26.1.17

आयुर्वेद का चिकित्सा विज्ञान: Ayurveda Medical Science


  

  आयुर्वेद लगभग, 5000 वर्ष पुराना चिकित्‍सा विज्ञान है । इसे भारतवर्ष के विद्वानों नें भारत की जलवायु, भौगालिक परिस्थितियों,भारतीय दर्शन, भारतीय ज्ञान-विज्ञान के द्ष्टकोण को घ्‍यान में रखते हुये विकसित किया। यह मनुष्य के जीवित रहने की विधि तथा उसके पूर्ण विकास के उपाय बतलाता है, इसलिए आयुर्वेद अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह एक चिकित्सा पद्धति मात्र नही है, अपितु सम्पूर्ण आयु का ज्ञान है। आयुर्वेद का अर्थ है वह ज्ञान जिससे आयुष अथवा जीवन को विस्तार मिलता है. आयुर्वेद वह शास्त्र है जो भारत के समृद्ध औषधीय और चिकित्सीय संपदा का गोचर है. दुर्भाग्यवश हम अपनी ही धरोहर में मिले इस विज्ञान को भूलते जा रहे हैं जिसके प्रयोग से जीवन ना सिर्फ़ रोग मुक्त किया जाता है अपितु अप्रतिम रूप से स्वास्थ्य की ओर संचालित भी किया जा सकता है|
संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो दुःखी होना चाहता हो। सुख की चाह प्रत्येक व्यक्ति की होती है, परन्तु सुखी जीवन उत्तम स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। स्वस्थ और सुखी रहने के लिए यह आवश्यक है कि शरीर में कोई विकार न हो और यदि विकार हो जाए तो उसे शीघ्र दूर कर दिया जाये। आयुर्वेद का मुख्य लक्ष्य व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना एवं रोगी हो जाने पर उसके विकार का प्रशमन करना है। ऋषि जानते थे कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ जीवन से है इसीलिए उन्होंने आत्मा के शुद्धिकरण के साथ शरीर की शुद्धि व स्वास्थ्य पर भी विशेष बल दिया है।
    आयुर्वेद आयुर्विज्ञान की प्राचीन भारतीय पद्धति है। यह आयु का वेद अर्थात आयु का ज्ञान है। जिस शास्त्र के द्वारा आयु का ज्ञान कराया जाय उसका नाम आयुर्वेद है। शरीर, इन्द्रिय सत्व, और आत्मा के संयोग का नाम आयु है। आधुनिक शब्दों में यही जीवन है। प्राण से युक्त शरीर को जीवित कहते है। आयु और शरीर का संबंध शाश्वत है। आयुर्वेद में इस सम्बन्ध में विचार किया जाता है। फलस्वरुप वह भी शाश्वत है। जिस विद्या के द्वारा आयु के सम्बन्ध में सर्वप्रकार के ज्ञातव्य तथ्यों का ज्ञान हो सके या जिस का अनुसरण करते हुए दीर्घ आशुष्य की प्राप्ति हो सके उस तंत्र को आयुर्वेद कहते हैं, आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है।
    आयुर्वेद के विकास क्रम और विकास के इतिहास पर दृष्टिपात करनें से ऐसा समझा जाता है कि आदिम काल के पूर्वजों नें रोंगों से मुक्ति पानें के लिये जिन जंगली जड़ी बूटियों, रहन, सहन और अन्‍य पदार्थों को रोगानुसार आरोग्‍यार्थ स्‍वरूप में स्‍वीकार किया, वे यह सारा ज्ञान अपनें बाद की पीढियों को देते चले गये। यह सारा ज्ञान श्रुति और स्‍मृति पर आधारित रहा। कालान्‍तर में यह ज्ञान एक स्‍थान पर एकत्र होता गया। जब गुरूकुलों की स्‍थापना हुयी तो धर्म, कर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इत्‍यादि की प्राप्ति के लिये यह कहा गया कि जब तक तन और मन स्‍वस्‍थ्य नहीं होंगे, ऐसा उद्देश्‍य प्राप्‍त करना कठिन है, इसलिये पहली आवश्‍यकता शरीर को स्‍वस्‍थ्‍य बनाये रखना है। जब तक लिपि का आविष्‍कार नहीं हुआ था तब तक यह ज्ञान स्‍मृति और श्रुति के सहारे जीवित रहा। जब लिपियों का आविष्‍कार हुआ तब यह ज्ञान पत्‍थरों से लेकर भोजपत्र में संचित करके रखा गया।
    आयुर्वेद में आयु के हित (पथ्य, आहार, विहार), अहित (हानिकर, आहार, विहार), रोग का निदान और व्याधियों की चिकित्सा कही गई है। हित आहार, सेवन एवं अहित आहार त्याग करने से मनुष्य पूर्ण रुप से स्वस्थ रह सकता है। आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन के चरम लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। पुरुषार्थ चतुष्टयं की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है अतः उसकी सुरक्षा पर विशेष बल देते हुए आयुर्वेद कहता है कि धर्म अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है। भाव प्रकाश, आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ, मे कहा गया है कि जिस शास्‍त्र के द्वारा आयु का ज्ञान, हित और अहित आहार विहार का ज्ञान, व्‍याधि निदान तथा शमन का ज्ञान प्राप्ति किया जाता है, उस शास्‍त्र का नाम आयुर्वेद है।
   


भारत के अलावा अन्‍य देशों में यथा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, नेपाल,म्‍यामार, श्री लंका आदि देशों में आयुर्वेद की औषधियों पर शोध कार्य किये जा रहे हैं। बहुत से एन0जी0ओ0 और प्राइवेट संस्थान  तथा अस्‍पताल और व्‍यतिगत आयुर्वेदिक चिकित्‍सक शोध कार्यों में लगे हुये है।
आयुर्वेद का इतिहास एवं मूलभूत सिद्धांत 
आयुर्वेद प्राचीन भारत में चिकित्सा की प्रयोग की जाने वाली पद्धति है जिसमें रोग का निवारण जड़ से किया जाता है. इस विद्या का प्रयोग भारत के ऋषि-मुनि एवं ज्ञानियों द्वारा 2000 से 5000 वर्ष पूर्व किया जाता था. यह चिकित्सा प्रणाली वास्तव में modern medicine से ग़ूढ और अधिक प्रभावशाली है क्योंकि इसमे रोग के वास्तविक कारण का निवारण किया जाता है. शरीर में स्वास्थ का निर्माण कर यह चिकित्सा प्रणाली अनियमित जीवन शैली से उत्पन्न अनेक रोगों को सफलता पूर्वक निवृत्त करती है. आयुर्वेद के अनुसार मन और शरीर दोनों आपस में जुड़े हुए हैं. मन में उत्पन्न दोषों से ही शरीर में व्याधि प्रगट होती है तथा शारीरिक रोगों के निवारण के लिए मानसिक स्वास्थ का विशेष महत्व आयुर्वेद में निर्धारित है.
प्राचीन काल में आयुर्वेद का विज्ञान मौखिक रूप से ही गुरु द्वारा शिष्य को दिया जाता था . ऋग्वेद में आयुर्वेद संबंधित चिकित्सा वर्णन सबसे पहले देखने को मिलता है. परंतु मूलतः आयुर्वेद अथर्ववेद का अंग है. बाद में सरल रूप देते हुए आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को दर्शाने वाले कुछ लिखित मूलग्रंथ सुश्रुत, चरक और वागभट्ट द्वारा दिए गये हैं. इसके अलावा अन्य छोटे ग्रंथों में आयुर्वेदिक पद्धति के अनुरूप विभिन्न रोग क्षेत्रों में अनेक चिकित्सा प्रणालियों का वर्णन है. परंतु विस्मित करने वाली बात यह है कि सभी ग्रंथ और अलग प्रकार की चिकित्सा में आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों पर ही केंद्रित हैं जिन्हे रोज़मर्रा के जीवन में भी सरलता पूर्वक प्रयोग किया जा सकता है. इससे भी अधिक आश्चर्य तब होता है जब हम प्रकृति तथा संपूर्ण ब्रह्मांड में आयुर्वेद के इन्ही मूलभूत सिद्धांतों को लागू पाते हैं. यह कहना कोई अतिशयोक्ति नही की आयुर्वेद एक विस्मयकारी, रहस्यदर्शी और वैज्ञानिक विद्या है जिसका विस्तार पूरे विश्व में मिलता है.
    आयुर्वेद में निहित तीन दोष - वात वायु और आकाश से निर्मित तत्व है जो की रुक्ष, ठंडा, खुरदुरा, सूक्ष्म, गतिशील, पारदर्शी और सूखाने वाला द्रव्य है. यह शरीर में हो रही आंदोलन और गति-संबंधी सभी कार्यों को होने में सहयोग देता है. शरीर में रक्त का आंदोलन, तंत्रिकायों में सूचना का प्रसारण, पेरिस्टल्स्स  (मांसपेशियों की वह लयबद्ध गतिमई क्रिया जिससे विभिन्न शारीरिक कार्य होते हैं- जैसे भोजन का निगलना), मलोत्सर्ग आदि सभी कार्य वात द्वारा ही संभव हैं. यदि इस दोष में असंतुलन उत्पन्न हो जाए तो यह इनमें से किसी भी क्रिया पर असर डाल सकता है.
   


वात: 
दोष की विकृति के कुछ लक्षण: शरीर का हलकापन, उँची आवाज़ को सहन ना कर पाना, कब्जियत, ठंडी और गर्म वस्तुओं  को ना सह पाना, आदि 
    पित्त: 
इस दोष से अग्नि और जल दोनों के ही गुण निहित हैं. यह तीक्ष्ण, गर्म, क्षारमई, चिकनाई युक्त लसलसा, पीले रंग का पदार्थ है जिस से शरीर में हो रहे प्रत्येक रूपांतरण के कार्य में सहायता मिलती है. पाचन की क्रिया को सुचारू रूप से करना, चयपचय , इंद्रियों की संवेदनशीलता तथा ग्राहक (कुछ भी ग्रहण करना या लेना) शक्ति, ये सब पित्त द्वारा ही किया जाता है. पित्त में उत्पन्न दोष से इन अब कार्यों में तीक्ष्णता अथवा अवरोध उत्पन्न हो सकता है. इससे जलन या सूजन का आभास भी हो सकता है.पित्त दोष की विकृति के कुछ लक्षण: चिड़चिड़ापन, खाली पेट होने पर वमन होना, जोड़ों में सूजन, शरीर में कफ: पृथ्वी और जल से निर्मित यह दोष भारी, ठंडा, तैलीय, घना, स्निग्ध, मधुर, भोथरा, ठोस, स्थाई पदार्थ है. वसा बढ़ जाती है जिससे शरीर में भारीपन और आकार में बढ़ोत्तरी हो जाती है.
कफ दोष की विकृति के कुछ लक्षण: अधिक श्लेष्मा का बनना, जीव्हा पर मोटी सफेद परत, 

आयुर्वेद के अनुसार उपचार
\आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांतों को समझकर हम इन रोगों को प्रारंभिक अवस्था में ही पकड़ सकते हैं तथा कुछ सरल उपायों द्वारा ही पुनः स्वस्थ को प्राप्त कर सकते हैं.
यदि शरीर में रोग की अवस्था आ चुकी है फिर चाहे वह मध्यम अथवा तीव्र हो, उसे आयुर्वेदीय उपचार द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है.
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आयुर्वेदिक और एलोपैथी की तुलना 
*  आयुर्वेदिक दवाओं का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है,जबकि एलोपेथी दवा को एक बीमारी में इस्तेमाल करो तो उसके साथ दूसरीबीमारी अपनी जड़े मजबूत करने लगती है|
* आयुर्वेद में सिद्धांत है कि इंसान कभी बीमार ही न हो |और इसके छोटे छोटे उपाय है जो बहुत ही आसान है | जिनका उपयोग करकेस्वस्थ रहा जा सकता है | जबकि एलोपेथी के पास इसका कोई सिद्दांत नहीं है|
*आयुर्वेद का 85% हिस्सा स्वस्थ रहने के लिए हैऔर केवल 15% हिस्सा में आयुर्वेदिक दवाइयां आती है, जबकि एलोपेथी का15% हिस्सा स्वस्थ रहने के लिए है और 85 % हिस्सा इलाज के लिए है
*  आयुर्वेद की दवाएं किसी भी बीमारी को जड़ से समाप्त करती है,जबकि एलोपेथी की दवाएं किसी भी बीमारी को केवल कंट्रोल में रखती है|
*  आयुर्वेद का इलाज लाखों वर्षो पुराना है,जबकि एलोपेथी दवाओं की खोज कुछ शताब्दियों पहले हुवा |
*  आयुर्वेद की दवाएं घर में, पड़ोस में या नजदीकी जंगल में आसानी से उपलब्ध हो जाती है, जबकि एलोपेथी दवाएं ऐसी है कि आप गाँव में रहते हो तो आपको कई किलोमीटर चलकर शहर आना पड़ेगा और डॉक्टर से लिखवाना पड़ेगा |
*  आयुर्वेदिक दवाएं बहुत ही सस्ती है या कहे कि मुफ्त की है, जबकि एलोपेथी दवाओं कि कीमत बहुत ज्यादा है| एक अनुमान के मुताबिक एक आदमी की जिंदगी की कमाई का लगभग 40% हिस्सा बीमारीऔर इलाज में ही खर्च होता है|

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