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24.2.17

सोमवल्ली जड़ी बूटी के औषधीय उपयोग


   


यह निचोड़ा हुआ शुद्ध दधिमिश्रित सोमरस, सोमपान की प्रबल इच्छा रखने वाले इंद्रदेव को प्राप्त हो।। (ऋग्वेद-1/5/5)

सोमवल्ली : प्राचीन ग्रंथों एवं वेदों में सोमवल्ली के महत्व एवं उपयोगिता का व्यापक उल्लेख मिलता है। अनादिकाल से देवी-देवताओं एवं मुनियों को चिरायु बनाने और उन्हें बल प्रदान करने वाला पौधा है सोमवल्ली। बताया जाता है कि रीवा जिले के घने जंगलों में यह पौधा आज भी पाया जाता है। इसका.वानस्पतिक नाम Sarcostemma acidum बताया जाता है। इसकी कई तरह की प्रजातियां होती हैं।

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     प्राचीन ग्रंथों व वेद-पुराणों में सोमवल्ली पौधे के बारे में कहा गया है कि इस पौधे के सेवन से शरीर का कायाकल्प हो जाता है। देवी-देवता व मुनि इस पौधे के रस का सेवन अपने को चिरायु बनाने एवं बल सामर्थ्य  एवं समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया करते थे। इस पौधे की खासियत है कि इसमें पत्ते नहीं होते। यह पौधा सिर्फ डंठल के आकार में लताओं के समान है। हरे रंग के डंठल वाले इस पौधे को सोमवल्ली लता भी कहा जाता है।  
   सोमवल्ली को औषधियों की रानी भी कहते है इसे महासोम,अंसुमान , रजत्प्रभा , कनियान , कनकप्रभा , प्रतापवान, स्वयंप्रभ, स्वेतान , चन्द्रमा ,,गायत्र ,पवत , जागत , साकर आदि नामो से जानते है आठ ऐश्वर्य बताये गए है जिन्हे प्राप्त कर कोई भी व्यक्ति देव श्रेणी में पहुंच सकता है |

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    सोम की लताओं से निकले रस को सोमरस कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि यह न तो भांग है और न ही किसी प्रकार की नशे की पत्तियां। सोम लताएं पर्वत श्रृंखलाओं में पाई जाती हैं। राजस्थान के अर्बुद, उड़ीसा के महेन्द्र गिरि, विंध्याचल, मलय आदि अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी लताओं के पाए जाने के जिक्र है। कुछ विद्वान मानते हैं कि अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर ही सोम का पौधा पाया जाता है। यह गहरे बादामी रंग का पौधा है।
  समस्त जड़ी बूटियों  में सोम जिसे संजीवनी बूटी के रूप में जानते है ,एक मात्र इतनी महत्त्व पूर्ण है जिससे आठो प्रकार के ऐस्वर्य प्राप्त किये जा सकते है आगे विशेषता बताते हुए कहा है कि अगर कोई भी जहरीला जानवर काट ले तो इस जड़ी का एक तोला चूर्ण शहद में मिलाकर लेने से कैसा भी जहर उतर जाता है|

  दूसरा प्रयोग बताते हुए कहा कि इस जड़ी का एक तोला चूर्ण शहद के साथ मिलाकर नित्य 30 दिनों तक सेवन करे तो किसी भी व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है मांस पेशीय सुदृढ़ होकर शरीर की पुरानी चमडी उतर जाती है और उसके स्थान पर नयी चमड़ी निकल आती है कमजोर नेत्र ज्योति भी बढ़ जाती है और तो और कम सुनाई देने की समस्या ख़त्म होकर कानो से पूरा सुनाई देने लगता है और व्यक्ति हर प्रकार से नवीनता को प्राप्त कर लेता है|

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    नागार्जुन के शिष्य समश्रुवा ने तो अपना पूरा जीवन ही इस संजीवनी के नए नए प्रयोगो में खपा दिया जीवन के अंत समय में उसने कहा आकाश के तारो को गिना जा सकता है मगर इस जड़ी के प्रभाव और महत्त्व को नहीं गिना जा सकता । उसने बताया इस प्रयोग के माध्यम से जमीन से ऊपर हवा में उठा जा सकता है व्यक्ति वायु वेग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है उसने आगे कहा कि मुझे कुछ और समय मिलता तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इसके प्रभाव से व्यक्ति अजर अमर हो सकता है क्योकि मृत्यु इससे नियंत्रण में रहती है अतः आयुर्वेद के लिए यह औषधि वरदान से कम नहीं है |

'संजीवनी बूटी' : 
कुछ विद्वान इसे ही 'संजीवनी बूटी' कहते हैं। सोम को न पहचान पाने की विवशता का वर्णन रामायण में मिलता है। हनुमान दो बार हिमालय जाते हैं, एक बार राम और लक्ष्मण दोनों की मूर्छा पर और एक बार केवल लक्ष्मण की मूर्छा पर, मगर 'सोम' की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं। दोनों बार लंका के वैद्य सुषेण ही असली सोम की पहचान कर पाते हैं।  

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