9.12.18

सूर्य स्नान करने की विधि और फायदे

                                                         
अग्नि तत्व जीवन का उत्पादक होता है। गर्मी के बिना कोई जीव या पौधा न तो उत्पन्न हो सकता है और न ही विकसित। चैतन्यता जहां कहीं भी दिखाई देती है, उसका मूल कारण गर्माहट ही है। गर्माहट के समाप्त होते ही क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है। अगर शरीर की गर्मी का अंत हो जाये तो जीवन का अंत ही समझा जाता है। अग्नि तत्व को सर्वोपरि समझते हुए आदि वेद ऋग्वेद में सर्वप्रथम मंत्र अक्षर 'अग्नि' ही आया है। सूर्य अग्नि तत्व का मूर्तिमान स्वरूप है, इसीलिए सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि जिन पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं को धूप पर्याप्त मात्र में मिलती है, वे स्वस्थ व निरोग रहते हैं। उसके विपरीत जहां सूर्य की जितनी कमी होती है, वहां उतनी ही अस्वस्थता रहती है। एक कहावत है-जहां धूप नहीं जाती, वहां डॉक्टर जाते हैं, अर्थात प्रकाश रहित स्थानों में बीमारियों का निवास हो जाता है। भारतीय तत्ववेत्ता अति प्राचीन काल से सूर्य के गुणों से परिचित हैं, इसीलिए उन्होंने सूर्य की उपासना की अनेक विधि-व्यवस्थायें प्रचलित कर रखी हैं। अब पाश्चात्य भौतिक विज्ञान द्वारा भी सूर्य के अद्भुत गुणों से परिचित होते जा रहे हैं।
 सूर्य की सप्त किरणों में 'अल्ट्रा वायलेट' और 'अल्फा वायलेट' किरणें उपस्थित रहती हैं जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभप्रद होती हैं। आजकल इन किरणों को मशीनों के माध्यम से कृत्रिम रूप में भी पैदा किया जाने लगा है परंतु जितना लाभ सूर्य से आने वाली किरणों द्वारा होता है, उतना मशीन द्वारा कृत्रिम किरणों से नहीं होता। यूरोप एवं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी अब सूर्य किरणों द्वारा उपचार विधियों का चलन जोरों पर हो गया है। वहां अनेक ऐसे औषधालय हैं जो मात्र सूर्य शक्ति से बिना किसी अन्य औषधियों के प्रयोग किए जटिल रोगों की चिकित्सा सफलतापूर्वक कर रहे हैं।
'क्रोमोपैथी' नामक एक स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति का ही आविष्कार हो चुका है, जिसमें रंगीन कांच की सहायता से सूर्य की वांछित किरणों को आवश्यकता के अनुसार रोगी तक पहुंचाया जाता है। रोग के कीटाणुओं का नाश करने की जितनी क्षमता धूप में है, उतनी और किसी वस्तु में नहीं होती। क्षय के कीड़े जो बड़ी मुश्किल से नष्ट होते हैं, सूर्य के सम्मुख रखने से कुछ ही मिनटों में नष्ट हो जाते हैं। वेटिव, लुक्स, जानसन, रोलियर, लुईस, रेडोक, टाइरल आदि अनेक उच्च कोटि के सुप्रसिद्ध चिकित्सकों ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में सूर्य किरणों की सुविस्तृत महिमा का वर्णन किया है और बताया है कि 'सूर्य से बढ़कर अन्य किसी औषधि में रोग निवारक शक्ति है ही नहीं।
सूर्य किरणों से निरोग और रोगी सभी को समान रूप से फायदा होता है, इसलिए नित्य नियमित रूप से अगर 'सूर्य स्नान किया जाय तो स्वास्थ्य सुधार में आश्चर्यजनक रूप से सहायता मिल सकती है। 

सूर्य स्नान की विधि:- नियमित रूप से सूर्य स्नान करते रहने से हर अवस्था के तथा हर रोग से ग्रस्त स्त्री-पुरूष तथा बच्चे स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकते है। सूर्य की किरणें शरीर में भीतर तक प्रवेश कर जाती है और रोग के कीटाणुओं को नष्ट कर देती है। पसीने द्वारा शरीर में स्थित विकारों को बाहर निकालकर अपनी पोषक शक्ति से क्षत विक्षत एवं रूग्ण अंगों को बल प्रदान करना सूर्य-किरणों का प्रमुख कार्य होता है।
टूटी हुई हड्डियों को जोडऩे, घावों को भरने तक से सूर्य-स्नान से लाभ पहुंचता है। यूं तो सूर्य-स्नान किसी भी ऋतु में किया जा सकता है, परंतु इसके लिए शीत-ऋतु अत्यन्त लाभकारी मानी जाती है। सूर्य-स्नान के लिए प्रात: काल का समय सबसे अच्छा माना जाता है। दूसरे दर्जे का समय संध्याकाल का होता है।
इसके लिए हल्की किरणें ही उत्तम होती है। तेज धूप में बैठने से अनेक त्वचा रोग हो सकते हैं। सूर्य-स्नान को आरंभ में आधे घंटे से ही शुरू करना चाहिए। फिर धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हुए एक डेढ़ घंटे तक ले जाना चाहिए।
 सूर्य-स्नान करते समय मात्र तौलिया पहनकर ही धूप में बैठना चाहिए। समस्त शरीर नंगा रहने पर सूर्य की किरणों को शरीर सोखता है। अगर एकांत व सुरक्षित स्थान हो तो तौलिया को भी हटाया जा सकता है। सूर्य-स्नान करते समय सिर को तौलिया या हरे पत्तों से ढक लेना चाहिए।
   केला एवं कमल जैसा शीतल प्रकृति वाला पत्ता मिल जाए तो अति उत्तम होता है। नीम के पत्तों का गुच्छा बनाकर भी सिर पर रखा जा सकता है। जितनी देर सूर्य-स्नान करें, उतने समय को चार भागों में बांटकर अर्थात् पेट का भाग, पीठ का भाग, दाई करवट तथा बाईं करवट को सूर्य की किरणों के सामने बारी-बारी से रखना चाहिए जिससे हर अंग में समान रूप से धूप लग जाये। धूप सेवन करने के बाद ताजे पानी में भिगोकर निचोड़े हुए मोटे तौलिए से शरीर के हर अंग को रगडऩा चाहिए जिससे गर्मी के कारण रोमकूपों द्वारा भीतर से निकाला हुआ विकार शरीर से ही चिपका न रह जाये।
  धूप का सेवन खाली पेट ही करना चाहिए। धूप सेवन के कम से कम दो घंटे पहले और आधे घंटे बाद तक कुछ नहीं खाना चाहिए। सूर्य का स्थान ऐसा होना चाहिए जहां पर जोर से हवा के झोंके न आते हों। धूप सेवन के बाद स्वभावत: शरीर हल्का एवं फुर्तीला हो जाता है परंतु अगर ऐसा न हो तो देह और भारी मालूम पडऩे लगती है।
अगर ऐसी बात हो तो कुछ देर और धूप स्नान करना चाहिए। अगर स्थिति और ऋतु अनुकूल हो तो सूर्य स्नान के बाद ताजे जल से स्नान कर लेना चाहिए। जिस दिन बादल हों या तेज हवा चल रही हो, उस दिन सूर्य स्नान नहीं करना चाहिए।


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