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18.7.17

पित्त दोष जनित रोगों के आयुर्वेदिक घरेलु उपचार


आयुर्वेद के अनुसार रोगों का मूल कारण वात, पित्त व कफ का असंतुलन है. यह तीन धातुएं जब तक संतुलित हैं शरीर निरोग एवं स्वस्थ रहता है. इनमे असमानता आते ही शरीर में रोग का प्रभाव आ जाता है. यदि हम यह जान जाए कि हमारे शरीर में कौन सी धातु असंतुलित हो रही है, तो बहुत सी बिमारियों को बिलकुल प्रारंभिक स्तर पर रोका जा सकता है,और यदि हम बिमार हो भी जाए तो इस ज्ञान के द्वारा उचित पथ्यापथ्य वा औषधि का सेवन करके हम जल्दी स्वस्थ हो सकते हैं.

पित्त :

सूर्य की शक्ति समस्त संसार में व्याप्त है और यही सूर्य शक्ति मानव देह में पित्त रूप में विराजमान है पित्त स्पर्श और गुण में उष्ण होता है, अर्थात् अग्नि रूप होता है एवं द्रव (तरल) रूप में रहता है। इसका रंग पीला एवं नीला होता है। यह सत्त्वगुण प्रधान होता है, रस में कटु (चरपरा) और तिक्त (कड़वा) होता है तथा दूषित होने पर खट्टा हो जाता है।

पित्त प्रकृति के लक्षण :

जिनकी पित्त प्रकृति होती है ऐसे पुरुषों स्त्रियों के बाल स्त्रियों के बाल समय से पहले ही श्वेत हो जाते हैं, परन्तु ऐसे व्यक्ति बुद्धिमान् होते है। उन्हें पसीना अधिक आता है। स्वभाव क्रोधी उग्र होता है. और ऐसे व्यक्ति स्वप्न में बहुधा चमकीली चीजें देखते है।>पित्त के स्थान एवं कार्य :
(1) अग्नाशय में स्थित अग्नि रूप पित्त जो चतुर्दिक आहार को पचाता है। इसको पाचक पित्त कहते हैं।
(2) त्वचा में स्थित पित्त त्वचा में कांति और प्रभा की उत्पत्ति करता है और शरीर की वाह्य त्वचा पर लगाये हुये लेप और अभ्यंग को पचाता है। यह शरीर के तापमान को स्थिर रखता है। इसको श्राजक पित्त कहते हैं।
(3) नेत्रों में स्थित पित्त जो कृष्ण पीट आदि रूपों को दिखाता है आलोचक पित्त कहलाता है

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(4) जो पित्त हृदय में रहकर मेधा (धारणाशक्ति) और प्रज्ञा (बुद्धि) को देता है, वह ‘साधक’ पित्त होता है।
इस प्रकार नाम और कर्म भेद से पित्त पाँच प्रकार का होता है। और यही पित्त समग्र शरीर को उत्तम रखने का कारण है।

पित्त रोग वर्णन :

पित्त से होने वाले 40 प्रकार के रोग इस प्रकार हैं :
1. धूमोद्वार – डकार से निकलने वाली वायु
2. विदाह – आँख हाथ पैर में बिना प्रत्यक्ष कारण के जलन में जलन
3. उष्णाड्डत्व – शरीर का गर्म बना रहना
4. मतिभ्रम – अधिकता होने पर विवेक शुन्यता
5. कांति हानि – शरीर का रंग पीला दिखाई देना
6. कंठ शोष – गले का सूखना
7. मुख शोष – मुख का सूखना
8. अल्प शुक्रता – वीर्य का अल्प होना
9. तिक्तास्यता – मुख का स्वाद कड़वा रहना
10. अम्लवक्त्रता – मुख का स्वाद खट्टा रहना
11. स्वेदस्त्राव – पसीने का अधिक आना
12. अंग पाक – शरीर में पस पड़ना
13. क्मल – परिश्रम के बिना ही थकावट का होना
14. हरितवर्णत्व – पित्त के मलयुक्त होने पर हरा सा वर्ण होता है
15. अतृप्ति – भोजनादि में तृप्ति नहीं होती
16. पीत गात्रता – अंगों का पीला होना
17. रक्त स्त्राव – रुधिर प्रवृत्ति
18. अंग दरण – अंगों में दरण्वत पीड़ा
19. लोह गन्धास्यता- निःश्वसित श्वास में लोहे की गन्ध का होना
20. दौर्गान्ध्य – पसीने में दुर्गन्ध का आना
21. पीतमूत्रता – मूत्र का पीत वर्ण होना
22. अरति – बेचैनी का होना
23. पीत विट्कता – पुरीष का पीला होना
24. पीतावलोकन – पीला ही पीला दिखना
25. पीत नेत्रता – नेत्रों का पीला होना
26. पीत दन्तता – दांतों का पीला होना



27. शीतेच्छा – शीतल पदार्थ और शीतल वायु की अभिलाषा सर्वदा होना

28. पीतनखता – नाखूनों का पीला होना
29. तेजो द्वेष – अत्यंत चमकीली वस्तुओं से द्वेष ( सूर्य का प्रकाश )
30. अल्पनिद्रा – थोड़ी निद्रा का आना
31. कोप – क्रोधी स्वभाव का होना
32. गात्साद – अंगों में द्रढता का अभाव
33. भिलविट्कता – पुरीष का द्रव रूप में आना
34. अन्धता – आँखों की ज्योति का कम होना
35. उष्णोच्छवास – वायु का गरम होकर आना
36. उष्ण मूत्रता – मूत्र का गरम होना
37. उष्ण मानता – मल का स्पशौषणा होना
38. तमसोदर्शन – अन्धकार का दिखना
39. पीतमण्डल दर्शन – पीले मण्डलों का दिखना
40. निःसहत्व – सहन शक्ति का अभाव होना
इस प्रकार पित्त जनित ये 40 रोग हैः
पित्त प्रकोप एवं शमन :
विदाहि (पित्त प्रकोपक ), कटु ( कडुआ,तीक्ष्ण), अम्ल (खट्टे) एवं अत्युष्ण (अत्यधिक गर्म ) भोजन से, अत्यधिक धूप अथवा अग्नि सेवन से, भूख और प्यास के रोकने से, अन्न के पाचन काल में, मध्याह्न में और आधी रात के समय उपरोक्त कारणों से पित्त का प्रकोप ( पित्त का विकृत होना ) होता है। इन कारणों के विपरीत आचरण विपरीत समयों में करने से पित्त का शमन होता है।



पित्तजनित दोषों को दूर करने हेतु औषधि :

1- शतावरी का रस दो तोला में मधु पांच ग्राम मिलाकर पीने से पित्त जनित शूल दूर होता है।
2- हरड, बहेड़ा, आंवला, ( सामान मात्रा ) में अमलतास की फली का गूदा (पीछे बतायी गयी सामग्रीके बराबर ) , इन चारों औषधियों के काढे़ में खांड़ और शहद मिलाकर पीने से रक्तपित्त, और पित्तजनित शूल (नाभिस्थान अथवा पित्त वाहिनियों में पित्त संचित और अवरुद्ध होने से उत्पन्न होने वाले शूल को ) अवश्य दूर करता है।
नोट- काढ़ा बनाने हेतु दवा के मिश्रण से 16 गुना पानी डालकर मंद आंच में पकायें। जब पानी एक चौथाई रह जाये, तो उसे ठंडा करके पीना चाहिये। इस काढ़ा की मात्रा चार तोला के आसपास रखनी चाहिए।
3- पिप्पल (गीली) पित्त को शान्त करती है।
4- खट्टा आंवला, लवण रस और सेंधा नमक भी पित्त को शान्त करती है।
5- गिलोय का रस पित्त को शान्त करता है।(10 ml )
6- हरीतकी (पीली हरड़) 25 ग्राम, मुनक्का 50 ग्राम, दोनों को सिल पर बारीक पीसकर उसमें 75 ग्राम बहेड़े का चूर्ण मिला लें। चने के बराबर गोलियां बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल ताजा जल से दो या तीन गोली सेवन करें। इसके सेवन से समस्त पित्त रोगों का शमन होता है। हृदय रोग, रक्त के रोग, विषम ज्वर, पाण्डु-कामला, अरुचि, उबकाई, कष्ट, प्रमेह, अपरा, गुल्म आदि अनेक परेशानियाँ नष्ट होती हैं।
7- 10 ग्राम आंवला रात्रि में पानी में भिगो दें। प्रातःकाल आंवले को मसलकर छान लें। इस पानी में थोड़ी मिश्री और जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करें। तमाम पित्त रोगों की रामबाण औषधि है। इसका प्रयोग 15-20 दिन करना चाहिए।
8- शंखभस्म 1ग्राम, सोंठ का चूर्ण आधा ग्राम, आँवला का चूर्ण आधा ग्राम, इन तीनों औषधियों को शहद में मिलाकर सुबह खाली पेट एवं शाम को खाने के एक घण्टे बाद लेने से अम्लपित्त दूर होता है।
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