20.3.18

धनिया के गुण और औषधीय उपयोग,dhaniya upyog

                                                   


हरे धन‍िये की पत्तियां और बीज दोनों ही खाने का स्‍वाद बढ़ा देते हैं| यह रसोईघर में प्रयोग होने वाले मसालों में से एक है |हरे धनिये में जीरा, पोदीना, नींबू का रस आदि मिलाकर स्वादिष्ट बनाकर सेवन करने से अरुचि बंद हो जाती है। इससे भूख खुलकर लगती है और पाचन क्रिया (भोजन पचाने की क्रिया) तेज हो जाती है।
रंग - धनिये के पत्ते का रंग हरा और दाना भूरा होता है।
स्वभाव - यह ठण्डे स्वभाव का होता है।
दोषों को दूर करने वाला-धनिये के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए शहद का उपयोग किया जाता है।
मात्रा- 9 से 10 ग्राम।

धनिया के  फायदे 

हरे धनिये की पत्तियों को सब्जी में डालकर सेवन करने से रक्त विकार नष्ट होते हैं।
★ इससे भूख खुलकर लगती है और पाचन क्रिया (भोजन पचाने की क्रिया) तेज हो जाती है।
★ यह मन को खुश करता है,
★ आंखों के लिए हरा धनिया बहुत ही गुणकारी होता है।
★ धनिया, वात, पित्त और कफ विकारों में लाभ पहुंचाता है।
★ यह वीर्य और पाचन शक्ति को विकसित करता है।
★ दिमाग की गर्मी को कम करता है,
★ पागलपन के लिए लाभदायक है,
★ धातु वीर्य दोषों को खत्म करती है,
★ नींद ज्यादा आती है,
★ इसके काढ़े से कुल्ला करने से मुंह में दाने नहीं होते हैं।
★ धनिये के सेवन से पेशाब खुलकर आता है।
★ दमा, खांसी में धनिया बहुत ही गुणकारी होता है।
★ यह शरीर की कमजोरी को नष्ट करने के साथ ही आंतों के कीड़ों को भी दूर करता है।

धनिये से विभिन्न रोगों का उपचार -

1. याददास्त कमजोर होना :

• 500 ग्राम पानी में 125 ग्राम धनिये को उबालें, और जब पानी एक चौथाई की मात्रा में रह जाये तो इसे छान कर इसमें 125 ग्राम मिश्री मिलाकर इसको गाढ़ा होने तक गर्म करके रोजाना 10 ग्राम की मात्रा में चाटने से दिमाग की कमजोरी दूर हो जाती है और बुद्धि का विकास होता है।
• धनिये के रस को सिर में लगाने से याददाश्त तेज हो जाती है।

2. बालरोगों की औषधि :

• धनिया, अतीस, काकड़सिंगी और गजपीपल को मिलाकर चूर्ण बनाकर शहद के साथ मिलाकर चटाने से बच्चों के अतिसार (दस्त) और वमन (उल्टी) रोग समाप्त हो जाते हैं।
• अगर बच्चे की नाभि उथल गई हो, तो हरा धनिया पीसकर लगाने से लाभ होता है।
• धनिया, लोध्र, इन्द्रजौ, आंवला, सुगन्धवाला और नागरमोथा को बारीक पीसकर शहद में मिलाकर बच्चों को चटाने से बुखार समाप्त हो जाता है।

3. खाने के तुरंत बाद दस्त होना : 

धनिये में काला नमक मिलाकर भोजन के बाद 1 चम्मच भरकर सेवन करने से खाना खाने के बाद होने वाले दस्त बंद हो जाते हैं।

4. वमन होना (उल्टी) :

• उल्टी होने पर सूखा या हरा धनिया को पीसकर उसका पानी निचोड़कर 5 चम्मच बार-बार रोगी को पिलाने से उल्टी आना बंद हो जाती है। इस प्रयोग से गर्भवती स्त्री की उल्टी भी बंद हो जाती है।
• आधा चम्मच हरे धनिये का रस, चुटकी भर सेंधानमक और 1 चम्मच कागजी नींबू के रस को मिलाकर रोगी को पिलाने से उल्टी होने के रोग में लाभ होता है।
• हरे धनिये को पीसकर निचोड़ लें और इसका रस निकालकर उस रस में से लगभग 33 ग्राम रस रोगी को पिलाने से उल्टियां होना बंद हो जाती हैं। इसको लगातार कई बार पिलाने से गर्भवती स्त्री की उल्टियां होना भी बंद हो जाती हैं।

5. गले की सूजन : 

गले में सूजन हो जाने की हालत में धनिये के दानों को पीसकर उसमें गुलाब जल मिलाकर गले पर चन्दन की तरह लगाने से गले की सूजन दूर हो जाती है।

6. गले का दर्द :

• हर 3-3 घंटे के अंदर 2 चम्मच सूखा साबुत धनिया चबा-चबाकर चूसते रहने से हर प्रकार का गले का दर्द दूर होता है।
• सूखे धनिये को मिश्री में मिलाकर रोगी को चबाने या चूसने को कहें। इससे गले का दर्द ठीक हो जाता है।
पित्त रोग (गर्मी के विकार) : 

लगभग 3 ग्राम की मात्रा में साबूत सूखा धनिया लेकर पीसकर चूर्ण बना लें, फिर इसको ठण्डे पानी और मिश्री के साथ मिलाकर गर्मी के दिनों में पीने से पित्त के कारण होने वाले रोगों से छुटकारा मिल जाता है।

7.शरीर की जलन :

• रात को 4 चम्मच धनिया और इतने ही चावल पानी में भिगों दें। इन्हें सुबह गर्म करके पीयें अथवा रात को धनिया भिगों दें और सुबह के समय मिश्री डालकर पीसकर छानकर पियें। इससे शरीर की गर्मी और पेट की जलन नष्ट हो जाती है।
• रात को धनिये को पानी में भिगों दें और सुबह उठने पर उसे छानकर उसमें मिश्री डालकर पी जायें। इससे शरीर की गर्मी और पेट की जलन दूर हो जाती है।

8. मूत्र में जलन :

यदि तेज प्यास, पेट, शरीर या मूत्र में कहीं जलन हो तो 15 ग्राम धनिये को रात को भिगो दें। सुबह के समय उसे ठंडाई की तरह पीसकर मिश्री डालकर सेवन करें। इस प्रयोग से दिल की तेज धड़कन सामान्य हो जाती है। धनिया और आंवला रात में भिगोकर सुबह के समय मसलकर पीने से मूत्र की जलन दूर हो जाती है।

9. अनिद्रा : 

चीनी और पानी के साथ हरे धनिये को पीसकर रोगी को पिलाने से सिर दर्द दूर होने के साथ ही अच्छी नींद आती है।

10. मासिक-धर्म अधिक मात्रा में आना :

• लगभग 20 ग्राम धनिया को 200 ग्राम पानी में डालकर उबालें जब 50 ग्राम पानी शेष रह जाए तो इसे छानकर इसमें मिश्री मिलाकर रोगिणी को सेवन करा दें। इस प्रयोग से मासिक-धर्म में अधिक खून का आना बंद हो जाता है।
• 10 ग्राम सूखा धनिया लेकर लगभग 200 ग्राम पानी में उबालते हैं। जब यह एक चौथाई की मात्रा में रह जाए तो इसे छानकर इसमें खाण्ड (चीनी) मिलाकर हल्के गर्म पानी के साथ सुबह के समय 3-4 बार रोगी को पिलाने से मासिक-धर्म का ज्यादा आना कम हो जाता है।

11. स्वप्नदोष :

• धनिये को पीसकर मिश्री में मिलाकर ठण्डे पानी से सेवन करने से स्वप्नदोष, मूत्रजलन, सूजाक और उपदंश में लाभ होता है जो लोग चाहते हैं कि काम वासना अधिक न सताएं वे लोग 2 ग्राम सूखा धनिया पीसकर पानी मिलाकर कुछ दिनों तक पीयें अथवा सूखा धनिया पीसकर छान लेते हैं। इसमें बराबर मात्रा में पिसी हुई चीनी मिलाएं सुबह के समय खाली पेट बासी पानी से 1 चम्मच भर की मात्रा में फांक लेते हैं तथा 1 घंटे बाद कुछ भी खाते-पीते नहीं हैं। इससे स्वप्नदोष से छुटकारा मिल जाता है।
• सूखा धनिया तथा मिश्री को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लेते हैं और किसी ढक्कनदार बर्तन में भरकर रख देते हैं। इस चूर्ण को 5-6 ग्राम के लगभग, ताजा पानी के साथ सुबह-शाम कुछ दिनों तक लेने से अनैच्छिक वीर्यपात, स्वप्नदोष आदि रोगों से मुक्ति मिल जाती है।

12. मुंह से दुर्गंध आना :

• हरा धनिया खाने से मुंह में सुगंध रहती है। प्याज, लहसुन आदि गंध वाली चीजें खाने के बाद हरा धनियां चबाने से मुंह से दुर्गंध आना बंद हो जाती है।
• हरा धनिये को खाने से मुंह की दुर्गंध खत्म होती है और मुंह में से सुगंध आती है।

13. रक्तातिसार (खूनी दस्त) :

15 ग्राम धनिये को पीसकर उसमें 12 ग्राम मिश्री मिलाकर पानी में घोलकर पीने से दस्त में खून आना बंद हो जाता है।
• धनिये को पानी में उबालकर उसमें मिश्री मिलाकर पीने से उल्टी आना बंद हो जाती है।
• हरे धनिये और पोदीने में सेंधानमक मिलाकर चटनी बना लें। इस चटनी में नींबू का रस मिलाकर खाने से उल्टी नहीं आती है।
• 3 ग्राम धनिया और 3 ग्राम सौंफ को पीसकर छान लें। इसे 250 ग्राम पानी में मिलाकर इसमें शक्कर डालकर 2-3 बार पीने से उल्टी आना बंद हो जाती है।
• हरे धनिये और पुदीने को मिलाकर, इसकी चटनी बनाकर खाने से उल्टी होना बंद हो जाती है।

14. लू :

• गर्मी के मौसम में चलने वाली गर्म हवा (लू) से बचने के लिए धनिए के पानी में चीनी मिलाकर सेवन करने से लाभ मिलता है।
• पानी में धनिये को पीसकर और मिश्री में मिलाकर पिलाने से बच्चे को लगी हुई लू को दूर किया जा सकता है।
• धनियां, बनफ्सा, मकोय, मुलेठी और सौंफ को बराबर मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से लू लगने का रोग ठीक हो जाता है।

15. गर्मी के कारण सिर दर्द :

• सूखा धनियां 10 ग्राम, गुठली रहित सूखा आंवला 5 ग्राम लेकर रात के समय मिट्टी के एक बर्तन में भिगो दें। प्रात:काल इसमें मिश्री मिलाकर छानकर सेवन करते हैं। इससे गर्मी के कारण हुआ सिर दर्द बंद हो जाता है।
• यदि सर्दी के कारण सिर दर्द हुआ हो तो सूखे धनिये के साथ सोंठ, चाय की पत्ती, तुलसी के पत्तों के साथ पीस लेनी चाहिए। फिर इसमें थोड़ा सा पानी मिलाकर लेप बना लेना चाहिए। इस लेप को चमचे में गर्म कर लेना चाहिए। यह गर्म लेप माथे पर लगाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।
• यदि गर्मी के कारण सिर दर्द हुआ हो तो लेप में सोंठ न डाली जाए, धनिया और तुलसी का लेप बनाकर माथे पर लगाना चाहिए। थोड़ी देर में दर्द दूर हो जाता है। यदि इस क्रिया के बाद भी सिर दर्द नहीं जाता है तो समझना चाहिए कि दर्द साधारण नहीं है। ऐसी स्थिति में हमें अच्छे डॉक्टरों से सलाह लेनी चाहिए।
• सिर दर्द में चक्कर, उल्टी व गर्भवती की उल्टी होने पर धनिया उबालकर मिश्री मिलाकर पीने से लाभ होता है।

16. मस्तिष्क की कमजोरी :

125 ग्राम धनिये को पीसकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालें। जब यह चौथाई बाकी रह जाए तो इसे छानकर 125 ग्राम मिश्री मिलाकर फिर गर्म करें। जब यह गाढ़ा हो जाए तो इसे उतार लेते हैं। इसे रोजाना सेवन करने से दिमाग की कमजोरी से आने वाला आंखों के सामने अंधेरा तथा जुकाम आदि सभी रोग दूर हो जाते हैं।

17. नकसीर (नाक से खून आना) :

• हरे धनिये का रस सूंघने और हरे धनिये की पत्तियों को पीसकर सिर पर लेप करने से गर्मी के कारण से नाक से बहने वाला खून बंद हो जाता है अथवा धनिया रात को भिगो दें। धनिये को सुबह के समय पीसकर मिश्री मिलाकर पीने से लाभ मिलता है।
• गर्मी की वजह से नाक से खून बहने पर हरे धनिये के रस को सूंघने से और उसकी पत्तियों को पीसकर सिर पर लगाने से नकसीर (नाक से खून बहना) बंद हो जाती है।
• 10 ग्राम धनिया, 75 ग्राम सौंफ, 100 ग्राम मिश्री और 8-10 कालीमिर्च के दानों को पानी के साथ पीसकर शर्बत बना ले। इस शर्बत को रोजाना सुबह और शाम पीने से नकसीर (नाक से खून बहना) के रोग में लाभ होता है।
• 5 ग्राम सूखा धनिया, 5 ग्राम गोरखमुण्डी के फूल और 8 मुनक्का लेकर 125 ग्राम पानी में 3 घंटे के लिये भिगोकर रख दें। सुबह उठकर इस पानी को छानकर पीने से नकसीर (नाक से खून बहना) का रोग ठीक हो जाता है।
• 2 चम्मच धनिये के दाने, थोड़ी सी किशमिश और थोड़ी सी मिश्री को पानी में डालकर और पीसकर पीने से नकसीर (नाक से खून बहना) में आराम आता है।

नींद न आने की शिकायत

नींद न आने की शिकायत लगातार कुछ सोचने, मानसिक अशांति, पेट में कब्ज, अत्यधिक थकावट, असामान्य बीमारी आदि के कारण होती है। कुछ लोग इस अवस्था में नींद की गोलियां ले लेते हैं। ऐसा कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि प्रारम्भ में नींद तो आ जाती है। परन्तु कुछ दिनों बाद नींद की गोलियां मन को सहज हो जाती है। अत: ये अपना प्रभाव डालना बंद कर देती हैं। तब मनुष्य और अधिक परेशानी में पड़ जाता है। इसके लिए दाल-सब्जी आदि में नमक की मात्रा कम कर देनी चाहिए। हल्का भोजन लेना चाहिए यदि कब्ज हो तो उसे दूर करना चाहिए। स्वादिष्ट व सुगंध खाने वाली चीजों को छोड़ देना चाहिए। तेज-मिर्च मसाले आदि नहीं खाने चाहिए। धनिया के 25 दाने, 1 लाल इलायची, 2 कालीमिर्च को पीसकर चूर्ण बना लेना चाहिये। फिर इस चूर्ण को दो चुटकी लेकर ऊपर से गुनगुना पानी ले लेना चाहिए। पांव के तलुवें में देशी घी या सरसों का तेल मलना चाहिए। इससे तनाव कम होकर नींद आ जाती है।

19. सिर का दर्द :

• धनिये को पीसकर माथे पर लेप की भांति लगाने से पित्त (गर्मी) के कारण होने वाला सिर दर्द खत्म हो जाता है।
• धनिये और आंवले को बराबर मात्रा में लेकर रात को सोते समय भिगो दें और सुबह छानकर इसमें मिश्री मिलाकर पीने से सिर का दर्द ठीक हो जाता है।
• हरे या कच्चे धनिये को पीसकर सिर पर लेप करने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।
• पित्तज या गर्मी के कारण होने वाले सिर के दर्द में धनिये, चन्दन और गुलाब के फूलों को बारीक पीस लें, और इनको ईसबगोल में मिलाकर गाढ़ा करके लगाने से सिर का दर्द खत्म हो जाता है।
• 1 चम्मच धनियां, 5 साबूत काली मिर्च, 4 पत्ते तुलसी के और दो लौंग को लेकर काढ़ा बनाकर पीने से सर्दी और जुकाम की वजह से होने वाला सिर का दर्द दूर हो जाता है।
• 10 ग्राम सूखा हुआ धनिया, 5 ग्राम आंवले का चूर्ण और 4 लौंग को पीसकर सेंधा नमक के साथ चाटने से या माथे पर लेप करने से गर्मी के कारण होने वाला सिर का दर्द दूर हो जाता है।

20. होठों का फटना : 

धनिया, राल, गेरू, मोम, घी और सेंधा नमक को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर और छानकर लेप करने से फटे हुए होठ ठीक हो जाते है।

21. पैरों में जलन :

सूखा धनिया और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। फिर इसके 2 चम्मच रोजाना 4 बार ठण्डे पानी से लेने से हाथ और पैरों की जलन दूर हो जाती है।

22. अधिक पसीना आना :

• जब शरीर अधिक पसीने से भीग जाए तो समझ लेना चाहिए कि जिगर में कोई खराबी है। इसमें भूख कम हो जाती है। शरीर पसीने के बाद शिथिल (ढीला) पड़ जाता है। काम में मन नहीं लगता है। हाथ और पैर फूल जाते हैं। रोगी घबराहट का अनुभव करने लगता है। भोजन में अरुचि हो जाती है। जीभ सूखी सी और कड़वी हो जाती है। अत: व्यक्ति को 5 दाने धनिये के पपीते के साथ लेना चाहिए। अदरक और शहद को साथ लेने से भूख खुलकर लगती है। अदरक के रस को शहद के रस में मिलाकर उंगली से चाटना चाहिए। मुंह की लार जितनी अधिक पेट के अंदर जाएगी, उतना ही अधिक पेट का भारीपन घटेगा। नमक की मात्रा कम कर देने से भी अधिक पसीना आने की शिकायत दूर हो जाती है।
• 2 ग्राम पिसे हुये धनिये को दिन में 3 बार पानी के साथ लेने से पसीना आना कम हो जाता है।

2३. गैस :

• 2 चम्मच सूखा धनियां 1 गिलास पानी में उबालकर छानकर उस पानी को 3 बार पीने से पेट की गैस दूर हो जाती है।
• हरे धनिये की चटनी में कालानमक मिलाकर सेवन करने से पेट की गैस समाप्त हो जाती है।
• 2 चम्मच सूखे धनिए के दानों को 1 गिलास पानी में उबाल लें। फिर इस पानी को छानकर पीने से पेट की गैस समाप्त हो जाती है।

24. अरुचि : 

धनिया, छोटी इलायची और कालीमिर्च बराबर मात्रा में पीसकर चौथाई चम्मच घी और चीनी में मिलाकर सेवन करने से अरुचि (भोजन करने का मन न करना) दूर हो जाती है।

25. भूख न लगना :

यदि भूख कम लगे तो 30 मिलीलीटर धनिये का रस रोजाना पीने से भूख लगना शुरू हो जाती है।

26. अपच :

जिसे भोजन न पचता हो, जल्दी ही पैखाना (शौच) जाना पड़ता हो उसे 60 गाम सूखा धनिया, 25-25 ग्राम कालीमिर्च और नमक लेकर पीसकर भोजन के बाद आधा चम्मच ताजे पानी से सेवन करने से लाभ मिलता है।

27. खूनी बवासीर : 

4 चम्मच धनिये को 250 ग्राम दूध में उबालकर व छानकर पिसी हुई मिश्री मिलाकर पीने अथवा मिश्री मिलाकर धनिये का रस पीने से खूनी बवासीर दूर हो जाती है।

28. रोशनीवर्द्धक :

• हरे धनिये को चावल के साथ पीसकर खाने से आंखों की कमजोरी दूर होकर आंखों की रोशनी तेज हो जाती है।
• हरे धनिये और त्रिफला की चटनी बनाकर खाने से आंखों की रोशनी तेज होती है।

29. मुंह के छाले :

• धनिये का बारीक चूर्ण, बोरेक्स अथवा खाने वाले सोडे में मिलाकर मुंह के छालों पर लगाने से लाभ होता है एवं लार भी ठीक निकलती है।
• हरे धनिये की पत्तियों को चबाने से मुंह के छाले नष्ट हो जाते हैं।
• सूखे धनिये तथा शहतूत दोनों को पानी में उबालकर इससे कुल्ला करने से छाले ठीक होते हैं।

30. गर्मी दूर करना : 

धनिये के लगभग 200 दानों को 1 गिलास पानी में लगभग 4 घंटे तक भिगोयें रखें और फिर उसे छानकर पानी में एक चुटकी नमक डालकर पी लें तो यह गर्मी के मौसम में पूरे दिन प्यास को कम करता रहेगा। प्यास की खराश दूर करने तथा प्यासे को राहत देने में यह पानी बहुत ही उपयोगी होता है।

31. अफारा (पेट का फूलना) :

धनिये का शर्बत अफारा में बहुत लाभकारी होता है। इसके लिए 50 ग्राम धनिया को 2 लीटर में उबाल लेते हैं। इसके बाद उबले हुए पानी को ठंडा करके 1 बोतल में भर लेते हैं। धनिये के काढ़े को छान लेते हैं। यह पानी दिन में 3-4 बार लेना चाहिए। यदि पानी मीठा लगे तो एक प्याला पीते समय उसमें थोड़ा-सा कालानमक डाल लेते हैं। इससे स्वाद बढ़ जाता है और काला नमक शरीर को लाभ पहुंचाएगा। धनिये के पानी से हाथ-मुंह भी धोना चाहिए। इससे पसीने की दुर्गंध काफी समय के लिए दूर हो जाती है।

32. कब्जनाशक :

• धनिया कब्ज तोड़ने में भी सहायता करता है। धनिये के चूर्ण से पुराने से पुराने कब्ज भी दूर हो जाता है। इसके लिए 50 ग्राम धनिया, 10 ग्राम सोंठ, 2 चुटकी कालानमक तथा 3 ग्राम हरड़ लेकर पीसकर कपड़े में छान लेना चाहिए। इस चूर्ण को थोड़ी-सी मात्रा में भोजन करने के बाद गुनगुने पानी से लेते हैं। इससे कब्ज नष्ट होता है और मल भी खुलकर आने लगता है। इससे पेट का दर्द भी कम हो जाता है और आंतों की खुश्की भी दूर हो जाती है। इससे भूख खुलकर आती है। मलावरोध समाप्त हो जाता है। यदि पुराना कब्ज हो तो इस चूर्ण को लगातार 40 दिनों तक लेना चाहिए। कब्ज न रहने पर भी यह चूर्ण लिया जा सकता है। इससे किसी भी प्रकार की हानि की संभावना नहीं होती है।
• 20 ग्राम धनिया और 20 ग्राम सनाय को रात में 250 मिलीलीटर पानी में भिगो दें। सुबह इसे छानकर इसमें मिश्री मिलाकर पीने से कब्ज दूर हो जाती है।

33. खट्टी फीकी डकारे आना :

यह कोई रोग नहीं है परन्तु यदि कभी लगातार खट्टी डकारे आने लगती हैं तो रोगी को बेचैनी होने लगती है और वह शीघ्र ही घबरा जाता है। पेट में जलन होती है और जबान सूखने लगती है। बार-बार डकार आने से खुश्की दूर हो जाती है और गैस के कारण पेट में गर्मी सी महसूस होने लगती है। सीने में जलन, अकड़न और मीठा दर्द होने लगता है। ऐसी दशा में पाचक औषधि काम करती है। इसके लिए थोड़ा सा पुदीना और थोड़ा सा सूखा धनियां, बड़ी इलायची, अजवायन और कालानमक को पीसकर या तो टिकिया बना लेते हैं या चूर्ण बना लेते हैं फिर इसे 2 घंटे बाद गर्म पानी से लेना चाहिए। थोड़ी देर में डकारे बंद हो जाएंगी। यदि डकारें खट्टी या तेजाबियत की हैं तो धनिया के 4 दाने और 10 दाने सौंफ के मुंह में डालकर उसका रस गले के नीचे उतारना चाहिए। इससे कुछ ही देर में डकारें आना बंद हो जाता है और रोगी को शांति मिलती है।

34. जीभ पर छाले होना : 

जब पेट के अंदर गर्मी का प्रकोप बढ़ जाता है तो जीभ की ऊपरी परत पर छाले उभर आते हैं। ऐसा उस दशा में होता है। जब हम खाद्य-पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं। गर्म पदार्थों में आलू, चाट, पकौड़े और अदरक, खट्टी मीठी चीजें, अरहर या मसूर की दाल, बाजरे का आटा आते हैं। कभी-कभी शरीर भोजन को ठीक से नहीं पचा पाता है। तब आंतों में अपच का प्रदाह उत्पन्न हो जाता है। यदि हम किसी कारणवश मल-मूत्र को रोंके रहते हैं। तब मल सड़ने लगता है और आंतों में सड़न क्रिया आरम्भ हो जाती है। इन सभी कारणों से जीभ पर छाले पड़ जाते हैं। इन छालों में असहनीय दर्द होता है जैसे कांटे चुभ रहे हों। नमक, मिर्च मसाले आदि खाने पर बहुत दर्द होने लगता है। भोजन करना मुश्किल हो जाता है। साधारण भाषा में इसे मुंह का आना कहते हैं। इसके लिए धनिये का मिश्रण बहुत ही लाभकारी इलाज होता है। धनिये के 50 दाने पीसकर सरसों के तेल में पका लेना चाहिए। फिर कपड़े में छानकर रूई की फुरेरी से इस तेल को जीभ पर लगाना जरूरी होता है। इसे लगाने के तुरन्त बाद मुंह खोलकर लार नाली में टपका देना जरूरी होता है। दिन में 4 बार यह क्रिया करने से छालों में आराम मिलता है।

35. कील-मुंहासे निकलना : 

कील-मुंहासे वैसे तो उम्र के अनुसार निकलते हैं। ये शरीर के अंदर की गर्मी के कारण अधिक निकलते हैं। कभी-कभी उनमें पस भी पड़ जाती है। अत: मुंहासों को फोड़ना नहीं चाहिए। वरना मुंह पर दाग बनने का डर रहता है। इसके लिए एक लेप बना लेना चाहिए। थोडे़ से अदरक का रस, उसमें खीरे का थोड़ा सा रस और धनिया का पानी मिला लेना चाहिए। फिर 2 घंटे बाद साफ पानी से मुंह को धो डालना चाहिए। इससे कील-मुंहासें निकलना बंद हो जाते हैं।

36. शरीर में सूजन आ जाना
:

 शरीर में सूजन या तो रक्त विकार उत्पन्न होने से हो जाता है या फिर आंतों की खराबी से होता है। कभी-कभी खून के बनने में धीमापन आ जाता है तो ऐसी हालत में पहले चेहरे पर सूजन आती है। फिर धीरे-धीरे सारे शरीर में सूजन का आक्रमण होता है। ऐसी हालत में रोगी को घबराना नहीं चाहिए। वैसे तो इसके लिए ताकत और खून को साफ करने के इंजेक्शन लगाये जाते हैं, परन्तु हमारा मसलेदानी भी सहायता कर सकती है। हमें 50 दाने धनिये के पीस लेने चाहिए। इसमें नमक बिल्कुल न मिलाएं। इस चूर्ण को फंकी बनाकर ऊपर से पपीता खाना चाहिए। यदि पपीता न मिले तो सेब, चीकू या अन्य कोई भी फल दिया जा सकता है। धनिया खून को साफ करता है और फलों का रस पाचन क्रिया को सुधार कर खून को सही रूप में प्रवाहित करता है। धीरे-धीरे शरीर की सूजन घटने लगती है और रोगी पहले की तरह स्वस्थ हो जाता है। सावधानी : याद रखना चाहिए कि गर्म व ठण्डी वस्तुओं का सेवन न करें। नमक कम से कम खाएं चाय भी बहुत हल्की ली जाए।

37. थकान और शरीर का टूटना : 

हम सभी जानते हैं कि थकान अधिक काम करने से होती है। कभी-कभी अधिक सर्दी या गर्मी में रहने, जमीन पर सोने या फिर कडे़ स्थान पर सोने से भी शरीर टूटने लगता है। इसके लिए एक बाल्टी पानी में 100 ग्राम धनिया, 2 चम्मच नमक और 4 चम्मच कड़वा तेल मिलाकर शरीर के निचले अंगों को सहते गर्म पानी में डुबोना चाहिए। थोड़ी देर में थकान और टूटन दोनों दूर हो जाते हैं। नसों में खिंचाव, मांसपेशियों में सूजन और जोड़ों में एसिड उत्पन्न हो जाने के कारण भी थकान व शरीर टूटने की शिकायत हो जाती है। विश्राम से भी रोगी को काफी लाभ मिलता है। तेज हवा में नहीं सोना चाहिए वरना और भी अधिक हानि हो सकती है। शरीर को चादर से ढककर सोने से भी शरीर का टूटना कम हो जाता है।

38. पागलपन का हल्का दौरा:

• जब कभी दिमाग पर भीतरी गर्मी प्रभाव छोड़ती है तो पागलपन का हल्का दौरा पड़ने लगता है। उस व्यक्ति को होश नहीं रहता है कि वह क्या कर रहा है। उसकी मुंह से उल्टी सीधी बातें निकल जाती हैं। चेतना क्षीण होने लगती है। ऐसी दशा में धनिया को शहद के साथ चाटना चाहिए। रोगी के सामने ऐसी वैसी बातें नहीं करनी चाहिए। उनको यही आभास दिलाते रहना चाहिए कि वह जो कुछ कह रहा है ठीक ही कह रहा है।
• 10 ग्राम से 20 ग्राम की मात्रा में धनिये के चूर्ण को सुबह और शाम के समय देने से संभोग की वजह से हुआ पागलपन ठीक हो जाता है।

39. बवासीर (अर्श) :

• बवासीर दो प्रकार की होती है वादी बवासीर और दूसरी खूनी बवासीर। खूनी बवासीर में मस्सों से खून आता है। परन्तु बादी में गुदा के भीतर-बाहर मस्से निकल आते हैं, जिनमें खुजली मचती है। ये मस्से कांटे की तरह चुभते हैं। बवासीर अक्सर कब्ज के कारण होती है। यह बड़ा भयंकर रोग है। इससे बचने के विभिन्न उपाय हैं। जैसे भोजन सुपाच्य लेना चाहिए, पेट में कब्ज न बनने दिया जाए अधिक खाने या खाने के बाद मैथुन से बचा जाए। बादी की चीजें जैसे अमरूद, भिण्डी, अरुई, बैंगन, उड़द, अरहर की दाल तथा अधिक वसायुक्त पदार्थ नहीं खाने चाहिए। चावल और बैंगन का प्रयोग भूलकर भी न करें क्योंकि ये दोनों भोज्य पदार्थ वादी और बवासीर वाले व्यक्ति को बहुत हानिकारक होते हैं। इसके उपचार के लिए वैसलीन में पिसा हुआ कत्था, 100 दाने धनिया, 10 बूंद मिट्टी का तेल, सत्यानाशी पौधे की जड़ ये सभी चीजें पीसकर और कपडे़ में छानकर वैसलीन में मिला लेते हैं। इस मरहम को गुदा में लगाने से बवासीर के मस्से ठीक हो जाते हैं। यदि खून निकलता है तो वह भी बंद हो जाएगा।
• धनिये के काढ़े में मिश्री मिलाकर रोजाना 2-3 बार पीने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है।
• हरे धनिया का 1 चम्मच रस निकालकर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर रोजाना सुबह के समय पीने से खूनी बवासीर मिट जाती है।
• धनिये को मिश्री के साथ मिलाकर चूर्ण बना लें। 1 कप गर्म पानी में 1 चम्मच चूर्ण डालकर रोजाना सुबह-शाम पीने से मलद्वार की जलन तथा खूनी बवासीर ठीक हो जाती है।
• सूखे धनिये को दूध और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से खूनी बवासीर ठीक होती है।

40. दस्त के साथ आंव और पेचिश का आना :

• धनिया तथा सोंठ के 20 ग्राम काढे़ में 1 ग्राम एरण्ड मूल का चूर्ण मिलाकर दिन में 2 बार रोगी को पिलाने से मल में आंव आना बंद हो जाता है।
• धनिया और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनायें। इस चूर्ण को 1-2 चम्मच पानी में घोलकर पीने से पेचिश के रोगी को लाभ मिलता है।
• धनियां, कुड़ा की छाल, इन्द्रजौ, बेलगिरी, सौंफ और जीरे का चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का 3 ग्राम सेवन करने से पेचिश का रोग दूर हो जाता है।

41. अग्निमान्द्य (हाजमे की खराबी) :

• 50 ग्राम धनिया, 10 ग्राम कालानमक, 20 ग्राम कालीमिर्च और 10 ग्राम सौंफ को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। खाना खाने के बाद रोजाना आधा चम्मच चूर्ण सुबह और शाम पानी के साथ सेवन करने से अग्निमान्द्यता (भोजन का न पचना) रोग समाप्त हो जाता है।

42. हर समय जम्हाइयां आना :

यदि हम कुछ लोगों के सामने बैठे हों और उस समय जम्हाई के कारण मुंह को बार-बार फाड़ना पडे़ तो बहुत ही खराब लगता है। इसका आना भी एक रोग है। यह शरीर को आलस्य की पीड़ा में घेरे रहता है। काम में मन नहीं लगता है। यदि काम करना पडे़ तो शीघ्र ही मन ऊब जाता है। जम्हाइयां या तो शरीर में थकावट बनी रहने के कारण आती है या फिर नींद ठीक से न आने के कारण। इसके लिए धनिये का चूर्ण गर्म पानी के साथ लेना चाहिए। यदि यह बीमारी सी बन गई हो तो 20 दाने धनिये को एक लीटर पानी में उबालकर इस पानी से मुंह धोना चाहिए, जम्हाइयां आनी अपने आप ही बंद हो जाएगी।

43. आंखों की सुरक्षा : 

हरे धनिये के पत्तों का रस निकालकर रोजाना 3-4 बार आंखों में डालते रहने से उनकी गर्मी शांत हो जाती है तथा आंखों की जलन, धुंध, लाली, दर्द आदि रोगों में फायदा होता है।

44. धनिया दाल व सब्जी को स्वादिष्ट बनाता है : 

जिस साग-सब्जी में मसाले के साथ धनिये का प्रयोग किया जाता है। वह साग-सब्जी स्वादिष्ट हो जाती है। उसका मटमैला रूप निखर जाता है। खाने में स्वाद बढ़ जाता है। इसके प्रयोग से सब्जी के खराब तत्व अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं जब साग-सब्जी ठीक प्रकार से बनती है तो इससे पेट की आग शान्त हो जाती है। मानव उसका प्रयोग रुचि के साथ करता है जोकि अनजाने में ही दवा का काम करता है। यदि हम साग-सब्जी में धनिये का प्रयोग बंद कर देते हैं तो दिनों-दिन निखार से दूर होते जाएंगे और शीघ्र ही हमें कोई न कोई बीमारी घेर लेगी।

45. मसूढ़ों से खून आना : 

यदि मसूढ़ों से खून आता हो तो धनिये को पानी में उबालकर धीरे-धीरे उस पानी से कुल्ले करने चाहिए। यदि शरीर में कमजोरी अधिक हो तो कपड़े को धनिये के पानी में तर करके खून निकलने वाले स्थान पर रखना चाहिए। इससे खून निकलना बंद हो जाता है।

46. सिर में चोट लगना : 

यदि सिर में गुम चोट लगी हो तो सरसों के तेल में पिसा हुआ धनिया डालकर उस तेल में कपड़े के फाहे को भिगोकर चोट वाले स्थान पर धीरे-धीरे सेंक करना चाहिए। चोट वाले स्थान पर धनिया की पोटली भी रखी जा सकती है।

47. रक्त विकार : 

खून में विकार या खराबी कई कारणों से होती है जैसे नमक का अधिक सेवन करना, खट्टी वस्तुओं का अधिक लेना, बासी भोजन करना। खून की खराबी से दिल तथा प्लीहा रोग हो सकता है। इस हालत में रोगी का मन किसी काम में नहीं लगता है। उसे हर समय सुस्ती घेरे रहती है। कभी-कभी शरीर में फोड़े-फुंसी भी निकल आते हैं। ऐसी अवस्था में रोगी को सबसे पहले खट्टी मीठी तथा गरिष्ठ चीजें खाने से परहेज करना चाहिए। खाने में रोटी, दलियां, तोरई, लौकी, टिण्डा, परवल आदि की सब्जियां तथा ताजा पानी लेना चाहिए। सभी खाद्य पदार्थों में नमक की मात्रा घटा देनी चाहिए। इसके बाद 4 कोपलें नीम, 4 कालीमिर्च, 5 ग्राम धनिये को लेकर पीस लेते हैं। इस चूर्ण को दिन में 3 बार पानी के साथ लेना चाहिए। इससे खून की खराबी धीरे-धीरे दूर हो जाती है। कुछ ही दिनों जब शरीर में शुद्ध खून प्रवाहित होने लगता है तो रोगी को खुद ही आराम आ जाता है।

48. गर्मी की घमौरियां : 

शरीर में अत्यधिक गर्मी में घूमने पर या पसीने के मरने पर घमौरियां होती हैं। तेज गर्मी में धूप में काम करने पर भी घमौरियां हो जाती हैं। शरीर पर छोटे-छोटे दानों का निकलना ही घमौरियां है। घमौरियां होने पर शरीर में खुजली होती है और कांटे जैसे चुभने लगते हैं। कपड़े पहनना अच्छा नहीं लगता है। इसके लिए साधारण सा इलाज है। बर्फ के पानी में 50 ग्राम धनिये के पानी को भिगो देना चाहिए। लगभग 5 घंटे बाद इस पानी को छानकर घमौरियों वाले स्थान पर लगाना चाहिए। यदि किसी छोटी तौलिया को इस पानी में भिगोकर घमौरियों पर रखा जाए तो बहुत आराम मिलता है। इस प्रक्रिया को 2 दिन तक सुबह-शाम करने से घमौरियां नष्ट हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त नींबू के रस में धनिये को डालकर पीना चाहिए। ध्यान रहे कि घमौरियों के कारण शरीर में नमक की मात्रा कम होने लगती है। इसलिए नमक का सेवन अवश्य ही करना चाहिए। यदि रोटी में नमक और अजवायन को मिला लिया जाए तो बहुत लाभ मिलता है।

49. स्याह (नीला) पड़ जाना : 

नीला दाग शरीर में खून जमा हो जाने के कारण पड़ता है। अक्सर गिर पड़ने, चोट खाने, मार-पीट आदि के कारण ऐसा होता है। उस स्थान पर रह-रहकर दर्द तथा टीस उठती है। रोगी को किसी भी दशा में चैन नहीं पड़ता है। ऐसी दशा में 10 ग्राम धनिया, 5 ग्राम हल्दी, 2 पुती लहसुन और ग्वार का पत्ता- इन चारों चीजों को सरसों के तेल में अच्छी तरह से पकाना चाहिए। फिर तेल को छानकर साफ शीशी में भर लेना चाहिए। इस तेल को रूई के फाहे पर डालकर चोट वाले स्थान पर लगाकर पट्टी बांध देने से चोट में आराम आ जाता है।

50. मोच आ जाना : 

ऊंची नीची जगहों पर पैर पड़ जाने या शक्ति से अधिक सामान उठाने के कारण मोच आ जाती है। उस समय नस अकड़ जाती है। इसमें एक प्रकार का खिंचाव आ जाता है। इससे रोगी को बड़ा कष्ट होता है। उसे किसी भी करवट चैन नहीं पड़ता है। ऐसी दशा में 10 ग्राम पिसा हुआ धनिया, 5 ग्राम हल्दी और 5 ग्राम जीरा को तिल्ली के तेल में अच्छी तरह से पका लेना चाहिए। कुछ देर तक मोच वाली जगह पर धीरे-धीरे मालिश करने से लाभ मिलता है।

51. डंक लगना या मारना : 

डंक, बिच्छू, बर्र, मधुमक्खी, आदि किसी का भी हो सकता है। इसके लिए बारीक सुई या चिमटी से सबसे पहले डंक निकालना चाहिए। इसके बाद हरा धनिया पीसकर डंक वाले स्थान पर पट्टी बांध देनी चाहिए। 20 मिनट में डंक का जहर उतरने लगता है और रोगी को आराम मिलने लगता है। डंक वाले स्थान पर सूखा धनिया पानी में पीसकर रगड़ने से भी जहर का असर कम हो जाता है।

52. कुत्ते के काटने पर :

कुत्ते के काटे हुए स्थान पर थोड़ा सा धनिया, 2 चुटकी सोडा, 2 चुटकी हल्दी और 2 कली लहसुन आदि की पोटली बनाकर बांधनी चाहिए। यदि घाव अधिक गहरा हो तो इंजेक्शन भी लगवाना चाहिए।

53. चक्कर आना : 

आंवले और हरे धनिये के रस को पानी में मिलाकर पीने से चक्कर आना बंद हो जाता है।

52. थायराइड ग्रन्थि का बढ़ना : 

थायराइड ग्रन्थि बढ़ जाए, क्रिया उच्च या निम्न हो जाए तो 5 चम्मच सूखा साबुत धनिया 1 गिलास पानी में तेज उबालकर छानकर रोजाना सुबह और शाम रोगी को पिलाएं।

54. आंख आना : 

धनिये का काढ़ा तैयार करके अच्छी तरह से छान लें। अब इस काढ़े को बूंद-बूंद करके हर 2-3 घण्टों में आंखों में डालने से आंखों में आराम आता है। इस काढ़े को आंखों में डालने की शुरुआत करने से पहले आंखों में एक बूंद एरण्ड तेल (कैस्टर आयल) डाल लें। यह आंख आने और आंखों के दर्द की बहुत लाभकारी दवा है।

55. रतौंधी (रात में न दिखाई देना) :

• सब्जियों में हरा धनिया डालकर बच्चों को खिलाने से रतौंधी (रात मे न दिखाई देना) का रोग कम हो जाता है।
• हरे धनिये की पत्तियों की चटनी को थोड़ा ज्यादा मात्रा में रोजाना भोजन के साथ खाने से रतौंधी (रात में न दिखाई देना) रोग मिट जाता है। इस चटनी को दाल, कढ़ी, साग (सब्जी) और रायतें में मिलाकर भी खाया जा सकता है।

56. बच्चों का पेट फूलना : 

1 से 4 बूंद धनिये के तेल को मिश्री के साथ देने से बच्चों के पेट की गैस से राहत मिलती है।
57. डकार के आने पर : धनिया और भरड्डी को पानी में पकाकर पीने से डकार आना रूक जाती है।

58. दस्त :

• हरा धनिया, सूखा हुआ धनिया, कच्चा और भुना हुए जीरा को मिलाकर पीसकर खाने से दस्त का आना बंद हो जाता है।
• सूखे धनिए के चूर्ण में थोड़ा-सा काला नमक मिलाकर रख लें, फिर इस चूर्ण को 1 चम्मच की मात्रा में खाना खाने के बाद खाने से दस्त रुक जाते हैं।
• धनियां और काले नमक को डालकर चूर्ण बनाकर खाना खाने के बाद सुबह और शाम सेवन करने से दस्तों के रोग में लाभ मिलता है।
• हरा धनिया, काला नमक, काली मिर्च को लेकर चटनी बनाकर रोगी को चटाने से दस्त में लाभ मिलता है।
• 1 चम्मच पिसे हुऐ धनिये को सेंककर पानी के साथ लेने से दस्तों का आना बंद हो जाता है।
• धनिये को पकाकर काढ़ा बनाकर उसमें मिश्री मिलाकर पीने से दस्त आना बंद हो जाते हैं।
• धनिये और काले नमक को मिलाकर खाना खाने के बाद 1 चम्मच के रूप में ठण्डे पानी के साथ पीने से दस्तों में आंव (एक प्रकार का सफेद चिकना पदार्थ जो मल के द्वारा बाहर निकलता है) और मरोड़ का आना बंद हो जाता है।

59. गर्भवती स्त्री की उल्टी में :

• 20 ग्राम धनिये को 200 मिलीमीटर पानी में उबालकर इसमें एक चौथाई रस रह जाने पर इसे छानकर इसमें चीनी मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से गर्भवती स्त्री की उल्टी बंद हो जाती है।
• गर्भवती स्त्री को उल्टी आने पर एक भाग धनिया और 2 भाग मिश्री को 1 चम्मच के लगभग चावल के पानी के साथ मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से बहुत लाभ मिलता है। अधिक जी मिचलाने में इसे दिन में 3-4 बार तक दिया जा सकता है। सूखे धनिये के कुछ दाने बीच-बीच में चबाने से गर्भावस्था की मिचली (जी मिचलाना) बंद हो जाती है।
• सूखा धनिया 25 ग्राम की मात्रा में पीसकर इसमें 25 ग्राम की मात्रा में चीनी मिला देते हैं। इसे लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से गर्भवती स्त्री की उल्टी बंद हो जाती है।

60. हिचकी का रोग : 

10 ग्राम धनिया, 10 ग्राम सौंफ, 5 ग्राम कालानमक, 5 ग्राम सेंधानमक, 10 दाने कालीमिर्च को एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें। हिचकी आने पर इसे 2 चुटकी शहद के साथ सेवन करने से हिचकी में लाभ होता है।

61 हकलाना, तुतलाना : 

अमलतास के गूदे और हरे धनिये को पीसकर रख लें तथा लगातार 21 दिन तक कुल्ला करें। इससे जीभ पतली हो जाती है और हकलापन दूर होता है।
62. मूत्ररोग :
• 250 मिलीमीटर पानी में 10-15 ग्राम धनिये को रात में भिगो दें। सुबह धनिये को पीसकर उसी पानी में निचोड़कर छान लें और ताल मिश्री या सफेद शहद मिलाकर रोजाना सुबह पीने से पेशाब के रोग में लाभ होता है। उस पानी में हरे आंवले का रस मिलाकर पीने से पेशाब में जलन होना ठीक हो जाती है।
• हरे धनिए के पत्तों के 2 चम्मच रस में शक्कर मिलाकर पीने से पेशाब की जलन ठीक हो जाती है।
• 10 ग्राम धनिये को रात में पानी में मिलाकर, छानकर मिश्री, मिलाकर पीने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है।

63. मासिक-धर्म सम्बंधी परेशानियां : 

लगभग 20-25 ग्राम धनिये के दानों को पानी में उबालते हैं। जब लगभग आधा कप पानी बचा रह जाए, तो इसे छानकर उसमें गुड़ मिलाकर सेवन करने से मासिक-धर्म की परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है।
64. आग से जलना : यदि शरीर का कोई अंग आग से जल गया हो तो उस समय बडे़ धैर्य से काम लेना चाहिए। सबसे पहले उस अंग को पानी से धो लेना चाहिए या फिर उसे कुछ देर तक पानी में डाले रहना चाहिए। ऐसा करने से जलन कम होती है और आराम भी मिलता है। कुछ न हो तो कपड़े को पानी से तर करके जले हुए भाग पर रखना चाहिए। इससे जलन पर एक तरह का मलहम लग जाता है। इसके बाद घरेलू चिकित्सा करनी चाहिए। इसके लिए 50 दाने धनिया, एक टिकिया कपूर, थोड़ा सा गोले का तेल इन चीजों को खरल या किसी बर्तन में घोंटकर मलहम बना लेना चाहिए फिर इसको दिन में कई बार जले हुए अंगों पर लगाना चाहिए। कुछ ही दिनों में जले का घाव ठीक होने लगेगा और दाग भी नहीं पडे़गा।

65. कट जाना : 

चाकू, कैंची, छूरी आदि किसी भी शस्त्र से शरीर का कोई भी भाग किसी भी समय कट सकता है। इसलिये सबसे पहले उस स्थान का खून बंद करना चाहिए। इसके लिए उस स्थान को कसकर दबा लेना चाहिए, फिर ठण्डे पानी से कपड़े को भिगोकर उस स्थान पर रख देना चाहिए। इसके बाद कटे हुए घाव पर 10 ग्राम धनिया बारीक पीसकर घी में मिलाकर लगाना चाहिए। कुछ ही दिनों में घाव भरना या कटा हुआ स्थान जुड़ना शुरू हो जाएगा।

66. घाव : 

घाव नया हो या पुराना, चाहे कितना भी जहरीला हो धनिये के पाउडर को यव के आटे के साथ मिलाकर घाव पर पट्टी बांधने से घाव अच्छा हो जाता है।
• 60 ग्राम सूखा धनिया, 25 ग्राम कालीमिर्च और 25 ग्राम नमक को अच्छी तरह पीसकर खाने के बाद आधा चम्मच रोज खाने से अग्निमान्द्यता (भोजन का न पचना) में लाभ होता है।
• धनिया और सोंठ को बराबर मात्रा में लेकर उसका काढ़ा तैयार कर लेते हैं। इस काढे़ को सुबह-शाम पीने से पाचन शक्ति (भोजन पचाने की क्रिया) तेज हो जाती है।
• 2 चम्मच धनिये के दाने और मिश्री को साथ पकाकर काढ़ा बनाकर पीने से अग्निमान्द्यता (भोजन का न पचना) के रोग में आराम मिलता है।

67. जिगर का रोग, मन्दाग्नि :

 धनिया, सोंठ और काले नमक का चूर्ण बनाकर रख लें और इसे दिन में 3 बार सेवन करें। इससे मंदाग्नि (बदहजमी) ठीक हो जाती है और जिगर की शक्ति, स्फूर्ति मिलती है तथा भूख भी खुलकर लगती है।

68. श्वेत प्रदर : 

धनिया क्षोभ शामक (चित्त की बेचैनी) है। इसलिए इसका हिम (शीत कषाय) अनुपान या सहपान के रूप में सेवन करने से सफेद प्रदर मिट जाता है।

69 अम्लपित्त :

• 2 चम्मच सूखा हुआ धनिया, 1 चम्मच सोंठ, आधा चम्मच जीरा और 4 लौंग के पीस को पीसकर चूर्ण बनाकर रख लें, फिर इसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर दिन में 3 बार खुराक के रूप में रोगी को देने से पेट में अम्लपित्त के बढ़ने पर, छाती, आंखों में जलन, आलस्य, चिड़चिड़ापन और सांस के फूलना आदि में आराम मिलता हैं।
• हरे धनिए को पानी में पीसकर थोड़ी-सी मात्रा में काला नमक मिलाकर पीने से अम्लपित्त शान्त होती है।
• धनिया, आंवला, नागरमोथा को बराबर मात्रा में लेकर पानी के अंदर डाल दें, 2 घण्टे के बाद इसमें मिश्री और नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से अम्लपित्त के रोग में लाभ होता है।
70. प्यास अधिक लगना : हरा धनिया और सूखा आंवला को मिलाकर चटनी बना लें। इस चटनी को रोजाना खाने से गले का सूखना व प्यास का अधिक लगना दूर हो जाता है।

71. हृदय रोग :

• धनिया, सौफ, छोटी इलायची के दाने को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इसे 3-3 ग्राम दिन में 2 बार खाना खाने के बाद लेने से हृदय का दर्द ठीक हो जाता है।
• 6 ग्राम धनिया और 10 ग्राम किशमिश को रात को पानी में गलने के लिए डाल दें। इसे सुबह पीसकर और छानकर कर पीयें। इससे हृदय की धड़कन में काफी लाभ होता है।
• सूखा धनिया व सौंफ 25-25 ग्राम पीसकर छानकर सुबह 5 ग्राम को पानी से लेने से हृदय के दर्द मे आराम आ जाता है।
• 25-25 ग्राम सौंफ और सूखा धनिया पीसकर और छान कर 50 ग्राम खाण्ड में मिला लें। इसे 5-5 ग्राम पानी से भोजन के बाद दोनों समय लेने से हृदय का दर्द दूर हो जाता है।
  • पायरिया के घरेलू इलाज
  • चेहरे के तिल और मस्से इलाज
  • लाल मिर्च के औषधीय गुण
  • लाल प्याज से थायराईड का इलाज
  • जमालगोटा के औषधीय प्रयोग
  • एसिडिटी के घरेलू उपचार
  • नींबू व जीरा से वजन घटाएँ
  • सांस फूलने के उपचार
  • कत्था के चिकित्सा लाभ
  • गांठ गलाने के उपचार
  • चौलाई ,चंदलोई,खाटीभाजी सब्जी के स्वास्थ्य लाभ
  • मसूड़ों के सूजन के घरेलू उपचार
  • अनार खाने के स्वास्थ्य लाभ
  • इसबगोल के औषधीय उपयोग
  • अश्वगंधा के फायदे
  • लकवा की चमत्कारी आयुर्वेदिक औषधि वृहत वात चिंतामणि रस
  • मर्द को लंबी रेस का घोडा बनाने के अद्भुत नुस्खे
  • सदाबहार पौधे के चिकित्सा लाभ
  • कान बहने की समस्या के उपचार
  • पेट की सूजन गेस्ट्राईटिस के घरेलू उपचार
  • पैर के तलवों में जलन को दूर करने के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार
  • लकवा (पक्षाघात) के आयुर्वेदिक घरेलू नुस्खे
  • डेंगूबुखार के आयुर्वेदिक नुस्खे
  • काला नमक और सेंधा नमक मे अंतर और फायदे
  • हर्निया, आंत उतरना ,आंत्रवृद्धि के आयुर्वेदिक उपचार
  • पाइल्स (बवासीर) के घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खे
  • चिकनगुनिया के घरेलू उपचार
  • चिरायता के चिकित्सा -लाभ
  • ज्यादा पसीना होने के के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार
  • पायरिया रोग के आयुर्वेदिक उपचार
  • व्हीटग्रास (गेहूं के जवारे) के रस और पाउडर के फायदे
  • घुटनों के दर्द को दूर करने के रामबाण उपाय
  • चेहरे के तिल और मस्से हटाने के उपचार
  • अस्थमा के कारण, लक्षण, उपचार और घरेलू नुस्खे
  • वृक्क अकर्मण्यता(kidney Failure) की रामबाण हर्बल औषधि
  • शहद के इतने सारे फायदे नहीं जानते होंगे आप!
  • वजन कम करने के उपचार
  • केले के स्वास्थ्य लाभ
  • लीवर रोगों की महौषधि भुई आंवला के फायदे
  • हरड़ के गुण व फायदे
  • कान मे मेल जमने से बहरापन होने पर करें ये उपचार
  • पेट की खराबी के घरेलू उपचार
  • शिवलिंगी बीज के चिकित्सा उपयोग



  • 13.3.18

    होम्योपैथिक दवा एगैरिकस (Agaricus) के लक्षण उपयोग फायदे -डॉ॰आलोक

                                           
    प्रमुख लक्षण
    (1) मांसपेशियों, अंगों का फड़कना
    (2) मांसपेशियों का थरथराना, सोने पर थरथराना बन्द ही जाना
    (3) शरीर की त्वचा पर चींटियों के चलने-जैसा अनुभव होना
    (4) वृद्धावस्था या अति-मैथुन से शारीरिक शिथिलता आ जाना
    (5) शीत से त्वचा का सूज जाना
    (6) चुम्बन की अति तीव्र-इच्छा
    (7) मेरु-दण्ड को रोग

    (9) रोग के लक्षणों का तिरछा-भाव
    (10) क्षय-रोग की प्रारंभिक अवस्था


    लक्षणों में कमी

    (i) शारीरिक-श्रम से लक्षणों में कमी
    (ii) धीरे-धीरे चलने-फिरने से लक्षणों में कमी
    लक्षणों में वृद्धि
    (i) सर्दी से, ठडी हवा सें वृद्धि
    (ii) मानसिक-श्रम से वृद्धि
    (iii) मैथुन से लक्षणों में वृद्धि
    (iv) भोजन के बाद वृद्धि
    (v) आँधी-तूफान से वृद्धि
    (vi) मासिक-धर्म के दिनों में लक्षणों में वृद्धि

    लक्षण वर्णन-
    *वृद्धावस्था या अति-मैथुन से शारीरिक शिथिलता तथा मेरु-दण्ड (spinal cord) के रोग –वृद्धावस्था में मनुष्य के रुधिर की गति धीमी पड़ जाती है, शरीर में झुर्रियां पड़ जाती हैं, सिर के बाल झड़ने लगते हैं। वृद्धावस्था के अतिरिक्त युवक लोग भी जब अति-मैथुन करने लगते हैं तब उनका स्वास्थ्य भी गिर जाता है, वे निस्तेज हो जाते हैं। वृद्धावस्था में रक्तहीनता के कारण और युवावस्था में अति-मैथुन के कारण या अन्य किसी कारण से रोगी में मेरु दण्ड (spinal cord) संबंधी उपद्रव होने लगते हैं। ये उपद्रव हैं-मांसपेशियों का फड़कना, कमर-दर्द, पीठ का कड़ा पड़ जाना, मेरु-दण्ड का अकड़ जाना आदि। पैरों में चलने की जान नहीं रहती, चक्कर आता है, सिर भारी हो जाता है, उत्साह जाता रहता है, काम करने का जी नहीं करता। युवा व्यक्तियों में जब अति-मैथुन से उक्त-लक्षण प्रकट होने लगते हैं, तब एगैरिकस की कुछ बूंदें मस्तिष्क के स्नायुओं को शान्त कर देती हैं। स्नायु-प्रधान स्त्रियां मैथुन के उपरान्त हिस्टीरिया-ग्रस्त हो जाती हैं, बेहोश हो जाती हैं। उनके लिये भी यह औषधि लाभकारी है। यह स्मरण रखना चाहिये कि केवल बुढ़ापा आ जाने से एगैरिकस नहीं दिया जाता। होम्योपैथी में कोई औषधि केवल एक लक्षण पर नहीं दी जाती, लक्षण-समष्टि देखकर ही औषधि का निर्णय किया जाता है।
    * मासपेशियों तथा अंगों का फड़कना –
    मासपेशियों तथा अंगों का फड़कना एगैरिकस औषधि का मुख्य लक्षण है। मांसपेशियां फड़कती हैं, आंख फड़कती है, अंगों में कपन होता है। यह कपन अगर बढ़ जाय, तो तांडव-रोग (Chorea) के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। एगैरिकस को कंपन की औषधि (Jerky medicine) कहा जाता है।

    *मांसपेशियों का थरथराना और सोने पर थरथराना बन्द हो जाना – मांस-पेशियों अथवा अंगों के फड़कने, थरथराने या कंपन में विशेष बात यह होती है कि जब तक रोगी जागता रहता है तभी तक यह कपन जारी रहती है, उसके सोते ही यह कंपन बन्द हो जाता है।
    * शीत से त्वचा का सूज जाना (chilblain) – बरफ से जब त्वचा सूज जाती हैं, उसमें लाल दाग पड़ जाते हैं, इस कारण त्वचा में बेहद खुजली तथा जलन होती है -ऐसी अवस्था में एगैरिकस अच्छा काम करती है।
    * चुम्बन की अति-तीव्र इच्छा – स्त्री तथा पुरुष में जब वैषयिक इच्छा तीव्र हो जाती है, जिस-किसी को चूमने की इच्छा रहती है, आलिंगन की प्रबल इच्छा, मैथुन को बाद अत्यन्त शक्तिहीनता, मैथुन को बाद मेरु-दण्ड के रोगों की प्रबलता, मेरु-दण्ड में जलन, अंगों का शिथिलता – ऐसी हालत में एगैरिकस औषधि उपयुक्त है।
    * मेरु-दण्ड (spinal cord) के रोग – एगैरिकस औषधि में मेरु-दण्ड के अनेक रोग आ जाते हैं। उदाहरणार्थ, सारे मेरु-दण्ड का कड़ा पड़ जाना, ऐसा अनुभव होना कि अगर मैं झुकूँगा तो पीठ टूट जायगी, मेरु-दण्ड में जलन, पीठ की मांसपेशियों का थिरथिराना, मेरु-दण्ड में थिरथिराहट, मेरु-दण्ड में भिन्न-भिन्न प्रकार की पीड़ा, पीठ में दर्द जो कभी ऊपर कभी नीचे को जाता है। स्त्रियों में कमर के नीचे दर्द होता है। अंगों का फड़कना थिरथिराना आदि मेरु-दण्ड के रोग के ही लक्षण है।
    *शरीर की त्वचा पर चींटियों के चलने जैसा अनुभव – सारे शरीर में ऐसा अनुभव होता है जैसे शरीर पर चींटिया चल रही हैं। यह अनुभव केवल त्वचा पर ही सीमित नहीं रहता। त्वचा के भीतर रोगी की मांस पर भी चींटियों के चलने जैसा अनुभव होता है। शरीर का कोई भाग इस प्रकार के अनुभव से बचा नहीं रहता। त्वचा या अन्य भागों पर कभी ठंडी, कभी गर्म सूई भेदने का-सा अनुभव होता है। शरीर के जिस अंग में रुधिर की गति शिथिल होती है-कान, नाक, हाथ, अंगुलियां, अंगूठे आदि-उनमें चुभन-सी होती है, जलन-सी होती है। ऐसी चुभव तथा जलन मानो ये भाग ठंड से जम-से गये हों। इस लक्षण के होने पर किसी भी रोग में एगैरिकस औषधि लाभ पहुँचाती है क्योंकि यह इस औषधि का सर्वागीण अथवा व्यापक लक्षण है। अंगों में ठंडी-सुई की-सी चुभन में एगैरिकस तथा गर्म-सुई की-सी चुभन में आर्सेनिक औषधि है।
    * जरायु का बाहर निकल पड़ने का-सा अनुभव –प्राय: स्त्रियों को शिकायत हुआ करती है जिसमें वे अनुभव करती हैं कि जरायु बाहर निकल-सा पड़ रहा है। वे टांगे सिकोड़ कर बैठती हैं। इस लक्षण को सुनते ही होम्योपैथ सीपिया, पल्सेटिला, लिलियम या म्यूरेक्स देने की सोचते हैं, परन्तु अगर उक्त लक्षण में मेरु-दण्ड के लक्षण मौजूद हों, तो एगैरिकस देना चाहिये। अगर जरायु के बाहर निकल पड़ने का लक्षण वृद्धा स्त्री में पाया जाय, और उसके साथ यह भी पता चले कि उसकी गर्दन कांपती है, सोने पर उसका कंपन बन्द हो जाता है, वह शीत-प्रधान है, यह अनुभव करती है कि उसके शरीर में गर्म या ठंडी सूई बँधने का-सा अनुभव है – अर्थात् जरायु बाहर निकलने के अनुभव के साथ एगैरिकस के अन्य लक्षणों की मौजूदगी में सीपिया आदि न देकर एगैरिकस औषधि को देना चाहिये।

    * क्षय-रोग की प्रारंभिक अवस्था – एगैरिकस औषधि के रोगी को छाती में बोझ अनुभव होता है। खांसी के दौरे (Convulsive cough) पड़ते हैं और घबराहट भरा पसीना आता है। हर बार कि कह नहीं सकते कि रोगी खांस रहा है या छीक मार रहा है। एगैरिकस छाती के रोगों के लिये महान् औषधि है। इससे क्षय-रोग भी ठीक हुआ है। रोगी को छाती का कष्ट होता है, खांसी-जुकाम, रात को पसीने आते हैं, स्नायु-संबंधी रोग रोगी की पृष्ठ-भूमि में होते हैं। तेज खांसी आती है और हर बार खांसी के बाद छींकें आती हैं। खांसी के दौरों के साथ शाम को पसीने आते हैं. नब्ज तेज चलती है, खांसी में पस-सरीखा कफ़ निकलता है, रोगी की प्रात:काल तबीयत गिरी-गिरी होती है। इन लक्षणों के होने पर यह सोचना असंगत नहीं है कि यह क्षय-रोग की प्रारंभिक अवस्था है। इस हालत में एगैरिकस औषधि लाभ करती है।
    *रोग के लक्षणों का तिरछे भाव से प्रकट होना-
     इस औषधि में विलक्षण लक्षण यह है कि रोग के लक्षण एक ही समय में तिरछे भाव से प्रकट होते हैं। उदाहरणार्थ, गठिये का दर्द दायें हाथ में और बायें पैर में एक ही समय में प्रकट होगा, या बायें हाथ और दायें पैर में। इसी प्रकार अन्य कोई रोग भी तिरछे भाव से प्रकट हो सकता है – रोग एक ही होना चाहिये !
    एगैरिकस औषधि के अन्य लक्षण
    * रीढ़ की हड्डी के रोग के विशेष रूप में आक्रान्त होने के कारण रोगी चलने-फिरने में बार-बार ठोकर खाकर गिर पड़ता है, हाथ में से बर्तन बार-बार गिर पड़ता है। बर्तन का हाथ से बार-बार गिर पड़ना एपिस में भी पाया जाता है, परन्तु दोनों औषधियों में भेद यह है कि एगैरिकस तो आग के पास बैठे रहना चाहता हैं, एपिस आग के सेक से परे भागता है।
    * रीढ़ की हड्डी को दबाने से हँसी आना इसका अद्भुत लक्षण है।
    * चलते समय पैर की एड़ी में असहनीय पीड़ा होती है, जैसे किसी ने काट खाया हो।
    * गोनोरिया के पुराने रोगियों में जिनके मूत्राशय में मूत्र करते हुए देर तक खुजलाहट भरी सुरसुराहट बनी रहती है, और मूत्र का अन्तिम बूँद निकलने में बहुत देर लगती है – इस लक्षण में दो ही औषधियां हैं – पैट्रोलियम तथा एगैरिकस।
    * रोगी घड़ी के लटकन की तरह आखें इधर-उधर घुमाता है। पढ़ नहीं सकता। अक्षर सामने से हटते जाते हैं। आँख के सामने काली मक्खियां, काले दाग, जाला दिखाई पड़ता है।
    * बोलना देर में सीखने पर नैट्रम म्यूर दिया जाता है, चलना देर में सीखने पर कैल्केरिया कार्ब दिया जाता हैं, परन्तु बोलना और चलना दोनों देर में सीखने पर एगैरिकस दिया जाता है।
    *इसका एक अद्भुत लक्षण यह है कि पेशाब करते हुए ऐसा लगता है कि मूत्र ठंडा है, जबकि मूत्र बूँद-बूँद निकल रहा होता है तब रोगी प्रत्येक ठंडे मूत्र-बूंद को गिन सकता है।
    शक्ति तथा प्रकृति – 3, 30, 200 (औषधि ‘सर्द’- प्रकृति के लिये है)

    किडनी फेल (गुर्दे खराब) की अमृत औषधि 

    प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

    सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

    आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार







    12.3.18

    मूंग की दाल के गुण,फायदे -डॉ॰आलोक



     पीली मूंग दाल

    मूंग दाल दो प्रकार की होती है हरी और पीली। धुली और छिली हुई मूंग दालें पीले रंग की होती हैं। दालों में प्रोटीन की मात्रा सबसे ज्यादा पाई जाती है। पकाने में आसान होने के साथ ही यह पचाने में भी आसान होती है। साथ ही शाकाहारी लोगों की पसंदीदा डिशेज़ में से भी एक है।
    पीली मूंग दाल मे 50 प्रतिशत प्रोटीन, 20 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 48 प्रतिशत फाइबर, 1 प्रतिशत सोडियम और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ना के बराबर होती है। बीमार लोगों के लिए पीली मूंग दाल बहुत फायदेमंद होती है। दाल के साथ-साथ इसका सूप भी पिया जा सकता है। भारत में इसे ज्यादातर रोटी और चावल के साथ खाया जाता है।




    (आधाशीशी) रोग का सरल उपचार


    फायदे
    पीली मूंग दाल में प्रोटीन, आयरन और फाइबर बहुत ज्यादा मात्रा में पाया जाता है।
    पोटैशियम, कैल्शियम और विटामिन बी कॉम्पलेक्स वाली इस दाल में फैट बिल्कुल नहीं होता।
    अन्य दालों की अपेक्षा पीली मूंग दाल आसानी से पच जाती है।
    इसमें मौजूद फाइबर शरीर के फालतू कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं।
    बीमारी में इस दाल का सेवन काफी फायदेमंद होता है।
    गर्भवती महिलाओं को भी हफ्ते में कम-से-कम 3 दिन इस दाल का सेवन करना चाहिए।

    मुह के छाले से परेशान है तो ये उपाय करे

    इसमें मौजूद अनेक प्रकार के तत्वों से बच्चों से लेकर बड़ों तक को कई स्वास्थ्यवर्धक फायदे होते हैं।
    स्वास्थ्य के साथ-साथ बच्चों में विकास संबंधी कई जरूरी पोषण की कमी पूरी करती है।
    मूंग दाल के अन्य लाभ
    * आग से जल जाना – जले हुए स्थान पर मूंग को पानी में पीसकर लगा देने से जलन समाप्त होकर ठंडक पड़ जाती है।
    *शक्ति वर्द्धक मोदक – मूंग के लड्डू बनवाकर सेवन करते रहने से शरीर में लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है और स्फूर्ति आती है। वीर्य दोष समाप्त हो जाते है।

    ज्यादा पसीना होता है तो  करें ये उपचार 

    *ज्वर के दौरान खाने में – ज्वर में मूंग की पतली सी दाल का पथ्य देना ठीक रहता है। इससे रोगी की स्थिति के अनुसार काली मिर्च, जीरा, अदरक और दाल देना चाहिये। लेकिन छौंक में घी बहुत कम मात्रा में ही ठीक रहता है।
    * दाद, खाज, खुजली, आदि चर्म रोग – इन समस्त रोगों को दूर करने के लिये छिलके वाली मूंग की दाल पीसकर इसकी लुगदी को रोग के स्थान पर लगानी चाहिये।











    11.3.18

    आर्थराईटीज़(संधिवात) रोग मे क्या खाएं क्या न खाएं


    आर्थराइटिस के दर्द को बढ़ाने वाले आहार

     आर्थराइटिस की चपेट में आज हर उम्र के लोग आ रहे हैं खास कर युवा अर्थराइटिस यानि गठिया या जोड़ो की बीमारी है। जब आपको चलने – फिरने में तकलीफ होने लगे, सो कर उठने पर या सीढियाँ चढ़ने पर जोड़ों में दर्द हो, तो एक ही बीमारी का अंदेशा होता है वह है अर्थराइिटस। यह बीमारी पहले 50 साल से अधिक उम्र के लोगों को अधिक होती थी लेकिन बदलती जीवन शैली के कारण उम्र का कोई बंधन नहीं रहा । अर्थराइटिस के दर्द को बढ़ाने या इस बीमारी में आहार का बहुत योगदान है हम आज आपको ऐसे ही कुछ खाद्य पदार्थ के बारे में बता रहे हैं जिनकी वजह से अर्थराइटिस का दर्द बढ़ता है और कम होता है ।

    *मीठा खाद्य-पदार्थ का सेवन अधिक करना :-यदि आप अपने दैनिक जीवन में मीठा ज्यादा खाते हैं तो मीठा आपके शरीर में प्रोटीन्‍स का ह्रास करता है। जिस कारण आपके शरीर में गठिया का दर्द बढ़ने लगता है। इसलिए आपको अपने डाइट चार्ट में से शुगर और शुगर वाले आहार को निकाल दीजिए। यह आपके शरीर में अर्थराइटिस की बीमारी को कम नहीं होने देगा|

    *ढूध वाले खाद्य पदार्थ :-ढूध से बने खाद्य-पदार्थ भी आर्थराइटिस की बीमारी को बढ़ा सकते हैं। क्‍योंकि ढूध वाले उत्‍पाद जैसे, पनीर, मखन आदि में कुछ प्रोटीन होते हैं जो जोड़ों के पास मौजूद ऊतकों को प्रभावित करते हैं, जिसकी वजह से जोड़ों का दर्द बढ़ जाता है। इसलिए ढूध वाले पदार्थ को खाने से बचना चाहिये ।

    *सॉफ्ट ड्रिंक और अल्कोहल (शराब) :- अर्थराइटिस के मरीजों को शराब और साफ्ट ड्रिंक आदि के सेवन से बचना चाहिए। अल्कोहल शरीर में यूरिक एसिड को बढ़ाता है और तो और शरीर में से गैर जरूरी तत्व भी शरीर में से नहीं निकलने देता । इसी तरह सॉफ्ट ड्रिंक खासकर मीठे पेय या फ्रूट जूस पैकिंग वाले खाद्य-पदार्थ में फ्रेक्टोस नामक तत्व होता है, जो हमारे शरीर में यूरिक एसिड को बढ़ाने में मदद करता है।     
    2015 में एक शोध से यह बात साबित हुई थी कि जिन लोगों के खाद्य-पदार्थ में फ्रक्टोस वाली चीजों का सेवन अधिक होता है उनमें आर्थराइटिस होने का खतरा दो से तीन गुना तक अधिक हो जाता है।

    *टमाटर खाने से बचें :- टमाटर को विटामिन और मिनरल का स्त्रोत माना जाता है और ये शरीर को फायदा भी पहुंचाता है लेकिन यह अर्थराइटिस के दर्द को बढ़ाता भी है। टमाटर में कुछ ऐसे रासायनिक तत्व पाये जाते हैं जो जोड़ों में सूजन बढ़ाकर दर्द पैदा करते हैं। इसलिए टमाटर खाने से बचना चाहिये

    आर्थराइटिस के दर्द से मुक्ति देने वाले खाद्य पदार्थ




    *हल्‍दी : हल्‍दी का सेवन करने से जोड़ों के दर्द और सूजन में कमी आती है 
    * लहसुन को अपने भोजन में जरुर शामिल करें ये खून को साफ़ करता है.आर्थराइटिस के कारण खून में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है. लहसुन के रस से यूरिक एसिड पिघल कर तरल रूप में पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाता है|

    * ग्रीन टी: दिन में एक बार ग्रीन टी का सेवन जरुर करें क्योंकि इसमें एंटीऑक्‍सीडेंट होता है जो दर्द का पता ही नहीं चलने देता उसे वहीँ दबा देता है।
    *कद्दू जरुर खाएं -कद्दू में काफी मात्रा में कैरोटीन होता है जो जोड़ों के सूजन को काफी हद तक कम करता है।
    * Vitamin C: अपने दैनिक जीवन के भोजन में विटामिन सी वाले खाद्य पदार्थ जरुर लें विटामिन सी वाले खाद्य पदार्थ में स्‍वास्‍थ्‍य वर्धक कोलाजिन होता है। जो हड्डियां को मजबूत बनाता हैं।
    *प्‍याज : प्‍याज में एसपिरिन के असर वाला पदार्थ होता है जो दर्द में राहत देता है|

    विशिष्ट परामर्श-  


    संधिवात,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है|   बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त गतिशीलता हासिल करते हैं| बड़े  अस्पताल   मे  महंगे इलाज के  बावजूद   निराश रोगी   इस  औषधि से लाभान्वित हुए हैं|औषधि  के लिए वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं| 






    7.3.18

    घबराहट दूर करने के आयुर्वेदिक उपाय

                                                         


        मानसिक रोग की बीमारियां इंसान को काफी परेशान कर देती हैं। तनाव, चिंता और अवसाद इंसान को अंदर से इतना कमजोर बना देते हैं कि धीरे—धीरे उसकी सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ने लगता है। घबराहट यह एक गंभीर समस्या है। ये किसी भी तरह की हो सकती है जैसे लिफ्ट में थोड़ी देर खड़े होने पर, भीड़ वाली जगह पर, बंद कमरे या दरवाजा बंद होने पर घबराहट या किसी चिंता का होना आदि। यदि आपको किसी भी तरह की एैसी समस्या है तो चिंता ना करें। हमारे पास इसका बहुत ही सरल और आसान उपाय है। इसके लिए कुछ नुस्खे आपको इस्तेमाल करने हैं।
    आयुर्वेदक इलाज-
    बहुत जरूरी है नींबू की चाय यानि (लेमन टी)-
    नींबू हमारी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। लेकिन यही नींबू हमें घबराहट की समस्या से निजात भी दिलवाता है। लेमन टी आप नियमित सुबह और शाम पीना शुरू कर दें। कुछ ​ही दिनों में घबराहट आपको महसूस नहीं होगी।
    ग्रीन टी पीएं-
    जब आपको एैसा लगता हो कि घबराहट हो रही है तो आप ग्रीन टी को पीएं। क्योंकि इस चाय में मौजूद गुण हमारे शरीर के रक्त संचार और रक्तचाप को ठीक रखते हैं जिसकी वजह से घबराहट दूर हो जाती है।
    फायदेमंद है चाकलेट-
    चाकलेट अक्सर हम सभी खाते हैं । घबराहट का उपचार करती है ये चाकलेट। नियमित एक चाकलेट आप खांए इससे आपके दिमाग में घबराहट पैदा करने वाले हार्मोन कम होने लगते हैं। जिससे आपको पूरी तरह से इस बीमारी से मुक्ति मिल जाती है।
    आयुर्वेदक तेल लैवेंडर-
    बहुत ही लाभदायक है लैवेंडर का तेल घबराहट को कम करने में। जी हां यदि आप इस तेल को सूंघते हो तो इससे आपको इस परेशानी से राहत मिलती है। साथ ही आपका ब्लड प्रेशर भी नियंत्रित हो जाता है। आप चाहें तों लैवेंडर के टैबलेट का सेवन भी कर सकते हो। लेकिनअपने डॉक्टर से पूछने पर।
    बहुत ही फायदेमंद है अखरोट व अलसी-
    यदि आप अखरोट या फिर अलसी के बीजों का सेवन करते हो तो आपको कभी भी घबराहट नहीं होगी। क्योंकि इन दोनों में ओमेगा—3 फैटी एसिड होता है जो हमारे शरीर में जाकर चिंता व तनाव को खत्म करता है। आप रोज अखरोट जरूर खाएं।
    जामुन का प्रभाव-
    जामुन एक कारगर दवा के रूप में काम करती है घबराहट में। जी हां यदि आप इसका सेवन करते हो तो चिंता, टेंशन व मन की अशांति-
    सभी दूर हो जाएगीं। और आप फिर से एक स्वस्थ जीवन जी सकोगे।
    साबुत अनाज लाभकारी है-
    जैसा की हमने आपको बताया था कि घबराहट एक मानसिक रोग है इसलिए इसे कम करने में हमारी डायट की अहम भूमिका रहती है। आप साबुत अनाज का सेवन करना शुरू कर दें। इससे आपका ये मानसिक रोग पूरी तरह से ठीक हो जाएगा।
    इसलिए जरूरी है बादाम-
    उन लोगों को कभी भी घबराहट की समस्या नहीं होती है जो बादाम का सेवन नियमित करते हैं। बादाम हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। और इस तरह की किसी भी समस्या से हमारे शरीर को बचाता है। इसलिए जरूर खाएं बादाम।
    योग जरूर करें-
    योग में छिपा है घबराहट का अचूक उपाय। जी हां आप रोज सुबह के समय कपालभाती और अनुलोम—विलोम करते हो तो ये समस्या आपकी जल्द ही ठीक हो जाएगी।

    5.3.18

    काकजंघा जड़ी बूटी के आयुर्वेदिक और तांत्रिक प्रयोग


    काकजंघा आयुर्वेद में मानी हुई औषधि है किंतु वर्तमान में जानकारी न् होने के कारण लुप्त प्रायः और जंगली पौधा समझ के उखाड़ दी जाती है।
    आयुर्वेद के अनुसार :-
    काकजंघा स्नेहन (तैलीय) और संग्राहक (अर्थात इसके सेवन से व्यक्ति का मन प्रसन्न और शांत रहता है) होता है ।
    यह पेट की जलन और त्वचा की सुन्नपन को दूर करता है। पाचन शक्ति, टी.बी. रोग से उत्पन्न घाव, पित्तज्वर, खुजली और सफेद कोढ़ में इसका उपयोग लाभकारी होता है।
    विभिन्न रोगों में उपयोग :
    1. बहरापन:
    काकजंघा का आधा किलो रस निकालकर, 250 मिलीलीटर तेल में मिलाकर पकाएं और जब यह पकते-पकते केवल तेल ही बाकी रह जाए तो उसे छानकर रख लें। इस तैयार तेल को सुबह-शाम कान में डालने से बहरापन दूर होता है।काकजंघा के पत्तों का रस निकालकर गर्म करके कान में डालने से बहरापन ठीक होता है।
    2. जलोदर: काकजंघा व हींग को पीसकर पीने से जलोदर नष्ट होता है।
    3. नींद न आना (अनिद्रा): काकजंघा की जड़ को सिर के बालों पर बांधने से नींद अच्छी आती है।
    4. सफेद प्रदर में-
    सफेद प्रदर की बीमारी से बचने के लिए चावल के पानी के साथ काकजंघा की जड़ के पेस्ट के साथ सेवन किया जाता है।
    5. वात रोग में-
    वात रोग में घी के साथ दस ग्राम काकजंघा के रस को मिलाकर सेवन करने से वात रोग से निजात मिलता है।
    6. कान की समस्या-
    यदि कान में कीड़ा चला गया हो तो आप काकजंघा के पत्ते से बने रस की कुछ बूंदे कान में टपकाएं आपको आराम मिलेगा।
    7. खुजली व दाद में-
    यदि दादए खाज व खुजली की समस्या हो रही हो तो आप काकजंघा के रस से शरीर की मालिश करें। आपको आराम मिलेगा।
    8. खून की गंदगी होने पर-
    यदि खून में विकार आ गया हो तो आप काकजंघा का काढ़ा बनाकर सेवन करें। यह खून की गंदगी को साफ करता है।
    9. विष व जहरीले कीड़े के काटने पर-
    यदि शरीर में किसी जहरीले कीड़े ने डंक या काट लिया हो तो आप काकजंघा के पेस्ट को लोहे के चाकू पर लगाकर उस जगह पर मलें जहां पर कीड़े ने काटा है।
    इसके अलावा यह औषधिय पौधा फोड़े.फुंसी, गहरे घाव, कुष्ठ आदि रोगों को ठीक करता है। काकजंघा एक शीतल और खुश्क पौधा है। जो त्वचा से संबंधित रोगों को ठीक करता है। बुखार, गठिया और कृमि जैसी गंभीर बीमारियों से आपको बचाता है यह पौधा।
    तन्त्रोक्त प्रयोग:-
    वशीकरण :-
    1. काले कमल, भवरें के दोनों पंख, पुष्कर मूल, काकजंघा – इन सबको पीसकर सुखाकर चूर्ण बनाकर जिसके भी सर या मस्तक पर डाले वह वशीभूत होगा।
    2. काकजंघा, लजालू, महुआ, कमल की जड़ और स्ववीर्य को मिलाकर तिलक करने से किसी को भी वश में किया जा सकता है। ( सेल्स, प्रोपर्टी के काम के लिए उत्तम)
    3. गोरोचन, वंशलोचन, काकजंघा, मत्स्यपित्त, रक्त चंदन , श्वेत चन्दन, तगर, स्ववीर्य संग कुएं अथवा नदी के जल से पीस कर गुटिका बनाकर तिलक करने से या गुटिका खिला देने से राजा भी आजीवन दास बन जाते हैं।( सरकारी अधिकारी, बॉस आदि के लिए उत्तम है)
    4. चन्दन, तगर, काकजंघा, कूठ, प्रियंगु, नागकेसर और काले धतूरे का पंचांग सम्भाग पीस कर एक सप्ताह तक अभिमंत्रित कर जिसे खिलादिया जायेगा वो सदा सेवक बना रहेगा।
    स्त्री वशीकरण :-
    1. काकजंघा, तगर, केसर, कमल केसर इन सबको पीसकर स्त्री के मस्तक पर तथा पैर के नीचे डालने पर वह वशीभूत होती है।
    2. शनिवार को विधि पूर्वक निमंत्रण दे कर हस्त या पुनर्वसु नक्षत्र युत रविवार को कपित्थ कील से काकजंघा मूल निकाल लें, फिर उसे सुखा कर चूर्ण बनाकर स्ववीर्य, पंचमैल और मध्यमा उंगली के रक्त से मिश्रित कर छोटी छोटी गोलियां बना लें। इन्हें अभिमंत्रित कर ये जिस भी स्त्री को खिला दी जायेगी वो आजीवन वश में रहेगी।
    3. तन्त्रोक्त विधि से रविवार युक्त हस्त या पुष्य नक्षत्र में उत्खनित श्वेत गुंजा एवं काकजंघा मूल के चूर्ण को गोरोचन, श्वेत चन्दन, रक्त चंदन , जटामांसी, केसर कपूर और गजमद संग गुटिका बनाकर अभिमंत्रित कर जो तिलक करेगा वो किसी भी स्त्री को इच्छित भाव से देखेगा तो प्रबल वशीकरण होगा।
    उच्चाटन :-
    1. ब्रह्मदंडी, काकजंघा, चिता भस्म और गोबर का क्षार मिलाकर जिस पर भी डालेंगे उस व्यक्ति का उच्चाटन हो जायेगा।
    2. ब्रह्मदंडी, काकजंघा और सर्प की केंचुली की धूप शत्रु का स्मरण करते हुए देने से उसका शीघ्र उच्चाटन हो जाता है।
    सर दर्द:-
    काकजंघा के पौधे की जड़, द्रोण पुष्पी की जड़ या मजीठ के पौधे की जड़ लें।
    जड़ को सफेद सूत के धागे में बाँध कर मन्त्र सिद्ध गंडा तैयार करें। इसे रोगी के माथे पर बाँध दें। ऐसा करने से सिर का दर्द चाहे जैसा हो और जितना भी पुराना हो, शीघ्र दूर हो जाएगा।

    17.2.18

    हीमोफीलिया रोग के उपचार और सावधानियाँ


    हीमोफिलिया क्या हैं
          हीमोफिलिया एक ऐसी आनुवंशिक बीमारी हैं जिस बीमारी से ग्रस्त होने पर व्यक्ति को शरीर के किसी भी भाग पर जब चोट लग जाती हैं तो उसके घाव से रक्त बहना बंद नही होता. इस बीमारी का मुख्य लक्षण यह हैं कि इस बीमारी के होने पर व्यक्ति के शरीर में खून का थक्का जमना बंद हो जाता हैं. यह एक जानलेवा बीमारी हैं. क्योंकि जब किसी व्यक्ति को चोट लग जाती हैं और उसका खून बहना बंद नही होता तो इस वजह से ही उसकी जान भी जा सकती हैं. इस बीमारी का मुख्य कारण व्यक्ति के शरीर में रक्त प्रोटीन की कमी होना हैं. जिसे मेडिकल की भाषा में क्लॉटिंग फैक्टर’ कहा जाता हैं. इस फैक्टर की कमी शरीर में हो जाती हैं तो शरीर में खून जमने की क्षमता क्षीण हो जाती हैं
    हीमोफिलिया के विभिन्न नाम –
    हीमोफिलिया को अलग – अलग अलग नामों से जाना जाता हैं जिनका विवरण इस प्रकार हैं
    1. अधिरक्तस्राव
    2.ब्लीडर रोग
    3. शाही रोग,
    4. क्रिसमस रोग
    हीमोफिलिया रोग के प्रकार
    १. हीमोफिलिया A – 
    हीमोफिलिया A को क्लासिक हीमोफिलिया के नाम से भी जाना जाता हैं. हीमोफिलिया A की बीमारी किसी भी व्यक्ति को जिन म्यूटेशन के कारण हो जाता हैं. हीमोफिलिया A f8 जिन में उत्परिवर्तन हो जाने के कारण हो जाता हैं. एक रिसर्च में यह प्रमाणित किया गया हैं कि हीमोफिलिया के इस प्रकार से ही व्यक्ति अधिक ग्रस्त होता हैं.
    २. हीमोफिलिया B - 
    हीमोफिलिया के इस प्रकार को क्रिसमस रोग के नाम से भी जाना जाता हैं. यह रोग f9 जीन उत्परिवर्तन होने के कारण होता हैं.
    हीमोफिलिया के इन दोनों ही प्रकारों में समानता यह हैं कि इन दोनों ही प्रकारों के जीन x गुणसूत्र में ही पाएं जाते हैं. जिसकी वजह से हीमोफिलिया के दोनों ही प्रकारों की वाहक महिलाएँ होती हैं तथा इसीलिए पुरुष ही इस बीमारी के ग्रस्त होते हैं. हीमोफिलिया के इन दोनों ही मुख्य प्रकारों के साथ – साथ इस बीमारी का एक और प्रकार मिलता हैं. लेकिन यह बीमारी कुछ ही लोगों में पाई जाती हैं. जिसके बारे में जानकारी नीचे दी गयी हैं.
    अधिग्रहीत हीमोफिलिया – 
    हीमोफिलिया की यह बीमारी आनुवांशिक बीमारी नही हैं. इस बीमारी के होने का मुख्य कारण बाद में व्यक्ति के शरीर में म्यूटेशन होना हैं. इस बीमारी के होने पर व्यक्ति का शरीर खुद ही स्व – प्रतिरक्षा तन्त्र विकसित करता हैं और इसके पश्चात् अपने रक्त का थक्का जमाने वाले कारक 8 को नष्ट कर देता हैं. जिसके कारण शरीर में रक्त का थक्का जमना बंद हो जाता हैं और व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित हो जाता हैं.
    हीमोफिलिया से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए विशेष ध्यान रखने योग्य बातें
    1.क्लॉटिंग फैक्टर – 
    हीमोफिलिया के रोगियों को क्लॉटिंग फैक्टर भी दिया जा सकता हैं. लेकिन यह किसी मरीज को नियमित रूप से देना पड़ता हैं तथा किसी – किसी रोगियों को कभी कभी. मरीज को क्लॉटिंग फैक्टर देने का फायदा यह होता हैं कि इसे देने से व्यक्ति के शरीर से अत्यधिक रक्त बहने की सम्भावना कम हो जाती हैं तथा उसके शरीर में धीरे – धीरे खून का थक्का जमना शुरू हो जाता हैं.
    क्लॉटिंग बढ़ाने और हीलिंग वाली दवाइयों का सेवन – अगर हीमोफिलिया से ग्रस्त व्यक्ति को चोट लगने की वजह से अधिक खून बहने लगे तो इस स्थिति में उसे खून जमाने के लिए तथा घाव को जल्द ठीक करने के लिए क्लॉट बढाने वाली तथा हीलिंग वाली दवाइयां दे सकते हैं.
    3.दवाइयों से परहेज – 
    हीमोफिलिया के मरीज को आमतौर पर दर्द से राहत पाने वाली दवाइयों का सेवन करने से बचना चाहिए. क्योंकि इन दवाईयों का सेवन करने से रोगी के शरीर पर इन दवाइयों का विपरीत प्रभाव पड सकता हैं. अगर आपको दर्द से छुटकारा पाने के लिए किसी भी दवाई की जरुरत महसूस होती हैं तो ऐसे समय में अपने चिकित्सक से एक बार सलाह जरुर लें और उसके पश्चात् ही किसी भी दवाई का सेवन करें.
    4.व्यायाम – 
    हीमोफिलिया की बीमारी से निजात दिलाने में व्यायाम काफी हद तक सहायक सिद्ध होता हैं. इसीलिए रोजाना व्यायाम जरुर करें. व्यायाम करने से आपको काफी लाभ होगा. जैसे यदि आप नियमित रूप से व्यायाम करते हैं तो इससे आपके जोड़ों में दर्द नही होगा. इसके साथ ही चोट लगने पर आपके शरीर से अत्यधिक खून नही बहेगा.
    5.खेल – कूद में सावधानी – 
    यदि आप हीमोफिलिया के मरीज हैं और आपको खेलना – कूदना अधिक पसंद हैं तो खेलते समय अपना पूर्ण रूप से ध्यान रखें तथा जहाँ तक हो ऐसे खेल बिल्कुल न खेलें, जिसमें आपको चोट लगने की अधिक सम्भावना हो.
    6.दांत की सफाई – हीमोफिलिया के रोगी को अपने दांतों को हमेशा साफ रखना चाहिए. क्योंकि यदि दांतों में किसी भी प्रकार का रोग हो गया तो इससे आपके दांतों में ब्लीडिंग हो सकती हैं. जो की आपके लिए बेहद ही खतरनाक साबित हो सकता हैं. इसलिए अपने दांतों को साफ रखें और दिन में दो बार कम से कम ब्रश जरुर करें.