9.10.18

आयुर्वेदिक चिकित्सा मे शल्य क्रिया का महत्व


                                                                          


आयुर्वेद की आठ शाखाओं में से एक शल्य तंत्र या सर्जरी शुरुआत से ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी विधा रही है. वाराणसी के महाराजा काशीराज दिवोदास धन्वंतरि आयुर्वेद में शल्य संप्रदाय के जनक रहे हैं.
आचार्य सुश्रुत (500 ई.पू.) काशीराज दिवोदास धन्वंतरि के सात शिष्यों में प्रमुख थे. उन्होंने काशी (वाराणसी) में शल्य चिकित्सा सीखी और चिकित्सा कार्य किया. उन्होंने आयुर्वेद के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक सुश्रुत संहिता की रचना की जो शल्य चिकित्सा के मूल सिद्धांतों पर उपयोगी जानकारी देती है.
उन्होंने कई शल्य चिकित्साओं से जुड़ी कारगर विधि और तकनीक के बारे में विस्तार से लिखा है. क्षतिग्रस्त नाक को फिर से बनाना (राइनोप्लास्टी), कान की लौ को फिर से ठीक करना (लोबुलोप्लास्टी), मूत्र थैली की पथरी को निकालना, लैपरोटोमी और सिजेरियन सेक्शन, घाव का उपचार, जले, टूटी हड्डी जोडऩा, कोई आंतिरक फोड़ा, आंत और मूत्र थैली के छिद्रों से जुड़े उपचार, प्रोस्टेट का बढऩा, बवासीर, फिस्टुला आदि के उपचार की कारगर विधि की खोज, शल्य चिकित्सा में उनकी दक्षता को दर्शाते हैं.
सुश्रुत के डिजाइन किए हुए सर्जिकल उपकरण
क्षारकर्म, अग्निकर्म और जलौका अवचरण उनके खोजे उपचार की अन्य विधियां हैं जो कई ऐसी बीमारियों को भी ठीक कर सकती हैं जिनके इलाज के लिए सर्जरी ही एकमात्र विकल्प समझा जाता है. उन्होंने छह विभिन्न श्रेणियों में 100 से अधिक विकसित चिकित्सीय औजार और विभिन्न शल्य क्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले 20 प्रकार के धारदार सर्जिकल उपकरणों को विकसित किया.
इसके साथ-साथ विभिन्न सुइयां और टांके लगाने में काम आने वाले रेशम और लिनन के धागे, पौधों के रेशे और कोशिका ऊतक भी डिजाइन किया. उन्होंने आंत के छिद्र की सर्जरी में चींटे के जबड़े का प्राकृतिक रूप से गलकर नष्ट हो जाने वाले क्लिप के रूप में प्रयोग किया, जो नए-नए प्रयोगों और तकनीक के उपयोग में उनकी दूरदर्शिता का परिचय देता है.
वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने नेत्र रचना विज्ञान, नेत्र की व्याधियों और नेत्र चिकित्सा पर चर्चा की. नजर की कमजोरी, मोतियाबिंद की सर्जरी के सफेद भाग, नेत्रों के पलक से जुड़ी समस्याओं एवं अन्य कई नेत्र रोगों और उनके निदान का तरीका बताया.



उन्होंने कान, नाक और गले में होने वाली विभिन्न बीमारियों और उनकी चिकित्सा के बारे में भी विस्तार से वर्णन किया है.
शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान और आयुर्वेद के अन्य मूलभूत सिद्धांतों के क्षेत्र में उनके कार्य को देखते हुए उन्हें 'शल्य चिकित्सा का जनक' भी कहा जाता है.
हालांकि शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में उनका योगदान सर्वाधिक है, पर उन्होंने स्त्रीरोग, प्रसूति चिकित्सा और शिशु चिकित्सा प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है.
सुश्रुत के समय में आयुर्वेद में सर्जरी का बड़ा प्रचलन था. लेकिन समय के साथ शल्य चिकित्सा का प्रयोग कम होता चला गया.
विश्वविद्यालयों में आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को पढ़ाए जाने की शुरुआत 1927 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हुई थी.
फिर 1964 में आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की शुरुआत हुई तो आधुनिक युग में आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के प्रयोग का दौर आरंभ हुआ.
कई प्रसिद्ध आयुर्वेदिक सर्जन विश्वविद्यालय से जुड़े और आयुर्वेद में शल्य प्रणाली के शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध एवं उपयोग के क्षेत्र में सराहनीय योगदान दिया. उनमें से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के संस्थापक निदेशक प्रोफेसर के.एन. उडुपा का विशेष योगदान रहा है. प्रोफेसर उडुपा 1959 में बीएचयू के साथ आयुर्वेद कॉलेज के प्रिंसिपल और सर्जरी के प्रोफेसर के रूप में जुड़े.
प्रोफेसर के.एन. उडुपा के योग्य नेतृत्व में 1970 के दशक में आयुर्वेद और आधुनिक मेडिसिन, दोनों का ही भरपूर विकास हुआ. आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के पुनरुद्धार की इस प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए.
-कई प्राचीन शल्य चिकित्सा सिद्धांत एवं दर्शन को स्थापित करना
-सुश्रुत संहिता जैसे आयुर्वेद के प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ में वर्णित शल्य प्रक्रिया और तकनीक को प्रयोग में लाना
-शल्य कर्म के जरिए ठीक होने वाले रोगों में आयुर्वेद की विशिष्ट चिकित्सा कर्म और औषधि से चिकित्सा करना
-जिन बीमारियों के लिए शल्य क्रिया की जरूरत होती है, उनके स्थान पर क्षारकर्म, अग्निकर्म और जलौका अवचरण जैसे उपचार, जो बस आयुर्वेद में ही हैं और इनके प्रयोग से शल्य क्रिया से बचा जा सकता है.
आयुर्वेद में प्रचलित विभिन्न शल्य क्रियाओं में से कुछ की तो विश्वस्तर पर मान्यता है और क्षारसूत्र से फिस्टुला जैसी बीमारी का उपचार तो इसके सबसे उत्तम और कारगर उदाहरणों में से एक है.
भगंदर का क्षारसूत्र उपचार
गुदामार्ग और गुदाद्वार की बाहरी सतह के बीच एक पुरानी सूजन के कारण एक असामान्य सुराख बन जाने को गुदा का भगंदर कहते हैं. इस बीमारी का सबसे प्रचलित उपाय है—शल्य चिकित्सा. गुदा के भगंदर के उपचार के लिए आधुनिक सर्जरी में कई उपकरण और नई तकनीक के आने से इलाज ज्यादा आधुनिक तो हो गया है लेकिन इसका अंतिम परिणाम अब भी बहुत संतोषप्रद नहीं है, क्योंकि सर्जरी के बाद भी बीमारी फिर से उभर आती है.


साथ ही, मल द्वार के सिकुड़ जाने, सर्जरी के दौरान हुई क्षति के कारण मल को रोकने पर नियंत्रण में कमी जैसी बड़ी परेशानियां आ खड़ी होती हैं. कई बार तो ये परेशानियां मूल बीमारी से ज्यादा गंभीर हो जाती हैं.
आयुर्वेद में गुदा के फिस्टुला के लिए एक अनूठी उपचार पद्धति बताई गई है. एक औषधियुक्त धागा—क्षारसूत्र को भगंदर क्षेत्र में बांधा जाता है. धीरे-धीरे यह पूरे भगंदर क्षेत्र को काटकर अलग कर देता है और गुदा मार्ग की संकुचक मांसपेशियों को बिना कोई नुक्सान पहुंचाए बीमारी को ठीक कर देता है.
उपचार की इस तकनीक को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के शल्य तंत्र विभाग ने फिर से स्थापित किया और इसे केंद्रीय आयुर्वेद शोध परिषद (सीसीआरएएस) एवं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) द्वारा विधिवत मान्यता प्रदान की गई.
क्षारसूत्र एक औषधियुक्त धागा (रासायनिक बत्ती) है जिसे अपामार्ग, कदली, पलाश, नीम आदि वनस्पतियों के अवयव को गुग्गलु और हरिद्रा जैसे अन्य पौधों के साथ मिलाकर बनाया जाता है. शल्य कार्य में प्रयुक्त होने वाले लिनेन के धागे पर इन अवयवों को बार-बार लपेटकर इसे उपचार में प्रयोग के योग्य बनाया जाता है.
सामान्य और छोटे भगंदर की स्थिति में उपचार की सफलता दर शत-प्रतिशत है और जटिल, पुराने और दोबारा उभरे भगंदर के उपचार में इसकी सफलता का दर 93 से 97 प्रतिशत तक रहता है. इस विधि से 40,000 से ज्यादा रोगियों का सफलतापूर्वक उपचार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एस.एस. अस्पताल के गुदा व मलाशय रोग विभाग में किया जा चुका है.
इस उपचार विधि के लाभ को पहचानते हुए आयुष मंत्रालय ने 2013 में क्षारसूत्र उपचार पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल (एस.एस. हॉस्पिटल) में नेशनल रिसोर्स सेंटर की स्थापना की है. यह केंद्र गुदामार्ग और मलाशय में आमतौर पर होने वाली बीमारियों, जिसमें भगंदर भी शामिल है, के उपचार से संबंधित सभी मूलभूत और आधुनिक सुविधाओं से लैस है.
बवासीर भी एक अन्य आम समस्या है और 10 करोड़ से अधिक भारतीय इस रोग के शिकार हैं. आयुर्वेद में कब्ज और आंतों से जुड़ी परेशानियों को जड़ से मिटाने के लिए बहुत-सी औषधीय वनस्पतियां बताई गई हैं. क्षारसूत्र का प्रयोग और अथवा क्षार (औषधीय वनस्पतियों से प्राप्त लेई) का प्रभावित क्षेत्र पर लेप करके बवासीर के मस्से को अलग कर देना इस रोग को ठीक करने के बड़े कारगर उपाय हैं.
शल्य क्रिया में घाव का उपचार भी एक अन्य क्षेत्र है जिसमें आयुर्वेद का योगदान असाधारण है. 100 से ऊपर विधियां और पाउडर, पेस्ट, पत्तों के ताजा रस, मरहम, एवं औषधीय तेल तथा घी से बनी सामग्रियों के रूप में अनेक प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं जिनका प्रयोग करके पुराने और आसानी से नहीं भरने वाले घावों को ठीक किया जा रहा है. आसानी से नहीं सूखने वाले घाव के उपचार का आयुर्वेद का मूलभूत सिद्धांत है- दुष्ट व्रण (घाव) को शुद्ध व्रण में परिवर्तित कर दिया जाए.


इसके लिए विभिन्न स्तरों पर अनेक प्रकार की दवाइयों की जरूरत होती है. दुष्ट व्रण या खराब घाव आमतौर पर निर्जीव उत्तकों से भरे ऐसे संक्रमित घाव होते हैं जिससे दुर्गंध और मवाद आती है. नीम, करंज, पपीता, दारुहरिद्रा आदि वनस्पतियां दुष्ट व्रण को शुद्ध व्रण में बदल देती हैं इसलिए इन्हें व्रण शोधन दवाएं भी कहा जाता है. जबकि चमेली, हरिद्रा, मंजिष्ठा, दूर्वा, चंदन घावों को तीव्रता से भरने में सहयोगी होते हैं इसलिए इन्हें व्रण रोपण दवाएं कहा जाता है.
कुछ दवाएं ऐसी भी हैं जो घावों की चिकित्सा के दोनों चरणों में उपयोगी होती हैं. पंचवल्कल (पंच-पांच, वल्कल-छाल) जो आयुर्वेद में घाव भरने हेतु लाभकारी प्रभाव के लिए वर्णित है, में वट, उदुबंर, पीपल, पारीष और पलक्ष जैसे पांच पौधों की छाल शामिल हैं. ये पौधे पूरे देश में सामान्य रूप से और प्रचुरता से उपलब्ध हैं.
इस यौगिक दवा का वैज्ञानिक मानकों पर मूल्यांकन किया गया और पाया गया कि दवा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकती है, नई रक्त वाहिका के गठन को बढ़ाती है, कोलेजन संश्लेषण में वृद्धि करती है और घाव के त्वरित उपचार के लिए जरूरी कारकों को बढ़ाती है. चूंकि तकनीक और दवाएं, दोनों ही हमारे देश में भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं इसलिए इस विधि से उपचार विदेशों से ड्रेसिंग मटेरियल आयात करने के मुकाबले बहुत सस्ता हो गया है.
जोंक का प्रयोग एक अन्य पैरा सर्जिकल तकनीक है जिसका आयुर्वेदिक सर्जन नहीं सूखने वाले घावों को ठीक करने के साथ ही साथ प्लास्टिक सर्जरी में त्वचा को जोडऩे में प्रयोग करते हैं. जोकों की विशेष प्रजातियां हैं जो विषाक्त प्रकृति की नहीं होतीं.
इनका प्रयोग संक्रमित घाव के चारों तरफ से आवश्यकता अनुसार रक्त को चूसकर निकालने के लिए किया जाता है. इससे रक्त का संचरण बढ़ता है और घाव को तेजी से भरने में मदद मिलती है. जोंक का प्रयोग एग्जिमा और गंजेपन जैसी बीमारियों को ठीक करने में भी बहुत कारगर है.
आयुर्वेद में कई अन्य गैर-शल्य क्रिया वाले प्रयोगों का वर्णन है जिनका वैज्ञानिक रूप से आकलन हुआ है. प्रोस्टेट बढ़ जाए तो इसके उपचार के लिए सर्जरी ही एकमात्र रास्ता बताया जाता था. इसके स्थान पर प्रयोग से प्रमाणित हुआ है कि औषधीय एनिमा के साथ-साथ गोक्षुरादि गुग्गुल और वरुण प्रोस्टेट को ठीक करने में उपयोगी होते हैं जो पीकर सेवन करने वाली औषधियां हैं.
वरुण, गोक्षुर, पाषाणभेद मूत्राशय की पथरी को ठीक करने में बड़े कारगर बताए जाते हैं. ये दवाइयां मूत्र की थैली में पथरी का बनना रोकती हैं और शल्य चिकित्सा के बाद फिर से पथरी बनने की संभावना को समाप्त करती हैं. मूत्र स्टेंट मूत्रवाहिनी में रखा पतला ट्यूब होता है. ये आयुर्वेदिक दवाएं मूत्र स्टेंट को लंबे समय तक कारगर रखने और स्टेंट के मूत्राशय में रखे जाने के बाद उसके भीतर लवण के जमा होने से रोकने में सहायक होती हैं.
हड्डी से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने में आयुर्वेदिक सर्जनों का योगदान सराहनीय है. कुछ ऐसे शिक्षण संस्थान साथ ही साथ निजी प्रेक्टिशनर भी हैं जो हड्डियों से जुड़े मामलों खासतौर से हड्डी की टूट-फूट से जुड़े मामलों, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, डिस्क का खिसकना एवं अन्य पुरानी बीमारियों का इलाज करते हैं. इसके अलावा, कुछ विशेष उपकरणों द्वारा अग्निकर्म और रक्तमोक्षण कुछ दूसरे उपाय हैं जो मांसपेशियों के पुराने दर्द का निवारण करने में बड़े प्रभावी हैं.
आयुर्वेद की शल्य क्रिया में प्रशिक्षित स्त्रीरोग एवं नेत्ररोग के आयुर्वेदिक सर्जन अपने-अपने क्षेत्र में शल्य चिकित्सा भी करते हैं. वे आयुर्वेद में वर्णित उपचार की कुछ विशेष तकनीक के अलावा सामान्य स्त्रीरोगों और प्रसवोत्तर सर्जरी करने में सक्षम हैं.
आयुर्वेदिक नेत्र सर्जन आंखों की सामान्य सर्जरी जैसे मोतियाबिंद निकालना आदि के साथ-साथ दूसरी नेत्र संबंधी सर्जरी में सक्षम हैं. आयुर्वेद में नेत्ररोग से जुड़ी विशेष क्रियाओं को क्रियाकल्प के रूप में जाना जाता है. क्रियाकल्प एक विशेष प्रक्रिया है जिसके द्वारा रेटिना से जुड़ी विभिन्न समस्याओं और अन्य पुराने नेत्र रोगों का सफल उपचार किया जाता है.
हालांकि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा की शुरुआत आजादी के बाद के दौर में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में शल्य तंत्र की पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई और प्रशिक्षण के द्वारा शुरू की गई लेकिन बाद में इसे कई अन्य शिक्षण संस्थानों में भी शुरू किया गया. अब आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन शिक्षण का संचालन सीसीआइएम और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा होता है, कई अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों ने भी शल्य तंत्र में पोस्ट ग्रेजुएशन यानी एमएस (आयुर्वेद) की पढ़ाई शुरू कराई है.
शल्य तंत्र में पोस्ट ग्रेजुएशन प्रशिक्षण तीन साल का होता है जो कि आयुर्वेद में ग्रेजुएशन के बाद किया जा सकता है. आज बिना सुरक्षित एनेस्थेसिया और लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सर्जरी की बात सोची भी नहीं जा सकती और यह बात आयुर्वेदिक सर्जरी पर भी लागू होती है. इसे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में समझा गया और आयुर्वेद में एनेस्थेसिया की शुरुआत की गई और बाद में सीसीआइएम ने आयुर्वेद विभाग में भी एनेस्थेसियोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स शुरू किया.
ये आयुर्वेदिक संस्थानों और निजी संस्थानों में आयुर्वेदिक सर्जनों की जरूरतों को पूरा कर रहे थे लेकिन एनेस्थेसिया पर आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स (संज्ञाहरण) को अचानक बंद कर देने से आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा की विशेषज्ञता की दिशा में हो रहे कार्यों को धक्का पहुंचा है और इस विषय पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है.
-डॉ. मनोरंजन साहू

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