोकल हाइपरहाइड्रोसिस भी हो सकता है। इससे ज्यादातर लोग प्रभावित होते हैं। लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि ये किसी प्रकार की कोई बीमारी है। कई बार ज्यादा दवाइयां खाने, किसी प्रकार के इलाज के कारण भी पसीने की समस्या शुरू हो जाती है जिसे सेकेंडरी हाइपरहाइड्रोसिस कहा जाता है। इसमें मौसम ठंडा रहने पर भी पसीना निकलता ही रहता है।




    हृदय संबंधी समस्या का संकेत-
    बिना किसी काम और एक्‍सरसाइज के सामान्‍य से अधिक पसीना आना हृदय की समस्याओं की पूर्व चेतावनी संकेत हो सकते हैं। दरअसल अवरुद्ध धमनियों के माध्यम से खून को दिल तक पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। जिससे शरीर को अतिरिक्त तनाव में शरीर के तापमान को सामान्‍य बनाए रखने के लिए अधिक पसीना आता है। 
    *जिन लोगों को पसीना ज्यादा आता है उन लोगों को साफ सफाई का कुछ ज्यादा ही ध्यान रखना पड़ता है अगर आपको भी पसीना ज्यादा आता है तो आप अपने बदन की साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें तभी आप अधिक पसीना आने की समस्या से छुटकारा पा सकते हैं अगर हो सके तो गर्मियों के दिनों में आप कम से कम 2 बार जरूर नहाने और आपके नहाने का जो पानी है उसमें एक चुटकी बेकिंग सोडा डालकर भी ज्यादा पसीना आने की समस्या को कम कर सकते हैं.
    *पसीना ज्यादा आता है उन्हें दिन में एक बार रोजाना टमाटर का जूस पी लेना चाहिए ऐसा करने से भी आपके शरीर में पसीना आना कम हो जाता है.
    *उसके अलावा एक उपाय और है जिन लोगों को बहुत अधिक पसीना आता है उन्हें चाय या कॉफी छोड़ देनी चाहिए और उसकी जगह ग्रीन टी का इस्तेमाल कीजिए ग्रीन टी पीने से पसीने आने की शिकायत ना के बराबर ही हो जाती है.
    *जिनको ज्यादा पसीना आता है उन्हें पानी ज्यादा पीना चाहिए क्योंकि पसीना ज्यादा आएगा तो आपके शरीर में दुर्गंध भी ज्यादा होगी और अगर आप ज्यादा पानी पिएंगे तो यह दुर्गंध कम हो जाएगी.
    *जिन लोगों को ज्यादा पसीना आता है उन लोगों को स्ट्रोबेरी, बादाम या अंगूर जैसी चीजें नहीं खाने चाहिए क्योंकि स्ट्रॉबेरी, अंगूर और बादाम में सिलिकॉन अधिक मात्रा में होता है जोकि पसीना ज्यादा आने में सहायक होता है अगर आप यह बंद कर देंगे तो भी आप का पसीना आना कम हो सकता है.
    *जिन व्यक्तियों या महिलाओं को पसीना ज्यादा आने की शिकायत हो ऐसे लोगों को फंगल इंफेक्शन होने की संभावना अधिक बनी रहती है। आप इस दिक्कत से इस तरह बच सकते हैं, अपने बॉडी की सफाई पर विशेष ध्यान देना और जितना सम्भव हो आप सिर्फ सूती कपडे ही पहने क्योंकि रेशमी या सिंथेटिक कपडे आपका पसीना नहीं सोख पाते हैं और इस वजह से आपको फंगल स्किन या चार्म रोग होने की संभावना और ज़्यादा बढ़ जाती हैं
    *पसीना जिनको ज्यादा आता हूं उनको कुछ तेज पत्ते लाकर मैं पानी में बहुत अच्छी तरह से उबाल लेना चाहिए और अच्छे से उबाल आ जाने पर इस पानी को ठंडा होने के बाद यह पानी उन जगहों पर लगाएं जिस जगह से ज्यादा पसीना आता है. जैसे बगलों में, पढ़ पर, या रान पर.
    *शरीर में जिन हिस्सों में ज्यादा पसीना आता है उन्हें कच्चे आलू की स्लाइस को काटकर उन हिस्सों पर मलें ऐसा करने पर आप को पसीना आना कम हो जाएगा.
    * शर्ट के बगल वाले हिस्से को पसीने के निशान से बचाने के लिए स्वेट पैड्स का इस्तेमाल करना चाहिए।






    * डियो, स्प्रे के बजाय रोलॉन या टेलकम पाउडर का इस्तेमाल ज्यादा अच्छा रहता है, लेकिन इसके ज्यादा प्रयोग करने से बचें क्योंकि ये स्किन को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
    *पसीने की अधिकता से सिर की त्वचा में दाने निकल आते हैं जिसे दूर करने के लिए माइल्ड शैंपू बहुत ही कारगर होता है।
    * हमेशा खुश रहने की कोशिश करें, क्योंकि कई बार ज्यादा पसीना निकलने का कारण तनाव और गुस्सा भी होता है।
    * एंटी-बैक्टीरियल साबुन का इस्तेमाल करें। जितनी बार नहाएं उतनी बार इसका प्रयोग करें। नहाने के पानी में यूडी कोलन की कुछ बूंदें डालना भी फायदेमंद होता है।
    *पसीने की वजह से पैरों में फंगल इन्फेक्शन हो सकता है। इससे बचने के लिए उंगलियों के बीच एंटी फंगल पाउडर छिड़कने के बाद ही मोजे और जूते पहनें।
    * इस मौसम में कुछ लोग मोजे पहनना छोड़ देते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं, इससे पैरों में एलर्जी हो सकती है।
    * तलवों से अधिक पसीना निकलता हो तो इससे बचने के लिए नहाने से पहले, पानी से भरे टब में दो चम्मच फिटकरी पाउडर डालकर उसमें दो मिनट तक पैरों को डुबोकर रखना चाहिए।
    *गर्मी के मौसम में बगल से सबसे ज्यादा पसीने की प्रॉब्लम होती है। तो बाहर निकलने से पहले कुछ मिनटों तक शरीर के इस हिस्से पर बर्फ रखना फायदेमंद होता है। इससे ज्यादा पसीना नहीं निकलता।


    22.12.16

    डकार आने के कारण और घरेलू उपचार

      

      खाना खाने के बाद डकार आना ठीक माना जाता है। लेकिन जब यह बार-बार आने लगे तो यह एक समस्या बन सकती है जो आपको तकलीफ देती है। पेट के अंदर की गैस को बाहार निकालने का प्राकृतिक तरीका है डकार। यदि पेट के अंदर की गैस डकार के जरिए बाहार न आए तो यह कई पेरशानी पैदा करती है जैसे पेट में दर्द और पेट मे जलन आदि। यदि डकार अधिक आने लगे तो कुछ सरल उपायों को आप अजमाकर इससे तुरंत राहत पा सकते हैं। आइये जानते हैं डकार दूर करने के उपाय।




    *चाय दिन की शुरुआत के लिये अच्छा संकेत है। जब आप चाय बना रहे है तो मिश्रण में पुदीने की पत्तियों को मिलायें। इसके एंटीऑक्सीडेंट पेट से निकलने वाले गैस को कम करने में सहायता देगा। खट्टी डकार का इलाज, भोजनोपरांत हर्बल चाय डकार से बचने में सहायता कर सकता है।
    *दही या लस्सी- दही में मौजूद बेक्टीरिया आंतों और पेट से जुड़ी हुई हर तरह की दिक्कतों को दूर करते हैं। डकार आने पर आप लस्सी या छाछ भी पी सकते हैं।दही एक आसान घरेलू नुस्खा है और यह एक प्रभावी नुस्खा है जो आपको डकार की समस्या से बचने में मदद करता है। पेट की समस्या का उपचार करने के लिए अपने रोजाना के खानपान में दही को शामिल करें। दही में जीवित बैक्टीरिया (bacteria) होते हैं जो पेट की समस्याओं से आपको निजात दिलाते हैं और आपके पेट में अच्छे बैक्टीरिया का सृजन भी करते हैं। दही का प्रयोग दूध और दुग्ध उत्पादों के स्थान पर किया जा सकता है जो कि एक अच्छी बात है, क्योंकि दुग्ध उत्पादों से डकार में वृद्धि होती है। आपके लिए यही अच्छा होगा कि छाछ में दही को मिश्रित कर लें। छाछ का प्रयोग भी डकार आने से रोकने के लिए किया जाता है। पानी के साथ दही का मिश्रण करें और इन दोनों को अच्छे से मिलाएं। इसमें थोड़ा सा जीरा मिलाएं जिससे पेट का स्वास्थ्य बना रहेगा और डकार भी नहीं आएगी।
    *पपीते में पपेन नामक महत्वपूर्ण एंज़ाइम पाया जाता है जो आपके पाचन तंत्र को अच्छी स्थिति में रखता है। यह प्राय: उन व्यक्तियों द्वारा उपभोग में लाया जाता है जो अपनी त्वचा की देखभाल करते हैं लेकिन यह पाचन और डकार को ठीक करने की एक दवा है।
    बेकिंग सोडा और नींबू का प्रयोग- यदि डकार से ज्यादा ही दिक्कत बन गई हो तो आप इसको दूर करने के लिए दो गिलास पानी में एक चौथाई बेकिंग सोड़ा और एक छोटी चम्मच नींबू का रस को मिलाकर इसे अच्छे से घोलें और तुरंत इसे पी जाएं। ये उपाय थोडी ही देर में डकार को खत्म कर देगा।




    *काला जीरा- अधिक या ज्यादा डकार आने पर काला जीरा का सेवन करें। क्योंकि काला जीरा पेट और पाचन तंत्र को ठीक रखता है जिससे डकार की समस्या पल भर में दूर हो जाती है।
    *मेथी के हरे पत्ते उबालकर, दही में रायता बनाकर सुबह और दोपहर में खाने से खट्टी डकारे, अपच, गैस और आंव में लाभ होता है।
    *सौंफ के बीजों में पेट को अकड़ से छुटकारा दिलाने वाले गुण होते हैं। यह आपके हाजमे की प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है, जिससे आपको व्यर्थ की परेशानियों से गुज़रना नहीं पड़ता। तनावमुक्त रहने और रोजाना व्यायाम करने से भी मरोड़ों की समस्या हल हो जाती है। कार्मिनेटिव (Carminative) भ पेट की जमी हुई गैस को निकालने का एक बेहतरीन तरीका है। यह पेट की सूजन को दूर करने में भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक कप उबला पानी लेकर इसमें 1 चम्मच अच्छे से पिसे हुए सौंफ के बीजों का मिश्रण करें। इसे 10 से 15 मिनट के लिए छोड़ दें और फिर इस मिश्रण को छान लें। इस मिश्रण का सेवन हर भोजन के पहले और बाद में करें। इससे पेट की गैस तेज़ी से बाहर निकलती है।
    *दालचीनी बेहतरीन प्राकृतिक नुस्खा है। यह पेट की समस्याओं को दूर करता है और आपके हाजमे को दुरुस्त करता है। यह आपको डकार और पेट में गैस की समस्याओं से भी छुटकारा दिलाता है। अपने द्वारा बनाई जा रही सब्जियों में भुनी हुई दालचीनी अवश्य डालें। आप चावल पका लेने से पहले इसमें भी दालचीनी भी डाल सकते हैं। इससे गैस की समस्या से आपका पीछा छूटता है। वैकल्पिक तौर पर दिन में 2 से 3 बार दालचीनी चबाएं। इससे भी गैस की परेशानी से निजात प्राप्त होती है। वैकल्पिक तौर पर चाय बनाएं और इसमें थोड़ी सी दालचीनी मिलाएं। इसमें थोड़ा सा ताज़ा अदरक भी मिश्रित करें। उबलते हुए पानी में एक चम्मच सौंफ डालें। इन्हें कुछ देर तक उबलने दें। इसके बाद इसे थोड़ा सा ठंडा होने दें और हल्की गर्म अवस्था में इसे पियें। इसका सेवन दिन में कई बार करने से पेट में गैस की समस्या से छुटकारा प्राप्त होता है।
    *नौसादर, कालीमिर्च, 5 ग्राम इलायची दाना, 10 ग्राम सतपोदीना पीस लें, इसे आधा ग्राम लेकर प्रतिदिन 3 बार खुराक के रूप में पानी के साथ लेने पर खट्टी डकारे, बदहजमी, प्यास का अधिक लगना, पेट में दर्द, जी मिचलाना तथा छाती में जलन आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।
    *बिजौरे नींबू की जड़, अनार की जड़ और केशर पानी में घोटकर रोगी को पिलाने से डकार और जुलाब बंद हो जाते हैं।
    *हर्बल चाय- यदि आप नियमित रूप से हर्बल चाय पीते हैं तो इससे आपको अधिक डकार की समस्या नहीं आती है। हर्बल चाय में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट पेट की गैस को कम करते हैं। इसलिए खाना खाने के बाद हर्बल चाय का सेवन कर सकते हैं।




    *अजवायन और सौंफ के साथ जीरा भी आपके पेट को काफी लाभ पहुंचाता है। 2 चम्मच भुना हुआ जीरा लें और इसे एक गिलास पानी में मिश्रित करें। इसे 5 मिनट तक अच्छे से घुलने दें और इस मिश्रण को छान लें। डकार से छुटकारा पाने के लिए इस मिश्रण युक्त पानी का सेवन दिन में कई बार करें।
    *धूम्रपान- यदि आप धूम्रपान करते हैं तो यह अधिक डकार का सबसे बड़ा कारण बनता है। इसलिए धूम्रपान बंद कर दें।
    *पानी हमारे दैनिक जीवन में सबसे ज़रूरी वस्तु है। पानी आपके हाजमे की प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है। आपको रोजाना कम से कम 8 गिलास पानी पीना ही चाहिए। इससे पेट की सूजन से छुटकारा मिलता है और पेट से अतिरिक्त गैस भी बाहर निकल जाती है। अतः सारे दिन और खाना खाने के पहले और बाद पर्याप्त मात्रा में पानी पियें। अगर आप चाहें तो अपने रोजाना के परिमाण से अधिक पानी का सेवन भी कर सकते हैं। इससे आपकी त्वचा, सुन्दरता और स्वास्थ्य में काफी निखार आता है।
    *इलायची – डकार आने पर इलायची डाल कर गरमा-गरम चाय बनाएं और धीरे-धीरे कर पियें। इलायची की चाय पीने से डकार आने की समस्या से जल्द छुटकारा मिल जाता है।
    *मुंह बंद करके खाना खाएं- भोजन करते समय ही आपका मुंह खुलना चाहिए। बाकी समय मुंह को बंद रखें। भोजन करते हुए जब आपका मुंह खुला रहता है तो इससे हवा पेट के अंदर जाती है जो गस की समस्या को बनाती है जिससे अधिक डकार आने लगती है। और अधिक तेजी से खाना नहीं खाना चाहिए।
    *नींबू – नींबू का रस भी लगातार डकार आने की समस्या को ठीक करता है। इसलिए जब भी यह आएं तो ताजे नींबू के रस के बिना कुछ मिलाए पियें, यह बंद हो जाएंगी।
    *लौंग – लौंग एक प्राकृतिक हर्ब है, इसके सेवन से कई समस्याएं ठीक होती हैं। यह डकार आने पर भी फायदा करती है, तो लगातार यह आने पर एक लौंग मुंह में रख कर चूसें, जल्द ही यह बंद हो जाएंगी।
    *ठंडा दूध – ठंडा दूध पीने से एसिडिटी की समस्या से राहत मिलती है। लगातार हिचकी या डकार आने पर ठंडा दूध पीना फायदा करता है। ठंडे दूध को धीरे-धीरे कर पीने से यह आना बंद हो जाती हैं।
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    खट्टे फल – खट्टे फल खाने से भोजन आराम से पच जाता है और यह समस्या भी ठीक हो जाती है। इसके लिए आप मुसम्‍मी, संतरा या फिर अनन्नास आदि फल खा सकते हैं।