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15.2.20

टायफाईड ज्वर की चिकित्सा



टाइफ़ाईड ज्वर को आंत्रिक ज्वर भी कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति साल्मोनेला टाईफ़ी नामक जीवाणु से होती है।इस रोग का मुख्य कारण जीवाणुओं से संक्रमित भोजन पदार्थों का उपयोग करना है। इस रोग में आंतें और पाचन संस्थान दूषित हो जाता है और रोग प्रतिरक्षा प्रणाली(इम्युन सिस्टम) अशक्त हो जाती है। निरंतर ज्वर बना रहता है जो संध्या काल से रात में बढ जाता है। सुबह के समय ज्वर न्युनतम रहता है। आंतों मे जख्म हो जाते हैं।त्वचा पर मोती जैसी चमक लिये दाने उभर आते हैं। पेट मे बेहद कष्ट और असुविधा मेहसूस होती है। ज्वर एक बार ठीक होकर पुन:-पुन: आक्रमण कर सकता है। यह छूतहा रोग है जो एक रोगी से अन्य व्यक्तियों में जा सकता है।यह रोग उचित चिकित्सा के अभाव में लंबे समय तक बना रहता है और कई रोगी की मृत्यु हो जाती है। इस रोग का योग्य चिकित्सक के मार्ग दर्शन में इलाज जरूरी है। मेरा अनुभव है कि निम्न वर्णित होम रेमेडीज से टायफ़ाईड ज्वर की समयावधि कम हो जाती है। आंतों में स्थित विजातीय पदार्थों का शीघ्र निष्कासन हो जाता हैं। रोगी की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्युन सिस्टम) में शक्ति आ जाती है। मैं बहुत साफ़ तौर पर बताना चाहूंगा कि माडर्न मेडीसीन,होम्योपेथिक या आयुर्वेदिक इलाज के साथ होम रेमेडीज लेने से रोग अति शीघ्र काबू में आ जाता है।


१) पानी उबालें । उसमें दो चम्मच शहद मिलाकर बार-बार पीते रहें। टाईफ़ाइड में अत्यंत उपकारी है।बिना उबला पा नहीं पीना चाहिये। रोगी को पूर्ण विश्राम देना आवश्यक है।
२) शौच निवृत्ति उपरांत साबुन से हाथ धोना चाहिये। स्वच्छता बेहद आवश्यक है।
३) रोगी को तरल भोजन जैसे जौ.मूंग की दाल का तरल और फ़लों का रस देना चाहिये। रोगी की आंतों को आराम देने के लिये भारी किस्म का गरिष्ठ भोजन कतई न लें। शुरु में हाई प्रोटीन डाईट देना हितकारी नहीं होगा।
४) पेट में कोई असुविधा मेहसूस न हो तो दूध ले सकते हैं।
५)भोजन पर्याप्त पका हुआ होना चाहिये। बासी भोजन कतई न करें।
६) संतरे का रस पानी में मिलाकर उपयोग करें।इससे आंतों की पाचन क्रिया में सुधार होगा। इससे रोग प्रतिरोधक शक्ति में इजाफ़ा होता है ,पेशाब खुलकर आता है ,शरीर से विजातीय द्रव्य बाहर निकलते हैं,शरीर को पौषक पदार्थ मिलते हैं।
७) टाईफ़ाइड ज्वर में लहसुन अत्यंत उपकारी है। इसे खाली पेट लेना उत्तम है। इससे रक्त के श्वेत कण ताकतवर बनते हैं जो रोग उन्मूलन में मददगार साबित होते हैं। २-४ लहसुन की कली बारीक काटकर १०० ग्राम दूध में ऊबालकर उपयोग करें।
८) हल्दी में रोगाणु नाशक गुण होते हैं। दूध में आधा चम्मच हल्दी उबालकर पीना कर्तव्य है।
९) तुलसी के पती १० नग,काली मिर्च ५ नग अच्छी तरह पीसकर गोली बनाकर गरम पानी के साथ निगल जाएं। अत्यंत गुणकारी उपाय है। दिन में दो तीन बार लेना चाहिये।


१०) ५-७ लौंग १ लिटर पानी में इतना ऊबालें कि आधा रह जाए। अब यह लौंग संस्कारित जल थोडा-थोडा करके पीते रहें। लौंग की औषधीय शक्ति से आंतों का संक्रमण दूर होगा। पाचन प्रणाली में सुधार होगा।
११) एक चम्मच नमक तवे पर सेक लें।इसे एक गिलास जल में घोलकर धीरे-धीरे पीयें। लाभदायक
नुस्खा है। एक घंटे बाद थोडा-थोडा सामान्य जल पीयें । टायफ़ाईड ज्वर जल्द ठीक होगा।
१२) पौषक तत्वों की पूर्ति के लिये सेवफ़ल का रस ,मौसंबी का रस और केले का उपयोग करना उचित है।
१३) धनिये की पत्ती का रस २ चम्मच एक गिलास खट्टी छाछ मे घोलकर दिन में तीन बार पीने से मोतीझला ज्वर शीघ्र ठीक होता है।
१४) एक पका केला १५ ग्राम शहद में मसलकर मिलाकर दिन में तीन बार कुछ रोज लेने से आशातीत लाभ होता है।


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