3.10.16

शिशु-रोग के उपचार और सही पालन पोषण



शिशु का सही पालन पोषण
मां को अपने बच्चे को अपना दूध पिलाते रहना चाहिए।
4 बूंदे शहद की रोजाना सुबह उठते ही बच्चे को चटाने से बच्चों को सभी रोगों से सुरक्षा हो जाती है। बच्चों का वजन भी बढ़ जाता है। शहद को चटाने से बच्चों के दांत निकलते समय कोई परेशानी नहीं होती है।
बादाम की एक गिरी को रात में पानी में भिगोकर रख दें। सुबह उठने पर बादाम को किसी साफ पत्थर पर चंदन की तरह बिल्कुल बारीक पीसकर अपनी अंगुली से धीरे-धीरे बच्चे को चटा दें। इससे बच्चे का दिल-दिमाग अच्छा बना रहता है और बच्चा खुशमिजाज रहता है। (नोट : बादाम कड़वा नहीं होना चाहिए)
4 महीने के उम्र के बच्चे को रोजाना दोपहर में एक पूरे संतरे का रस निकालकर और छानकर पिलाना चाहिए। अगर जरूरत पडे़ तो 4 सप्ताह के बच्चे को संतरे का रस और पानी बराबर मात्रा में मिलाकर दो चम्मच दिया जा सकता है। धीरे-धीरे पानी की मात्रा कम कर दी जाये और रस की मात्रा बढ़ा दी जाये। यह रस पिलाने से बच्चा सेहतमंद होता है और उसका रंग भी साफ हो जाता है।
धीरे-धीरे बच्चे को फलों के रस के अलावा हरी-सब्जियों का सूप (टमाटर, गाजर, पालक, धनिया, हरी पत्तियां) या मूंग की दाल का पानी आदि पीने वाले पदार्थ थोड़ी थोड़ी मात्रा में पिला सकते हैं।
.बच्चों के सीने को चौड़ा करना : तीन महीने तक की उम्र के बच्चे को शुरू में दिन में तीन मिनट उल्टा जरूर लिटायें। उसके बाद जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता चला जाता है उसको उल्टा लिटाने का समय बढ़ाते जायें। इससे बच्चे की छाती चौड़ी होगी और उसकी पाचनशक्ति भी बढ़ेगी। इसके साथ ही बच्चे के पेट में कोई तकलीफ नहीं होगी।
हफ्ते में कम से कम 2 से 3 बार सरसों या जैतून के तेल की मालिश करके बच्चे को नहलाना चाहिए। इससे बच्चे मोटे और सेहतमंद बन जाते हैं। बच्चे का वजन जन्म होने पर लगभग ढाई किलो होता है, चार महीने के बाद उस बच्चे का वजन जन्म से दो गुना अर्थात लगभग 5 किलो होना चाहिए और साल भर के बच्चे का वजन कम से कम जन्म से तिगुना या साढ़े सात किलो के आसपास होना चाहिए।
शिशुओ के दाँत निकलना
बच्चों में दाँत 6 से 8 वें महीने निकलें शुरू होते है , कुछ बच्चों में देरी से भी दाँत निकलते हैं। आमतौर पर यह बच्चे के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। अगर बच्चों के दाँत देरी से निकलने शुरू होते हैं तो इस बारे में ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। दाँत निकलने का क्रम सही होना चाहिए। बच्चों के दाँत पहले नीचे, सामने निकलते हैं, फिर ऊपर के सामने के दाँत आते हैं।
बच्चे के जब दाँत निकलने शुरू होते हैं तो उसके मसूड़े सूज जाते हैं। उनमें खुजली होती है, इससे उसे हर समय झुंझालाहट होती है। इस दौरान वह अक्सर अपनी ऊँगली मुँह में डालता रहता है।
उसे अपने आसपास, जो भी चीज दिखाई देती है, वह हर चीज को मुँह में डालता रहता है। इस दौरान सबसे ज्यादा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि बच्चा, जो कुछ भी मुँह में डाले, वह गंदा न हो।
आमतौर पर यह कहा जाता है कि दाँत निकलते समय बच्चे को दस्त लग जाते हैं। हालांकि ऐसा होता भी है, लेकिन इसकी खास वजह होती है बच्चे की साफ-सफाई में बरती गई लापरवाही। बच्चे को इस दौरान दस्त तभी लगते हैं, जब कोई गंदी चीज उसके मुँह में चली जाती है।
हमारे मुँह में जीवाणु हमेशा मौजूद रहते हैं। बच्चे के जब दाँत नहीं होते, उस समय उसके मुँह के अंदर जीवाणुओं की तादाद कम होती है और जैसे-जैसे बच्चे के दाँत निकलते जाते हैं, जीवाणुओं की संख्या भी बढ़ती जाती है, क्योंकि बच्चा जीवाणुओं को झेल नहीं सकता, इसलिए उस का पेट खराब हो जाता है और उसे दस्त लग जाते हैं।
धीरे-धीरे जब बच्चा जीवाणुओं के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है तो उस का पेट भी ठीक हो जाता है। बच्चे को शारीरिक परेशानी हो तो उसे डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा देनी चाहिए।
शिशुओ का बुखार
मोजे गीले करके उन्हें एड़ियों में पहनना अजीब लगता है, लेकिन बच्चों के तेज बुखार को कम करने के लिए यह अद्भुत काम करता है। एक जोड़ी सूती मोजे लें जो बच्चे की एड़ियों को कवर करने के लिए पर्याप्त लम्बे हों। मोजे को नल के ठंडे पानी में ठीक से गीला कर लें। अतिरिक्त पानी को निचोड़ दें। मोजों को बच्चे के पैरों पर रख दें और जब मोजे सूख जायें तो इस प्रक्रिया को दोहरायें।
गर्म या गुनगुने पानी से स्नान करें। गुनगुने पानी से स्नान करके दौड़ें। बुखार से पीड़ित व्यक्ति को कूदने दें और उसे छोड़ दें, तो गर्म तापमान धीरे धीरे नीचे आ जाता है क्योंकि तापमान अचानक के बजाय धीरे-धीरे ही नीचे आता है। व्यक्ति ताप परिवर्तन पर ध्यान कम देता है। (अपेक्षाकृत) शांत, नम पानी तापमान को समतल स्तर पर ले आता है, यदि ऐसा न हो तो तापमान को कम करना चाहिए।





सिर और गर्दन को ठंडा करें। बहुत तेज बुखार के लिए, एक बड़ा सूती कपड़ा पानी में अच्छी तरह से डुबोएं,अतिरिक्त पानी को निचोड़ दें। कपड़े को बच्चे के सिर और गर्दन के चारों ओर लपेटें तथा जब कपड़ा सूख जाए, तो इसे दोहरायें।तेल मालिश करें। दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए, सोने से पहले,उनके पूरे शरीर को शुद्ध जैतून के तेल से मालिश करके उन्हें अच्छी तरह से सूती कपड़े और एक कंबल में लपेट दें। तेल को हटाने के लिए उन्हें सुबह स्नान करायें । यह कदम गीले मोजे के साथ अच्छी तरह से काम करता है।
पानी का खूब सेवन करें।बुखार जीवों से लड़ने के लिए आपके शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है, लेकिन अधिक ताप का मतलब पानी की कमी है। पानी की कमी न होने दें, खासकर दस्त या उल्टी होने पर, क्योंकि इससे शरीर में पानी की कमी हो जाती है।
हल्के कपड़े पहनें, मोटे कपड़े न पहनें। कंबल न लपेटें चाहे ठंड ही क्यों न महसूस हो रही हो, क्योंकि इससे आपके शरीर के तापमान में वृद्धि होगी।
इमली के रस या एलो वेरा जेल या अमरूद की पत्ती के रस का उपयोग करके शरीर के तापमान को तेजी से कम किया जा सकता है। रस को माथे पर लगायें, इसे सूखने दें और फिर लगायें, जब तक कि आपके शरीर के तापमान में कमी न हो जाये। घर में हवा के लिए पंखा चलायें। लेट जायें और ठीक से आराम करें।
छोटे बच्चों को बड़ी जल्दी बीमारियां घेरने लगती है। कई बार बच्चे के रोगों का पता भी नहीं चल पाता है कि वह किस समस्या से परेशान है। सामान्य परेशानियां जैसे प्रायः पेट फूलना, चुनचुने लगना, जुकाम, पेट में एठन होना मुख्य समस्याएं हैं जिनके बारे में बच्चे की मां को पता होना चाहिए। इन लक्षणों (symptoms of children’s diseases) के आधार पर पर नवजात बच्चों की बीमारी का पता लगाया जा सकता है।
1. बीमारी के शुरूआत में शिशु में चिड़चिड़े पन के साथ रोने लगता है।
2. शिशु में बेचैनी का बढ़ना।
3. शिशु का सुस्त और निढाल सा होना।
4. मां की गोद में भी न आना।
5. बच्चे की त्वचा का शुष्क होना।
6. मां का दूध भी न पीना। या पीने के बाद उल्टी कर देना।
7. मल त्याग न कर पाना।
8. बच्चे के किसी भाग में दर्द होना और उस भाग का लाल और कड़ा होना तथा उसे छूने पर बच्चे का रोना। समय रहते रोगों के लक्षणों की पहचान से बच्चे को रोगों से बचाया जा सकता है।
कब्ज
शिशु को समय पर शैच का न आना।
मल का सख्त और उसका कठिनता से निकलना।
कारण
शिशु का दूध अधिक पीना या कम पीने की वजह से कब्ज होती है।
पेट में विकार होने से भी कब्ज हो सकती है।
इलाज





शिशु को गुनगुना जल पीलाएं।
उपर के दूध में छुआरा या मुनक्का उबाल कर बच्चे को दे सकते हो।
देशी जन्म घुटी बच्चे को देनी चाहिए।
शिुशु को पालक का साग मसलकर खिलाना चाहिए।
बच्चों को दस्त संबंधी रोग सबसे अधिक होते हैं। एैसी अवस्था में बच्चे को दूध भी नहीं पच पाता है। बच्चों के दस्त दो प्रकार के होते हैं।
पहले प्रकार के दस्त
इस प्रकार के दस्त में बच्चे को शैच में ही सफेद रंग की बुंदकिया होती है।
कभी शैच राख के रंग की तरह होता है।
कारण
दूध अधिक मात्रा में पी जाना।
दूध में चिकनाई का अधिक होना।
उपचार
एैसे में दूध की मात्रा कम कर दें।
दूध में थोड़ा पानी मिलाकर दूध को हल्का कर देना चाहिए।
दस्त के दूसरे प्रकार
लक्षण
दस्तों का झागदार होना।

कारण
दूध में चीनी अधिक डालना।
उपचार
दूध में उबला पानी मिलाकर शिशु को पिलाना चाहिए।
दस्त के तीसरे प्रकार
लक्षण
तीसरी प्रकार के दस्त में बच्चों को पतले और हरे रंग के दस्त होते हैं।
कारण
बच्चे को डिब्बे या भैंस का दूध हजम नहीं होना।
शिशु के द्वारा कम मात्रा में दूध सेवन करना भी दस्त का कारण बन सकता है।
उपचार
भैसं का दूध शिशु को न दें। मां का दूध का सेवन कराएं
शिशु के दूध की मात्रा बढ़ा दें और बच्चे की मां को दलिये का सेवन करना चाहिए।
पेट में पीड़ा होना
लक्षण






पेट का फूल जाना।
पेट में पीड़ा या शूल रहना।
कारण
दूध में शक्कर या प्रोटीन की ज्यादा मात्रा होना इस रोग का कारण बनती है।
इलाज
शिशु को बकरी का दूध का सेवन कराएं।
शिशु के पेट की सिकाई करें।
शिशु को दूध में शक्कर डालकर देना चाहिए।
शिशु को दूध में पानी मिलाकर देना चाहिए।
ऐठन होनाऐठन होने पर
शिशु का चेहरा पीला पड़ जाता है। और शिशु की मांसपेशियों में खिंचाव आने लगता है।
उपचार
शिशु को दूसरे बच्चों से दूर रखें।
शिशु के कपड़ों को ढीला कर लें।
शिशु को ठंड से बचायें।
सूखा रोग
इस रोग में शिशु पीला पड़ जाता है। और उसकी त्वचा पर झुर्रियां या सिकुड़ने आदि पड़ने लगती है। सूखा रोग में शिशु का वजन कम हो जाता है साथ ही वह हड्डियों का ढांचा मात्र लगने लगता हैं। शिशु के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने लगता है। इसका सबसे बड़ा कारण है विटामिन सी की शरीर में कमी। इस रोग से बचाव में शिशु का विटामिन सी वाले पदार्थ देते रहना चाहिए।



शिशु का उल्टी होना 
शिशु को यदि उल्टी हो रही हो तो उसे नियमित रूप से ओआरएस का घोल पिलाएं। सबसे पहले आप ओआरएस के घोल को उबाल कर ठंडा करके शिशु को पिलाते रहें। आप केवल 24 घंटे तक एक घोल का इस्तेमाल कर सकते हैं। उसके बाद दूसरा घोल बनाकर शिशु को दें।
किस तरह से करें शिशु की देखभाल बीमारी में
मां को चाहिए कि वे अपने बच्चे को स्तनपान करवाती रहे।
दांत निकलने से बच्चे को होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए बच्चे को सुबह के समय में शहद चटाएं। शहद बच्चे को हर प्रकार की समस्या से बचाता है।
बच्चे की तेल से मालिश करें। दो साल से कम उम्र के बच्चे की मालिश रात को सोने से पहले जैतून के तेल से करें।
बुखार होने पर
बच्चे को खूब पानी दें। उल्टी होने पर भी बच्चे को पानी जरूर दें। शरीर में पानी कम कमी से बच्चे की जान को खतरा हो सकता है।
बच्चे को मोटे कपड़े ना पहनाएं। जितना हो सके हल्के कपड़ो को ही बच्चे को पहनाएं।
बुखार होने पर गीले मोंजों को बच्चे के पैरों पर रख दें। और मोजे सूखने पर दोबारा इस क्रिया को दोहराएं।
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