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5.12.18

नाक, कान, गला के रोगों से निजात पाने के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपाय



ईएनटी (ईयर, नोज एंड थ्रोट) का संक्रमण किसी भी को हो सकता है। फिर चाहे वह बच्‍चा हो या बड़ा। आमतौर पर इस संक्रमण के लक्षण में ही दिखाई देते हैं। इस बीमारी के कुछ लक्षण हैं - गाल में दर्द के साथ नाक से गाढा बलगम निकलना, नाक बहना, सिरदर्द, बुखार और कुछ भी निगलने में परेशानी कान में इंफेक्‍शन होने से हमेशा तरल पदार्थ बाहर निकलता रहता है। सुनने में परेशानी होती है और संक्रमण की वजह से दर्द और सूजन भी हो जाती है।

ईएनटी के संक्रमण से बचने के उपाय –

इस संक्रमण की शुरूआत जुकाम से होती है। इसलिए जुकाम को शुरूआती स्‍तर पर ही पहचान लीजिए। इससे बचने के लिए जुकाम की शुरुआत में ही भाप लीजिए। जिससे संक्रमण नहीं होगा। और संक्रमित बलगम बाहर निकल जाएगा।
ईएनटी के संक्रमण से बचने के लिए तैराकी करते वक्‍त विशेष ध्‍यान देना चाहिए। तैराकी के दौरान कान को और आंख को संक्रमण से बचाने के लिए कान में ईयर प्‍लग और चश्‍मा लगाकर ही तैराकी कीजिए।


अगर गले में खराश हो तो हल्‍के गुनगुने पानी में नमक डालकर गरारा कीजिए। इससे खराश में फायदा होता है। साथ ही गले का संक्रमण नहीं। दिन में कम से कम तीन से चार बार गरारा कीजिए। गरारा करने से रक्‍त संचार भी अच्‍छा होता है।

अगर आपकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है तो लोगों के संपर्क में आने से बचने की कोशिश कीजिए। भीड़-भाड़ वाले इलाके में जाने से परहेज कीजिए। जिससे आपको संक्रमण न हो।
यदि जुकाम से ज्‍यादा परेशान हैं तो हवाई यात्रा नहीं करनी चाहिए। हवाई यात्रा करने से संक्रमण बढ कर साइनस का रूप ले सकता है और कान को भी प्रभावित कर सकता है।
मादक पदार्थों का सेवन करने से बचें। धूम्रपान और शराब पीने से साइनस का संक्रमण बढ जाता है।
फलों और सब्जियों का ज्‍यादा मात्रा में सेवन करें। डेयरी उत्‍पाद का सेवन कम कीजिए।

कान दर्द

कारण

कान के अन्दर मैल फूल जाने, घाव हो जाने, कान में सूजन होने या संक्रमण के कारण कान में दर्द होता हैं। गले या नाक में संक्रमण होने पर समय रहते चिकित्सा न की जाए, तो उससे भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

कान का सूजना, कान से मल निकलना, कानों में रूक – रूक कर दर्द होना आदि।

घरेलू चिकित्सा

तुलसी के पत्तों का रस निकलकर गुनगुना कर लें और दो – तीन बूँद सुबह – शाम डालें।

नींबू का रस गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
प्याज का रस निकालकर गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
बकरी का दूध उबाल कर ठंडा कर लें। जब गुनगुना रह जाएं, तो इसमें सेंधानमक मिलाकर 2 – 3 बूँद दोनों कानों में टपकाएं।
मूली के पत्तों को कूटकर उसका रस निकालें। रस की एक तिहाई मात्रा के बराबर तिल के तेल के साथ आग पर पकाएं। जब केवल तेल ही बचा रह जाए, तो उतार कर छान लें। कान में 2 -3 बूँद डालें।
कपूर व घी समान मात्रा में लेकर पकाएं। पकने पर उतार कर ठंडा कर लें व 2 – 3 बूँद कानों में डालें।
आक के पत्तों का रस, सरसों का या तिल का तेल तथा गोमूत्र या बकरी का मूत्र बराबर मात्रा में लेकर थोड़ा गर्म करें और कान में 2 – 3 बूँद डालें।
लहसुन की दो कलियाँ छीलकर सरसों के तेल में डाकार धीमी आंच पर पकाएं। जब लहसुन जलकर काला हो जाए, तो उसे उतार कर ठंडा करें व छान कर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
अदरक का रस, सेंधानमक, सरसों का तेल व शहद बराबर मात्रा में लेकर गर्म करें और गुनगुना होने पर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
आक की पकी हुई पीली पत्ती में घी लगाकर आग पर गर्म करें। इसे निचोड़कर रस निकालें व दो – तीन बूँद कानों में डालें।
आम की पत्तियों का रस निकालकर गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

महत्पंचमूल सिद्ध तेल, सुरसादि पक्व तेल का प्रयोग किया जा सकता हैं। रामबाण रस, लक्ष्मीविलास रस व संजीवनी वटी का प्रयोग खाने के लिए करें।




कान बहना


कारण

जुकाम, खांसी या गले के संक्रमण की चिकित्सा न की जाए, तो कान में भी संक्रमण हो जाता हैं। छोटे बच्चे जिनका गला खराब हो या खांसी हो, जब कान में मुंह लगाकर धीरे से कोई बात करते हैं, तो सांस के साथ रोग के जीवाणु कान में पहुँच जाते है। कान में फोड़ा – फुंसी हो, पानी, रूई या अन्य कोई बाहरी वस्तु कान मे रह जाए, तो भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

रोगी के कान से बदबूदार स्राव या मवाद बाहर निकलती हैं।

घरेलू चिकित्सा

लहसुन की दो कलियाँ व नीम की दस कोपलें तेल में गर्म करें। दो – दो बूँद दिन में तीन – चार बार डालें।
150 ग्राम सरसों का तेल किसी साफ़ बर्तन में डालकर गर्म करें और गर्म होने पर 10 ग्राम मोम दाल दें। जब मोम पिघल जाए तो आग पर से उतार लें और इसमें 10 ग्राम पिसी हुई फिटकरी मिला दें। 3 – 4 बूँद दवा सुबह – शाम कान में डालें।
2 पीली कौड़ी का भस्म 200 मिली ग्राम व दस ग्राम गुनगुने तेल में डालें। छानकर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
नींबू के रस में थोड़ा सा सज्जीखार मिलाकर 2 – 3 बूँद कान में टपकाएं। आग से उतार कर ठंडा करें व छानकर रख लें। 2 – 3 बूँद कान में डालें।
10 ग्राम रत्नजोत को 100 ग्राम सरसों के तेल में जलाएं। ठंडा होने पर छानकर रखें और 2 – 3 बूँद कान में डालें।
धतूरे की पत्तियों का रस निकालकर थोड़ा गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।
नीम की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
तुलसी की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
आधा चमच्च अजवायन को सरसों या तिल के तेल में गर्म करें। फिर आंच से उतार लें। गुनगुना रह जाने पर 2 – 3 बूँद डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

आरग्वधादि क्वाथ से कान को धोएं। पंचवकल क्वाथ या पंचकषाय क्वाथ का प्रयोग भी किया जा सकता हैं। समुद्रफेन चूर्ण का प्रयोग भी लाभदायक होता है।



नासास्रोत शोथ


कारण

चेहरे की हड्डियों में स्थित गुहाएं (रिक्त स्थान) जोकि नाक से सम्बद्ध हैं, साइनस कहलाती हैं। ये स्लेश्म्कला से ढकी रहती हैं एवं चार प्रकार की होती हैं और जिस हड्डी में स्थित हैं, उनके अनुसार इनका नामकरण किया गया हैं। जुकाम या इन्फ्लुएंजा के उपद्रव के रूप में या संक्रमण के कारण इनमें सूजन आ जाने को साइनुसाइटिस या नासास्रोत शोथ कहते हैं।

लक्षण

किसी साइनस में शोथ होने पर एक ओर नासिका से स्राव होता हैं, साथ ही वेदना की शिकायत भी रहती हैं। जिस साइनस में शोथ हो, उसी के अनुसार वेदना की प्रतीति भी माथे व चेहरे के विभिन्न भागों में होती हैं।

घरेलू चिकित्सा
रोगी को पसीना आने वाली दवा दें, ताकि शोथ के कारण पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद नासागुह के छिद्र खुल जाएं। इसके लिए रोगी को अदरक, लौंग, काली मिर्च, बनफशा की चाय पिलाएं।
एक ग्राम काली मिर्च को आधा चमच्च देसी घी में गर्म करें। ठंडा होने पर ह्वान लें व दो – तीन बूँद नाक के दोनों छिद्रों में तीन बार डालें।
अदरक या सफेदे के पत्ते पानी में उबालकर भाप लें।
5 ग्राम अदरक घी में भूनकर सुबह – शाम लें।
5 ग्राम अदरक को पाव भर दूध में उबालें। यह दूध नाक के नासाछिद्रों में भर कर रखें।
जलनेति – 1 लीटर पानी को नमक डाल कर उबालें। गुनगुना रहने पर टोंटीयुक्त लोटे में भरकर बाएँ नाक से पानी लेकर दाएं से निकालें।फिर दाएं से लेकर बाएँ से निकालें। अंत मैं बारी – बारी से दोनों नाकों से पानी लेकर मुंह से निकालें।

पेटेंट दवाएं