1.6.17

होम्योपैथिक औषधि कास्टिकम के गुण लक्षण उपयोग


लक्षण 
बेहद कमजोरी – गला, जीभ, चेहरा, आँख, मलाशय, मूत्राशय, जरायु तथा हाथ-पैर आदि की पक्षाघात ( लकवा ) ठंडा पानी पीने से आराम
सायंकाल मानसिक लक्षणों का बढ़ना बिस्तर की गर्मीं से अाराम
दु:ख, शोक, भय, रात्रि-जागरण आदि से उत्पन्न रोग हल्की हरकत से आराम
स्पर्श न सह सकना गठिये में नमीदार हवा से रोगी को आराम
गठिये में पुट्ठों और नसों का छोटा पड़ जाना और ठंडी हवा में आराम
खांसी में ठंडे पानी के घूंट से आराम तथा कूल्हे के जोड़ में दर्द लक्षणों में वृद्धि
मोतियाबिन्द ठीक करता है खुश्क, ठडी हवा से वृद्धि
मस्सों का होम्योपैथिक दवा त्वचा-रोग के दब जाने से रोग उत्पन्न हो जाना
मासिक-धर्म दिन को ही होता है। सायंकाल रोग में वृद्धि
*बेहद कमजोरी – 
गला, जीभ, चेहरा, आंख, मलाशय, मूत्राशय, जरायु, हाथ-पैर आदि का लकवा – 
कॉस्टिकम औषधि की स्पाइनल कौर्ड (मेरु-दण्ड) पर विशेष क्रिया है, और क्योंकि वहीं से ज्ञान-तंतु भिन्न-भिन्न अंगों में जाते हैं इसलिये मेरु-दंड के ज्ञान-तंतुओं पर ठंड आदि के कारण, अथवा चिरस्थायी दु:ख, शोक, भय, प्रसन्नता, क्रोध, खिजलाहट आदि के कारण जिन्हें रोगी सह नहीं सकता उसके भिन्न-भिन्न अंगों में से किसी भी अंग में लकवा हो जाता है। लकवा किसी एक अंग का होता है। ठंड लगने या भय आदि से जब शुरू-शुरू में किसी अंग में यह रोग होता है तब एकोनाइट से ठीक हो जाता है, परन्तु जब एकोनाइट काम नहीं करता, तब कॉस्टिकम देने की जरूरत पड़ जाती है। कॉस्टिकम में रोग का प्रारंभ बेहद कमजोरी से शुरू होता है। हाथ-पैर या शरीर के अंग कांपने लगते हैं, रोगी मानो बलहीनता में डूबता जाता है जेलसीमियम में भी पक्षाघात में यह कांपना पाया जाता है। रोगी धीमी चाल से आता है, मांस-पेशियों की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है, गले में लकवा, भोजन-प्रणालिका में लकवा, डिफ्थीरिया के बाद इन अंगों में लकवा, आंख की पलक का लकवा, मलाशय, मूत्राशय, जरायु का लकवा, हाथ-पैर का शक्तिहीन हो जाना, बेहद सुस्ती, थकान, अंगों का भारीपन – ये सब लकवा की तरफ धीरे-धीरे बढ़ने के लक्षण हैं जिनमें कॉस्टिकम का प्रयोग लाभप्रद है। कॉस्टिकम का लकवा प्राय: दाई तरफ होता है। बाई तरफ के लकवा में लैकेसिस की तरफ ध्यान जाना चाहिए।
एक-एक अंग में लकवा –
 लकवा इस औषधि का चरित्रगत लक्षण है। शरीर के किसी एक अंग पर इस रोग का आक्रमण होता है। उदाहरणार्थ, अगर ठंडी, खुश्क हवा में लम्बा सफर करने निकलें और हवा के झोंके आते जायें, तो किसी एक अंग पर इस हवा का असर पड़ जाता है और वह अंग सुन्न हो जाता है, काम नहीं करता। ठंड से चेहरा टेढ़ा हो जायगा, आवाज़ बैठ जायेगी, भोजन निगलने की मांस-पेशियां काम नहीं करेंगी, जीभ लड़खड़ाने लगेगी, आंख की पलक झपकना बन्द कर देगी, पेशाब नहीं उतरेगा, शरीर भारी हो जायगा। इन सब लक्षणों पर कॉस्टिकम से अनेक रोगी झट-से ठीक होते देखे जाते हैं।
बच्चों का पहली नींद में पेशाब निकल जाना – 
प्राय: बच्चे सोने में पेशाब कर दिया करते हैं, या जागते हुए भी अनजाने पेशाब हो जाता है। बच्चा इस प्रकार पेशाब पहली नींद में ही कर दे, तो कॉस्टिकम से ठीक हो जायगा। प्राय: देखा जाता है कि बच्चे को पता ही नहीं चलता कि उसने पेशाब कर दिया है। जब वह हाथ लगाकर देखता है कि उसका कच्छा भींग गया है तब वह समझता है कि पेशाब अपने-आप निकल गया।
सायंकाल मानसिक-लक्षणों का बढ़ जाना और घबराहट के साथ चेहरा लाल तथा बार-बार पाखाने की हाजत होना – 
कॉस्टिकम औषधि में रोगी हर समय उदास रहता है। चित्त की यह अवस्था उस समय बहुत बढ़ जाती है जब दिन का उजाला सिमटने लगता है, सांयकाल की अंधेरी उमड़ कर आने लगती है। रोगी उस समय डरा हआ, घबराया हुआ रहता है। उसके मन की एकरसता में बाधा पड़ जाती है और उसे कहीं शान्ति नहीं दिखती। उसे ऐसा लगता है कि कोई संकट टूट पड़ने वाला है। उसकी आत्मा से आवाज निकलती है कि उसने कोई अपराध किया है। इस घबराहट में उसे बार-बार पाखाने की हाजत होती है। घबराहट में चेहरा लाल हो जाना और उस समय बार-बार पाखाने की हाजत होना कॉस्टिकम का विशेष लक्षण है। रोगी का मिजाज चिड़चिड़ा हो जाता है और स्वभाव संदेहशील तथा दूसरों के दोष ढूंढनेवाला हो जाता है। चिड़चिड़ा होना और दूसरों के प्रति सहानुभूति प्रकट करना एक अद्भुत-लक्षण है।
मूत्राशय से अपने-आप मूत्र निकल जाना या पेशाब बन्द हो जाना –
 इसी प्रकार मूत्राशय के लकवा का यह स्वाभाविक परिणाम है कि या तो मूत्र अपने-आप बहा करता है या निकल जाता है क्योंकि उसे रोकने वाली पेशियां काम नहीं करतीं, या कोशिश करने पर भी पेशाब नहीं होता। ये दोनों अवस्थाएं भी पक्षाघात का ही परिणाम हैं।
दुःख, शोक, भय, रात्रि-जागरण आदि से उत्पन्न रोग – 



कॉस्टिकम विशेषकर उन मानसिक रोगों के लिए अत्यंत उपयोग है जो दीर्घकालीन दु:ख, शोक आदि से उत्पन्न होते हैं। कई दिनों तक रात्रि-जागरण से जो रोग हो जाते हैं उनके लिये भी यह लाभप्रद है। इस दृष्टि से इसकी तुलना ऑरम मेट, इग्नेशिया, कौक्युलस, लैकेसिस, ऐसिड फॉस तथा स्टैफिसैग्रिया से की जा सकती है। इन रोगों की उत्पत्ति भी तो जीवनी-शक्ति के निम्न स्तर पर पहुंच जाने के कारण मानसिक-पक्षघात की सी ही समझनी चाहिये। इन रोगों पर जब रोगी सोचने लगता है तब उसकी तबीयत और बिगड़ जाती है।

भय या त्वचा-रोग दब जाने से मिर्गी, तांडव, ऐंठन होना –
 कभी-कभी मिर्गी, तांडव तथा अकड़न का रोग व्यक्ति के भीतर किसी भय के बैठ जाने से पैदा हो जाता है। भय के कारण इस प्रकार के रोगों को कॉस्टिकम दूर कर देता है। भय के अतिरिक्त किसी त्वचा के रोग को लेप आदि से दबा देने से भी इस प्रकार के मानसिक-लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। यौवन-काल में किसी लड़की को मासिक-धर्म की गड़बड़ी से भी ऐसे लक्षण हो सकते हैं। भय के मन में गुप्त-रूप से बैठ जाने, दानों के दब जाने या मासिक के अनियमित होने से अगर मिर्गी, तांडव या अकड़न हो, और रोगी अनजाने अपने हाथ-पैर हिलाता रहे, या सोते हुए हाथों या पैरों को झटके देता रहे, तो यह औषधि उपयोगी है।
मस्तिष्क के लकवा के कारण पागलपन – 
प्रचंड पागलपन के लिये तो बेलाडोना आदि दवाएं हैं, परन्तु जब रोग पुराना पड़ जाता है और मस्तिष्क के पक्षाघात के कारण रोग ठीक होने में नहीं आता, रोगी सदा चुपचाप बैठा रहता है, किसी से बात नहीं करता, अपने दिल में निराश रहता है, तब पक्षाघात के कारण उत्पन्न यह पागलपन इस दवा से ठीक हो जाता है।
 स्पर्श न सहन सकना – 
स्पर्शासहिष्णुता इसका चरित्रगत-लक्षण है। जैसे कच्चे फोड़े को छुआ जाय तो दर्द होता है, वैसा दर्द इस औषधि में भिन्न-भिन्न स्थानों पर पाया जाता है। खांसते हुए छाती में फोड़े का-सा दर्द होता है, गले में फोड़े का-सा दर्द, पेट की शोथ में फोड़े का-सा दर्द, दस्त आते हों तो धोती या साड़ी के स्पर्श को भी आते नहीं सक सकतीं, इन्हें ढीला करना पड़ता है, मलद्वार में भी लाली दिखाई देती है जहां छूने से दर्द होती है – स्पर्श के प्रति इस तरह की असहिष्णुता कॉस्टिकम का व्यापक-लक्षण है। यह स्पर्श को दर्द के कारण सह न सकना आर्निका की तरह का नहीं है। आर्निका में कुचले जाने का-सा दर्द होता है, वह दर्द मांस-पेशियों (Muscles) में होता है। यह दर्द रस टॉक्स के दर्द के समान भी नहीं है। रस टॉक्स का दर्द मोच खाये दर्द के समान होता है, और मांस-पेशियों के ‘बन्धनों’ तथा मांस-पेशियों के ‘आवरणों’ (Sheaths) में होता है। कॉस्टिकम का स्पर्श न सह सकने का दर्द ‘श्लैष्मिक-स्तरों’ (Mucous surfaces) में होता है, मानो वहां अध-पके फोड़े का-सा दर्द ही रहता हो।



मलाशय से अपने-आप मल निकल जाना या कब्ज हो जाना तथा गुदा-भ्रंश – मलाशय पर लकवा का असर दो तरह का हो सकता है। क्योंकि मलाशय काम नहीं करता इसलिये या तो एलो की तरह मल अपने-आप बाहर निकल पड़ेगा, या मल निकलेगा ही नहीं, कब्ज हो जायगी। दोनों अवस्थाएं पक्षाघात का परिणाम है। मलाशय के पक्षाघात में कॉस्टिकम औषधि का विशेष-लक्षण यह है कि रोगी खड़े होकर ही टट्टी कर सकता है। गुदा के लकवा के कारण गुदा-भ्रंश भी हो जाता है।

* गठिये में पुट्ठों और नसों का छोटा पड़ जाना और ठंडी हवा में आराम – 
गठिये के इलाज में रोगी प्राय: मालिश आदि कराते हैं, नाना प्रकार के तेलों का इस्तेमाल करते हैं, डाक्टरी इलाज में छाले आदि डलवाते हैं। इन सबके कारण जोड़ और अंग विकृत हो जाते हैं, पुट्ठे और नसें छोटी पड़ जाती हैं। बांह या पैर सीधा नहीं किया जा सकता, सीधा करने से वे अकड़ जाते हैं ये कष्ट सर्दी से बढ़ जाते हैं, रोगी का मन घबराया रहता है, उसे भय सताने लगता है कि कोई असह्य-कष्ट आने वाला है। रोग का मुख्यतौर पर आक्रमण जबड़े पर होता है। गठिये में कॉस्टिकम का विशेष-लक्षण यह है कि रोगी ठंड या नम हवा में ठीक रहता है। जब-जब भी नम या सर्द मौसम आती है गठिया (Arthritis) गायब हो जाता है। साधारण तौर पर गठिये का रोग ठंड से या नम हवा से बढ़ना चाहिये, परन्तु कॉस्टिकम में उल्टा पाया जाता है। लीडम में तो गठिये का रोगी पैर को या गठिया-ग्रस्त अंग को बर्फ के पानी में रखता है, तब उसे चैन पड़ती है।
*खांसी में ठंडे पानी के घूंट से आराम तथा कुल्हे के जोड़ में दर्द –
 खांसी सूखी आती है, सारा शरीर हिल जाता है, रोगी कफ को बाहर निकालने की कोशिश करता है, निकाल नहीं पाता, वह इसे अन्दर ही निगल जाता है। खांसते हुए गले में, छाती में फोड़े के समान दर्द होता है। अगर इस खांसी में ठंडे पानी का घूंट पीने से आराम पड़े, तो कॉस्टिकम ही दवा है। इस कफ़ में लेटने से खांसी बढ़ती है, और अद्भुत-लक्षण ये है कि खांसते हुए कुल्हे के जोड़ में दर्द होता है। इस औषधि में अनेक रोग- ठंडे पानी से आराम- इस ‘विलक्षण-लक्षण’ के आधार पर ही ठीक हो जाते है।
मस्सों का होम्योपैथिक दवा –
 कॉस्टिकम औषधि में सारे शरीर पर मस्से पैदा करने की शक्ति है। शरीर पर, आंख की पलकों पर, चेहरे पर, नाक पर यह मस्से पैदा करती है, इसलिये मस्सों को यह दूर भी करती है। डॉ० टायलर मस्सों के विषय में अपना अनुभव लिखते हुए कहती हैं कि उनके फार्म में बछड़ों के मुख, नाक और कानों पर जब मस्से निकलने लगे, तब उनके पिता ने निम्न-शक्ति का कॉस्टिकम पानी में घोल कर उन्हें पिला दिया जिससे सबके मस्से झड़ गये। थूजा भी मस्सों की औषधि है, परन्तु थूजा के मस्से ज्यादातर गुदा-द्वार और जननांगों पर होते हैं।
मासिक-धर्म दिन को ही होता है – 
मासिक-धर्म सिर्फ दिन को होता है, लेटने से बन्द हो जाता है, रात को नहीं होता – यह इसका विचित्र-लक्षण है। कैक्टस तथा लिलियम में भी ऐसा ही होता है। मैगनेशिया कार्ब, अमोनिया म्यूर और बोविस्टा में मासिक सिर्फ रात को लेटने से होता है, चलने-फिरने से बन्द हो जाता है, क्रियोजोट में भी चलने-फिरने से मासिक-धर्म बन्द हो जाता है।
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मोतियाबिन्द की दवा – 
कॉस्टिकम में व्यक्ति रोशनी को सह नहीं सकता। आंख के आगे काले भुगने से उड़ते दीखते हैं। मोतियाबिंद की यह उत्तम औषधि है। देखने में ऐसे गलता है कि रोगी धुंध में से देख रहा हो, आंख के सामने एक पर्दा-सा आ जाता है। एक स्त्री जिसे मोतियाबिंद था, और बायीं आंख में तो बहुत बढ़ चुका था, कॉस्टिकम से बिल्कुल ठीक हो गई। पहले उन्होंने उसे 1000 शक्ति की एक ही दिन में चार मात्राएं दीं। चार मास के बाद देखने से पता चला कि दृष्टि में बहुत सुधार हुआ। तब उन्होंने 40000 शक्ति की एक ही दिन में चार मात्राएं दीं। साल भर बाद दायीं आंख बिल्कुल ठीक हो गई, बायीं आंख में रोग का कुछ अवशेष बचा रहा। तब उन्होंने रोगिणी को 1 लाख की एक मात्रा दी और कुछ मास में बायीं आंख का मोतियाबिंद भी जाता रहा।
 अन्य–लक्षण
*रोगी आग से जलने के बाद ठीक नहीं हुआ हो – अगर रोगी कहे कि जब से वह आग से जला है तब से वह ठीक नहीं हुआ, तब इस दवा की तरफ ध्यान जाना चाहिए।
*प्रात: गला बैठना – अगर प्रात:काल आवाज बन्द रहे तो कॉस्टिकम, अगर सायंकाल आवाज बन्द हो तो कार्बो वेज और फॉसफोरस को ध्यान में रखना चाहिए।
*पुराना घाव बार-बार फूटे – अगर पुराना घाव ठीक हो होकर बार-बार फूटे तब यह लाभप्रद है।
*मोतियाबिंद – मोतियाबिंद में कुछ दिन प्रतिदिन 30 शक्ति की एक मात्रा देने से लाभ हुआ है।
*अगर कोई दवा लाभ देना बन्द कर दे – अगर यह देखा जाय कि रोगी दवा देने से कुछ देर ठीक रहता है, फिर वही हालत हो जाती है, तो सोरिनम, तथा सल्फर की तरह कॉस्टिकम को भी ध्यान में रखना उचित है।
शक्ति तथा प्रकृति – शक्ति 3 से 30; पुराने रोगों में उच्च शक्ति सप्ताह में एक या दो बार। फॉसफोरस को कॉस्टिकम से पहले या बाद में नहीं दिया जाता। औषधि ‘सर्द’- प्रकृति के लिए है।
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